





शिष्य द्वारा अपने हृदय में गुरू को धारण करना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु यह तो प्रारम्भ मात्र है, जैसा कि एक बार पूज्य गुरूदेव ने कहा था-
‘‘यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, कि गुरू को कितने शिष्य याद करते है? यह भी उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, कि ‘गुरू’ शब्द को कितने शिष्यों ने अपने हृदय पटल पर अंकित किया है? यह भी उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, कि कितने शिष्य गुरू सेवा करने की कामना अपने दिल में रखते हैं? यह भी उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, कि कितने शिष्य गुरू की प्रसन्नता हेतु सचेष्ट है?’’
‘‘-अपितु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण यह है, कि गुरू कितने शिष्यों को याद करता है।’’
‘‘-अपितु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण यह है, कि गुरू के होठों पर कितने शिष्यों का नाम आता है।’’
‘‘-अपितु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण यह है, कि कितने शिष्यों के नाम गुरू के हृदय पटल पर खुदे हुए है।’’
‘‘-अपितु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण यह है, कि गुरू ने किस शिष्य की सेवा स्वीकार की है।’’
‘‘-अपितु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण यह है, कि गुरू किस शिष्य पर प्रसन्न हुआ है।’’
और गुरू के होठों पर शिष्य का नाम उच्चरित हो, गुरू के हृदय पटल पर शिष्य का नाम अंकित हो, गुरू सेवा का अवसर प्राप्त हो तथा शिष्य के कार्यो से गुरू प्रसन्न हों, यह शिष्य जीवन का परम सौभाग्य है तथा प्रत्येक शिष्य की यही प्राथमिक इच्छा होती है। जिस शिष्य को ऐसा दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त होता है, अणिमादि सिद्धियां उसके सामने नृत्य करती है, कि शारीरिक रूप से गुरू गृह में रह कर ही सम्पन्न की जाय, अपितु महत्त्वपूर्ण गुरू सेवा यह है, कि शिष्य कितना अधिक गुरू द्वारा प्राप्त ज्ञान के द्वारा लोगों को लाभान्वित करता है तथा कितने अधिक लोगों को गुरू से जोड़ने का कार्य करता है, निःस्वार्थ निष्कपट भाव से।
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