





महर्षि द्वारा पूछे गये प्रश्नों को गहराई से देखें तो पायेंगे कि उनकी चोट मानव प्रकृति की उन सहज प्रवृत्तियों पर है जिन्हें आज का मनोविज्ञान मूल प्रेरक कहता है, जो मानव मन में स्पष्ट-अस्पष्ट बैठी मूल प्रवृत्तियां हैं। ये कब और कैसे अपना काम करती हैं, इसका ज्ञान भी नहीं होता। ये मानव मन का संचालन करती हैं और मानव एक खिलौने की तरह संचालित होता है। श्री मद्भगवद्गीता में इसी संदर्भ में भगवान श्रीकृष्ण से अर्जुन ने प्रश्न किया है-
‘किसके द्वारा प्रयुक्त हुआ यह जीव न चाहता हुआ भी पाप का आचरण करता है। प्रतीत होता है मानो कोई उसे पापकर्म में बलात् लगा रहा हो।’
‘वह देवी भगवती ज्ञानियों के चित्त को जबरदस्ती खींचकर महामाया द्वारा भ्रमित कर देती है।’
अष्टावक्र ने इस सूत्र में ‘काम’ की ओर संकेत किया है। वे आश्चर्य प्रकट कर रहे हैं। आखिर क्यों होता है ऐसा? क्या कारण है जो मोक्ष की इच्छा रखनेवाला साधक, परम अद्वैत को जानने का दावा करने वाला ज्ञानी काम द्वारा पीडि़त हो, तरह-तरह की चेष्टायें करता है।
जनक, तुम झांको स्वयं में, देखो स्त्री के प्रति अभी तुम्हारा आकर्षण समाप्त हुआ है या नहीं। यह आकर्षण सहज ही समाप्त हो जाता है, जब आत्मरति का सुखी प्राप्त हो जाये। राम सुख को बिना पाये, काम पर विजय का अभिमान तो किया जा सकता है, पर काम पर विजय नहीं पायी जा सकती।
अन्य वैषयिक सुखों से अलग है कामसुख। जड़ वस्तुओं में आसक्ति होती है, जबकि काम सुख में सामने से भी प्रतिक्रिया होती है। यह प्रकृति द्वारा दिया गया सहज सुख है। इसे शास्त्रों में ब्रह्मानंद का सहोदर कहा है। तंत्र शास्त्र की मान्यता है कि काम सुख ही वह सुख है जो किसी ऐसे सुख की ओर जाने को प्रेरित करता है, जहां समय ठहर जाता है, जहां चित्त और अहंकार के साथ समस्त इंद्रिया लय को प्राप्त हो जाती हैं। इस घटना को प्रजनन के रूप में, स्थूलरूप में समूची प्रकृति में भी देखा जा सकता है। इसलिये इससे ऊपर उठने का अर्थ है प्रकृति से ऊपर उठ जाना। और ब्रह्मवेत्ता प्रकृति के समस्त द्वन्द्वों से मुक्त हो चुका है, इसीलिये उसकी चित्तवृत्ति को काम मथता नहीं। व्यथित नहीं करता।
अष्टावक्र का अगला प्रश्न फिर से ‘काम’ को लेकर है। वे काम की तीव्रता को जानते हैं। काम का मूलरूप से ज्ञान यदि न हो, तो इससे मुक्त हो पाना मात्र कल्पना है। क्या यह आश्चर्य नहीं कि काम को ज्ञान का शत्रुरूप माननेवाला भी काम से स्वयं को घिरा पाता है। वह सोचता है, थोड़ा बहुत तो चलेगा ही। प्रकृति की देन है इसलिये चलेगा। अनेक ऋषि जब नहीं बच पाये, तो मेरे लिये भी छूट होनी चाहिये। आत्मसंतुष्टि के लिये वे श्रीकृष्ण आदि के उदाहरण देते हैं। इतने से ज्ञान की उपलब्धि में कोई फर्क पड़ने वाला नहीं, ऐसा तर्क होता है उनका। है न आश्चर्य।
महाराज पाण्डु को पता था कि उनके लिये स्त्रीसंग का अर्थ है मृत्यु। माद्रीं ने बहुत समझाया। लेकिन मृत्यु की कोई परवाह नहीं की उन्होंने। ‘अभी तो भोग लूं फिर देखा जायेगा’, यह तर्क पाण्डु का ही नहीं प्रत्येक का होता है। है न आश्चर्य! मृत्यु को सामने देखकर भी काम की इच्छा करता है जीव। जनक, तू देख अपने भीतर, कि काम के बारे में तेरी समझ क्या है, कैसी है? कितनी तीव्रता है तुझमें काम को लेकर? अगर तूने आत्मतत्व की उपलब्धि कर ली है, तो काम सुख तेरे जीवन से निरस्त हो जाना चाहिये। ऐसा हो गया होगा। हुआ क्या?
यह सूत्र मेरी दृष्टि से अत्यन्त व्यावहारिक और महत्वपूर्ण हैं मोक्ष की कामना करने वाला मोक्ष से डरता है। मुक्ति की बात करता है, लेकिन मुक्ति के साधनों को नहीं अपनाता। उसे डर है कि असंभावित के चक्कर में जो मिला हुआ है वह भी कहीं हाथ से न खिसक जाये। संशय की यह स्थिति अज्ञानी में होती हो, ऐसी बात नहीं है। अष्टावक्र कहते हैं कि विवेक और वैराग्य संपन्न मुमुक्षु के जीवन में भी यह देखने को मिलती है। और यह तब तक बनी रहती है, जब तक स्वप्नकाल के दृश्यों का इस रूप में ज्ञान नहीं हो जाता कि ये तो सपना थे। जनक, तुम्हें भी मोक्ष से भय तो नहीं? तुम्हें इस बात का भय तो नहीं कि संसार के विषय सदा-सदा के लिये कहीं ले न जायें? तुम्हें विश्वास हो गया है कि विषय सुख के जाने से तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला?
जनक तुम्हें अनुकूल परिस्थितियों में तोष (प्रसन्नता) और विपरीत परिस्थितियों में कोप तो नहीं होता? क्या तुम्हारे लिये सारी स्थितियां अनुकूल हो चुकी हैं? क्या तुम्हारी अनुकूलता-प्रतिकूलता की सोच समाप्त हो चुकी है? ऐसा अष्टावक्र जनक से इसलिये पूछ रहे हैं क्योंकि जो धीर पुरूष है, जो हमेशा केवल आत्मा का दर्शन करनेवाला है, उसका व्यवहार ऐसा नहीं होता। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘ब्रह्म में स्थित, ब्रह्मवेत्ता प्रिय वस्तु को पाकर प्रसन्न नहीं होता, अप्रिय को पाकर उससे द्वेष नहीं करता। क्योंकि उसकी बुद्धि स्थिर होती है।’
ऊपर बताये गये तत्वज्ञानी के लक्षण की विवेचना करते हुये महर्षि कहते हैं-प्रशंसा सुन हर्षित और निन्दा सुन क्रोधित तो वह होता है जो स्वयं को शरीर माने। जो तुम्हारी निन्दा या स्तुति कर रहा है, वह तुम्हारे शरीर से आगे तुम्हारे बारे में कुछ नहीं मानता। तो स्तुति या निन्दा किसकी हो रही है? शरीर की! आत्मा की कोई क्या स्तुति या निन्दा करेगा। निंदा-स्तुति का आत्मा पर कोई फर्क पड़नेवाला हनीं। जो स्वयं को शरीर नहीं मानता, आत्मा जानता है उसे सहजरूप में न ही तो स्तुति से हर्ष होगा न निन्दा से उद्वेग।
महर्षि के इस श्लोक का अंतिम चरण महत्वपूर्ण है। आमतौर पर ‘क्षोभ’ हम निन्दा की प्रतिक्रिया को मानते हैं। क्षोभ अर्थात् असंतुलन लेकिन महर्षि स्तुति को भी क्षोभ का कारण मानते हैं। स्तुति की अपेक्षा से ही तो निन्दा है। ध्यान रहे, निन्दा से तत्काल दुख होता है, क्षोभ होता है, वेदना होती है, जबकि स्तुति के गर्भ में छिपा होता है क्षोभ। ‘मुझे ऐसा कहा, जिसे लोग वैसा मानते हैं।’ विचार कीजिये इस स्थिति पर पता चल जायेगा कि कैसे स्तुति क्षोभ का कारण बनती है। आत्मवान्, विवेकशील इस रहस्य को जानता है, इसीलिये वह दोनों स्थितियों में अपना संतुलन नहीं खोया करता। वही एक समान रहता है।
‘जिस प्रकार सूर्य उदय के समय भी रक्तवर्ण का होता है और अस्तकाल में भी उसमें कोई अन्तर नहीं आता। इसी प्रकार सुख हो या दुःख महान पुरूष दोनों स्थितियों में एक रूप ही रहते हैं।’
जो स्तुति-निन्दा में समान बना रहता है, उसके लिये महर्षि ने संबोधन प्रयुक्त किया-महाशय। महान आशय है जिसका। जिसका लक्ष्य परम को पाना है। इसीलिये वह छोटी-मोटी बातों के संवरने-बिगड़ने से परे रहता है। वह नहीं उलझाता स्वयं को क्षणिक ऐसे लक्ष्यों को पाने में जिनका अस्तित्व मात्र प्रतीतिभर है।
पिछले श्लोकों में महर्षि ने मूल प्रेरकों को लेकर सवाल किया है। इस श्लोक में भी वे एक ऐसे ही प्रेरक की बात करते हैं। जीव अपने अस्तित्व को बचाने में ही सदैव लगा रहता है। उल्टी-सीधी कोशिशें करता है, वह अस्तित्व को बचाने व सुरक्षित करने के लिये। प्रयास करने के बाद उसे इस बात का संतोष भी होता है कि उसने स्वयं को बचा लिया। लेकिन एक स्थिति ऐसी है, जिससे वह स्वयं को बचा नहीं पाता। वह जानता है बच नहीं पाऊंगा। फिर भी हिम्मत नहीं छोड़ता, प्रयास करता रहता है। लेकिन जो जीवन के, जगत के स्वरूप को जान लेता है, वह मृत्यु के सामने आने पर भी भयभीत नहीं होता। वह जानता है कि शरीर तो प्रत्येक सात वर्ष बाद पूरी तरह से परिवर्तित हो जाता है। जन्मने-मरने की प्रक्रिया उसमें निरन्तर चल रही है। शरीर तो मरेगा ही अपने मूल तत्वों के रूप में भले ही नहीं, नाम-रूप में तो। और आत्मा? वह कभी जन्मती-मरती नहीं। तो भय किसका?
जो तत्वज्ञानी है, जिसकी बुद्धि स्थिर हो गयी है, जिसे जगत के स्वरूप का, अपने स्वरूप का निश्चय हो गया है, वह मृत्यु से भी नहीं डरता। जनक, निरीक्षण कर अपना, तुझे अपनी मृत्यु का भय तो नहीं। मृत्यु यदि तेरे सामने आकर खड़ी हो जाये, तब तू भयभीत तो नहीं होगा।
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