





पूजा-अर्चना से नैतिक आचरण की शुद्धि विश्व के सभी धर्मों में आचरण के शुद्धिकरण पर विशेष जोर दिया गया है, इसके लिऐ कुछ नियम बनाए गयें हैं, भले ही वे नियम-उपनियम बाद में धर्मकांड के प्राचार्यो के स्वार्थों के कारण अंधविश्वासों में बदल दिए गए हों, पर आज भी नैतिक आचरण के अनुशासन विधि-विधान प्रचलित हैं धार्मिक दैनिकचर्या का आज भी महत्व हैं, मुस्लिम संप्रदाय में नमाज का प्रचलन एक प्रकार से योग ही हैं, उससे शारीरिक स्वास्थ्य तो बना ही रहता है, मन को शांति भी मिलती हैं।
इसी तरह हिंदू धर्म में कर्मयोग, दैनिक आचरण, योग और प्राणायाम पर जोर दिया गया है, अनासक्त, निष्काम और निर्लिप्त कर्म करने का नाम कर्मयोग है, जब कोई भी व्यक्ति निष्काम रहेगा-निर्लिप्त रहेगा तो भला उसके मन में किसी प्रकार का विकार कैसे उत्पन्न होगा। उसका मन कभी विकारों से ग्रस्त नहीं होगा, उसे कोई मानसिक संताप नहीं होगा और जब उसका मन दुखी नहीं होगा तो भला उसका शरीर रोग से ग्रस्त कैसे होगा?
मूर्तियों से कॉस्मिक इलेक्ट्रो मैग्नेटिक शक्ति का प्रसार सगुण उपासना में साधक इष्टदेव की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना करते हैं, ये मूर्तियां संगमरमर की, अष्ट धातुओं या सोने-चांदी की बनी होती हैं, साधक इन सुंदर और सुघड़ मूर्तियों को विधिवत् धार्मिक संस्कारों के अनुसार स्नान कराकर वस्त्राभूषण पहनाते है, इस प्रक्रिया में जब प्रेममय उद्धलित भाव से वे उन्हें स्पर्श करते हैं तो उन मूर्तियों के संमिश्रित धातुकणों से प्रवाहित कॉस्मिक इलेक्ट्रों मैग्नेटिक शक्ति का प्रवाह साधक के शरीर और मंडल में होता है, इससे ऊर्जा उत्पन्न होती है, स्फूर्ति मिलती है और रक्त शुद्धि होती है, शिवलिंग पर भक्तगण जल की धारा डालते हैं और दूध से स्नान कराते है, इस जल और दूध के अभिषेक से लिंग में विद्युत कणों का स्फुरण होता है, उन अग्निस्फुणों में चमत्कारिक मैग्नेटिक पॉवर होता है, जब भक्तगण शिवलिंग को आत्म समर्पित भाव से अपने हाथों से स्पर्श करते हैं, तो हाथों की उंगलियों के पोरों के माध्यम से व्याप्त हो जाते है।
यह अलौकिक शक्ति और मन के कुपित त्रिदोषों को शांत करती है, शिवलिंग पर गिरने वाले जल और दूध की धाराओं को आंखों पर लगाने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।
यह समस्त ब्रह्माण्ड पंचभूतात्मक है अर्थात्-पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश द्वारा गठित हैं, मानव प्रकृति भी पांच प्रकार की है, इसी कारण तत्ववेत्ता ऋषियों ने प्रत्येक तत्व के अपेक्षित परिणाम के लिए व्यवस्था करके पांच प्रकार की उपासना का अधिकार बतलाया है, प्रकृति सद्गुरू योगबल, स्वरोदय शास्त्र, ज्योतिष आदि में बतलाया गया है कि किस व्यक्ति की अतः प्रकृति किस प्रकार की होती है, उसमें किस तत्व की अधिकता होती है, इसको ध्यान में रखते हुए व्यक्ति को उस तत्व के देवता की उपासना का अधिकार है।
प्राचीन आयुर्वेदाचार्यो के अनुसार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश-इन पंचतत्वों में से किसी भी तत्व के कुपित होने पर नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होने लगते हैं, चरक तथा सुश्रुत ने अपने ग्रंथों में कोपजन्य विकारों का उल्लेख किया है, साथ ही रोगों के निवारणार्थ देवी-देवताओं की उपासना का भी उल्लेख किया है, इसके अतिरिक्त पंचदेवों का निश्चित क्रम भी निश्चित क्रिया है- वरूण, शक्ति, शिव, विष्णु तथा सूर्य।
वेदों के अनुसार, जल तत्व से सृष्टि क्रम प्रारंभ हुआ, जल के देवता वरूण है, जल तत्व की विषमता से अनेक संक्रमक रोग, उदर, क्षय, स्नायु रोग आदि होते हैं, जल का संबंध चंद्रमा से है और चंद्रमा का प्रभाव स्त्रियों के तन-मन पर पड़ता है, अतः जल के दूषित होने से गर्भाशय संबंधी रोग भी होते है। शरीर में आहार से अग्नि उत्पन्न होती है, अतः आहार संबंधी अनियमितता के कारण उत्पन्न रोग अग्नि से संबंध रखते हैं, मदांग्नि, तीक्ष्णाग्नि, विषमाग्नि, भस्माग्नि जब दोषों के कारण असंतुलित हो जाती हैं तो शरीर में अपच, गर्मी संबंधी रोग, ज्वर आदि विकार होते है।
अग्नि के बाद पृथ्वी तत्व की गणना होती है, जल तथा, अग्नि- जो दोनों तत्वों की आधारभूमि है, पृथ्वी तत्व के अधिष्ठाता है, भगवान शिव, जो पृथ्वी तत्व से उत्पन्न जड़ता, शोथ, गांठ, नेत्र रोग, मानसिक विकार, श्वास आदि का विनाश करते हैं, इन तीनों की सृष्टि के बाद शब्द ध्वनि की आवश्यकता पड़ती है, शब्द का गुण आकाश में है, इसके अधिपति भगवान विष्णु है, उनकी पूजा-साधना शब्दों द्वारा स्तुति से कीर्तन-भजन से की जाती है, कहा जाता है कि स्तुति, भजन-गायन एवं कीर्तन से आकाश तत्व से जुडे़ पक्षाद्यात, शारीरिक शैथिल्य, गले और हृदय संबंधी रोग, तनाव आदि का शमन होता है।
मंत्र जप में शब्द, ध्वनि और भावनाओं का आवेग रहने से एक विद्युतीय वातावरण की सृष्टि होती है, उसमें हमारे शरीर और मस्तिष्क से विकीर्ण होने वाली तरंगें यथेष्ट दिशा में गमन करती हैं जिससे हमारे स्थूल शरीर पर अनुकूल प्रभाव पड़ता हैं। वास्तव में मंत्र में भावना शक्ति की तरंगे बिजली की तरह प्रतिरोध सहित गति से गमन करती हैं, प्रयत्न करने पर दोनों की अदृश्य तरंगे एक-सी गति से गमन करने लगती हैं, और ऐसी स्थिति में ही शक्तिशाली वातावरण का निर्माण होता है।
पूजा और उपासना में भक्त अपने इष्टदेव को पंचामृत, प्रसाद, फल आदि चढ़ाते हैं, पंचामृत में दूध, दही, घी, तुलसी और मधु मिले होते हैं, भगवान को यह अर्पित कर भक्त यदि उसका सेवन करता है, तो उसे कोई रोग नहीं होता, इसमें मिले हुए सभी पदार्थ वस्तुतः एंटोबॉयटिक औषधियां हैं, अनेक साधक व्यक्ति मेवा, केशर, इलायची, मिश्री, नारियल गिरी आदि मिलाते हैं, जिससे वह प्रसाद रोग निरोधक अमृत तुल्य बन जाता है।
साधक अपने पूजा-स्थल में धूप-दीप अगरबत्ती जलाता हैं, दीप प्रज्जवलित करता है, धूप की सुगंध से आस-पास के सारे रोगाणुओं-जीवाणुओं का नाश हो जाता हैं, धूप-अगरबत्ती जलने से प्रदूषण से बचाव होता है, उसकी गंध से हमारी इंद्रियां प्रसन्न व सचेष्ट रहती हैं और पूरे शरीर में स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है, दीप जलाने से भी प्रदूषित वायु गर्म होकर बाहर निकल जाती है और शुद्ध वायु का प्रवेश होता हैं।
विभूति भस्म, अगरू, केशर, गोपीचंदन, चंदन आदि का तिलक लगाने से मस्तिष्क की सुप्त नाडि़यां जागृत होती है, तिलक लगाने से मस्तिष्कगत दिव्य नाडि़यां एक स्थान पर आकर विकसित हो जाती है, और फिर तरल पदार्थ जम कर कठोर बनकर प्रकाशवान बन जाता है, एक तरह से वह प्रकाश सर्चलाइट का काम करता है, इतना ही नहीं उसके माध्यम से पिंडगत शक्तियां पूर्ण रूप से विकसित होती हैं, ऐसा व्यक्ति अलौकिक शक्तियों का स्वामी होता है।
मंदिरों में घंटानाद के साथ आरती की जाती है, घरों में भक्त और साधक घंटी बजाकर आरती करते है, इस क्रिया से शरीर में तीव्र स्पंदन होता है, तीव्र आवेग होता है, गर्मी शरीर के रग-रग में दौड़ जाती है, जिससे वातावरण की दूषित वायु बाहर निकल जाती है और शुद्ध वायु का वातावरण सघन हो जाता है, उससे रक्त संचार की गति भी तेज हो जाती हैं।
साधक जब इष्टदेव की प्रतिमा को दोनों हथेलियों को जोड़कर नमस्कार करता है तो कॉस्मिक इलेक्ट्रो मैग्नेटिक वेव्स का एक चक्र उसके शरीर के अग्रभाग में घूमने लगता है, उससे शरीर में विकारों को नष्ट करने वाली ऊर्जा उत्पन्न होती है, साधक को नयी स्फूर्ति के साथ, नयी प्रेरणा मिलती है, और उसी पावर से उसकी नकारात्मक प्रवृत्तियां खत्म हो जाती है, साधक धीरे-धीरे सात्विक प्रवृत्ति का हो जाता है, ठीक यही बात दंडवत करने में हैं, दंडवत में शरीर के आठ अंग पृथ्वी को स्पर्श करते है, इस क्रिया में पंचभूतात्मक देह पंचभूतों से निकलने वाली क्रिया किरणों की विभूति देह बन जाती है।
धर्म शास्त्रों में लिखा है कि दैवीय शक्ति और उनका आभामंडल स्वभावतः ही दक्षिणवर्ती होता है, देव प्रतिमा से कुछ दूरी तक उस देवता की दिव्य प्रभा बिखरी रहती है, जो निकट में कुछ गहरी और आगे कम होती है, देवता के चारों ओर परिक्रमा करने से वे दिव्य कण हमारे चारों और चिपक जाते हैं।
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