





भारतीय साधनात्मक साहित्य का एक विषद खण्ड केवल योगिनी साधना के प्रति ही समर्पित है।
ब्रह्मांड का केंद्र शिव हैं। शंकराचार्य कृत ‘सौन्दर्यलहरी’ का प्रथम श्लोक ही शक्ति की अभ्यर्थना से प्रारम्भ होता है-
“शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं।
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि।।”
अर्थात् शक्ति से युक्त होने पर ही शिव सृजन का सामर्थ्य रखते हैं, शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय हैं। इसी पराशक्ति का विराट, रहस्यमय और पूर्ण स्वरूप है-‘चौसठ योगिनियाँ’।
चौंसठ योगिनियाँ आदिशक्ति माँ काली/दुर्गा की सहायक, मातृका और तांत्रिक शक्तियाँ हैं। इनकी उत्पत्ति आदिशक्ति के ही एक स्वरूप काली के स्वेद-कणों से मानी गयी है। ये सृष्टि-पालन-संहार के प्रत्येक सूक्ष्म कार्य में संलग्न रहती हैं। तंत्र शास्त्र में इन्हें 64 कलाओं, 64 शक्तियों और 64 चेतन तरंगों का अधिष्ठान माना गया है। ‘घोर’ नामक महादैत्य का वध करने के लिए जब भगवती ने ‘काली का स्वरूप’ धारण किया, उस समय दैत्य-राज का वध करते समय उसके शरीर से जो स्वेद-बिन्दु नीचे गिरे, उनसे करोड़ों योगिनियों की उत्पत्ति हुई थी। वे सभी योगिनियाँ भगवती काली के साथ ही विद्यमान रहती हैं तथा भगवती के अंश से उत्पन्न होने के कारण वे सब भी भगवती महादेवी के ही समान सामर्थ्यवान तथा अपने भक्तों की अभिलाषा को पूर्ण करने वाली हैं। अलग-अलग योगिनी अलग-अलग विशिष्ट गुणों एवं क्षमताओं को धारण करने वाली होती है। योगिनी ब्रह्मांड में सामंजस्य बनाए रखने, बुराई से लड़ने और अच्छाई को कायम रखने के लिए विभिन्न रूप और दिव्य शक्तियों को धारण करती हैं।
योगिनियाँ स्वतंत्रता का भाव और अपने हर कार्य में पूर्ण निपुणता का संचार करती हैं। अपनी मोहक निगाहों से वे महानतम योगी को भी सम्मोहित कर लेती हैं और इच्छा अनुसार अपना रूप बदल सकती हैं। तांत्रिक साहित्य में योगिनियों को स्वतंत्र, मुखर, स्पष्टवादी और सहज स्वभाव वाली स्त्री बताया है। उनके बिना योग अपने उद्देश्य में विफल और निरर्थक हो जाता है। वे चेतना, प्रकृति और सूक्ष्म शरीर की उन दिव्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो साधक को भय, अहंकार और सीमाओं से ऊपर उठाने में सहायता प्रदान करती हैं।
सदियों से ‘योगिनी’ शब्द के अनेक अर्थ रहे हैं, लेकिन इसकी जड़ें भारतीय संस्कृति में गहराई से जुड़ी हैं, जहाँ योगिनियाँ केवल योगाभ्यास करने वाली ही नहीं, बल्कि अलौकिक शक्तियों से युक्त शक्तिशाली, रहस्यमयी, आध्यात्मिकता और श्रद्धा के संगम से भरी आकर्षक हस्तियाँ हैं। प्रत्येक योगिनी के पास एक विशेष ऊर्जा और एक विशेष जागरण का द्वार विद्यमान रहता है कहीं अंतर्ज्ञान, कहीं साहस, कहीं गहन आध्यात्मिक स्वतंत्रता।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों और परंपराओं में, योगिनियों को अलौकिक स्त्री शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है, जो तंत्र की दैवीय परंपराओं से घनिष्ठ रूप से जुड़ी होती हैं तथा असाधारण शक्तियों (सिद्धियों) से युक्त मानी जाती हैं। इनकी रक्षक, उग्र, भयावह, आकृतियों के रूप में भी पूजा की जाती है।
योगिनियां न केवल दिव्य आत्मा होती हैं, बल्कि उन्हें अप्रत्याशित और उग्र स्वभाव का भी माना जाता है। योगिनी भौतिक और आध्यात्मिक जगत के बीच एक सेतु का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो पवित्रता और आध्यात्मिकता की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देती थीं। योगिनी का यह रूप बताता है कि जब साधक अपने भीतर के अंधकार, भय, मोह और अज्ञान का सामना करता है, तभी वह वास्तविक शक्ति को प्राप्त कर पाता है।
योगिनियों के पास अद्भुत शक्तियां होती हैं, इन्हें उड़ने, रूप बदलने, प्राकृतिक तत्वों को नियंत्रित करने तथा अपने भक्तों को वरदान देने की क्षमता आदि का ज्ञान होता है। कई कहानियों में योगिनियों को शिक्षक के रूप में चित्रित किया गया है, जो साधकों को जटिल आध्यात्मिक साधनाओं के माध्यम से मार्गदर्शन करती हैं, जिनमें अपार अनुशासन और साहस की आवश्यकता होती है।
भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में योगिनी नारीत्व के पालन-पोषण और भयपूर्ण दोनों पहलुओं का प्रतीक हैं। तांत्रिक और योगिक परंपराओं में उनका आदर-सत्कार किया जाता रहा है, वहीं ग्रामीण इलाकों में उनके चित्र, कथाएँ, कला, साहित्य और लोक कथाओं को ज्ञान, शक्ति और रहस्य का प्रतीक माना जाता है।
योगिनियों की कहानियां हमें आज भी आकर्षित करती हैं क्योंकि वे शक्ति और गरिमा, स्वतंत्रता और परस्पर जुड़ाव के संतुलन का प्रतीक हैं। आध्यात्मिकता केवल शांति नहीं, बल्कि संतुलन है, भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के बीच एक सामंजस्य है, शक्ति और गरिमा, स्वतंत्रता और परस्पर जुड़ाव का प्रतीक है। आधुनिक संदर्भ में, वे महिलाओं और पुरुषों को अपनी आंतरिक शक्ति को अपनाने और अपने जीवन की परिवर्तनकारी क्षमता को पहचानने की प्रेरणा देती हैं। चाहे इन्हें पौराणिक पात्रों के रूप में देखा जाये या आध्यात्मिक आदर्शों के रूप में, योगिनियां हमें याद दिलाती हैं कि अंतर्मुखी यात्रा किसी भी महाकाव्य कथा की तरह ही रोमांचक और सशक्त होती है।
इनके अन्दर स्वतंत्रता का भाव और अपने हर कार्य में पूर्ण निपुणता से सम्पन्न करने का भाव रहता है। अपनी मोहक निगाहों से वे महानतम योगी को भी सम्मोहित कर सकती हैं और इच्छा अनुसार अपना रूप बदल सकती हैं। तांत्रिक विद्वानों ने योगिनियों को स्वतंत्र, मुखर, स्पष्टवादी और सहज स्वभाव वाली स्त्री बताया है। उनके बिना योग अपने उद्देश्य में विफल हो सकता है और निरर्थक रह सकता है।
शाक्त ग्रंथ स्त्री और पृथ्वी दोनों को ऊर्जा, जीवन शक्ति, शारीरिक और आध्यात्मिक कल्याण के स्रोत के रूप में समान रूप से सम्मान देते हैं। योगिनी योग शक्ति, कुंडलिनी का प्रतिनिधित्व करती है, साथ ही विभिन्न चक्रों की अंतर्निहित शक्तियों तथा स्त्री देवियों का भी। योगिनी स्वयं योग की शक्ति धारण करती है और उसे दूसरों में भी जागृत करती है, न केवल सामान्य रूप से बल्कि शरीर या मन के किसी भी बिंदु या स्थान पर।
आध्यात्मिक चेतना प्रदान करने हेतु एक स्त्री उतनी ही अविचलित रहती है जितनी एक माँ अपने बच्चे को दूध पिलाने में। किसी पुरुष को ऊर्जा और कृपा प्रदान करके – उसे आशीर्वाद या शक्ति प्रदान करके वह स्वयं को कमजोर नहीं समझ रही होती, बल्कि वे अपनी ऊर्जा को उस व्यक्ति के साथ साझा कर रही होती हैं जिसने उनको प्राप्त करने हेतु साधना-तपस्या किया हो।
देवी छिन्नमस्ता भी एक महान योगिनी का ही प्रतीक हैं। जो मन से परे अद्भुत चेतना हैं। वे तृनेत्र जागरण का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिससे प्रत्यक्ष बोध की विद्युत प्रवाहित होती है जो सभी द्वैत और नकारात्मकता को नष्ट कर देती है। देवी छिन्नमस्ता योग शक्ति का प्रतिक हैं, यानि योग की शक्ति जो ज्ञान प्रदान करने की अपनी सबसे प्रभावशाली क्रिया में प्रकट होती है। इसलिए उन्हें ‘वज्र योगिनी’ के नाम से भी जाना जाता है। वज्र अंतर्मन की उच्च विद्युत शक्ति है।
छिन्नमस्ता परा-डाकिनी हैं, जो योग मार्ग की परिचारिका देवियों में सर्वोच्च और सर्वोपरि हैं। गुप्त या योगिक शक्तियों के मार्ग पर चलने वाले साधक उनकी पूजा करते हैं तथा उनसे संबंधित मंत्र का उच्चारण करते हैं।
ब्रह्मांड विज्ञान में 64 का विशेष महत्व है और यह पूर्णता तथा ब्रह्मांडीय सृजन के पूर्ण चक्र का प्रतीक है। 64 योगिनियों के इस समूह में प्रत्येक योगिनी दैवीय ऊर्जा के एक विशिष्ट पहलू का प्रतिनिधित्व करती है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह ब्रह्मांड को संचालित करती है। उनके अन्दर असाधारण शक्तियों को रूपांतरित करने की क्षमता व्याप्त है।
तंत्र विद्या में 64 योगिनियों को मार्गदर्शक और रक्षक माना जाता है, जो अपने भक्तों को ज्ञान और अलौकिक शक्तियाँ प्रदान करती हैं तथा प्राकृतिक और अलौकिक जगत पर नियंत्रण स्थापित करती हैं। 64 योगिनियाँ योग की ज्ञाता और तंत्र विद्या की गूढ़ रहस्यों में निपुण हैं, और इन्हें व्यापक रूप से देवियों के समान माना जाता है, विशेष रूप से भगवती पार्वती के रूपों के समान।
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