





ज्येष्ठ (मई) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से भूमि पर आविर्भूत हुयी थीं। जो दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है, इस दिन गंगा स्नान, पूजा, स्तुति आदि धार्मिक कर्म करने से दशविध युक्त पापों का भी नाश होता है, ।
वास्तव में गंगा केवल साधारण नदी मात्र नहीं, अपितु यह भारतीय संस्कृति की ज्वलन्त प्रतीक है, भारतीय संस्कृति का गौरव है। भगवती गंगा की पावन महत्ता का वेद, शास्त्र, उपनिषद्, पुराण, रामायण में वर्णन मिलता है।
बृहन्नारदीय पुराण में लिखा है- सतयुग में सभी तीर्थों का पूर्ण प्रभाव रहता है। त्रेता में पुष्कर का, द्वापर में कुरुक्षेत्र का और कलियुग में गंगा जी का विशेष महत्त्व है।
किसी भी तरह का पाप लगा हो, व्यक्ति महापातक ही क्यों न हो, शास्त्रीय विधि व नियम से गंगा स्नान कर वह सभी तरह के पातको से मुक्त हो जाता है। माँ गंगा के तट पर रहकर किये जाने वाली अनेक साधनात्मक क्रियाओं का कोटि-कोटि गुणा फल प्राप्त होता है। साथ ही यह भी स्पष्ट कहा गया है, कि गंगा तट पर किया गया पाप भी कोटि-कोटि गुणा होकर नरक का मार्ग प्रशस्त करता है।
माँ गंगा भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली हैं। स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त कराने वाले साधनों में गंगा अग्रणी हैं। गंगा जल पीने से अनेक जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। महर्षि वाल्मीकि माँ गंगा से प्रार्थना करते हुये कहते हैं- हे भागीरथि गंगे! मैं आप से यह प्रार्थना करता हूं कि तुम्हारे तट पर निवास करते हुये, तुम्हारा नाम स्मरण करते हुये मेरा शरीरपात हो।
तुलसी दास कहते हैं कि कलियुग में पाखण्ड प्रबल रूप में होगा। सभी ओर पतित, आचार भ्रष्ट, कर्तव्य विमुख लोग ही दिखायी देंगे। इस विषम स्थिति में आत्म कल्याण के दो ही मार्ग हैं- एक राम नाम का जप तथा दूसरा गंगा की पवित्र जल धारा, जिसमें स्नान करने से, जल पीने से तथा यथा सम्भव गंगा तट पर स्तुति, पूजन करने से आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा।
भारत ही नहीं, पूरे विश्व के जनमानस जो सनातन धर्म में आस्था रखते हैं, उनकी यह कामना होती है कि वह अपने जीवन में कम से कम एक बार माँ गंगा की जीवन दायिनी जलधारा स्नान कर स्वयं को कृतार्थ कर सके, उस पवित्र जल का पान कर आत्मिक शीतलता का बोध प्राप्त कर पायें। माँ गंगा को सुरसरि कहा गया है, इसीलिये हिन्दू की आकांक्षा होती है, कि मृत्यु के समय गंगा जल तथा तुलसी पत्र उसके मुख में डाला जाये और मृत्युोपरान्त उसकी अस्थियां गंगा के पावन जल में विसर्जित की जायें। भारतवर्ष में गंगा के प्रति वृहद आस्था और विश्वास का नाता है, गंगा हमारे जीवन में नदी ही नहीं बल्कि मातृ शक्ति गंगा के रूप विद्यमान है।
हे मातृ गंगे! देवताओं और राक्षसों से वंदित आपके दिव्य चरण कमलों को नमस्कार करता हूं, जो मनुष्य को नित्य उनकी भावना अनुसार भुक्ति और मुक्ति प्रदान करते हैं।
इस दिन गंगा नदी अथवा संभव ना हो तो समीप के किसी नदी या सरोवर में स्नान कर अभय मुद्रा युक्त मकर वाहिनी भगवती गंगा का ध्यान कर निम्न मंत्र से 21 बार जप करें-
जप पश्चात् इस मंत्र से नमः के स्थान पर स्वाहा लगाकर हवन भी कर सकते हैं। पश्चात् निम्न मंत्र से हाथों में पुष्प व जल लेकर गंगा उत्पत्ति स्थान हिमालय का ध्यान करते हुये पुष्पांजलि अर्पित करें।
गंगा में स्नान करते हुये दस बार डुबकी लगायी जाती है, जिससे मनुष्य के दस प्रकार के पापों को क्षय हो सके। इस दिन सत्तू दान का भी महत्व बताया जाता है।
गंगा में स्नान करते समय शरीर को बिना मले मसल की तरह गंगा में अवगाहन करें और यह भावना रखें कि अमृत रूप में ब्रह्म द्रव्य के द्वारा परमात्मा प्रभु से साक्षात् हार्दिक सम्मिलन हो रहा है। गंगा स्नान के अन्त में शरीर पोंछना नहीं चाहिये। शरीर से जो जल गिरता है, वह अन्य योनियों में गये हुये पितरों को प्राप्त होता हे। शरीर पोंछने पर वे पितर उस जल से वंचित हो जाने के कारण दुखी होकर शाप देते हैं। गंगा में स्नान करते समय निम्न मंत्र का उच्चारण कर डुबकी लगायें-
विष्णुपादाब्ज सम्भूते गंगे त्रिपथगामिनी।
धर्मद्रवेति विख्याता पापं मे हर जाहनवि।।
विष्णुपाद प्रसूतासि वैष्णवी विष्णु पूजिता।
त्रहि मामेन सस्तस्मादा जन्मरणान्तिकात्।।
श्रद्धया धर्म सम्पूर्णे श्रीमता रजसा च ते।
अमृतेन महादेवि भागीरथि पुनीहि माम्।।
त्रिभिः श्लोकवरैरेभिर्यैः स्नायाजाहनवीजले।
जन्म कोटि कृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः।।
स्नान के पश्चात् वस्त्र दूर निकाले, जिससे निचोड़ा हुआ जल पुनः गंगा में ना जाये और ना ही गंगा में वस्त्रादि धुलें।
एक बार शिव जी पार्वती के साथ हरिद्वार में घूम रहे थे। पार्वती ने देखा कि हजारों-हजारों मनुष्य गंगा में नहा-नहा कर ‘हर हर’ करते चले जा रहें हैं, परन्तु प्रायः सभी दुखी हैं। पार्वती ने बड़े आश्चर्य के साथ शिव जी से पूछा कि हे देव! गंगा में इतनी बार स्नान करने पर भी इनके पाप और दुःखों का नाश क्यों नहीं हुआ? क्या गंगा में सामर्थ्य नहीं रही?
शिव जी ने कहा- प्रिये! गंगा में तो वही सामर्थ्य है, परन्तु इन लोगों ने पापनाशिनी गंगा में स्नान ही नहीं किया है, तब इन्हें लाभ कैसे हो? पार्वती ने आश्चर्य से कहा कि स्नान कैसे नहीं किया? सभी तो नहा-नहाकर आ रहें हैं? अभी तक इनके शरीर भी नहीं सूखे हैं। शिव जी ने कहा- ये केवल जल में डुबकी लगा कर आ रहें हैं, तुम्हें कल इसका रहस्य समझाऊंगा।
दूसरे दिन बड़े जोर की बरसात होने लगी। गलियां कीचड़ से भर गयीं। एक चौड़े रास्तें में एक गहरा गड़ढा था, चारो ओर लपटीला कीचड़ भरा था। शिव जी वृद्ध रूप धारण कर दीन-विवश की तरह गड्ढे में जा गिरे। पार्वती को यह समझा दिया कि तुम लोगों से सहायता मांगकर मुझे निकालने का प्रयत्न करो, लेकिन जो गड्ढे से निकालने के लिये तैयार हो जाये, उससे कहना कि यदि आप सर्वथा निष्पाप हैं, तो ही मेरे पति को हाथ लगाना नहीं तो हाथ लगाते ही भस्म हो जाओगे।
भगवती पार्वती आने-जाने वालों से मदद की विनय करने लगीं, गंगा स्नान कर दल के दल लोग आ रहे थे, परन्तु भस्म होने की बात सुनकर किसी की हिम्मत ना पड़ी। सुन्दर युवती को बैठकर देख कईयों के मन में पाप भी आया, तो कई ने यहां तक कह दिया मर जाने दे बुड्ढे को इसके लिये क्यों रोती है? कई दयालु पुरूष भी आये परन्तु वे सोचने लगे कि गंगा स्नान करके आयें हैं तो क्या हुआ, पापी तो हैं ही, कहीं इसे छूने पर भस्म ना हो जायें। इस तरह सैकड़ों आये पूछा और चले गये।
थोड़ी देर बाद एक जवान हाथ में लोटा लिये, हर-हर करता हुआ आया, पार्वती ने उसे भी वही बात कही। युवक का हृदय करूणा से भर गया, उसने वृद्ध को निकालने की तैयारी की, पार्वती ने रोकते हुये कहा भाई! तुम सर्वथा निष्पाप नही होगे तो मेरे पति को छूते ही जल जाओगे। युवक ने उसी समय बिना किसी संकोच के कहा- माता! मेरे निष्पाप होने में तुझे सन्देह क्यों होता है? देखती नहीं मैं अभी गंगा नहाकर आया हूं।
भला गंगा में गोता लगाने के बाद भी कहीं पाप रहते हैं? तेरे पति को अभी निकालता हूं। युवक ने लपक कर वृद्ध को बाहर निकाला। शिव-पार्वती उसे दर्शन का अधिकारी समझकर उसे अपने मूल स्वरूप के दर्शन देकर कृतार्थ किया! तब शिव जी ने देवी पार्वती से कहा कि इतने लोगों में से केवल इस एक ने ही गंगा स्नान किया है।
वास्तव में पवित्र मन, भाव, श्रद्धा से किया गया गंगा स्नान का ही वर्णित उक्त फल प्राप्त होता है, केवल औपचारिकता वश अथवा दम्भ अहंकार के साथ किया स्नान या केवल पाप धोने की मंशा से स्नान कर लें और पुनः जाकर पाप कर्म में संलिप्त हो जायें, तो ऐसे स्नान का वास्तविक लाभ नहीं मिलता, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि गंगा स्नान का महत्व कम है। व्यक्ति में जितने उच्चकोटि के भाव होंगे, उतना ही लाभ प्राप्त होता है।
इसीलिये जब भी आप कभी गंगा स्नान करें, तो मन, कर्म, वचन से गंगा स्नान पूर्ण चैतन्य भाव से करें, स्नान के समय जितना हो सके शास्त्रीय नियम का पालन करें।
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