





अर्थात् आहार, निद्रा, भय और मैथुन मनुष्य तथा पशु में समान रूप से होता है। पशु भी इन्हीं चार बातों में चलता हुआ अपना जीवन बिताता है तथा सामान्य मनुष्य भी जीवन में इन चार बातों के सहारे ही अपना संसार रचित करता है, उसमें इच्छायें, कामना इत्यादि जागती है। फिर मनुष्य में ऐसी क्या विशेषता है, जिसके कारण से उसे पशु से अलग किया गया है। इसी शास्त्र में आगे लिखा है कि-
अर्थात् ज्ञान ही मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता है और ज्ञान ही उसे पशुत्व से मुक्त करता है। जो व्यक्ति ज्ञान में अग्रणी होगा, वही जीवन के रहस्य को भली-भांति समझ सकता है।
इस जीवन में आकांक्षा, इच्छा के बिना कोई कर्म नहीं होता और किसी भी कर्म का परिणाम निश्चित रूप से प्राप्त होता है। कर्म करने से ही फल की प्राप्ति होती है तथा कर्म से पूर्व मन में फल के प्रति आसक्ति भाव भी रहता है। मनुष्य जीवन में सबसे बड़ी बाधा यह है कि वह कर्म के परिणाम से किस प्रकार से मुक्त रहे। संसार में रहकर संसार की विषमताओं से ही मुक्त रहने की क्रिया जीवन मुक्ति क्रिया कहलाती है, जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल के प्रभाव से मुक्त रहता है। उसके ऊपर जल की एक बिन्दु भी नहीं ठहरती है। यह जीवन मुक्ति की अवस्था है, पूर्णत्व की अवस्था है। इस अवस्था का ज्ञान निरंतर कर्म करने से साधना करने से ही आता है।
हमारे शास्त्रों में गृहस्थ और संन्यास जो भेद बताये गये हैं वे कर्म के भेद नहीं है, दोनों में कर्म की पद्धति का भेद है। ऐसा नहीं हो सकता है कि जो व्यक्ति केवल गृहस्थ है, वह गृहस्थ में रहकर संन्यासी नहीं बन सकता है और जो व्यक्ति संन्यासी है, वह संन्यास में रहकर गृहस्थ का पालन नहीं कर सकता। दोनों में केवल कर्म करने के तरीके में भेद है। गृहस्थ व्यक्ति स्वयं द्वारा निर्मित कर्म के जाल में निरंतर उलझता रहता है। यह जाल छोटा अथवा बड़ा। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता, लेकिन यदि व्यक्ति अपने जीवन में संन्यस्त भाव से कर्म करता है, तो कर्म के बंधन उस व्यक्ति को बांध नहीं सकते हैं। वह गृहस्थ मे रहकर भी चिन्ता मुक्त हो सकता है और यदि कोई संन्यासी चिन्ता से युक्त रहता है, तो उसे संन्यासी नहीं कहा जा सकता।
संन्यास का तात्पर्य कर्म का त्याग नहीं हैं, अपितु कर्म की पद्धति का त्याग है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि-
अर्थात् जो व्यक्ति कर्म फल पर आश्रित न रहकर कर्म करता है, वहीं संन्यासी है, वही योगी है। जीवन में पढ़ाई, लिखाई, नौकरी, विवाह इत्यादि जितने भी कर्म हैं, वे सब फल के अधीन हैं। कर्म और कर्तव्य में बहुत अधिक अन्तर है, जो कर्म कर्तव्य भाव से किया जाता है, उसमें व्यक्ति उस कर्म के फल से चिपकता नहीं है, जबकि बिना कर्तव्य के क्रिया ऐसा कर्म बनती है, जो उसे निरंतर बंधनों में लपेटती रहती है। जिस कर्म के फल में मनुष्य की बुद्धि लिप्त है और जो कर्म इच्छा से प्रेरित होकर किया जाता है, उसे कर्म कहते हैं और उनसे फल संस्कार तथा जन्म, मरण होता है, जो कर्म कामना रहित फल की आशा से मुक्त होकर किया जाता है तो उसे कर्मयोग कहते हैं। व्यक्ति संसार रूपी भूमि में जो बीज बोता है, उसका फल अवश्य प्राप्त होता है। यदि बीज को भून करके बोया जाये, तो उससे वृक्ष की उत्पत्ति नहीं हो सकती है।
संसार में आकर मनुष्य कामना के आवरण में इस प्रकार लिप्त हो जाता है कि उसे जीवन में उसका फल सुख-दुख रूप में, हानि-लाभ रूप में, जन्म-मरण रूप में, सम्पत्ति-विपत्ति के रूप में, रोग, जरा, मृत्यु और अपमान के रूप में प्राप्त होता है। लेकिन यदि इसी कर्म को कर्तव्य की अग्नि में तपा दिया जाये तो उस पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता और उससे दुख की उत्पत्ति भी नहीं होती। वह संन्यास की स्थिति में पहुंच जाता है। वही सच्चा संन्यासी है।
जब संन्यास का भाव जाग्रत होता है, तो वह अपने प्रत्येक कर्म को अपने तंत्र को अलग रूप से देखने लगता है, तब उसमें और संन्यासी में अंतर मिट जाता है। उसे अपना लक्ष्य हर समय ध्यान रहता है। वह जान जाता है कि वह कर्ता का ईश्वर का एक अंश है, वह नियमित रूप में इस संसार में आकर कार्य कर रहा है। तब उसे किसी भी प्रकार का दुख सताता नहीं है। गृहस्थ व्यक्ति को देह की चिन्ता ज्यादा सताती है और देह की चिन्ता को वह मन की चिन्ता बना लेता है और एक चिन्ता दूसरी चिन्ता को उत्पन्न करती है। जब कि संसार का कार्य संन्यस्त भाव से किया जाये, तो चिन्ता की उत्पत्ति ही नहीं होती है।
कर्म मानसिक और भावनात्मक शक्ति को प्रखर करने का माध्यम है। जहां-जहां भी व्यक्ति क्रिया करता है, वहीं यह शक्ति क्रिया करती है। संन्यास भाव में शारीरिक श्रम और आध्यात्मिक प्रयास दोनों ही समान रूप से किया जाता है, इसीलिये श्रेष्ठ सुकर्मशील व्यक्ति को राज योगी कहा जाता है।
प्रथम कर्तव्य है, आत्म उन्नति और दूसरा कर्तव्य है, समाज में आध्यात्मिक विचार और ज्ञान का प्रचार करना वह केवल स्वयं की उन्नति के लिये ही नहीं अपितु सारे परिवार व समाज की उन्नति के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहता है। उसके भीतर चंचलता समाप्त होकर चित्त में मानसिक शांति व सदैव आनन्दमय रहने की स्थिति आ जाती है। यह संन्यासी गृहस्थ जीवन में ही अपने सारे बंधनों के क्रम को एक-एक करके तोड़ कर सदैव अपने आपको उन्मुक्त भाव से अनुभव करता है और उसके लिये उसे अपने मन का स्वामी बनना आवश्यक है, जो अपने कु-संस्कारों का नाश कर अपने मन को आत्म बल से नियंत्रित कर देता है, वही संन्यासी है।
केवल कुंकुम, अक्षत की पूजा से, केवल आरती उतारने से इच्छाओं की पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती, ना ही धूप, अगरबत्ती, हवन से भगवती व लक्ष्मी की चेतना को प्राप्त कर सकते हैं। उनके सामने भोग लगाकर, घण्टा-घडि़याल बजा कर हम देवी की शक्तियों को प्राप्त नहीं कर सकते, ऐसा तो हम कई वर्षों से करते आ रहें हैं, कई वर्षों से दीपावली की रात्रि को दीपकों की जगमगाहट करते आ रहे हैं, भगवती की नयी प्रतिमा स्थापित करते आ रहे हैं। इन सब क्रियाओं से जीवन रूपी लक्ष्यों की प्राप्ति संभव नहीं हो पाती है। इसके लिये तो आवश्यक है कि हम सद्गुरु रूपी देव शक्तियों को चैतन्य स्वरूप में अपने घर में, अपने जीवन में महत्वपूर्ण स्थान दें।
कार्तिक पूर्णिमा को लक्ष्मी सिद्धि का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त बताया गया है। श्रेष्ठ सांसारिक संन्यस्त शक्ति युक्त गृहस्थ जीवन का तात्पर्य ही सर्व लक्ष्मियों से युक्त होना है। वास्तव में लक्ष्मी जो सहस्त्र गुणों से युक्त होती है। उसकी आवश्यकता गृहस्थ व्यक्ति को ही अधिक रहती है। क्योंकि गृहस्थ व्यक्ति का जीवन पशु जीवन से थोड़ा ही ऊपर होता है। साथ ही जीवन की साधनात्मक क्रियाओं को सम्पन्न करते हुए अपने आपको हर तरह से श्रेष्ठ बना सके और उसके लिये आवश्यक है कि सहस्त्र स्वरूपों में धन लक्ष्मी, भू-वसुधा लक्ष्मी, सरस्वती लक्ष्मी, प्रीति लक्ष्मी, कीर्ति लक्ष्मी, शांति लक्ष्मी, तुष्टि लक्ष्मी और पुष्टि लक्ष्मी की प्राप्ति हो।
सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्द जी महाराज के आशीर्वाद् से सिद्धाश्रम चैतन्य भूमि कोरबा (छ-ग-) में गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी के सानिध्य में सर्व शक्ति प्रदायक महामाया भूमि पर कार्तिक पूर्णिमा गुरु परब 02-03-04 नवम्बर को सर्वमंगला महामाया संन्यास शक्ति साधना महोत्सव सम्पन्न होगा।
इस महान आयोजन में भगवान सदाशिव महादेव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय पूर्णिमा शनिवार को भोर काल में जीवन को अभिशाप रूपी बनाने में सहायक तंत्र दोष, प्रेत बाधा, सर्व पितृ दोष की मुक्ति हेतु कर्ण पिशाचिनी व महाकाल भैरव शक्तिपात साधनात्मक क्रियायें सम्पन्न होंगी। जिससे आने वाला नूतन वर्ष साधक के जीवन के प्रत्येक भाव को सुन्दर, सौम्य, आनन्द, सुखमय युक्त निर्मित करने से सांसारिक जीवन में निश्चिन्त रूप से निखार और श्रेष्ठता आ सकेगी।
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