





उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में स्थित केदारनाथ धाम द्वाद्वश ज्योतिर्लिंगों, चार धाम और पंच केदार में एक है। इस ज्योतिर्लिंग को अपार ऊर्जा का केन्द्र माना जाता है। शंकराचार्य ने यहीं तपस्या कर समाधि ली थी। यह स्थान तीन तरफ़ से केदारनाथ पर्वत, खर्चकुंड व भरतकुंड पर्वत से घिरा है। यहां पर पंच नदियां मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीर गंगा, सरस्वती और स्वर्ण गौरी का संगम भी है, इनमें से कुछ नदियों का संगम वर्तमान में नहीं रहा, परन्तु मंदाकिनी नदी आज भी अविरल प्रवाहित है, इसी के तट पर केदारनाथ धाम स्थित है।
पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत काल में पांडव भ्रात हत्या व अन्य हत्या के दोषों से मुक्ति पाने चाहते थे, पांडव भगवान शिव के दर्शन हेतु काशी गये, पर वे उन्हे वहां नहीं मिले, फि़र वे लोग उन्हें ढूंढते हुये हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिये वे वहां से अंर्तधयान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर पांडव शिव दर्शन के श्रद्धा-लग्ग से दृढ़ थे, वे उनको ढूंढते-ढूंढते केदार आ पहुंचे। भगवान शंकर ने तब बैल रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवो को संदेह हो गया, तब भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ो पर पैर फ़ैला दिया।
अन्य सभी पशु तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुये। भीम बल-पूर्वक बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंर्तधयान होने लगा। जब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडव की भक्ति, दृढ़ संकल्प देखकर अत्यत प्रसन्न हुये, उन्होंने तत्काल पांडवो को दर्शन देकर, उन्हें सभी दोषों से मुक्त किया। उसी समय से भगवान शिव की आराधना केदारनाथ में की जाती है। ऐसा माना जाता है कि बैल रूप में शिव का मुख भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ था, जहां पर वे पशुपतिनाथ स्वरूप में विद्यमान हैं।
केदारनाथ धाम की यात्रा करना परम सौभाग्य है, ऐसा माना जाता है, कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन से व्यक्ति सभी पाप-दोष से मुक्त होकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति करता है।
अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है। भगवान शिव ने मां पार्वती को अमरकथा अमरनाथ गफ़ुा में सुनायी थी। भगवान शिव जब पार्वती को अमरकथा सुनाने ले जा रहे थे, तब उन्होंने सबसे पहले पहलगाम में अपने नंदी बैल का परित्याग किया। इसके बाद चंदनबाड़ी में अपनी जटा से चन्द्रमा को मुक्त किया। शेषनाथ नामक झील पर पहुंचकर उन्होंने गले से सर्पों को भी उतार दिया। अपने प्रिय पुत्र गणेश को महागुणस पर्वत पर विश्राम करने के लिये छोड़ दिया, इसके पश्चात् पंचतरणी नामक स्थान पर पहुंचकर भगवान शिव ने पांचों तत्वों का परित्याग किया था।
अमरकथा के रहस्य को भगवती पार्वती के साथ ही शुक (तोता) और दो कबूतरों ने भी सुन लिया था। यही शुक बाद में शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हुये। जबकि गफ़ुा में आज भी कई श्रद्वालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है, जिन्हे अमर पक्षी माना जाता है।
पुराणों के अनुसार काशी विश्वनाथ के दर्शन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना अधिाक पुण्यदायक अमरनाथ महादेव का दर्शन है। मान्यता है कि गफ़ुा के ऊपर पर्व पर श्रीराम कुण्ड स्थापित है। अमरनाथ गफ़ुा के अन्दर बनने वाली हिम शिवलिंग पक्के बर्फ की होती है, जबकि गफ़ुा के बाहर मीलों तक सर्वत्र कच्चा बर्फ ही दिखता है। जो सदाशिव महादेव के प्रत्यक्ष होने का प्राणी मात्र को संकेत है। यह भी कहा जाता है कि अमरनाथ शिवलिंग दर्शन से 23 पवित्र तीर्थों के दर्शन का फ़ल प्राप्त होता है। अमरनाथ गफ़ुा में स्थित पार्वती पीठ 51 शक्तिपीठों में एक हैं, जहां सती का कंठ गिरा था।
यह दिव्य धाम शिव-गौरी के सभी तीर्थ स्थलों में प्रमुख माना जाता है। इसकी महत्ता है कि यहां पर दर्शन करने वाला श्रद्धालु अमरत्व की प्राप्ति करता है और वह जन्म-मोक्ष के बंधन से मुक्त हो जाता है।
पवित्र गफ़ुा जाने के दो मार्ग है, पहला पहलगाम और दूसरा सोनमर्ग बालटास से, पहलगाम एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है। जम्मू या श्रीनगर से पहलगाम या बालटाल बस या छोटे वाहन से पहुंचना पड़ता है, इसके बाद आगे की यात्रा पैदल करनी होती है। खच्चर और घोड़े की भी व्यवस्था रहती है, व्यक्ति अपनी आवश्यकता अनुसार चयन कर सकता है। बालटाल से पवित्र गफ़ुा की दूरी चौदह किलोमीटर है, परन्तु यह सीधी चढ़ाई वाला बहुत ही दुर्गम रास्ता है। यह रास्ता सुरक्षित नही माना जाता, पहलगाम का यात्री बेस कैम्प 6 किमी दूर नुनवन में है। यहां 10 किमी की यात्रा कर चंदनबाड़ी, चंदनबाड़ी से आगे पिस्सु घाटी की चढ़ाई शुरु होती है, कहा जाता है कि पिस्सू घाटी में देवताओं और राक्षसों की लड़ाई हुई थी।
पिस्सू घाटी से 14 किमी शेषनाग पर विश्राम कर, अगले दिन 12 किमी की यात्रा कर पंचतरणी पहुंचा जाता है। यहां दिव्य अमरनाथ गफ़ुा मात्र 8 किमी रह जाती है। अमरनाथ ज्योतिर्लिंग यात्रा-दर्शन का एक अद्भुत आनन्द है।
ज्वाला देवी मन्दिर 51 शक्तिपीठों में से एक ज्योर्तिंमय शक्तिपीठ है, यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कालीधार पहाड़ी के बीच स्थित है, जहां मां सती जिव्हा गिरा था, यह शक्तिपीठ मां के अन्य शक्तिपीठों से भिन्न और चमत्कारिक है। यहां पर आद्या शक्ति ज्वाला अर्थात् अग्नि रूप में विद्यमान हैं। जो प्राकृतिक रूप से शाश्वत प्रज्ज्वलित रहती है। इसमें किसी भी द्रव्य पदार्थ का उपयोग नहीं होता है।
वैसे तो आद्या शक्ति के सभी शक्तिपीठों की अपनी अलग विशेषता है, और प्रत्येक शक्ति-पीठ दर्शन की अपनी महत्ता होती है। मां ज्वाला का दर्शन अग्नि स्वरूप में है, जो ज्ञान, प्रकाश का सूचक हैं। अग्नि अपार ऊर्जा का भी परिचय है।
अर्थात् जहां जीवन है, वहां अग्नि और ऊर्जा विद्यमान है। सच्चे मन और हृदय से ज्वाला शक्तिपीठ के दर्शन से भक्तों की मनोकामनाऐं पूरी होती हैं। माना जाता है कि यहां पर हवन करने से 10000 यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। यह पीठ धूमा देवी के नाम से भी जानी जाती है। यहां पर मां आद्या शक्ति की प्रतिदिन पंच आरती की जाती है, जिसमें प्रथम आरती ब्रह्म मुहूर्त में जिसे श्रृंगार आरती कहते हैं, दूसरी मंगल आरती, तीसरी मध्याकन दोपहर, चौथी संधया आरती और पांचवी रात्रि 9 बजे शैया आरती की जाती है। यहां पर मां की तांत्रोक्त पद्धति से शत्रु शमन व नवग्रह शांति के लिये गुप्त खप्पर पूजा भी की जाती है।
मां आद्या शक्ति इस अद्वितीय शक्तिपीठ पर पृथ्वी गर्भ से निकल रहीं 9 ज्वालाओं के रूप में विद्यमान हैं, जिसे मां का 9 स्वरूप कहा जाता है। जिसमें सबसे बड़ी ज्योति को महाकाली कहा जाता है और अन्य, मां अन्नपूर्णा, चण्डी, हिंगलाज, विंधयावासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, व अंजी के रूप में विद्यमान हैं। अनादि काल से प्रज्ज्वलित ये ज्योति साक्षात् आद्या शक्ति के जाज्वल्यमान स्वरूप को दर्शाती हैं, इस शक्तिपीठ में अद्भुत चेतना व ऊर्जा का भंडार है।
इस मंदिर में एक और अद्भुत विशेषता है, कि मंदिर के परिसर में स्थित पानी का एक छोटा कुण्ड जो गोरख डिब्बी व गोरख मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस जल कुण्ड में देखने से पानी उबलता हुआ दिखता है, किन्तु पानी में हाथ डालकर देखा जाये तो पानी ठंडा होता है। इस स्थान को गोरख मन्दिर या गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है।
मां ज्वाला के दर्शन 12 महीने होते रहते हैं, परन्तु नवरात्रि के दिनों में श्रद्धालुओं की भीड़ अधिक होती है। भक्तगण किसी भी माह में मां के दर्शन कर सकते हैं। आद्या शक्ति मां ज्वाला के 9 ज्योर्तिंमय ज्योति के रूप में दर्शन होते हैं।
कांगड़ा जिले के मुख्य बस स्टैण्ड से बस अथवा छोटे वाहन से दो घंटे की यात्रा पर मां ज्वाला मंदिर विद्यमान है, ज्वाला मंदिर बस स्टैण्ड से कुछ दूर पैदल चलने एक मुख्य पथ है, जो मंदिर परिसर तक जाता है।
द्वारका भारत के सबसे प्राचीन नगरो में एक है, आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धाम और पवित्र सप्त पुरियों में द्वारका धाम या द्वारका पुरी का वर्णन है। द्वारका को देव नगरी के रूप में भी जाना जाता है। भगवान कृष्ण द्वारा स्थापित यह नगरी उनकी कर्म भूमि है। भगवान कृष्ण ने यहीं से दुष्ट अत्याचारी अधर्मी कंस, शिशुपाल को परास्त किया और पांडवों को मार्गदर्शन देकर धर्म की स्थापना की, उन्होंने पूरे देश को एक नये मार्गदर्शक के रूप में धर्म की स्थापना का ज्ञान दिया। भारत के पश्चिम समुद्र के निकट बसा द्वारका नगरी अनेक विशेषताओं से युक्त है। द्वारका अर्थात द्वार जिसका तात्पर्य है प्रवेश, इसे ब्रह्मत्व का प्रवेश द्वार माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि द्वारका कर्म की भूमि है, यहां पूजा, दर्शन से व्यक्ति अपने कर्म, कर्तव्य का सही ज्ञान प्राप्त करता है। वह सद्गति की ओर अग्रसर होता है, उसकी प्रवृत्ति में धार्मिकता और आधयात्मिक चिंतन का गहन प्रवेश होना प्रारम्भ होता है।
बारह ज्योतिर्लिंगों में एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भी द्वारका के पास विद्यमान है, इसके साथ द्वारका के आस-पास अनेक प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनके दर्शन हेतु लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं। द्वारका मंदिर को जगत मंदिर, सार्वभौमिक मंदिर या त्रिलोक मंदिर (तीन लोकों में सबसे पवित्र) या चैतन्य आदि नामों से जाना जाता है।
रूक्मणि मंदिर- यह मंदिर भगवान कृष्ण की रानी रूक्मणि का है। जो मुख्य द्वार से तीन किमी की दूरी पर है। द्वारकाद्वीश के दर्शन के बाद इस मंदिर का दर्शन अवश्य करना चाहिये।
रणछोड़ जी मंदिर- द्वारका के भव्यता में एक रणछोड़ जी मंदिर जो भगवान कृष्ण का ही है। यहां श्याम वर्णीय सुसज्जित आभूषणों युक्त अति सुन्दर प्रतिमा भगवान कृष्ण की स्थापित है।
हीरे-मोती और सोने के मुकुट से शोभित चार भुजा धारी प्रतिमा चांदी के सिंहासन पर विराजित है।
शंख तालाब- रणछोड़ जी से तीन किमी की दूरी पर यहां भगवान कृष्ण शंख नारायण की विद्यमान हैं। यहां पर शंख तालाब में स्नान कर शंख नारायण के दर्शन किये जाता है।
शारदा मठ- आदि गुरु शंकराचार्य के चार मठों में से एक हैं, यह सनातनी संतों के लिये परम आराधय के रूप में स्थित है।
गोमती द्वारका- द्वारका के दक्षिण में एक तालाब है, जिसे गोमती तालाब कहते हैं, इस गोमती तालाब के ऊपर नौ कुण्ड है, जिसमें एक निष्पाप कुण्ड है।
इसमें गोमती का पानी भरा रहता है। भक्तगण पहले इसमें स्नान कर स्वयं को शुद्ध करते हैं। यहां पर पुरखों का पिण्ड दान भी होता है।
अन्य बहुत सी धार्मिक विशेषताओं और अद्भुत शिल्पकलाओं से परिपूर्ण द्वारका का दर्शन करना अपने आप में बहुत बड़े सौभाग्य की बात है।
जीवन में एक बार इस कर्म की चेतना से आप्लावित भूमि का स्पर्श अवश्य करना चाहिये। सांसारिक जीवन में भगवान कृष्ण के कर्म शक्ति, कर्म ज्ञान की आवश्यकता पग-पग पर होती है।
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