





सामान्य रूप से सबसे बड़ी समस्या यह है कि विवाहित स्त्री के पच्चीस से 30 वर्ष की आयु के मध्य प्रथम संतान अवश्य होनी चाहिये, इसमें देरी होने पर बच्चें में कुछ विकार पनप जाते हैं। देरी से संतान होना सम्भवतः पारिवारिक वातावरण अनुकूल नहीं होना साथ ही कुछ कुग्रहों का प्रभाव भी संतान उत्पति में व्यवधान उत्पन्न् करते हैं। पति-पत्नी की कुण्डली में मंगल दोष होना अथवा शुक्र की दशा में शनि व राहु का प्रभाव भी वंश वृद्धि में बाधा उत्पन्न करते हैं। उक्त कुस्थितियों का निवारण सामान्य पूजा, साधना व श्रेष्ठ चैतन्य सामग्री धारण करने से परिवार में वृद्धिमय स्थितियां पूर्णरूपेण संभव हो पाती हैं।
गर्भवती होने के बाद ही गर्भस्थ शिशु की ओर ध्यान देना प्रारम्भ होता है। यह सदा ध्यान रखें कि उत्तम संतान के लिये पूर्व की तैयारी भी उत्तम होनी चाहिये और यह तैयारी गर्भाधान से भी बहुत पहले से प्रारम्भ होना चाहिये। गर्भ धारण से दो-तीन महीने पूर्व ही शारीरिक, मानसिक और सबसे अधिक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक तैयारी कर लेनी चाहिये।
सबसे पहले मानसिक रूप से यह तैयारी करें कि अब हमें माता-पिता बनना है। तो ऐसे में एक जीव को संसार में लाने की जिम्मेदारी हमारी है। उस जीवन को किस सांचे में ढ़ालना है, इसकी गंभीरता को समझना होगा। आप जो सोचेंगे, जो खांयेगे और जैसा आहार-व्यवहार, आचरण करेंगे वैसा ही प्रभाव आने वाले नवजात शिशु पर पडे़गा।
उत्तम संतान के लिए उत्तम अंडाणु और शुक्राणु के मिलन की अनिवार्यता है अर्थात् माता-पिता दोनों का ही मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिये, तभी अंडाणु और शुक्राणु की गुणवत्ता अच्छी होगी। प्रारम्भ के तीन हफ्तों में ही बच्चे के मस्तिष्क और रीढ़ का निर्माण हो चुका होता है। ऐसे में यह और भी अधिक आवश्यक है कि गर्भाधान के पूर्व की तैयारी बेहतरीन हो।
सामान्यतः होता यह है कि स्त्री अपने मासिक आने का इन्तजार करती है और मासिक न होने पर जब तक वो टेस्ट द्वारा इस नतीजे पर पहुंचती है कि वो मां बनने जा रही है तब तक शिशु 3-4 हफ्तों का हो चुका होता है और इसके बाद खान-पान, व्यायाम, परहेज आदि पर ध्यान दिया जाता है।
गर्भाधान से 1-2 महीने पहले ही स्त्री को अपने संतुलित खान-पान पर ध्यान देना शुरू कर देना चाहिये, उसे फॅालिक एसिड से भरपूर आहार लेना चाहिये, जो कि मस्तिष्क और रीढ़ के विकास के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है, इसकी कमी के चलते गर्भस्थ शिशु एनेनसीफैली का शिकार हो जाता है, जिसमें मस्तिष्क का ऊपरी भाग अविकसित रह जाता है।
इसके अलावा हरी सब्जियां, छिलके सहित आलू, गवार, सोया, गोभी आदि का सेवन करना चाहिये। पिता को भी सभी तरह के व्यसन छोड देने चाहिये। गर्भावस्था में वजन पर नियंत्रण रखना बहुत ही आवश्यक है। वजन एक अनुपात में ही बढ़ना चाहिये, जैसे यदि कद 160 सेमी है, तो वजन 60 किग्रा के करीब होना चाहिए।
गर्भ पूर्व योगासनः मां के साथ-साथ पिता को भी योगासन करना चाहिये, क्योंकि इससे पेल्विक ऑर्गन्स की ओर रक्त संचार बढ़ता हैं, जिससे शुक्राणु की गुणवत्ता बढ़ती है। प्राणायाम गर्भावस्था में नहीं करना चाहिए, प्राणायाम के अपने लाभ हैं, किन्तु गर्भ धारण अवस्था में इसे वर्जित बताया गया है।
गर्भ पूर्व मेडिटेशनः हमारा शरीर पंच तत्वों से बना होता है और अंत में उसी में विलीन हो जाता है। अतः इन तत्वों के महत्व को समझते हुये मेडिटेशन के द्वारा पंच तत्वों का आह्वान करके उचित व संतुलित मात्र में ऊर्जा प्राप्त करने का प्रयास करें। दिन में पांच-सात बार थोड़ा-थोड़ा कर भोजन ग्रहण करें। भोजन के साथ तरल पदार्थों व फलों का उपयोग अधिक करें। पूरे गर्भकाल में माँ को किसी भी तरह की मामूली सी भी अस्वस्थता नहीं आये।
गर्भाधान संस्कारः गर्भाधान से 3 दिन पहले ज्यादा तामसिक भोजन, नकारात्मक स्थितियां, क्रोध, उद्धिग्नता से बचने की सलाह दी जाती है, प्राचीन समय में गर्भाधान के दिन सफेद कद्दू का रस दिया जाता था, क्योंकि यह प्रकृति का सबसे ज्यादा पॉजिटिव एनर्जी से भरा फल माना जाता है। शाम को रमणीय बाग की सैर, फिर सुगन्धित स्नान किया जाता था, स्नान के पश्चात् इष्ट देवता, कुल देवता का स्मरण व प्रार्थना करके शयन कक्ष में समागम होने से पूर्व आवाहन किये जाने वाली आत्मा के स्वागत में श्लोक, स्तोत्र पठन किया जाता था और उसके बाद समागम होता था, अतः इस तरह के विचार मन में लाने चाहिए कि हे ईश्वर! मेरे गर्भ में उत्तम आत्मा का प्रवेश हो, जिसमें ईश्वरीय गुण हो। परन्तु वर्तमान में नित्य धार्मिक पुस्तकों का पठन करना चाहिये, जिससे संतान में देवत्व शक्तियों स्वरूप सुसंस्कारों की वृद्धि हो सके।
सबसे पहले तो पति का पूर्ण साथ, पूर्ण सहयोग जरूरी है, अक्सर हमारे यहां पति की मात्र इतनी ही भूमिका समझी जाती है कि यदि उसे समय मिले तो वह चेकअप के वक्त पत्नी के साथ चला जाये, जबकी पश्चिमी देशों में गर्भावस्था में ही भावी पिताओं को प्रशिक्षण दिया जाता है, प्रसव के समय भी पति का पत्नी के पास उपस्थित रहना आवश्यक होता है, जिससे पत्नी को मानसिक सहारा मिल सकें।
इसके अलावा पूरी गर्भावस्था के दौरान पिता का अधिक से अधिक योगदान जरूरी है, इससे पिता और बच्चे के बीच भावनात्मक रिश्ता मजबूत होता है। चौथे महीने में बच्चे में सुनने व स्पर्श की क्षमता विकसित हो जाती है। ऐसे में माता-पिता को लगातार बच्चे से बातचीत करनी चाहिये, इससे बच्चे में सुरक्षा की भावना आ जाती है, माँ को तनाव, चिन्ता आदि से भी बचना चाहिये, क्योंकि तनाव में माँ की बढ़ी हुई धड़कने गर्भस्थ शिशु सुन सकता है और वह तनाव के कारण एक ख्याल को रंग मिला——एक कल्पना को आकार——-खुशियों की कई कलियां खिलीं और वो ख्वाब हुआ साकार सुबह जब केसरिया किरणें मेरे आंगन खिलेंगी आये इस बदलाव को सबसे पहले पहचान जाता है। प्रीमेच्योर अथवा सीजेरियन द्वारा संतान होना उस बालक के लिये शारीरिक-मानसिक रूप से अनुकूल नहीं रहता है।
मंत्रोच्चारः मंत्रोच्चार करने या फिर सुनने की खास वजह यह है कि मंत्रोच्चार से जो ध्वनि कंपन होता हैं, वह बच्चे को अधिक प्रेरित करता है जिससे मंत्रों के भाव को बच्चा आत्मसात करता है। इसके अलावा माता-पिता को बार-बार पेट पर हाथ से स्पर्श करना चाहिये, क्योंकि शिशु स्पर्श की भाषा पहचानता है और उसे सुरक्षा का एहसास होता है।
पांचवे महीने तक बच्चे में जीन सेंसेस जिसे थ्री आर कहते हैं विकसित हो जाता है- रिमेंबर, रीकॉल और रीप्रोड्यूस। ऐसे में आप जो रूटीन बाहर फॉलो करेंगे, वही रूटीन बच्चा बाद में फॉलो करेगा, यानि आप गर्भ में ही उसे ट्रेनिंग देकर अनुशासन सिखायें, आपको पूजा के समय घंटी बजाना, शांत चित्त प्रसन्न भाव से वार्तालाप करना चाहिये, रोजाना वही आवाज निश्चित समय पर सुनने पर शिशु में भी ऐसी ही चेतना का विकास होता है।
गर्भ संगीतः संगीत का बहुत प्रभाव पड़ता है शिशु पर, जिसे हम स्क्रीन पर देख सकते हैं। अगर फास्ट म्यूजिक बजाओं तो बच्चे का मूवमेंट भी फास्ट होता है, जिसे मातायें भी महसूस कर सकती हैं। इस तरह से संगीत द्वारा बच्चे को उत्तेजित करके उसकी बुद्धिमत्ता बढ़ायी जा सकती है, दरअसल गर्भावस्था में बच्चे के सिनैप्सिस (ये नर्व सेल्स के बीच के जोड़ होते हैं, जिन्हे न्यूरॉन कहा जाता है) को उत्तेजित करके बढ़ाया जा सकता है। ये सिनैप्सिस जितना अधिक बढे़ंगे, उतना ही बच्चा बुद्धिमान बनेगा। एक बार ये बन गये तो बाद में इन्हें नहीं बढ़ाया जा सकता। अतः गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास के लिए भी संगीत बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है। हम जन्म के बाद ही शिशु की आयु की गणना करते हैं, जबकि इस तथ्य पर कभी ध्यान ही नही देते कि बच्चा जब जन्म लेता है तो वह नौ महीने का हो चुका होता है। गर्भावस्था में व्यायाम करते वक्त बांसुरी का संगीत सुनें, सोते समय सितार, तानपुरा, सरोद, राग यमन, आसावरी स्वरूप मधुर भजन, संगीत सुनें।
हृदय भाव से बच्चे के लिये कामना करें- तुम्हारा कल्याण हो, तुमने मेरे गर्भ में आकर मुझे महान मातृत्व प्रदान किया है, इसके लिये मैं तुम्हारी कृतज्ञ हूं, तुम्हारा शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास उत्कृष्ट हो, इस गर्भावस्था में तुम पर उत्तम संस्कार हो, ऐसा कहते हुए मंत्रों से बच्चे को नहलाएं, फिर धीरे-धीरे 3 सांसे लें और धीरे-धीरे आंखे खोले, इस दौरान धीमा संगीत बजाया जा सकता हैं, कोई खुशबूदार धूप या अगरबत्ती जलाने से चित्त में शांति रहती है।
गर्भ प्रार्थनाः बच्चे का कर्णेंद्रिय स्पर्शेंद्रिय घ्राणेंद्रिय, चक्षु, रसनेंद्रिया विकसित होते समय उसके लिए योग्य उत्तेजना जान-बूझकर दी जानी चाहिए, कोई गाना, भजन, श्लोक, मंत्र बार-बार सुनाने चाहिए, सिर्फ भावी माता ही नहीं पिता को भी चाहिए कि पेट पर हांथ रखकर गर्भस्थ शिशु से सुसंवाद करें, जैसे की ऊपर बताया गया है, जिन शब्दों में चाहें, उन शब्दों में गर्भ प्रार्थना करें, पेट में स्थित बच्चे तक ये कंपन पहुंचता है उसके जवाब के रूप में बच्चे का हिलना गर्भवती स्त्री अनुभव कर सकती है, यह जवाब सोनोग्राफी में भी देखा जा सकता है और इसे डॉप्पलर मशीन पर सहजता से नापा जा सकता है।
एरोमा थेरेपीः इन मसाज ऑयल्स से संकुचन की क्रिया बढ़ती है। डिलीवरी के वक्त हम गहरी सांस लेकर ऊँ के उच्चारण की सलाह देते हैं, यह ध्वनि ही अपने आपमें संपूर्ण व सात्विक है, इसका उच्चारण व कंपन ही अपने आपमें उत्तम संतान के लिए पर्याप्त है।
प्रसूता में कमजोरी
गर्भावस्था में शिशु को माता के माध्यम से ही पोषण मिलता है, अतः प्रसूता का कमजोर हो जाना स्वाभाविक है, इसके अलावा प्रसव के समय खून अधिक निकल जाने से तथा प्रसव के बाद भी कुछ दिनों तक खून का निकलना जारी रहने से प्रसूता को कमजोरी आ जाती है, ऐसी अवस्था में पोषक आहार लम्बे समय तक निरन्तर ग्रहण करने से यह कमजोरी शीघ्र दूर हो जाती है। आने वाली संतान को मानसिक शारीरिक कुशाग्र बुद्धि युक्त बनाने के लिये नियमित पोष्टिक आहार व सुभाव युक्त आचरण होना आवश्यक है। क्योंकि बच्चे की हर तरह की सुवृद्धि व सुसंस्कारों का निर्माण करने में केवल और केवल माता-पिता ही श्रेष्ठ शिक्षक हैं।
काली मिर्च, पीपल, सोंठ, दंती, निसोत, चित्रकमूल को सम्भाग में लेकर चूर्ण बनायें और संपूर्ण चूर्ण के गरागर गुड़ मिलाकर रख लें, इसे एक से डेढ़ चम्मच की मात्र में प्रतिदिन सुबह गुनगुने दूध के साथ सेवन करें, इससे प्रसूता की कमजोरी दूर होती है। साथ ही सौन्दर्य में निखार और जठराग्नि प्रदीप्त होती है, इससे प्रसूता में आयी सूजन का भी शमन होता है।
असगंधाः प्रसूता की कमजोरी और दुर्बलता में असगंध भी लाभदायक है, असगंध का चूर्ण 3 से 5 ग्राम की मात्रा में मिश्री मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से लाभ होता है।
शतावरः प्रतिदिन शाम को एक गिलास दूध औटाकर उसमें 10 ग्राम शतावर चूर्ण व मिश्री मिलाकर पीने से प्रसूता की शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है। उक्त आयुर्वेदिक उपचार पूर्णरूपेण डॅाक्टर की सलाह से ही करना चाहिये।
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