





समाधि संसार का अंत और सत्य का प्रारम्भ है। समाधि मन की मृत्यु और आत्मा का जन्म है। इस ओर से देखें तो समाधि अंतिम चरण है, उस ओर से देखें तो समाधि पहला चरण है।
श्रवण, मनन, निदिध्यासन, इनसे मन क्षीण होता चलता है, लीन होता चलता है, समाधि में पूरी तरह लीन हो जाता हैं और जहां मन पूरी तरह लीन हो जाता है, वहां उसका अनुभव शुरू होता है, जो वस्तुतः हम हैं। इस समाधि के संबंध में यह सूत्र है। और इस सूत्र में कुछ बहुत गहरी बाते हैं।
समाधि के समय वृत्तियां केवल आत्मरूप विषय वाली होती है, इससे जान नहीं पड़ती, पर समाधि में से उठे हुए साधक की वे उत्थान पाई हुई वृत्तियां स्मरण से अनुमान की जाती है।’
जो साधना में लगे है, उनके लिये, आज नहीं कल, काम की होगी।
समाधि में कोई अनुभव नहीं होता। सुन कर कठिनाई होगी। समाधि में कोई अनुभव हो भी नहीं सकता। और समाधि परम अनुभव भी है। यह विरोधाभासी वक्तव्य है, उल्टा दिखाई पड़ता है। लेकिन कुछ कारण से उलटा दिखाई पड़ता है। समाधि में परम आनन्द का अनुभव होता है, लेकिन समाधि में डूबे हुए साधक को कोई भी पता नहीं, चलता, क्योंकि साधक और आनन्द एक हो गये होते है, पता चलने के लिये दूरी नहीं रहती।
हमें पता उन्हीं चीजों का चलता है जिनसे हम भिन्न है, अलग हैं, दूर हैं। समाधि में आनन्द की जो प्रतीती होती है, जो अनुभव होता है, उसका कोई पता समाधि में नहीं चलता। जब साधक समाधि से वापस लौटता है, तब अनुमान करता है कि आनन्द हुआ था, पीछे से स्मरण करता है कि परम आनन्द हुआ था, अमृत बरसा था, जीये थे किसी और ढंग में और जीवन की कोई गहन स्थिति अनुभव की थी- यह पीछे से स्मरण आता है, जब मन लौट आता है।
श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि, ये चार सीढ़ियां हैं। इनसे साधक समाधि के द्वार पर जाकर अनुभव करता है। अगर समाधि में ही साधक रह जाये और वापस न लौट सके, तो अपने अनुभव को कभी भी न कह सकेगा। अपने अनुभव को बताने का फिर कोई उपाय नहीं है। लेकिन जो साधक समाधि को उपलब्ध हो जाता है, वह वही का वही वापस कभी नहीं लौटता, नया ही होकर लौटता है,। लौट कर सारे संबंध उसके मन से बदल जाते है, लेकिन लौटता है मन में।
पहले जब मन में था तो गुलाम था मन का, कोई मालकियत न थी अपनी। मन जो चाहता था, करा लेता था, मन जो बताता था, वही मानना पड़ता था, मन जहां दौड़ता था, वही दौड़ना पड़ता था। मन की गुलामी थी, मन के हाथ में लगाम थी आत्मा की।
समाधि के द्वार से लौटता है साधक जब वापस मन में, तो मालिक लौटता है। लगाम उसकी अब अपने हाथ में होती है। अब मन को जहां ले जाना चाहता है, वहां ले जाता है। नहीं ले जाना चाहता तो नहीं ले जाता। चलाना चाहता है तो चलाता है, नहीं चलाना चाहता तो नहीं चलाता है। मन की अब अपनी कोई सामर्थ्य नहीं रह जाती। लेकिन समाधि को उपलब्ध साधक जब मन में लौटता है-मालिक होकर- तभी वह स्मरण कर सकता है। क्योंकि स्मरण मन की क्षमता है। तभी वह पीछे लौट कर देख सकता है मन के द्वारा कि क्या हुआ था।
इसका मतलब हुआ कि मन केवल संसार की ही घटनाओं को अंकित नहीं करता है, जब साधक समाधि में पहुंचता है, और जो घट रहा होता है, वह भी मन अंकित करता है। मन दोहरा दर्पण है। उसमें बाहर का जगत भी प्रतिबिंबित होता है, उसमें भीतर का जगत भी प्रतिबिंबित होता है। तो जब साधक लौटता है मन में तभी अनुभव कर पाता है कि क्या घटा! तो फिर वह तीन सीढ़ियों से लौटे, तो ही अभिव्यक्ति कर सकता है।
पहली सीढ़ी होगी साधक की समाधि से लौटते वक्त, निदिध्यासन। निदिध्यासन में उसको अनुभव होना शुरू होगा, समाधि में जो उसने जाना था सूक्ष्म में, गहन तल में, अपने आत्यंतिक केंद्र पर, वह निदिध्यासन की सीढ़ी पर आकर उसको अपने आचरण में झलकता हुआ दिखाई पड़ेगा। वह पैर उठायेगा, तो पैर पुराना नहीं मालूम पड़ेगा। इस पैर में कोई नृत्य की ध्वनि समा गई! वह आंख उठा कर देखेगा, तो यह पुरानी आंख नहीं मालूम पड़ेगी, ताजी हो गई, जैसे सुबह की ओस! उठेगा तो निर्भार मालूम पड़ेगा, जैसे आकाश में उड़ सकता है! भोजन करेगा तो दिखाई पड़ेगा कि भोजन शरीर में जा रहा है और मैंने कभी भी भोजन नहीं किया है।
अब वह जो कुछ भी करेगा- समाधि से लौटा हुआ साधक-निदिध्यान की पहली सीढ़ी पर अपने आचरण में समाधि का प्रतिफलन देखेगा, सब जगह उसका आचरण दूसरा हो जायेगा। वह कल जो आदमी था, मर गया। वह जो समाधि के पहले निदिध्यासन की सीमा में खड़ा आदमी था, यह वही नहीं है। सीढ़ी वही है, आदमी उतरता हुआ दूसरा है। यह कुछ जान कर लौटा है। और ऐसी बात जान कर लौटा है कि इसका पूरा जीवन रूपांतरित हो गया है। वह जानने में पुराना मर गया है और नये का जन्म हो गया है।
निदिध्यासन में उसे झलक दिखाई पड़ेगी, जो समाधि में घटा है, रस जो बहा है भीतर, वह अब उसके रोएं-रोएं, व्यवहार में सब तरफ बहता हुआ मालूम पड़ेगा।
महाकाश्यप बुद्ध से बार-बार जाकर पूछता था, कब होगी समाधि? तो बुद्ध कहते थे, तू फिक्र मत कर, मुझसे पूछने न आना पड़ेगा। जब हो जायेगी तो तू पहचान लेगा। और तू ही क्यों पहचान लेगा, जो भी तुझे देखेंगे, वे भी पहचान लेंगे, अगर उनके पास थोड़ी सी भी आंख है। क्योंकि जब भीतर वह क्रांति घटती है, तो उसकी किरणें तन-प्राण, सभी को पार करके बाहर आ जाती है।
निदिध्यासन की सीढ़ी पर साधक को पता चलेगा कि मैं दूसरा हो गया, मैं नया हूं, मेरा दूसरा जन्म हो गया। साधक को पता चलेगा कि जो मैं गया था समाधि में, वहीं लौटा नहीं हूं। कोई और गया था, कोई और लौटा है।
निदिध्यासन से नीचे है मनन। जब साधक निदिध्यासन से और नीचे उतरेगा मन में, तो मनन का क्षण आयेगा। अब साधक सोच सकेगा, क्या हुआ, अब वह लौट कर विचार कर सकेगा, क्या हुआ? क्या मैंने देखा? क्या मैंने जाना, क्या मैं जीया? अब वह विचार में , शब्द में, प्रलय में अनुभव को बांधने की कोशिश करेगा।
जो लोग मनन की सीढ़ी पर आकर अनुभव को बांध सके है, उनसे ही निकले है वेद, उपनिषद, बाईबल। बहुत लोग समाधि तक गये है, लेकिन जो जाना है, उसे मनन तक वापस लौटाना बड़ा कठिन काम है।
ध्यान रखना, पहली यात्रा इतनी कठिन नहीं थी जो हमें बहुत कठिन मालूम पड़ रही है। इस दूसरी यात्रा से तुलना करें तो पहली यात्रा बहुत सरल थी। यह दूसरी यात्रा अति कठिन है।
लाखों लोग समाधि तक पहुंचते हैं। उनमें से कुछ थोड़े से लोग वापस निदिध्यासन में खड़े हो पाते हैं। उनमें से भी कुछ थोड़े से लोग मनन तक उतर पाते हैं। और उनमें से भी बहुत लोग पहली सीढ़ी, जिसको हम श्रवण कहते हैं- उसका नाम लौटते वक्त बदल जाता है, वह मैं आपसे बात करूंगा-हजारों लोग पहुंचते है समाधि तक, एकाध आदमी बुद्ध हो पाता है। समाधि तो हजारों लोगों को लगती है, एकाध आदमी बुद्ध हो पाता है। बुद्ध का मतलब यह कि जो वापस इन चार सीढ़ियों को उतर कर, जो जाना है उसने, जगत को दे पाता है।
मनन का अर्थ है लौटते वक्त विचार में बांधना उसको जो निर्विचार है।
इस जगत में असंभव से असंभव घटना यही है। जो नहीं बोला जा सकता, नहीं सोचा जा सकता, उसे शब्द की सीमा में रखना, बांधना।
आप देखते हैं, सुबह का सूरज ऊगता है। कभी कोई चित्रकार, कभी, उस ऊगते सूरज को पकड़ पाता है। सूरज को पकड़ लेना बहुत कठिन नहीं है। बहुत से चित्रकार बना लेंगे सूरज को, लेकिन ऊगते सूरज को पकड़ना कठिन है। वह जो ऊगने की घटना है, वह जो गुण है विकास का, वह जो उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ है, वह भी चित्र में अंकित हो जाये, और चित्र देख कर ऐसा लगे कि सूरज अब बढ़ा आगे, अब उगा, अब उगा।
वृक्ष को पकड़ लेना कठिन नहीं है, लेकिन जीवंतता को पकड़ लेना कठिन है। ऐसा लगे कि पत्ते अब हिल जायेंगे, हवा का जरा सा झोंका और फूल झर जायेंगे। वह बहुत कठिन है और वही फर्क है फोटोग्राफी में और पेंटिंग में। फोटोग्राफी कितना ही पकड़ ले, मुर्दा ही पकड़ पाती है। कभी कोई पिकासो, कोई वानगॉग, कोई सीजां पकड़ पाता है, वह जो जीवंतता है, उसको।
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