





मैं जगत् में व्याप्त हूं और यह जगत् मुझ अधिष्ठान में स्थित है, यह भी भ्रान्ति है, ऐसा निश्चय जनक को हुआ है। क्योंकि व्याप्य-व्यापक भाव और अधिष्ठान-अधिष्ठेय की बात तो तब ही पैदा होती है जब जगत् को नित्य व सत्य मानें। जब जगत मिथ्या ही है, तो ये द्वैत परक सम्बन्ध प्रगट करने वाले शब्द भी अर्थ हीन हो जाते हैं। तब तो न वहां बन्ध रहता है न मुक्ति।
उपरोक्त बात को स्वप्न के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मानो स्वप्न में किसी को कारावास हो जाता है। प्रयत्न करके वह कारावास से मुक्त हो जाता है। जागकर वह किसी को अपना सपना सुनाता है। स्वप्न की गाथा सुनने वाला उस व्यक्ति को कारावास से मुक्त होने की बधाई देता तो स्वप्न सुनने वाले का यह उत्तर सहज रूप में नहीं होगा- ‘मूर्ख हो, मैं बंधा ही कब था जो मुक्त हो गया, इसलिये बधाई किस बात की।’ इसी तरह यदि अज्ञान में पड़े हो, तो संसार हैं संसार है तो बन्धन ही बन्धन है। तब मुक्ति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। और जब जाग गये, तो न बन्धन है, न मुक्ति। बन्धन और मुक्ति दोनों ही भ्रांतियां सापेक्षिक हैं, इसलिये मैं संसार में हूं और संसार मुझ में है, ये दोनों मान्यतायें भी भ्रान्ति परक हैं। वस्तुतः तो वह कुछ भी नहीं है, जो दिखाई दे रहा है।
पहले कहे गये सूत्रों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि भ्रांति के लिये प्रकाश और अन्धकार दोनों का होना जरूरी है। पूर्ण अंधकार में भ्रांति संभव नहीं और पूर्ण प्रकाश में, जब सब बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा हो, भ्रांति का प्रश्न ही नहीं उठता। जब ज्ञान हो गया और अधिष्ठान स्पष्ट रूप से दिखने लगा शरीर समेत तो जगत् का प्रश्न ही नहीं उठता-यहां अधिष्ठान शब्द का प्रयोग समझने के लिये किया गया है, क्योंकि इस शब्द का प्रयोग भी तभी बनता है, जब अधिष्ठेय की सत्ता को सत्य स्वीकारा जाये। अब सब स्पष्ट दिखाई दे रहा है, इसलिये जगत् की कल्पना कैसी। सब शुद्ध चेतन मात्र ही तो है- ऐसा विचार निश्चित हो चुका है- अनुभव के धरातल पर पहुंचने के बाद महाराज जनक को।
जब जगत का ही अस्तित्व नहीं तो द्वैत मूलक स्वर्ग-नरक, बन्ध-मोक्ष आदि शब्दों की कैसी सार्थकता। और यह भी कि इन्हीं को लेकर कर्तव्य अकर्तव्य का विधान शास्त्रें में वर्णित हैं धर्म से स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति होती है। निष्काम कर्म और उपासना से अन्तः करण शुद्ध होता है और शुद्ध अंतःकरण में ही अद्वैत ज्ञान प्रकट होता है- सद्गुरु की कृपा से। ये सभी विधि-निषेधादि कर्म जगत् की सत्यता को लेकर हैं। जब अद्वैत ज्ञान हो गया, तो कैसा कर्तव्य। ज्ञानी जब इस तरह की बात करता है, तो लोग अकसर भ्रमित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं ऐसा न हो कि ज्ञानी कोई व्यवहार कर बैठे जो शास्त्र विहित न हो। ऐसे व्यवहार का अनुकरण साधक करेंगे, जिसका प्रतिफल अधर्म आचरण होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। शास्त्र विहित कर्म ज्ञानी सहज रूप में करेगा-बिना किसी अपेक्षा के, उपेक्षा के। पुष्प यदि सुगन्धित है, तो सुगन्ध के लिये कोई प्रयास अपेक्षित नहीं है। उसकी सुगंध से आस-पास सहज रूप में सुवासित होता है। धर्म-अधर्म स्वर्गनरकादि जैसे द्वन्द्व परक शब्दों के साथ जनक ने ‘भय’ शब्द का विशेष रूप से प्रयोग किया है। निर्भयता ज्ञानी का प्रमुख और सहज लक्षण है। जो जगत् और आत्मा के स्वरूप जान-पहचान गया, उसे कैसा और किसका भय। भय तो अन्य से होता है और दूसरा कोई है नहीं।
कुछ विद्वानों की धारणा है कि अध्यात्म और व्यवहार बिल्कुल अलग-अलग हैं। अद्वैत ज्ञान जिसे हो चुका है, ऐसा तत्वज्ञानी भी व्यवहार में द्वैत परक व्यवहार करता है, पंडिताः समदर्शिनः समवर्तिनः नः -तत्ववेत्ता समदर्शी होते हैं, समवर्ती नहीं। जबकि अन्य का मानना है कि ऐसा संभव नहीं। एक ही स्थान पर दो ज्ञान नहीं हो सकते। यदि रस्सी दिख रही है, तो वह सच हैं उसके प्रति सर्प सा व्यवहार कोई चाहते हुये भी नहीं करेगा। जबकि इससे विपरीत किसी स्थान पर सर्प भास हो रहा हो, वह भय आदि लक्षणों को प्रकट किये बिना रह नहीं सकता। जनक कहते हैं कि अब मुझे द्वैत भ्रमित नहीं करता, मैं नाना जीवों में बिल्कुल वैसे ही रहता हूं जैसे अरण्य में नाना वृक्षों के बीच विचरने वाला के नानात्व से भ्रमित नहीं होता। भटकाव व उस भटकाव से उत्पन्न दुख का प्रतीक है जंगल। दूर से दिखने में सुन्दर दिखने वाले जंगल के यथार्थ दुख रूप को मैं भली-भांति जानता हूं। अब वह संसार रूपी जंगल मुझे आकर्षित नहीं करता।
शरीर कैसे मेरा नहीं, मैं क्यों शरीर नहीं, कैसे मैं चैतन्य भी नहीं। इन बातों को समझना अब सरल हो गया होगा। ऐसा अनुभव निरपेक्ष, निर्द्वन्द्व अस्तित्व की ओर संकेत करता है। इस सूत्र में महत्वपूर्ण है बन्धन के एक कारण की अन्य ही रूप में प्रस्तुति। कोई कहे कि अमुक पानी में इसलिये डूब गया क्योंकि डूबते समय उसने प्रयास किया कि वह न डूबे। सुनकर अजीब-सा लगता है। कैसे हो सकता है ऐसा, लेकिन असलियत यही है कि उसके बचने के प्रयास ही उसके डूबने का कारण बनते हैं। यदि वह लहरों में स्वयं को छोड़ दे, तो वो लहरें जो उसे डुबाने की जगह किनारे पर ले जाने का साधन बन जाती है। ‘जीने की इच्छा बन्धन है’ ये शब्द भी ऐसे ही सुनने में अटपटे लगते हैं। जीने की इच्छा में जीव मृत्यु से बचने की कोशिश करता है, और बचाव का भययुक्त प्रयास उसे मोह के बंधन में डालता जाता है। जब मेरी मृत्यु ही नहीं है, तो जीने की इच्छा का कोई भी प्रयास क्यों। जन्म तो सहज है फिर उसकी इच्छा कैसी। उसकी इच्छा करने का अर्थ है मृत्यु की स्वीकृति, और यह स्वीकृति बताती है कि जीव ने स्वयं को शरीर माना हुआ है। इस प्रकार जीने की इच्छा ही शुभ-अशुभ कर्मों को कराने वाली, पुण्य-पाप का कारण है। इन द्वन्द्वों के सिवा बन्धन और क्या है?
अच्छा रूपक है। मैं रूपी महासमुद्र में चित्त को वायु बताया। चित्त ही है जिसमें जन्म-जन्मांतरों के संस्कार पडे़ रहते हैं। कोई सुप्त होता है, तो कोई जागृत। सुप्त संस्कारों के भी तल हैं। कुछ तो इतने सूक्ष्म हैं कि उनका पता ही नहीं चलता। परतों में रहते हैं ये सूक्ष्म संस्कार। इन्हीं को कर्म की व्याख्या करते समय ‘संचित’ कह दिया। इन्हें अवसर चाहिये। सर्दी में विषधर सांप की स्थिति यदि आपने देखी हो, तो आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं। वह सुकड़ा पड़ा होता है। लगता है मानो निर्जीव हो, मर गया हो। लेकिन जैसे ही थोड़ी-गरमी मिलती है। सक्रिय हो जाता है। वह कर दिखाता है, जिसके बारे में सोचा नहीं जा सकता। चित्त की गहराइयों से स्फुरणा होती है। वह हल्की विक्षेप की रेखा, छोटी-सी तरंग एक बवंडर का रूप ले लेती है। लेकिन इन सबसे वह प्रभावित होता है, जो समुद्र से, जल तरंगों से स्वयं को भिन्न माने। जो अभिन्न है उस पर विक्षेपों का कोई असर नहीं होता। वह सिर्फ बनने-बिगड़ने का खेल देखता है।
पिछले सूत्र में जनक ने जगत् की उत्पत्ति उसके आश्रय स्थल, लय स्थान का वर्णन किया है। चित्त रूपी पवन के मूल में हैं शुभ-अशुभ कर्मों की अनादि शृंखला। जब अद्वैत ज्ञान के परिणाम स्वरूप संचित और क्रियमाण कर्मों का क्षय हो जाता है, तो प्रारब्ध कर्म भी अपना फल देने में असमर्थ हो जाते हैं। फल किसे दें, जब कोई कर्ता ही न रहा।
यहां कर्मों का स्वरूप भी संक्षेप में समझना अपेक्षित है। शास्त्रकारों ने कर्मों का विभाजन तीन रूपों में किया है। मानो कोई धनुर्धर हो। उसके तरकस में रखे तीर संचित कर्म हैं। ये वे कर्म हैं जिनका परिपाक अभी नहीं हुआ है। ये प्रसुप्त संस्कारों के रूप में पड़े हैं। समय की प्रतीक्षा में हैं वे, धनुर्धर नहीं जानता कि वे कितने, और कैसे हैं। और क्रियमाण कर्म? ये वो कर्म हैं जिनका संधान धनुर्धर ने अपने धनुष पर कर लिया है। इन पर अभी धनुर्धर का नियंत्रण है। वह इन्हें चाहे तो छोड़े, चाहे तो न छोड़े। जबकि प्रारब्ध कर्म वे कर्म हैं, जो धनुर्धर की प्रत्यंचा के वेग से धनुष से छूट कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। यह शरीर इन्हीं प्रारब्ध कर्मों का फल है। इन्हें सभी भोगते हैं। ज्ञानी भी, अज्ञानी भी। अज्ञानी भोगता है क्योंकि उसमें कर्तापन का अहंकार होता है, जबकि ज्ञानी भोग रहा है ऐसा दिखता हैं वास्तव में वह मात्र दृष्टा होता है। क्योंकि संसारी की दृष्टि प्रत्यक्ष पर आधारित होती है, इसलिये ज्ञानी के व्यवहार को भी वह शंका की दृष्टि से देखता है। प्रारब्ध को ही भाग्य कहा जाता है। जब कर्ता ही नहीं तो कर्मों का फल किसे प्राप्त हो। ऐसे में भाग्य भी निरस्त हो जाता है।
जनक जीव को व्यापारी कहते हैं। है ही यह व्यापारी। इसका अपना ही गणित है, उसी तराजू पर यह जीवन की घटनाओं को तोलता है- लाभ-हानि, मान-अपमान, जीवन-मरण आदि इस व्यापारी की कसौटियां हैं। जनक कहते हैं, जब इस जीव रूपी व्यापारी का भाग्य नष्ट हो जाता है अर्थात् समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं तो शरीर रूपी नौका भी नष्ट हो जाती है। यहां शरीर का अर्थ सिर्फ स्थूल शरीर से नहीं हैं शरीर का अर्थ तीनों शरीरों से है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण ये तीनों ही शरीर नष्ट हो जाते हैं। तब जगत् और जीव दोनों का ही लय अपार सागर मुझमें हो जाता है।
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