





हजारों-हजारों साधक व गृहस्थ शिष्य इस बात के प्रमाण हैं, कि सद्गुरुदेव नारायण भगवती अद्वितीय चेतना, ईश्वरीय शक्ति से आपूरित व्यक्तित्व थे, जिनके सानिध्य में लाखों-लाखों पीडि़त, दीन-हीन जीवन से व्यथित व्यक्तियों के जीवन में प्रसन्नता, आनन्द, प्रेम, सुख-समृद्धि, आध्यात्मिक चेतना की प्राप्ति हुयी है और हजारों-हजारों साधक ईश्वरीय शक्ति, साधना, मंत्र जाप आदि से अपना तादात्मय स्थापित करने में सफल हुये। चेतना का प्रवाह निरन्तर प्रवाहित होता रहता है, चेतना ब्रह्माण्ड की वह शक्ति है, जिसका किसी भी कालान्तर में क्षय नहीं होता। वह सदा एक ही भाव में अग्रसर रहती है।
यही चेतना शक्ति व्यक्ति को जीवनी शक्ति अथवा जीवट शक्ति प्रदान करती है। मनुष्य के जीवन में जो भी चमक, तेजिस्वता, आशा, उत्साह, उमंग, उल्लास दिखाई पड़ता है, वह इसी चेतना शक्ति का प्रभाव है। शरीर में बलिष्ठता, निरोगता, स्फूर्ति, क्रियाशीलता के रूप में और मस्तिष्क में तीव्र बुद्धि, दूरदर्शिता, स्मरण शक्ति, सूझ-बूझ के रूप में यही शक्ति परिलक्षित होती है। आत्म-विश्वास, उत्कर्ष, धैर्य, साहस, काल को भी परास्त कर समस्त जीवन को सुरक्षित करने वाली यही चेतना शक्ति है।
यह चेतना समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। जड़ पदार्थो में जब यह चेतना कार्य करती है, तो उसे विद्युत कहते हैं, अध्यात्म की भाषा में इसे अपरा शक्ति कहते हैं। इस चेतना शक्ति को अनुभूति एवं संवेदनाओं से अपने जीवन में उतारा जा सकता है, लेकिन भाव दृष्टि और ज्ञान दृष्टि से ही उसकी निकटता प्राप्त हो सकती है। इसी चेतना को, शक्ति को ब्रह्म, ईश्वर, परमात्मा, नारायण भगवती आदि नामो से जाना जाता है। अध्यात्म विज्ञान हमें यही चिंतन देता है, कि व्यक्ति की भावनात्मक आत्मा उस विश्वव्यापी चेतना के साथ अपना जुड़ाव स्थापित कर अपने जीवन को उर्ध्वगामी बना सके।
मनुष्य अपने जीवन में परमात्मा रूपी सद्गुरुदेव के साथ आत्मिक जुड़ाव स्थापित करने में जितना अधिक अग्रगामी अथवा गंभीर होता है, उतना ही उसके जीवन में देवत्व का उदय, अवतरण होता है। वह अपने जीवन में सामान्य जन साधारण जीवन के अतिरिक्त जो विशिष्टता होती है, उसे इसी ब्रह्माण्डीय चेतना के द्वारा आत्मसात कर पाता है। यह चेतना व्यक्ति को सशक्त, प्रखर और समर्थ बनाती है।
हर्ष, उल्लास, आनन्द, जीवन्तता का महापर्व आपके जीवन को क्रियाशील करने हेतु दस्तक दे रहा है, जिसे सामान्यतः रंगोत्सव या होली पर्व कहते हैं, सद्गुरुदेव नारायण ने सदा मानव जीवन के लिये अनिवार्य प्रसन्नता, आनन्द पर अपने ज्ञान प्रकाश का दीपक प्रज्ज्वलित किया है। उन्होंने सदा मनुष्य को आनन्दमय जीवन व्यतीत करने की चेतना, प्रेरणा प्रदान की है। होली पर्व इसी आनन्द, उत्साह, प्रेम को परिभाषित करने का दिव्य अवसर है, उससे भी अधिक नारायण भगवती की वात्सल्यमय शक्ति से स्वयं को सराबोर कर जीवनी शक्ति से अभिभूत होने का महापर्व है। निखिल शिष्यों के प्रेम, श्रद्धा और अपने आराध्य सद्गुरुदेव से एकाकार हो जाने का चेतनामय दिवस, उनके प्राणत्व से सम्बन्ध स्थापित करने, नारायण भगवतीमय चेतना प्राप्ति का दिव्य अवसर है।
सद्गुरु शिष्य के लिये आराध्य होते हैं और आराध्य के साथ केवल भक्ति नहीं की जा सकती। आराध्य के प्रति भक्ति के साथ प्रेम का अटूट गहरा नाता होता है। तभी भक्त और भगवान, गुरु और शिष्य एकाकार होते हैं। जोधपुर की पावन नगरी इन्हीं नारायण भगवती की चेतनामय रश्मियों से आप्लावित है, जिसकी ऊर्जा शक्ति को आत्मसात कर व्यक्ति जीवन की मलिनता, दुर्गन्ध पूर्ण स्थितियां और दुर्भावनाओं पर विजय प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार गंगा की शीतलता प्राप्त करने के लिये गंगा के समीप जाने की क्रिया करनी पड़ती है, उसी तरह शिष्य को भी तन-मन-प्राण से गुरु के समीप, उनके निकट जाना पड़ता है।
इतना ज्ञान तो माली को भी होता है, कि उसी जमीन में अंकुर फूट सकता है, जो भीगी हो, जो चेतना से जुड़ी हो, जो दिव्यता को स्वयं में समेटे हुये हो। परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी के सानिध्य में इसी चेतनावान भूमि पर दुर्लभ नारायण भगवती अक्षुण्ण शक्ति प्राप्ति साधना महोत्सव 28 फरवरी व 01 मार्च को कैलाश सिद्धाश्रम के दिव्यतम साधना भवन में सम्पन्न होगा। आपका स्वागत है! उस दिव्य साधना स्थली पर, जो ब्रह्माण्डीय चेतना से आप्लावित है। जहां के कण-कण में नारायण भगवती के संस्पर्श चेतना का अनुभव होता है, जहां भावनाओं का प्रवाह है, जहां सम्पूर्ण गुरु परिवार की उपस्थिति, दुलार, करूणा व्याप्त है। वहां व्यक्ति को उन्मुक्ता का पूर्ण रूपेण अनुभव होता है, वह अपनी भावनाओं के माध्यम से गुरु से एक रस हो सकता है। यही जीवन का वास्तविक होली महोत्सव है, जब आप उन्मुक्त, स्वतंत्र भाव से जीवन में नवीनता आत्मसात कर सके।
आप सभी सच्चिदानन्द महाराज नारायण भगवती स्वरूप शिवमय गुरु चरणों में बैठ कर अपने जीवन का नवनिर्माण विविध रंगो के आलोक के साथ कर सकें। वन्दनीय माता जी, पूज्यपाद गुरुदेव का आर्शीवाद् प्राप्त कर जीवन को रसेश्वर आनन्दमय बना सके। इन्हीं भावों के साथ आपका हृदय भाव से स्वागत है—-!!!!
गुरु सानिध्य में जो सृजित होता है, वही वास्तविक उत्सव होता है, क्योंकि गुरु का चिंतन अपने शिष्य के जीवन में स्थायित्व के साथ कुछ नवीन सृजित करने का होता है। होली तो आप अपने घर पर भी एक-दूसरे पर रंग डाल कर मना सकते हैं, लेकिन जीवन के अशुभ का विध्वंस करने के लिये विशिष्ट साधानात्मक क्रियायें सिद्ध चैतन्य स्थल पर सद्गुरु सानिध्य में ही संभव हो पाती है। तब ही सृजनात्मक शक्ति का प्रवाह निरन्तर बना रहता है। होली महापर्व इन्हीं भावों को क्रियात्मक स्वरूप देने का दिव्य अवसर, जिसे आप सद्गुरुदेव नारायण व वन्दनीय भगवती की दिव्य चेतना शक्ति को सिद्धाश्रम संस्पर्शित रश्मियों के मध्य साक्षीभूत स्वरूप में आत्मसात कर सकेंगे। जिससे जीवन के अवरोधा, अटकाव, दीन-हीन स्थिति, अभाव पूर्ण रूपेण होलिकाग्नि में भस्मी-भूत होंगे व शत्रु संहारक महा- काली कर्ण पिशाचिनी दीक्षा से सर्वमांगल्य महाकाली जीवन प्राप्ति शक्ति से युक्त हो सकेंगे ।
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