



भिन्न-भिन्न धर्म ग्रन्थों में लिखे गये कृत्य के पालन को ही मानव जीवन का कर्तव्य कहा गया है। जिसे वे अनुयायी पुरे तन-मन-धन से मानते हैं, परंतु हमारे सनातन धर्म में स्वयं का विकास, स्वयं उद्धार, ज्ञान की प्राप्ति, धन की प्राप्ति, विवेक की प्राप्ति, यश की प्राप्ति को ही अपने जीवन का कर्तव्य कहा गया है।
चौरासी लाख योनियों में मनुष्य ही कर्म योनी है, आप स्वयम् कर्म कर-कृत्य कर फलों को भोग व प्राप्त कर सकते हो। आप अपने कर्मों के फलस्वरुप ही पितृ और देव योनि में प्रवेश कर सकते हो, इसके अतिरिक्त सभी योनि पाप-योनियाँ हैं जहाँ कष्ट-पीड़ा-तिरस्कार व दुखों पर आश्रित रहना होता है। एक गधा कितनी भी मेहनत क्यों न कर ले वह कभी ऐश्वर्य पूर्ण जीवन नहीं जी सकता। एक श्वान (कुत्ता) कितना भी वफादार हो जाये, मालिक नहीं बन सकता। वहीं मनुष्य योनि-कर्म योनि आपको केवल अपने कर्म से, अपने कर्तव्य पालन से निर्धन से धनवान, रोगी से योगी, असाध्य से साध्य बनाते हैं।
मनुष्य-पितृ-देव तीनों योनि में केवल मनुष्य मुक्ति-मोक्ष पाने का सामर्थ्य रखते हैं। अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता भगवान हनुमान स्वयम् भी मुक्त नहीं हो सके। खैर यह तो उनकी लीला है पर आप इस जीवन काल में अपने कर्म से, अपने पुण्य से, अपने आज को बदल सकते हो।
यह जीवन कई योनियों बाद मिला है, यह अति दुर्लभ-देह तो एक वरदान है, इस जीवन का हर क्षण क्षय हो रहा है परन्तु जीवन अभी शेष है, बहुत कुछ पाना, पूर्ण करना, विजय होना अभी शेष है, अवसर और भी आने हैं, आपको तो केवल उनको अपने अन्दर समाहित करना है।
यह संसार रूपी समुद्र पार करने के लिये आपका देह एक सुन्दर, दृढ़ नौका है व गुरु उस नौका के चालक, कर्णधार हैं, आपके कर्म, भक्ति, इसकी अनुकूल हवा जो आपको आगे बढ़ने में सहायक है।
स्वयं के विकास, समृद्धि, विवेक की प्राप्ति है, आपके उपरान्त आपके परिवार का आपके बच्चों का क्या होगा इस व्यर्थ की चिंता में समय व्यर्थ मत करो। वे तो एक-सवा महिने में आगे बढ़ जायेंगे। आप अपना आज सुधार लेते हो तो आपका और आपके परिवार का स्वतः ही कल समृद्ध होगा। क्यों व्यर्थ चिंता करते हो आपके गुरु पूर्व में भी आपके साथ थे, आज भी आपके समक्ष व आज भी दृढ़ता के साथ आपके ही साथ हैं।
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण का अनुशरण कर विजयश्री हुए, उनके भी मन-मस्तिष्क में हजारों संदेह-भ्रान्तियां थी। भगवान श्री हनुमान को भी अपने सामर्थ पर, अपनी शक्ति पर संदेह था; पर वे फिर भी श्री राम पर, राम नाम पर, विश्वास कर अजर-अमर हुए, आप भी अपने इष्ट पर अपने गुरु पर विश्वास कर विजयश्री हो सकते हो, आपको केवल अपने कर्तव्यों का पालन करना है- जो स्वयं के लिये किये कृत्य हैं!!
सन्देह व भ्रान्तियां आना तो स्वाभाविक है आपको तो केवल उनको अपने गुरु के चरणों में रखना है।