





बाल्यावस्था से ही कौरवों को अपने चचेरे भाई पाण्डवों से ईर्ष्या व द्वेष की भावना थी, क्योंकि सभी पाण्डु-पुत्र सदा से ही समस्त क्रिया-कलाओं में कौरवों से अग्रणी थे। दुर्योधन भीम के कारण सबसे अधिक चिन्तित था और इसीलिये एक बार दुर्योधन ने भीम के भोजन में विष मिला दिया था और अचेत अवस्था में जहरीले नागों वाले समुद्र में फेंक दिया। नागों द्वारा डंसने का विष और भोजन के विष ने भीम के शरीर में मिलकर प्रतिकारक का काम किया और भीम शीघ्र होश में आ गये, नाग देव वासुकी ने प्रसन्न होकर भीम को अमृत पान कराया, जिससे भीम और अधिक शक्तिशाली हो गये।
कहा जाता है कि भीम में दस हजार हाथियों का बल था। कौरवों द्वारा छलपूर्वक पाण्डवों का जब शासन हड़प लिया गया था, तब वे तेरह वर्ष तक अज्ञातवास स्वरूप वन में रहने लगे थे। उस समय अर्जुन हिमालय की ओर इन्द्रकीला चले गये थे, क्योंकि उन्हें कौरवों से युद्ध करने हेतु तेजस्वी शस्त्रों की आवश्यकता थी, इसका एक कारण और भी था कि कौरव सेना में भीष्म, द्रौण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वथामा आदि जैसे कई बहादुर योद्धा थे, इन सभी को पराजित करने के लिये और अधिक शस्त्र-बल की आवश्यकता थी।
पाँच वर्ष बीत जाने पर भी अर्जुन नहीं लौटे और चारों भाई समेत द्रौपदी को भी अर्जुन के बिना वन सूना लगने लगा था। एक दिवस ऋषि लोमश ने पाण्डवों के समीप आ उन्हें सूचित किया कि अर्जुन अपने कार्य में सफल हो गये हैं, परन्तु देवता गण को अर्जुन की कुछ समय के लिये आवश्यकता है, इसलिये वे कुछ समय पश्चात् ही आ पायेंगे। इस बीच आप सभी मेरे साथ गंधमन पर्वत की चोटी पर स्थित कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल की यात्रा पर चलें और अंत में कुबेर के रमणिक बाग की भी सैर कर सकते हैं व आते समय अर्जुन भी हमारे साथ होंगे।
मार्ग में प्रकृति के सुंदर दृश्य उन्हें देखने को मिले परन्तु पहाड़ की ओर जाने वाला मार्ग जटिल व संकरा था। युधिष्ठिर ने द्रौपदी की देख-भाल की जिम्मेदारी भीम को सौंपी थी। थोड़ी देर में ही आंधी-तूफान के बाद बारिश आरंभ हो गई परन्तु भीम ने कुशलता से द्रौपदी की रक्षा की।
विश्राम के लिये वे सभी कुछ दिन के लिये नारायण आश्रम रूकते हैं, इस आश्रम में नर व नारायण ऋषि ने कठोर तपस्या की थी। आश्रम के आस-पास भ्रमण करते समय द्रौपदी को सौंगधिका नामक एक सुंदर सुगंधित पुष्प मिलता है। वह भीम को उनके लिये ऐसे ही कुछ और पुष्प ले आने का अनुरोध करती है। भीम खुशी-खुशी मान जाते हैं और जिस मार्ग से सौगंधिका के पुष्पों की सुगंध आ रही होती है, उसी ओर प्रस्थान कर देते हैं।
वे घने जंगल में पहुँच जाते हैं, वहाँ उनका सामना जंगली हाथी, शेर जैसे कई भयंकर जानवरों से होता है, परन्तु सभी को परास्त कर भीम उन पुष्पों की महक की ओर बढ़ते चले जाते हैं। भीम एक झील को पार कर एक अन्य जंगल में प्रवेश कर रहे होते हैं तभी रास्ते में उन्हें एक वानर विश्राम करते हुये मिलता है, भीम उस वानर को मार्ग से हट जाने के लिये कहते हैं, जिससे वह वन में प्रवेश कर सके, परन्तु वह वानर कहता है कि वह बहुत दुर्बल व बीमार है। भीम को अपने बल पर घमंड होता है, भीम के मन विचार आता है कि मात्र एक वानर की बात वह क्यों माने? भीम कहते हैं कि ‘वृद्ध वानर! तुम नहीं जानते किससे बात कर रहे हो?
मैं पांडव वंश का क्षत्रिय हूँ। मैं माँ कुन्ती व पवन देव का पुत्र हूँ। मैं भीम, वीर हनुमान का भ्राता हूँ और इसलिये यदि तुमने मेरी आज्ञा का उल्ंलघन किया तो मेरे क्रोध का सामना करने के लिये तैयार हो जाना।’ अब बिना मेरा समय व्यर्थ किये, मेरे मार्ग से हट जाओ उस विशाल स्वरूप वाले वानर को भीम के कथनों का ज़रा भी असर नहीं होता, वह अट्टहास पूर्वक भीम से कहता है कि ‘यदि तुम इतनी शीघ्रता में हो तो स्वयं ही मेरी पूँछ को अपने मार्ग से हटाकर आगे चल जाओ।’ वह वानर आगे पूछता है कि ‘कौन है ये वीर हनुमान, मैंने तो यह नाम पहले कभी नहीं सुना, वह क्या करता है और ऐसा कौन-सा महान कार्य किया है उसने जो तुम इतने सम्मान के साथ उनका गुणगान कर रहे हो’। भीम कहता है कि ‘तुम बहुत बड़े अज्ञानी प्रतीत होते हो, तुम हनुमान से अनभिज्ञ कैसे हो सकते हो? क्या तुमने पराक्रमी हनुमान के बारे में नहीं सुना जिन्होंने सौ योजन से भी ज्यादा बड़े समुद्र को लांघ कर रावण की लंका दहन कर दिया था और प्रभु राम की अर्धांगिनी माता सीता को ढूंढ निकाला?
तुम तो वास्तव में अनभिज्ञ लग रहे हो’ उसके उत्तर में वानर केवल मुस्कुराता है। भीम कोई और उपाय न सूझते देख वानर की पूँछ को एक तरफ रख देने की सोचते हैं। परन्तु अपना पूरा बल लगाने के बावजूद भी वे उस वानर की पूंछ को आधा इंच भी हिला नहीं पाते। वे अपना सम्पूर्ण शारीरिक बल लगा देते हैं परन्तु सब व्यर्थ जाता है। भीम थक कर चूर हो जाते हैं। वह अपमानित व शर्मसार महसूस करते हैं कि वे एक वानर से हार मान गये?
भीम कहते हैं, ‘आप कोई साधारण वानर नहीं है, आप कौन है? मैं आपसे पराजय स्वीकार कर आपके समक्ष नतमस्तक हूँ। वह वानर कहता है, ‘भीम, मैं ही वह हनुमान हूँ, जिसका कुछ क्षण पूर्व तुमने वर्णन किया है। मैं ही तुम्हारा वह भ्राता हूँ। तुम्हारा आगे का मार्ग संकट भरा है, यह प्रभु का मार्ग है और मानव के लिये सुरक्षित नहीं है, इसीलिये मैं यहाँ तुम्हें सचेत करने आया हूँ। मुझे ज्ञात है कि तुम यहाँ सौगन्धिका के पुष्प लेने आये हो, मैं तुम्हें उस सरोवर का मार्ग दिखाता हूँ जहाँ यह पुष्प खिलते हैं। तुम वहाँ से जितने चाहो उतने पुष्प लेकर लौट सकते हो।’ भीम अति प्रसन्न होते हैं, हनुमान को देख उनकी अश्रुधारा बहने लगी, वह उनके आगे नतमस्तक हो गये।
भीम ने हनुमान से उनके विशाल स्वरूप के दर्शन की विनती की, जिस स्वरूप में उन्होंने सौ यौजन चौड़ी समुद्र को एक छलांग में पार कर लंका प्रवेश कर पाये थे। भगवान हनुमान ने भीम की विनती स्वीकार करते हुये अपने विशाल स्वरूप का दर्शन दिये, वह स्वरूप इतना विशालकाय था मानो कोई विराट चट्टान हो और इतना सफेद, चमकदार व प्रकाशयुक्त था, कि भीम को अपने नेत्र बंद करने पड़े। पुनः अपने साधारण स्वरूप में आने के बाद हनुमान ने भीम को गले लगा लिया और आशीर्वाद दिया। उन्होंने भीम को आश्वस्त किया कि ‘जब तुम महाभारत के युद्ध मैदान में शेर की भाँति दहाड़ोगे तब मेरी ध्वनि भी तुम्हारी ध्वनि में मिलकर तुम्हारे विरोधियों के हौंसले पस्त कर देगी।
मैं अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान रहूँगा और विजय तुम्हारी ही होगी।’ भगवान हनुमान द्वारा भीम को गले लगाने के कारण भीम का बल और अधिक प्रचंड हो गया था। हनुमान अपने भाई भीम को उसके बल के अहंकार से मुक्त कर विरोधियों के समक्ष सम्पूर्ण बल व पराक्रम से युद्ध लड़ने को प्रेरित करने के लिये आये थे। भीम को आशीर्वाद दे कर हनुमान ने उन्हें आगे प्रस्थान करने को कहा। जब भीम सौगन्धिका पुष्प लेने झील की ओर झुके, वहाँ कुबेर के सेवक असुरों ने भीम को ऐसा करने से मना कर दिया।
भीम के समझाने पर कि यह प्रकृति तो सभी के लिये समान है, तो वे उसे पुष्प लेने से क्यों रोक रहें हैं। परन्तु वे असुर नहीं माने व आक्रमण करने के लिये आगे आये, भीम ने शीघ्र ही उन सभी असुरों को परास्त कर दिया। वे सभी असुर अपने राजा कुबेर के समक्ष जा कर भीम के बारे में बताने लगे। कुबेर ने उन्हें आज्ञा दी कि भीम जितने चाहे उतने पुष्प ले जा सकते हैं और सभी पाण्डवों को महल में प्रस्थान करने का निमंत्रण दिया। भीम ने बहुत मात्रा में पुष्प एकत्रित कर द्रौपदी को दिये। द्रौपदी को भीम के बल व वचनबद्धता पर गर्व हुआ। सभी पाण्डव व द्रौपदी ने कुबेर के वन में कुछ दिन निवास भी किया।
निधि श्रीमाली
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