





जीवन का अर्थ है- समस्या, परेशानी, संघर्ष और हर क्षण एक भय, न जाने किस क्षण कौन सी विपदा आ खड़ी हो जहां सुख प्रसन्नता पलक झपकते ओझल होते देर नहीं लगती और साधक का अर्थ है उन समस्त समस्याओं से जूझ जाना, प्रत्येक भय को समाप्त कर उस पर विजय प्राप्त करना। यह सब लक्षण प्रकट होते हैं मात्र हनुमान के साधक में, क्योंकि हनुमान ही ऐसे देव है, जिनमें अदम्य बल, साहस, बुद्धि, कर्मठता, तेजस्विता, तुरन्त निर्णय लेने की क्षमता और संकटों पर विजय प्राप्त कर लेने का साहस हैं ऐसा समन्वय आदि किसी में है तो हनुमान में ही है।
हनुमान साधना सम्पन्न करना वास्तव में साधक के लिये समस्त आपदाओं के समक्ष वज्र के समान खड़े हो जाने की प्रक्रिया है, जिससे समस्यायें उससे टकरा कर वापस लौट जायें। इसलिये यह साधना कोई साधना प्रयोग मात्र नहीं है। महाभारत में स्वयं कृष्ण ने अर्जुन से कहा, कि अर्जुन! यदि तुम्हें महाभारत में विजय प्राप्त करनी है और राज्य, धन, वैभव, यश, प्रतिष्ठा प्राप्त करनी है तो तुम्हें हनुमान साधना सम्पन्न करनी ही पड़ेगी। अपने अन्दर उनके बल को उनके त्वरित निर्णय लेने की क्षमता को, उनकी बुद्धि, उनके साहस को आत्मसात् करना पड़ेगा, तभी तुम अपने लक्ष्य में, सफल हो सकोगे और जब अर्जुन ने यह साधना सम्पन्न की तो वह फिर अपने सम्पूर्ण जीवन में कभी समस्याओं से नहीं डगमगाए, फिर वह कभी भी पराजित नहीं हुये और इसका रहस्य था कृष्ण ने, स्वयं जगद्गुरू ने, उसको अपना शिष्य बनाकर उसे दीक्षा प्रदान की और उसे पूर्ण विधि-विधान से साधना सम्पन्न करवाई।
इस साधना के फलस्वरूप फिर अर्जुन ने सम्पूर्ण महाभारत युद्ध लड़ा और उनके बड़े-बड़े दिग्गजों से, भीष्म द्रोणाचार्य, कर्ण आदि से युद्ध किया और सब पर उसने विजय प्राप्त की।
हनुमान साधना का रहस्य ही यही है, कि इसे सम्पन्न कर साधक में भी वह समस्त गुण आ जाते हैं जो हनुमान के पास थे। यदि साधक पूर्ण एकाग्रता, पूर्ण विश्वास के साथ मंत्र जप करता है, तो हनुमान स्वतः प्रत्यक्ष होकर साधक की अभीष्ट पूर्ति करते ही है।
और फिर वर्तमान युग के लिये यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साधना है, जब जीवन में संघर्ष, समस्याऐं, कठिनाईयां, उलझन, तनाव, ही हैं। यह साधना वास्तव में जीवन को पूर्ण रूप से जीने की साधना है। कायरता, डर, भयमुक्त जीवन, जीवन नहीं कहलाता और दुर्बल मनुष्य तो आज के समाज में कहीं स्थापित ही नहीं हो सकता। ऐसे ही मनुष्यों के लिये यह साधना है।
इस साधना को सम्पन्न करने के लिये कुछ विशेष सावधानियाँ बरतनी चाहिये।
हनुमान जितने सरल प्रकृति के हैं, क्रोध में आने पर उतने ही उग्र हो जाते हैं, इसलिये यदि साधक साधना काल में अत्यधिक क्रोध में रहने लगता है तो परेशान नहीं होना चाहिये अपितु गुरू मंत्र का जप कर लेना चाहिये।
साधकों के लिये तो यह सिद्धियों का द्वार खोलने की साधना है। हनुमान स्वयं कभी किसी के समक्ष पराजित नहीं हुये, अपितु कितनी भी विपरित स्थिति हुई उसमें भी वे अपनी चार्तुयता से विजयी हुये है और साधकों में यह गुण उनकी श्रेष्ठता का गुणबद्ध होना चाहिये, कि कैसी भी समस्या हो, कैसी भी परिस्थितियाँ हो अपने पुरूषार्थ से अपने बल, चातुर्य से विपरित स्थितियों में सफलता प्राप्त करे ही।
हनुमान का एक प्रमुख गुण था, कि उन्हें अपने इष्ट, अपने गुरू में अखण्ड विश्वास था, कि उनके इष्ट उनके साथ है, इस कारण वे प्रत्येक कार्य करने को उद्यत रहते थे, चाहे वह लंका तक पहुंचना हो, समुद्र को पार करना हो या फिर लक्ष्मण के लिये जड़ी-बूटियों का पूरा पहाड़ लाना हो। यदि साधक साधना के प्रति, साधना में सफलता प्राप्ति के प्रति तथा अपने गुरू के प्रति पूर्ण विश्वास युक्त होकर इस साधना में प्रवृत होता है तो यह सम्भव ही नहीं, कि वह सफलता प्राप्त न करें। हनुमान साधना का मूल उद्देश्य तो यही है।
साधना विधिः
हनुमान का ध्यान करें-
बालार्कयुत तेज संत्रिभुवन प्रक्षोभकं सुन्दरं।
सुगीव्रादि मस्तवान रगणैः संसेत्यपादाम्बुजम्।।
नादेनैव समस्तराक्षसगणान्संत्रासयन्तं प्रभुं।
श्रीमुद्रामपदाम्बुजस्मृतिरतं ध्यायसामि वातात्मजम्।।
मंत्रः
।। ऊँ नमों आजनेयाय रूद्रात्मकाय नमः।।
।। Om Namo Aajaneyaye Rudraatmakaaye Namah।।
नित्य मंत्र की 5 माला जप होने के पश्चात साधक साधना स्थान पर ही सो जायें।
तीन दिन बाद यंत्र तथा माला नदी में प्रवाहित कर दें।
साधक जो भी कामना लेकर यह साधना सम्पन्न करेगा उसमें उसे सफलता प्राप्त होगी ही।
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