





महाशिवरात्रि की चैतन्य रात्रि को ही भगवान शिव और माता गौरी का पाणि ग्रहण संस्कार भी सम्पन्न हुआ था। भगवान शिव के समस्त स्वरूप कल्याण और शांति प्रदान करने वाले हैं। वे रूद्र स्वरूप में मलिनताओं को भस्म करते हैं, महाकाल स्वरूप में कालरूपी स्थितियों का हरण करते हैं तो वहीं आशुतोष स्वरूप में शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
भगवान शिव के तीन नेत्र हैं, जो सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि के प्रतीक हैं, वे भूत, वर्तमान और भविष्य के नियन्ता हैं। भगवान शिव एकमात्र ऐसे देव हैं, जिनकी उपासना देव, मनुष्य, असुर सभी करते हैं और अपनी सभी अभिलाषायें पूर्ण कर पाते हैं।
महाशिवरात्रि के सम्बन्ध में अनेकों आख्यानों में यह आख्यान महत्वपूर्ण है कि भगवान शिव का प्रगटीकरण महाशिवरात्रि की रात्रि में हुआ। रात्रि प्रतीक होती है अन्याय, अज्ञान, अंधकार, पाप, हिंसा, धोखा, असत्य और दुर्भाग्य की। भगवान शिव ऐसी ही रात्रि में प्रकट होकर मनुष्य जीवन के इन सारे तमोगुणों को समाप्त करते हैं और उसे नया प्रकाश प्रदान करते हैं। शिवरात्रि के बाद महा अमावस्या आती है, महा अमावस्या सम्पूर्ण जीवन के अंधकार का स्वरूप है और यह सम्पूर्ण अंधकार ज्ञानमय शिव के माध्यम से ही नष्ट हो सकता है। भगवान शिव प्रत्येक क्षण आनंदित, तरंगित व उल्लसित हैं, इसीलिये वे महाकाल आशुतोष स्वरूप हैं।
भगवान शिव सदैव आनन्द मग्न हैं और शक्ति स्वरूपा मां भगवती पार्वती इस जीवन में आनन्द और सरसता की साकार मूर्ति हैं। इनके परस्पर मिलन से सम्पूर्ण प्रकृति इस पावन दिवस पर अपने पूर्ण श्रृंगार के साथ नृत्य कर उठती है और इसी से साधना का यह महान पर्व दुर्लभ अवसर बन जाता है। सम्पूर्ण रूप से प्रकृति का अणु-अणु चैतन्य होकर साधक को उसका मनोवांछित प्रदान करने के लिए तत्पर हो जाता है। भगवान शिव तो सर्वथा सरल और भोले हैं जिनके विषय में कहा गया है कि मिट्टी से बना शिवलिंग, बेल के पत्तों से पूजन और गाल बजा देने से मंगल ध्वनि! इतना ही त्रैलोक्य संपत्ति प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है।
शिव शक्ति स्वरूप, शक्तिमय पूर्ण अजर-अमर आत्मा युक्त, सर्व दुःख संहारक स्वरूप है। शक्ति के अभाव में व्यक्ति को दुःख दारिद्रय, भय, विनाश की आशंका रहती है, शक्ति के जाग्रत होने से साधक स्वयं शक्ति पुंज बन जाता है, जिसके कारण आत्म विश्वास की एक ऐसी महान शक्ति उसमें समाहित हो जाती है। जिसके फलस्वरूप उसकी बाधायें, विपत्तियां, अपने आप दूर होने लगती हैं, शिव साधना से शक्ति की उत्पत्ति होती है, शिव साधना में निरन्तर यह भावना रहनी चाहिए कि हम एक शक्ति पुंज की लहरें हैं, जो कि शिव के प्रतीकों शिव त्रिनेत्र, अर्द्धचन्द्र, डमरू, वृषभ, लिंग, श्वेत वर्ण के माध्यम से निरन्तर प्रवाहित हो रही है और हम अपने रोम-रोम में आत्मसात कर रहें हैं।
सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में अवन्तिका (उज्जैन) जाज्वल्यमान चेतनामय पुरी है। उज्जैन का पूरा क्षेत्र महाकाल शिव के तेज से विभूषित है, यह सम्पूर्ण संसार में एकमात्र ऐसी दिव्य भूमि है, जहां काल रूपी स्थितियों पर विजय प्राप्त की जा सकता है। इस धाम की सर्वाधिक विशेषता यही है कि भगवान शिव इस स्थान में विष रूपी स्थितियों के संहारक स्वरूप में विद्यमान है अर्थात् साधक महाकाल ज्योतिर्लिंग की चेतनामय भूमि पर सद्गुरु के सानिध्य में दर्शन, पूजन, अभिषेक, साधना, दीक्षा के माध्यम से जीवन को सर्व स्वरूपों में सभी सुस्थितियों से युक्त कर सकेंगे।
वास्तव में महाकाल की महिमा भारतीय जनमानस में सर्वाधिक प्रचलित है, प्रत्येक सांसारिक व्यक्ति अपने जीवन में बार-बार महाकाल ज्योतिर्लिंग के दर्शन, पूजन करने की अभिलाषा रखता है, क्योंकि सांसारिक जीवन में सबसे अधिक कालिमा होती है, संघर्ष, कठिनाईयां, परेशानियां, तंत्र दोष, अनेक प्रकार के भूत-प्रेत आदि बाधाओं से मानव जीवन त्रस्त होता है, इन सभी कालिमा रूपी स्थितियों को महाकाल ही भस्मीभूत कर सकते हैं, केवल महाकाल शिव ही जीवन की गति को सुगमता प्रदान करने वाले देव हैं, क्योंकि उन्हें ही नीलकण्ठ कहा गया है, जो जगत के विष का पान करने वाले हैं, केवल वे ही मानव जीवन की विषमताओं का शमन करने वाले देवो के देव महादेव हैं।
अन्य किसी भी देवी-देवता ने विषपान करने का साहस नहीं दिखाया, इससे यही ज्ञात होता है, कि शिव ही हमारे जीवन के विष रूपी समस्याओं का पान कर हमें जीवन में सुख-समृद्धि, वृद्धि रूपी अमृत से सराबोर कर सकते हैं। महाकाल की भस्म आरती पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, इस भस्म आरती को प्रसाद रूप में ग्रहण करने से व्यक्ति जादू-टोना, भूत-प्रेत आदि बाधाओं से मुक्त हो जाता है। इनकी उपासना करने के बाद साधक विरोधात्मक परिस्थितियों में भी सर्वत्र विजय प्राप्त करता है और निरन्तर सफलता पथ पर अग्रसर रहता है।
इसीलिये इस दिव्य चैतन्य भूमि पर निरन्तर सद्गुरु का सानिध्य प्राप्त करना चाहिये, क्योंकि सद्गुरु सानिध्य में ही साधक महाकाल विजयश्री शिव-गौरी सौभाग्य शक्ति की चैतन्य रश्मियां अपने रोम-रोम में अक्षुण्ण स्वरूप आत्मसात कर पाता है और एकमात्र सदगुरु ही परम दयालु होते हैं, जो सभी विषमताओं पर विजय प्रदान करने में सहायक सिद्ध होते हैं। इसलिये कहा जाता है कि इस सृष्टि में काल और दयाल दो ही का नियंत्रण है और इनकी ही महिमा सर्वपूजित है, काल के मकड़जाल से केवल और केवल महाकाल स्वरूप परम दयालु सद्गुरु ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं और महाकाल की ज्योर्तिंमय चेतना में साधक जीवन के सभी दुखों का वरण कर उसे उच्चता प्रदान करते हैं।
शास्त्रों में गुरु को साक्षात शिव कहा गया है पालनकर्त्ता, निर्माणकर्त्ता स्वीकार किया गया है, गुरु ही ऐसे विराट व्यक्तित्व से पूर्ण जीवित देव हैं, जो शिष्य के जीवन की सभी समस्याओं का समाधान कर जीवन में सही चिंतन प्रदान करते हैं, उसके जीवन में आने वाली बाधाओं, दुखों और विपत्तियों का शमन करने की चेतना प्रदान करते हैं, उसे श्रेष्ठ रास्ता दिखाते हैं, जिससे जीवन सुपथगामी बनता है।
चैतन्य दिव्य शक्तियों से ओत-प्रोत तीर्थ स्थान की यात्रा श्रेष्ठ मार्गदर्शक के सानिध्य में सम्पन्न कर साधक अपने जीवन के भटकाव व अपूर्णता की स्थिति को समाप्त कर सकता है। तीर्थ का तात्पर्य ही तारण होता है। तीर्थ स्थानों की दिव्यता से जीवन की विषमताओं और न्यूनताओं को समाप्त कर जीवन को दिव्य शक्तियों युक्त निर्मित करने का क्रियात्मक रहस्य छिपा होता है, जो समर्थ चेतनावान महापुरुष के साध्निय में सम्पन्न कर साधक प्राप्त कर सकता है।
आपका अहोभाग्य है कि आप शिव- गौरी परिणयमय चैतन्य दिवस महाशिवरात्रि पर महाकाल ज्योतिर्लिंग की चैतन्य रश्मियों को सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी के दिव्य सानिध्य में रोम-रोम में आत्मसात कर सकेंगे और अपने जीवन की सभी काल रूपी विषमतायें पितृ दोष, तंत्र दोष, कालसर्प योग, भूमि-वास्तु दोष, गुप्त शत्रु जाने- अनजाने हुये पापकर्म दोष व नवग्रहों की प्रतिकूलता का शमन महाकाली चण्डिका काल भैरव सर्व दोष संहारक की तेजमय चेतना में कर सकेंगे।
महाशिवरात्रि के दिव्य दिवस पर पापहारिणी क्षिप्रा तट और सप्तपुरी मोक्षदायिनी चेतनामय ज्योति से आपूरित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन, पूजन, अभिषेक जीवन्त जाग्रत सद्गुरु के सानिध्य में आत्मसात कर सकेंगे। जिससे जीवन शिव-गौरी परिवारमय गृहस्थ सुखों की सुस्थितियां से युक्त होगा और जीवन में सुख-समृद्धि, सम्पन्नता, आरोग्यता, दीर्घायु, संतान सुख, सम्मोहन, आकर्षण सौभाग्यमय धन लाभ से युक्त हो सकेंगे।
ऐसे दिव्यतम स्थान की धरा निश्चित रूप से सदाशिव आनन्द युक्त बनाने और जीवन में शक्तिमय माता गौरी की अखण्ड सौभाग्यता को प्राप्त करने में सर्व समर्थ है। 12 ज्योर्तिलिंगों में सर्वश्रेष्ठ महाकाल ज्योर्तिलिंग उज्जैन में जीवन की आलोकिक दिव्यतम महोत्सव महाशिवरात्रि पर्व पर सपरिवार स्व रूद्राभिषेक सम्पन्न करने से जीवन मृत्युोर्मा मृत्युंजय शक्ति युक्त बनता है।
सभी साधक सपरिवार आने पर जीवन को हर तरह की स्थितियों में श्रेष्ठमय बनाने और रिद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ कार्तिकेय विजयश्री की अक्षुण्ण चेतना से युक्त होकर साधनात्मक तेजस्वी शक्ति से अभिसिंचित हो सकेंगे।
प्रस्तुत कथा लिंग पुराण में वर्णित है, जिसे स्वयं भगवान शिव ने माँ पार्वती को सुनाया था और कहा था कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को जो व्यक्ति व्रत कर प्रदोष काल में मेरा पूजन करता हुआ रात्रि जागरण करता है, उसे शिव लोक की प्राप्ति होती है।
एक गांव में एक बहेलिया रहता था, जो बहुत गरीब था। पक्षी पकड़ कर या पशु मार कर गुजर बसर करता था, लेकिन इससे उसका जीवन यापन सही ढंग से नहीं हो पाता था। एक बार उसने अपने गांव के एक सेठ से कुछ रूपये कर्ज लिये, परन्तु बहुत समय बीतने पर भी वह उसे चुका नहीं पाया। एक दिन सेठ ने बहेलिया को बुलाया और धन न मिलने पर उसे शिव मन्दिर की एक कोठरी में बन्द कर दिया। वह फाल्गुन त्रयोदशी का दिन था और मन्दिर में भगवान शिव का भजन-कीर्तन हो रहा था। भूखा प्यासा बहेलिया दिन भर शिव-शिव, शंकर-शंकर सुनता रहा। रात हो जाने पर सेठ ने दयापूर्वक उसको कोठरी से छोड़ दिया और खाने को खाना भी दिया।
बहेलिया अपने घर चला गया, अगले दिन महाशिवरात्रि थी। सुबह-सुबह वह बहेलिया जंगल में शिकार ढूंढने चला गया। सारा दिन भटककर भी उसे शिकार नहीं मिला। थका-हारा बहेलिया भूख से परेशान होकर रात बिताने के लिये एक ऊंचे बेल के पेड़ पर मचान बनाया। पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था, मचान बनाते समय कुछ बिल्वपत्र टूट कर शिवलिंग पर गिरते रहे। बहेलिए ने पत्तो से बड़ा दोना बनाकर उसमें पानी भर पीने के लिये मचान पर रखा था। जब-जब वह हिलता-डुलता, कुछ बूंदे छलक कर शिवलिंग पर गिरती रहीं। रात के पहले पहर में एक गर्भवती हिरणी उधर आई, शिकारी ने उसे मारना चाहा तो हिरणी ने कहा कि मैंने गर्भ धारण किया है, बच्चे को जन्म देकर वापस आऊंगी। बहेलिया मान गया, दूसरे पहर में फिर एक हिरणी आयी, उसे मारने को धनुष उठाया तो वह भी बोली कि मैं अपने पति से मिलकर जरूर वापस आ जाऊंगी, तीसरे पहर में फिर एक हिरणी अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ वहां आई, उसने भी मारने को तैयार होते शिकारी को देख उससे विनती कि ये छोटे बच्चे अकेले घर नहीं पहुंच पायेंगे, मैं इन्हें घर पहुंचाकर स्वयं आ जाऊंगी। बहेलिया फिर माना गया, चौथे पहर एक सुन्दर बलवान हिरण पेड़ के नीचे आया। बहेलिया उसका शिकार करने के लिये तैयार हो गया, सोचने लगा कि रात भर में तीन हिरणियों को छोड़ चुका हूं, लौटने का कह कर एक भी वापस नहीं आयी, अब इस हिरण का शिकार तो करके ही रहूंगा।
फिर बहेलिये से सारी घटना जानकर हिरण ने कहा कि वे तीनो मेरी पत्नियां है। मेरे घर पहुंचे बिना वे सब कैसे आतीं, आप मुझे एक बार जाने दें, मैं अवश्य वापस आऊंगा, बहेलिये के मन में दया आ गई और उसने हिरण को भी जाने दिया। चारों पहरो में जब-जब बहेलिये अपना धनुष-बाण उठाया था, तब-तब बिल्व पत्र और जल की बूंदे शिवलिंग पर गिरती रहीं और अनायास ही भगवान सदाशिव महादेव की पूजा बहेलिये द्वारा सम्पन्न हो गयी। साथ ही बहेलिया निराहार तो था ही, प्रातः काल होने पर बहेलिया ने पिछली रात मंदिर में सुना नाम शिव-शिव, शंकर-शंकर दोहराया और दोने का बचा पानी पीकर पेड़ से नीचे उतर कर घर चलने को तैयार हुआ कि तीनो हिरणियां और हिरण अपने कहे अनुसार आ पहुंचे, उन पुशओं के सत्यपालन को देखकर बहेलिये का हृदय पाप मुक्त हो गया। उसने उन सब को जाने दिया और अपना धनुष बाण फेंक कर शिवलिंग को साष्टांग नमन किया। तब देवदूत विमान लेकर आये और बहेलिये के निराहर व्रत, जागरण, बिल्वपत्र अर्पण और दयाभाव के कारण उसे शिवलोक ले गये।
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