





एक बार जोधपुर में मनाये जा रहे 21 अप्रैल जन्मोत्सव को सद्गुरुदेव ने शिष्य जन्मोत्सव की संज्ञा दी थी, क्योंकि शिष्यों के रूप में गुरु का आनन्द जो प्रकट होता है और जिस रूप में वे स्वयं की परिपूर्णता भी अनुभव करते हैं। उत्सव का अवलम्ब बना कर जो कुछ संचालित होता है। वस्तुतः वह शिष्यों के जीवन को संवारने का प्रयास ही होता है।
साधक आंखों की कोर में थोड़ी सी श्रद्धा भर कर देखे, नतमस्तक होकर अनुभव करें तो उसकी पीठ पर निरन्तर गुरु का वरदहस्त रहता ही है और इसी कारण जीवन के मुख्य ऋणों में सबसे ऊपर गुरु-ऋण माना गया है। शिष्य अथवा साधक गुरु-कृपा का कोई भी प्रतिदान दे ही नहीं सकता, गुरु-ऋण यर्थाथतः चुका ही नहीं सकता, लेकिन परम्परा से वर्ष में दो ऐसे दिवस निश्चित किए गये, जब वह प्रतीक रूप में अपने गुरु के पवित्र चरणों में कुछ भेंट करके अपनी भावना व्यक्त कर गुरु की शक्तियों से अपने आपको चैतन्य कर सके, जिससे वह गुरुमय बनने की ओर क्रियाशील हो सके। ये दो पर्व होते हैं- गुरु पूर्णिमा व गुरु जन्म दिवस महोत्सव।
जिस प्रकार गुरु पूर्णिमा अत्यन्त पावन पर्व है, उससे भी अधिक एक शिष्य के लिये उसके गुरु का जन्मदिन पावन है, क्योंकि गुरु पूर्णिमा के अवसर पर तो हम प्रायः परम्परा से जो गुरु प्राप्त हुये हैं, उनका स्मरण करते हैं, किन्तु जिन्हें सौभाग्य से जीवित गुरु का सानिध्य मिला है, वे सौभाग्यशाली ही इस उत्सव को मना पाते हैं, इसका अनोखा आनन्द ले पाते हैं कि कैसे एक दिव्यात्मा के चरणों में बैठ कर, साक्षात् उनका पूजन कर उनकी कृपा-दृष्टि में भीग कर, उनके अमृत वचनों को कानों के माध्यम से अपने सारे शरीर में उतार कर दिव्य, चैतन्य, निरोगी, सुखी और श्री युक्त बनाया जा सकता है।
आने वाली पीढि़यां तो बहुत कसक से याद करती हैं कि काश! हमें ऐसे व्यक्तित्व का साथ मिला होता। उपस्थित पीढ़ी जीवित जाग्रत गुरु का अर्थ प्रायः नहीं समझ पाती क्योंकि गुरु वर्तमान युग से बहुत आगे चल रहें होते हैं, किन्तु आने वाली पीढि़यां उनका मूल्यांकन करने में कुछ-कुछ समर्थ हो पाती हैं और तब वे केवल उनके द्वारा छोड़े ज्ञान को आधार बनाकर अपना जीवन धन्य करती हैं। किन्तु ऐसे उल्लास और उत्सव के क्षण, जिस पीढ़ी को भी मिल जाये, उसे तो एक बार में झूम कर न्यौछावर हो जाना चाहिये, अपना सर्वस्व लुटा देना चाहिये क्योंकि ये उल्लास, ये उत्सर्ग कर देने का भाव, अपने समर्पण को प्रकट करने का अवसर बड़े सौभाग्य से मिलता है।
अब इसमें बचा कर रखना भी क्या, एक ही क्षण में अपने-आप को लुटा देना है! धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, अपना सब कुछ प्रभु चरणों में भेंट कर देना है, क्योंकि इसी से ही फिर जीवन का वास्तविक श्रृंगार होगा। ये सब सम्पदा व्यक्ति के साथ जाने वाली नहीं और उसके जीवन के पश्चात् केवल फूट और कलह की जड़ बन कर रह जाती है। ऐसे धन को यदि गुरु चरणों में चढ़ा दिया जाये तो न केवल साधक इस जीवन के पाप-दोष से मुक्त होता है वरन अपने इस जीवन को सुख-शांति, प्रेम, आनन्द, प्रसन्नता, प्रतिष्ठा से व्यतीत कर पाता है, ऐसे साधकों को मोक्ष भी सुलभ हो जाता है।
इतिहास साक्षी है कि जब आद्य शंकराचार्य सम्पूर्ण भारत की विजय यात्रा पर निकले थे, तो मार्ग में पड़ने वाले गांव की स्त्रियों ने उनके विराट लक्ष्य को पूरा करने के लिये अपने गले का हार, अंगूठियां, कर्ण फूल, कंगन इत्यादि स्वर्णिम आभूषण स्वतः ही उनके चरणों में भेंट कर दिये थे और हमारे सामने तो ऐसे समर्पण को प्रकट करने के लिये एक ऐसा पर्व उपस्थित हो रहा है। जिसकी चिरस्मरणीयता बनी रहेगी।
यह कोई निमन्त्रण या आमंत्रण नहीं है वरन होना तो यह चाहिए कि शिष्य स्वयं अपनी चेतना से इस महोत्सव में उपस्थित हो ही, साथ ही अधिक से अधिक कुधन रूपी ईर्ष्या, द्वेष, अहं को गुरु चरणों में अर्पित करना है, जिस प्रकार से गुरु पूर्णिमा में साधक श्रद्धा प्रकट करता है, अपनी भावना व्यक्त करता है, उसी प्रकार इस विशिष्ट पर्व में करना है। सही शिष्य तो वह जो अपना सब कुछ अर्पित कर दे और त्वदीयं वस्तु गोविन्दं तुभ्यमेवं समर्पयेत कहकर सम भाव से एक ओर खड़ा हो जाये।
जो अपने-आपको समर्पित कर अपनी पात्रता सिद्ध करने का दमखम रखते हों, गुरु के हृदय में उतरने का हौसला रखते हों, वे ही आगे आयें क्योंकि यह तो समुद्र में छलांग लगाने जैसा दुःसाहस है और पूज्यपाद गुरुदेव इस अवसर पर इस विशेष महोत्सव में अपने शिष्यों को शिष्यता की कसौटी पर कसकर देख लेना चाहते हैं, कि कौन केवल होंठों से अपने को शिष्य कहता है और कौन वास्तव में अपने कुभावों, कुसंस्कारों को अर्पित करने का हौंसला रखते हैं।
और बचाकर रखने से मिल भी क्या जायेगा? चंद ठीकरे यदि इकट्ठा भी कर लिये तो उससे जीवन की कौन सी प्रसन्नता मिल जायेगी? न तो उससे आप स्वास्थ्य प्राप्त कर सकते हैं, न नींद, न प्रेम, न प्रसन्नता और न जीवन की हंसी, फिर उन बेजान आभूषणों और कागज के टुकड़ों से प्रेम करना भी कैसा? यदि इसके विपरीत उन्हें गुरु चरणों में अर्पित कर दिया तो उसका हजार गुना आशीर्वाद युक्त वापस मिल ही जायेगा। समुद्र से एक बूंद खोती है और वापस वही एक नदी बन कर उसमें हजार- हजार गुना जल के साथ मिल जाती है।
यह तो जीवन का एक वर्तुल है कि जितना दिया जायेगा उसका सहस्त्र गुणा वापस मिलेगा। जितना बचा कर रखेंगे, तो वे भी यहीं रह जायेंगे। क्योंकि संसार में व्यक्ति भाग्य लेकर आता है, और कर्म उसके साथ जाते हैं। अब हमें विचार करना है कि इस जीवन में कर्म कैसे कर रहें हैं? हमारे कार्यों से ही संसार हमें स्मरण करेगा।
वास्तव में गुरु जीवन में न प्राप्त करने की वस्तु है न खोने की। न अर्जित करने की और न खर्च कर देने की। रोज-रोज की व्यापार बुद्धि हमारे ऊपर इतनी अधिक हावी हो चुकी है, हमारी आंखों में इतनी अधिक व्यवसायिकता उतर आई है कि हमने उन्हें भी एक व्यापारिक दृष्टि से देखने के प्रयास किये, लेकिन इससे जो सत्यता है, उस पर कोई अन्तर नहीं पड़ता।
इस सामान्य चर्म चक्षुओं से तो हम अपने घर-परिवार और सगे सम्बन्धियों को ही नहीं पहचान सकते। हमारे प्रति उनके मन में क्या भावना है, कितना प्रेम है, इसको ही नहीं आंका जा सकता, फिर एक विभूति को कैसे समझा जा सकता है? यद्यपि यह ईश्वर की हम पर असीम कृपा है, क्योंकि व्यक्ति इस जगत के छद्म और कपट व्यापार को यदि सही-सही जान ले तो उसका सारा हृदय ही घुट कर रह जायेगा।
इस सम्पूर्ण यात्रा में, उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक और मृत्यु के उपरान्त अनन्त ब्रह्माण्ड में जाकर लाखों- करोडों आत्माओं के बीच में विलीन अस्तित्व को सद्गुरु अपनी दृष्टि की सीमा में निरन्तर बांधे रखते हैं और उसके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते रहते हैं। सत्य तो यही है कि एकमात्र गुरु ही शिष्य के सच्चे शुभचिंतक हैं, श्रेष्ठ मार्गदर्शक हैं, उसके जीवन को सफल बनाने में सबसे अधिक सहायक हैं। उन्हीं सद्गुरु नारायण का जन्मोत्सव तो एकमात्र बहाना है, वास्तव में यह दिवस तो शिष्य को नवचेतना से सराबोर करने देने का भाव है, तेजस्वी-ओजस्वी रूप में निर्मित करने की क्रिया है।
आदि गुरु शंकराचार्य व सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्द जी के अवतरण दिवस पर सर्व शक्ति प्रदायक महामाया भूमि भाटापारा छ-ग- में सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी व वन्दनीय माता जी के दिव्य सानिध्य में 20-21-22 अप्रैल को नारायण भगवती अमृत महोत्सव में सिद्धाश्रम संस्पर्शित नारायण महामाया राजयोग कर्ण पिशाचिनी व अक्षय सौभाग्य धन लक्ष्मी शक्तिपात दीक्षा व साधना सम्पन्न कर साधक अपने जीवन में धन लक्ष्मी गणपति कार्तिकेय रिद्धि-सिद्धि शुभ-लाभ शिव-महामाया शक्ति चेतना से युक्त हो सकेंगे, जिससे अक्षय धन लक्ष्मी, कार्य व्यापार वृद्धि, संतान सुख, सौभाग्य शक्ति व शत्रु विहीन जीवन निर्मित होगा।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,