





पूर्व अध्याय में जनक कहते हैं कि यह विश्व अपनी स्वाभाविक गति से चल रहा है। मेरे ज्ञानी हो जाने से विश्व की गति में कोई परिवर्तन नहीं आ गया। बल्कि मेरी दृष्टि बदल गई जिससे पहले मैं उसमें लिप्त था, उसकी गति से प्रभावित था किन्तु अब मैं साक्षी होकर, दृष्टा होकर देख रहा हूँ। अब मैं उससे प्रभावित नहीं हो रहा हूँ। इससे मेरे में त्याग, ग्रहण और लय के विचार ही नहीं उठते। मैं आत्म-स्वरूप हो गया हूँ फिर ये विचार किससे उठें। विचार मात्र मन के हैं। आत्मा में कोई विचार नहीं हैं। इसी क्रम में वे आगे इस सूत्र में अपनी मुक्तावस्था का वर्णन करते हैं कि मैं आत्मा हूँ जो उस अन्तहीन महासमुद्र के समान हूँ जिसमें यह विश्वरूपी नाव अपनी प्रकृति वायु से इधर-उधर डोलती है। कोई दूसरा इस वायु को नहीं चलाता किन्तु मैं तटस्थ होकर, साक्षी होकर इसे देख रहा हूँ। मुझे असहिष्णुता नहीं है, मैं इससे प्रभावित नहीं होता हूँ। यह सारा उपद्रव, अशांति आदि लहरों तक ही सीमित है, समुद्र गहराई में प्रभावित नहीं होता।
इसी प्रकार मनुष्य की सारी अशांति का कारण मन है। मन में ही कामनाओं, वासनाओं की तरंगें उठती हैं, यह मन का स्वभाव है। जो नहीं है उसकी माँग है, जो है उसमें सन्तोष नहीं है, अधिक चाहिये, कोई धन पाने के लिये अशांत है, तो कोई पद के लिये, कोई सम्मान के लिये तो धार्मिक व्यक्ति ईश्वर तथा मोक्ष पाने के लिये ही अशांत है, लोग भिन्न-भिन्न कारणों से अशांत हैं किन्तु मेरे में सहिष्णुता है। मैं अपने स्वभाव को उपलब्ध हो गया हूँ, स्वाभाविक जीवन जी रहा हूँ अतः मैं पूर्णतया शान्त हूँ। मैं शान्त होने की चेष्टा भी नहीं करता। चेष्टा ही अशांति का कारण है। जो हो रहा है सब ठीक है, सब स्वीकार है, कोई चुनाव नहीं, अच्छे-बुरे का कोई भेद नहीं, कोई संकल्प-विकल्प नहीं, न मैं हिंसक हूँ न अहिंसक बनने का प्रयत्न करता हूँ, न संसार छोड़ा न संन्यास ग्रहण किया, न पश्चाताप करता हूँ न क्षमा याचना, न त्याग का आग्रह है न ग्रहण का। यही आत्मा का स्वभाव है और मैं उसमें स्थित हुआ शांत हूं।
जनक कहते हैं कि महासमुद्र में जिस प्रकार से तरंगें उठती हैं अथवा शान्त हो जाती हैं तो उनसे न समुद्र की कोई वृद्धि होती है न कमी। इसी प्रकार चित्त रूपी वायु से आत्मा में जो वासनाओं, कामनाओं आदि की तरंगें चाहे उठें या मिटें मैं आत्मरूप होने से मेरी न कोई वृद्धि है न हानि। यह सारी वृद्धि और हानि अहंकार की होती है। अहंकार प्रतिष्ठा माँगता है। न मिलने पर वह अपने को छोटा समझने लगता है, प्रतिष्ठा मिलने पर अपने को बड़ा समझने लगता है, फुग्गे की तरह फूलता व पिचक जाता है। संसारी तो प्रतिष्ठा मांगते ही हैं, साधु-संन्यासी भी माँगते हैं। वे भी बैंड बाजे बजवाते हैं, जय-जयकार करवाते हैं, शोभा-यात्रा निकलवाते हैं, तालियाँ बजवाते हैं, ऊँचे आसन पर ही बैठते हैं, यह सारा पाखंड पूज्य बनने के लिये करते हैं। वे अस्वाभाविक हैं, जो इन अहंकार की तरंगों से प्रभावित हैं। जनक कहते हैं मैं इन सबसे अप्रभावित हूँ अतः मेरी न वृद्धि है न हानि।
जनक कहते हैं कि मैं आत्मारूपी अन्तहीन समुद्र हूँ जिसमें यह संसार कल्पना मात्र है। जब इसका अस्तित्व ही नहीं है तो यह मुझे कैसे प्रभावित कर सकता है। पहले इस कल्पना को, भ्रम को ही मैं वास्तविक समझता था इसलिये यह मुझे प्रभावित करता था, अशांत करता था। अब मैं अपने को निराकार रूप में समझकर अत्यन्त शान्त हूँ। अब मेरे में कोई विक्षेप नहीं है। ये सारे विक्षेप मन के कारण थे। आत्म-रूप मुझमें कोई विक्षेप नहीं हो सकता।
राजा जनक कहते हैं कि शरीर के साथ इन्द्रियाँ और मन है। यह मन सदैव विषयों की ओर आकर्षित होता है तथा इन्द्रियों की सहायता से उन्हें भोग कर तृप्त होता है। शरीर नहीं रहने पर इन्द्रियां भी नहीं रहतीं किन्तु मन सूक्ष्म शरीर के साथ रहने से उसकी विषयों का सम्बन्ध केवल शरीर और मन तक ही है। ये ही कर्त्ता और भोक्ता हैं, ये ही विषयों का भोग करते हैं। मैं इनसे परे आत्म-स्वरूप हूँ जो न कर्त्ता है न भोक्ता। अतः इस आत्मा का विषयों से कोई सम्बन्ध नहीं है। न आत्मा विषयों में है और न ये विषय उस अनन्त, निर्दोष आत्मा में है, इसलिये मैं आत्मा होने से सदा इन विषयों के प्रति अनासक्त हूँ, विषयों के प्रति आसक्ति केवल मन व शरीर की है मेरी नहीं। इसलिये मैं स्पृहामुक्त हूँ, मेरी विषयों में कोई इच्छा नहीं है। ऐसी अवस्था में मैं स्थित हूँ।
जनक कहते हैं कि मैं आत्म-स्वरूप हूँ तथा आत्मा के लिये यह समस्त संसार इन्द्रजाल की भाँति, माया एवं भ्रम दिखाई देता हैं यह माया जाल मन और इन्द्रिय को ही प्रभावित कर सकता है जिसमें अज्ञान है। आत्मा ज्ञान-स्वरूप है वह इससे प्रभावित नहीं होती। वह इस सारे खेल को दृष्टा होकर देखती है। जब तक अज्ञान था तब तक मैं इस इन्द्रजाल को सत्य समझता था जिससे हेय और उपदेय, अच्छा-बुरा, लाभ-हानि, शुभ-अशुभ आदि की अनेक कल्पनायें करता था। अब मुझे आत्म-बोध हो चुका है जिससे अब अपने को इन सबसे परे आत्मा-स्वरूप मानता हूँ इसलिये यह संसार मुझे इन्द्रजाल से अधिक महत्व का ज्ञात नहीं हो रहा है, अब मैं इससे अप्रभावित हूँ, इसमें हेय की तथा उपादेय की कल्पना भी नहीं कर सकता। अब सब कल्पनायें ही व्यर्थ हो चुकी हैं। जब सब कुछ पा लिया, पाने को कुछ शेष नहीं बचा फिर कल्पना किसकी की जाये। इस संसार में न कुछ पाने को है, न छोड़ने को। भोग व त्याग दोनों कल्पनायें हैं जो कुछ पाने के लिये की जाती हैं। हेय और उपादेय, अच्छा-बुरा, शुभ-अशुभ आदि की सारी कल्पनाओं के पीछे प्राप्ति की वासना ही हैं। जब वासना ही नहीं रही तो ये भेद अपने आप छूट गये। मैं स्वभाव से जो हो रहा है उसमें संतुष्ट हूँ, कोई, चुनाव नहीं है। मैं दोनों का साक्षी होकर चैतन्य में स्थित हूँ।
अष्टावक्र के उपदेश से राजा जनक को तत्व-बोध हो गया। अष्टावक्र ने विभिन्न प्रश्नों द्वारा उनकी परीक्षा की एवं जनक उसमें भी खरे उतरे। अष्टावक्र इनसे संतुष्ट हो गये किन्तु अन्तिम रूप से बन्ध और मुक्ति की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकरण के इन चार सूत्रों में सार रूप में देते हुये कहते हैं- हे जनक! यह बन्ध कोई भौतिक नहीं है। संसार में कोई बाँधा जा सकता है। किन्तु उसकी चेतना, उसके मन, विचार आदि को नहीं बाँधा जा सकता। मनुष्य स्वयं देहाभिमान के कारण, वासनाओं और इच्छाओं के कारण अपने आप बाँधता है और फिर दुःखी होता है।
उसके दुःख का कारण कोई दूसरा नहीं, वह स्वयं ही है। आत्मा से भिन्न यह चित्त है। यह चित्त ही समस्त विचारों, वासनाओं, इच्छाओं का केन्द्र है। इसी से संसार भाता है। इसी के कारण सुख-दुःख का अनुभव होता है। यह चित्त विषयों की इच्छा वाला होकर उसे भोगने हेतु उसकी प्राप्ति की इच्छा करता है। इसी इच्छा से संसार की शुरूआत हो जाती है। इसी इच्छा पूर्ति हेतु वह संघर्ष करता है, दूसरों को कष्ट पहुँचाता है, शोषण करता है, अपनी तिजोरी भरता है। हिंसा व हत्या करता है, अनेक प्रकार के अच्छे व बुरे कार्य करता है। ज्यों-ज्यों उसे प्राप्त होता जाता है, लोभ बढ़ता जाता है, तृष्णा बढ़ती जाती है, मोह बढ़ता जाता है, एक पूरा जाल तैयार हो जाता है। जब उसे प्राप्त होता है तब हर्ष होता है, प्राप्त नहीं होने पर दुःख होता है। इस प्रकार वह सुख-दुःख का अनुभव करता हैं प्राप्त नहीं होने पर अथवा बाधा आने पर क्रोधित भी होता है। इस प्रकार जब चित्त इच्छा करता है, वासनाग्रस्त होता है तभी वह कुछ चाहता है, सोचता है, त्यागता है, ग्रहण करता है और इसी से उसे सुख-दुःख होता है। योग वशिष्ठ में भी कहा है कि ‘वासना से बँधा चित्त ही बन्धन है और वासना का क्षय ही मोक्ष है। इसलिये हे राम! तू वासना का त्याग करके मोक्ष की इच्छा का भी त्याग कर दे, तब तू सुखी होगा।’ बाहर कर्म-जगत् है जो छोटा है किन्तु इसके पीछे एक विशाल विचार-जगत् है एवम् इसके पीछे ही सबसे विशाल वासनाओं का जगत् है। वासनाओं से ही विचार उत्पन्न होते हैं एवं विचारों से ही कर्म होते हैं। इसलिये कर्मों को रोक देने से विचार नष्ट नहीं हो सकते एवं विचारों को रोक देने से वासनायें नष्ट नहीं होतीं।
वासनायें यदि मूल है तो विचार उसके तने व शाखायें हैं एवं कर्म उसके पत्ते हैं। इन सबकी खुराक तो वासनारूपी जड़ों से मिल रही है जिससे पत्ते मात्र काट देने से कोई परिणाम नहीं होता। जब तक वासनायें जीवित हैं तब तक कर्मों पर रोक लगा देने से कोई लाभ नहीं होता बल्कि वासनाक्षय से यह विचार और कर्म-जगत् अपने आप नष्ट हो जाता है। चित्त में होती है वासना, उसके कारण मन सक्रिय होता है जिससे विचार उत्पन्न होते हैं। इन विचारों को बुद्धि नियंत्रित करती है व थोड़े से विचारों को ही क्रियान्वित करने के लिये वह शरीर को आदेश देती है तब शरीर कर्म में उतरता है। अतः कर्मों का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है।
वासना के कारण ही मनुष्य सोचता है, चिन्तन करता है, त्याग करता है, ग्रहण करता है, एवं सुखी-दुःखी होता है। ये सब लक्षण हैं जो वासना के कारण पैदा होते हैं जिनसे यह पहचाना जाता है कि अभी वासना शेष है। मन का सक्रिय होना ही बन्ध नहीं है बल्कि वासना की उपस्थिति ही बन्ध है। वे काम, क्रोध, लोभ आदि उसके फल हैं। वासना से ही चित्त में तरगें उठती हैं। ये तरंगें ही मन है। तरंगों को सीधा रोका नहीं जा सकता केवल वासना रूपी वायु के रूकने से ही तरंगें शान्त होंगी। इसी प्रकार वासना क्षय से ही मन का क्षय होगा अन्यथा नहीं। अतः न शरीर बन्धन है, न उसके कर्म, न मन बन्धन है न उसके विचार बल्कि यह वासना ही बन्धन है।
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