





लेकिन ये सुख उपभोग की वस्तुयें, ये संपदा, धन, रिश्ते-नाते, देह आदि जिन्हें तुम अपना मान बैठे हो उनमें कुछ भी तुम्हारा नहीं है। एक सद्गुरु की परिभाषा में यह सब एक दिन तुमसे छूट जाने वाले हैं। ये सब तुम्हारा साथ नहीं दे पायेंगे। इन सबको पाने के लिये तुम जीवन में कितना भी घोर प्रयत्न करो, पूरा जीवन संग्रह में लगा दो लेकिन फिर भी तुम्हें एक दिन यह सब छोड़ना होगा और तुम यह सब पाकर प्रसन्न होते हो और कहते हो कि गुरुजी आपकी कृपा से सब ठीक है। अरे क्या ठीक ? जब तुम्हारे पास ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है कि जिसे तुम अपना कह सको जो तुमसे बिछड़ न सके सदैव और सदैव तुम्हारे पास रहे। मैं देखता हूं कि ऐसा तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है।
तुमने इस जीवन में किया भी क्या? कमाया भी क्या? यह सब सांसारिक वस्तुयें जो तुम एकत्र कर प्रसन्न हो रहे हो। वह सब तो मिट्टी की ढे़री के समान है। सद्गुरु के वचन अनुसार तो यह तुम्हारी भाग्यहीनता है। तुम भाग्यशाली तो तब बन पाओगे जिस क्षण तुम इन सब को अपने मन से सत्य न समझोगे। इस जीवन में कर्तव्य तो पूर्ण करने होंगे लेकिन उस नारायण को पाने के लिये स्वयं को लुटा दोगे, न्यौछावर कर दोगे, उस दिन भाग्यशाली हो जाओगे। एक ईश्वर ही है जो कभी नहीं बिछड़ता, जो कभी अलग नहीं होगा। वह हर पल, हर जन्म में तुम्हारे साथ होता है। उसे पाना, उससे साक्षात्कार करना ही सौभाग्य है।
जिस देह पर तुम गर्व कर रहे हो, जिन अंगों से तुमने कार्य किये वही अंग जब शिथिल हो जाते है उनमें कोई चेतना नहीं होती, क्रियाशीलता नहीं होती। तब उस अंतिम समय में पश्छाते हो कि मैंने पूरा जीवन ऐसे ही बिता दिया। तब आपको जवाब नहीं मिल पाता। जिन रिश्तों को तुम अपना समझ बैठे हो वे सभी कोई भी तुम्हारा साथ नहीं दे पाते। धन सम्पदा, भवन, आदि जो बडे़ ही चाव से बनाया, संग्रह किया एक दिन सब छोड़ कर चल देते हो। आखिर कब समझ पाओगे यह सब? गुरु तो केवल संकेत कर सकता है चेतना दे सकता है, अपनी करूणा बरसा सकता है और शक्तिपात भी कर सकता है। जिससे तुम जाग सको लेकिन फिर भी जागना तुम्हे ही पड़ेगा। जिज्ञासा तुम्हें स्वयं ही करनी होगी।
तुम पूरे जीवन भर प्रयत्न करके बन जाते हो डाक्टर, वकील, विशेषज्ञ, पायलट आदि-आदि। लेकिन कभी अपने जीवन के पायलट के बारे में भी ख्याल किया या नहीं जो तुम्हारे जीवन को चला रहा है। तुम्हारा सभी प्रयास, जीवन भर की मेहनत बेकार सिद्ध हो जाती है तुम्हारे अंतिम समय में। कोई विशेषज्ञ तुम्हारे लिये सार्थक नहीं हो पाता, मृत्यु के मुख से बचा नहीं पाता, कोई डाक्टर तुम्हारा इलाज नहीं कर पायेगा, कोई वकील तुम्हें बचा नहीं सकेगा केवल और केवल सार्थक हो सकेगा तो ईश्वर ही। जब तुम उसके ध्यान में, उसके प्रेम में डूबोगे तो तुम उसी में लीन हो जाओगे। मृत्यु का कोई भय तुम्हें नहीं होगा, कोई पछतावा भी नहीं होगा, तुम हंसते हुये प्रसन्नता से अपना जीवन ईश्वर को सौंपोगे क्योंकि तुम उसी में से निकले हुये अंश हो।
और एक बात जो निश्चित है, वह है मृत्यु। क्योंकि जिसने जन्म लिया चाहे दस मिनट पहले लिया हो अथवा सौ वर्ष पहले। उसकी मृत्यु निश्चत है। दस मिनट पैदा होने वाले कि मृत्यु ग्यारहवें मिनट में भी हो सकती है। इसका कोई पक्का भरोसा नहीं है कि व्यक्ति के श्वास कितने निश्चित किये गये है। अतः मृत्यु अटल है। इस जीवन को पाकर सभी उस सत्य को, नारायण को पाने का प्रयत्न भी करते हैं, तुम्हारे पूर्वजों ने भी किया होगा। भले ही उनका प्रयास पूर्ण सार्थक नहीं हो पाया, उनमें से कोई ईश्वर से साक्षात्कार नहीं कर पाया लेकिन उन्ही के प्रयासों की श्रृंखला में तुम्हारा जन्म भी ईश्वर को पाने के लिये ही हुआ है। यदि तुम ईश्वर से साक्षात्कार पाने में सफल हो पाओगे तो तुम्हारा नाम इतिहास में अंकित होगा अन्यथा तुम्हारी अगली पीढ़ी में किसी ऐसी आत्मा के लिये जन्म लिये जाने तक इंतजार करना तुम्हारी मजबूरी होगी जो ईश्वर से साक्षात्कार करने में सफल होगा। तुम्हारे पूर्वजों को भी कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं मिला होगा, जो उन्हें नारायण से साक्षात्कार करा सके तथा आगे का भी कोई भरोसा नहीं कि उन्हें कोई सद्गुरु मिल ही जाये जो तुम्हें या उन्हें जगा सके तथा उस मार्ग पर बढ़ा सके। लेकिन एक बात तो निश्चित है जिसे भी ईश्वर का साक्षात्कार होगा वह स्वयं को तथा अपनी पिछली पीढि़यों को भी तार देगा। उसके पूर्वज जो प्रतीक्षारत रहते हैं, वह सब भी इस सुकृत्य से तृप्त होंगे, प्रसन्न होंगे, मुक्त होंगे।
लेकिन ईश्वर को पाने के प्यास चरम सीमा तक पहुंचे और बाकी प्यास (लालसाऐं), धन, पद आदि की न रहें, विरक्त हो जायें। एकमात्र उसे पाने की प्यास ही बाकी रहें लेकिन आज के समय में जब सभी मानव जाति धन, पद, सम्पदा को पाने की अदम्य लालसा को अपने अंदर पाले हुये हैं तथा असत्य का साथ दे कर धन आदि को प्राप्त कर रहें हैं, अन्याय का साथ दे रहें हैं, पद आदि को पाने के लिये दूसरे का मारण कर रहें हैं, कुछ रूपयों के लिये सत्य बेच दिया जाता है। ऐसे समय में ईश्वर की तरफ चलने वाला व्यक्ति स्वयं को अकेला अनुभव करता है। उसे इस मार्ग पर चलने पर अनेकों-अनेकों कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि आज के समाज में असत्य का जोर है, लेकिन सत्य का अन्वेषी परेशानियों का अनुभव करता है, लेकिन अंत में उसकी विजय सुनिश्चित है यह ध्यान रखो कि सत्य का उजागर कुछ समय पश्चात अवश्य होता है, उसे असत्य के द्वारा ज्यादा समय तक दबा कर, ढ़क कर, छुपा कर नहीं रखा जा सकता। सत्य का प्रकाश मंद गति से चलता है। लेकिन शाश्वत होता है। असत्य अफवाहों की भांति तीव्र गति से फैलता है और शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। अर्थात उन पर कोई विश्वास नहीं करता। अतः सत्य के अन्वेषी को स्वयं की अपनी यात्रा अकेले ही करनी होती है क्योंकि समाज में तो सभी धन सम्पदा, मोह-माया आदि के जाल में फंसे हुये है जिसे पाकर वह स्वयं को बड़े ही भाग्यशाली समझ रहे हैं लेकिन ईश्वर को पाने के लिये कोई प्रयास नहीं करना उनकी नासमझी है।
तुम जीवन में सब कुछ करो धन कमाओ, उच्च पद पर आरूढ़ हो जाओ, सम्पदा के लिये भी घोर प्रयत्न करो सभी के लिये प्रयास करो और पूर्णता सफल हो जाओ। इन सब को प्राप्त करने के लिये तथा जीवन में सफलता हासिल करने के लिये ही साधनाओं का निर्माण हुआ हैं लेकिन सब के साथ-साथ उस भीतर के धन को भी जो तुम्हारे स्वयं के अंदर विद्यमान है उसे पाने के लिये भी साधनाओं को करना तुम्हारे लिये अति आवश्यक है। अतः उसे पाने के लिये भी तुम्हारा प्रयास सार्थक हो सके, इसीलिये सद्गुरु तुम्हें अपने समीप बुलाता है और जिस दिन तुम उसे पा जाओगे तो उस दिन से तुम्हें किसी भी वस्तु के पाने का प्रयत्न नहीं करना होगा। उससे बड़ा धन और कोई नहीं। उसे पाने से बड़ा परम-पद अन्य कोई नहीं। उसे पाने के पश्चात् तुम्हें किसी बाहरी धन, पद इत्यादि की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी तुम स्वयं सम्राट हो जाओगे।
लेकिन तुम्हारा चंचल मन तुम्हें बार-बार सत्य के मार्ग से विचलित करता रहता है। सोचते रहते हो कि मैं तो बड़ा निर्धन रह गया हूं। कुछ धन कमा लूं फिर साधना करूंगा। लेकिन जरा शांत दिमाग से सोचो कि क्या उन सभी लोगों के पास सद्गुरु हैं? क्या ईश्वर के किसी दूत से उनका कोई सम्पर्क है? वास्तव में तो तुम दूसरों से अधिक धनी हो। जो तुम्हें सद्गुरु मिल गये। तुम्हें दूसरे कुछ भी कहें, तुम नहीं सुनोगे, तुम तो मस्ती से कहोगे, मैं और निर्धन— नहीं! जब अपने स्वयं के भीतर के खजाने की कुंजी ही हाथ आ गई है, तो फिर निर्धन कहां रहा? यह कुंजी सद्गुरु ने तुम्हें सौंप दी है। फिर तुम्हें क्या दुःख और क्या सुख? इन सब से तुम परे हो जाते हो, तुम आनन्द अवस्था को प्राप्त करते हो।
अभी तुम रोते हो तो तुम दुःख के कारण दुःखी होकर रोते हो। समाज भी तुम्हारा साथ देता है तथा वह भी तुम्हारे दुःखों को समझता है, लेकिन जब तुम आनन्द अवस्था में रोते हो तो वह दुःख के अश्रु नहीं होते, वह तो प्रेम के अश्रु होते हैं। उसकी कृपा के, कृतज्ञता के अश्रु होते है जिसे तुम्हारे आस-पास के लोग नहीं समझ पायेंगे। वे तुम्हे पागल समझते हैं। तुम्हारी आंखे यदि सद्गुरु का नाम लेते ही भर आयें तो सभी तुम्हें मूर्ख बतायेंगे। लेकिन यह सब उन्हें क्या पता? यह सब तो अंदर की बात है जिसे तुम समझे हो या तुम्हारे अंदर बैठा सद्गुरु, तुम्हारा ईश्वर। तुमने जो पाया वह बाहर दिखाई नहीं पड़ता इसलिये बाहरी लोग तुम्हें ताना मारते हैं कि इन मंत्र-जप, साधना आदि से क्या हो जायेगा? लेकिन तुम अंदर से शक्तिशाली हो, मजबूत हो, तुम्हें स्वयं अनुभव होता है कि मैंने बहुत कुछ पा लिया है और भी पाने का प्रयास करते रहते हो। तुम आंतरिक रूप से जब सुदृढ़ हो जाते हो तो फिर बाहर भी दिखाई पड़ना शुरु हो जाता है। सद्गुरु पहले आंतरिक रूप से सफाई व सुदृढता प्रदान करता है क्योंकि यदि नींव सुदृढ़ होगी तो भवन अधिक ऊँचा व दीर्घायु होगा।
और तुम परिस्थिति बदलने के चक्कर में मत पड़ो तो अच्छा है क्योंकि परिस्थिति को बदलने में तुम्हारी सारी शक्ति नष्ट हो जायेगी सभी समय व्यर्थ हो जायेगा लेकिन परिस्थिति बदल नहीं पाओगे। किस-किस को बदलोगे? कब तक बदलोगे? इस चक्कर में तुम्हारी परिस्थिति अधिक बदतर हो सकती है। जिसकी जो नेचर है, उस नेचर को बदलने का प्रयास तुम्हें उनका दुश्मन बना देगा। यह सब तुम्हारी बाहर की यात्रा है। तुम दूसरों की तरफ ध्यान न देकर स्वयं की तरफ केंद्रित हो जाओ। यदि तुम अपनी मनस्थिति को बदलने को राजी हो तो कोई भी परिस्थिति हो वह तुम्हारी दास हो जायेगी। तुम अपने अंदर की यात्रा के लिये तैयार हो जाओ। बाहरी क्रिया-कलापों को नेग्लेक्ट भाव से त्याग दो उनसे अंजान से बने रहो, जानो तो जरूर लेकिन जानकर भी अंजान बन कर रहो तो तुम अपने अंदर की यात्रा शुरू कर सकते हो और अपने अंदर उस ईश्वर से बात करने में सक्षम हो सकते हो। उस अनहद नाद को सुन सकते हो जो उसकी वाणी है जो अनवरत् रूप से सदा तुम्हारे अंदर गूंज रहा है।
यह सब तुम्हारी इंद्रियों के माध्यम से ही होता है और इन्द्रियों का उपयोग अधिकतर बाहरी रूप में मनुष्य प्रति दिन करता ही है। यदि यह बाहरी क्रिया हम न करें तो उन्हीं इन्द्रियों से हम अंदर की यात्रा शुरू करें जैसे यदि कान बाहर की आवाज सुन रहें हों तो प्रयास करें कि हम अपने अंदर की आवाज को सुनने की कोशिश करें। आंखे बाहर के दृश्य को देख रही है, लेकिन आंखे बन्द करके अपने शरीर पर ध्यान केन्द्रित कर देखें श्वास की गति अंदर की ओर उतरते हुये हम गहराई तक अनुभव करें। यह सब धीरे-धीरे अभ्यास के द्वारा सब लोग कर सकते हैं और जब ऐसा होता है तो तुम इस संसार में रहकर भी किसी भी अच्छी बुरी स्थिति से घबराओगे नहीं बस उन्हें देखते से रहोगे क्योंकि तुम अंदर से जुड़ चुके होते हो और तुम संतुष्ट भाव से तृप्त हो जाते हो जब तुम्हारी यह मनः स्थिति होती है तो बाहरी परिस्थिति तुम्हारा क्या बिगाड़ लेगी। लेकिन तुम बाहरी क्रिया-कलापों से मुंह मत फेर लेना बस अनजान से बने रहना क्योंकि रहना तो समाज में ही है। इसी से तुम अपने अंदर स्थित अमृत रस में डुबकी लगा लोगे। बस अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनते रहना उस नाद में डूब जाना जो सदा से तुम्हारे भीतर गूंज रहा है।
फिर तुम सुख या दुःख की किसी भी स्थिति में समता की स्थिति में होगे और आनंद के भागी बनोगे। आनंद के भागी तभी बन सकते हैं जब सुख-दुःख के भाव से विरक्ति हो। क्योंकि आनंद के भाव विलक्षण है। आनंद मन की शान्ति का भाव है जब सुख-दुःख से परे होते हैं तो ही शान्ति उपलब्ध हो सकती है, यही साक्षी भाव है। कभी-कभी सद्गुरु तुम्हे जगाने के लिये, तुम्हें बचाने के लिये, झूठ का भी सहारा लेता है। ऐसा नहीं है कि उसमें सद्गुरु को कुछ लाभ होने वाला हो। वह तो तुम ही हो जो सत्य की भाषा को समझ नहीं पाते तुम्हें कहा भी नहीं जा सकता यदि कहा जाये तो तुम भाग खड़े हो जाते हो। तुम उस स्टेज पर खड़े हो जहां पर तुम्हारी समझ में झूठ की भाषा ही आ पाती है। जिस प्रकार एक पिता की कई संताने घर के अंदर खेल में मस्त हो रहीं हों तथा भूकंप आ जाये तथा पिता उन सब को आवाज लगाकर बाहर खुले में बुला रहा हो लेकिन वे उसकी बात को, उसकी पुकार को अनसुना कर रहें हों आने वाले खतरे से अंजान होने के कारण। लेकिन पिता है कि एक-एक को किस प्रकार पकड़ कर लाये तो समय ही बीत जाये तो वह भी एक युक्ति का प्रयोग करता है कि बच्चों ने उसे आज बाहर काम पर जाते समय मिठाई लाने के लिये बोला था तब उसने एक आवाज लगाई कि बच्चों आओ मैं तुम्हारे लिये आज मिठाई लाया हूं बाहर आकर उसे ले लो और बच्चों ने उसकी बात सुन कर कुछ भी देर नहीं लगाई तथा बाहर दौडे चले आये। जब कि पिता कुछ भी नहीं लाये थे लेकिन उन्हें बचाना आवश्यक था। उनके बाहर आने पर खतरा तो टल ही गया था, अब मिठाई भी आती रहेगी।
तुम भी उन बच्चों की तरह अबोध हो तुम्हें भी इसी प्रकार सद्गुरु द्वारा अनेक प्रकार से बचाना पड़ता है और सभी सद्गुरुओं ने अपने-अपने समय में तुम्हें आवाजें दी हैं लेकिन तुमने सब को अनसुना किया। अतः मुझे भी तुम्हारी ही भाषा में, तुम्हारी ही रूचि के अनुसार बाते करनी पड़ती है। जिससे तुम मेरे समीप आ सको मेरा स्पर्श पाकर प्रकृति के गुप्त रहस्यों को तथा अपने जीवन का सार समझ सको और तुम सभी धीरे-धीरे ही इस सब प्रकार के क्रिया-कलापों से अभ्यस्त होकर साधनाओं द्वारा स्वयं में पात्रता अर्जित कर सको। जब तुम पात्र हो जाते हो तब तुम्हें पता चलता है यह सब तो मात्र एक खिलौने की भांति है। तब तुम गुरु से नाराज नहीं होकर उनके प्रति कृतज्ञ होते हो क्योंकि तुम्हें बचाने के लिये तुम्हें जगाने के लिये सद्गुरु की मजबूरी थी। सद्गुरु के इशारों को समझो विचार मत करो कि क्या ठीक है क्या नहीं। जो सद्गुरु कहे उसे तुरन्त कर डालो तो ही सफलता के निकटतम होंगे। भूकंप आने पर तुम मकान से किसी भी प्रकार निकलो लेकिन निकलना ही पर्याप्त है फिर सद्गुरु स्वयं संभाल लेता है।
अतः गुरु जो बोले सो करना ही चाहिये वह शिष्य के हित के लिये बोलता है। तुम पर उसकी सीधी दृष्टि होती है। तुम किस स्थिति में हो इस बात का उसे पता होता है, तुम किस प्रकार से सफल होते हो? कैसे खतरों से बच सकते हो? तुम्हारी मंजिल की दिशा मार्ग आदि की ओर सद्गुरु का इशारा होता है। वह जो बोलता है तुम्हारी सफलता उसके शब्दों पर टिकी होती है। तुम्हें अकेले में जो बाते सद्गुरु कहें वह ध्यान पूर्वक सुने तथा जीवन में गांठ बांध लें उसके कहे अनुसार ही आचरण करें। जो साधनायें गुरु बतायें उसे करें तथा वह क्या करता है उस पर ध्यान न दें, उसकी नकल न करें।
सद्गुरु की क्रियायें स्वयं की क्रियायें हैं जो स्वयं के लिये हैं लेकिन वह जो वाणी बोलते हैं वह दूसरों के लिये शिष्यों के लिये है और प्रत्येक मनुष्यों की शक्ल, हाव-भाव, आकृति, चिन्ह आदि भिन्न-भिन्न है और प्रत्येक मनुष्य की चित्त दशा भी भिन्न है। प्रत्येक मनुष्य अपनी अलग ही धुन में है। अनेक-अनेक जन्म हो चुके हैं। आप लोग भिन्न-भिन्न मार्गो से गुजरे हैं। अतः सभी का सफलता का मार्ग एक सा न हो कर अलग-अलग है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग मार्गो से होकर गुजरा है तथा प्रत्येक के संस्कार भी अलग-अलग हैं। प्रत्येक व्यक्ति को गुरु से अपने लिये आदेश लेना चाहिये जो तुम्हारी प्रखरता को उच्चतम अवस्था में पहुंचा सके तथा तुम्हें गतिशीलता प्रदान कर सकें। और मनुष्य परम ज्ञान को उपलब्ध हो जाता है लेकिन गुरु नहीं बन पाता। सभी ज्ञानी गुरु बने ही ऐसा आवश्यक नहीं है। लेकिन सभी गुरु ज्ञानी होते हैं।
जैसे व्यक्ति जाते हैं चिकित्सक के पास अपनी व्याधियों के, समस्याओं के कारण और वैद्य उसकी नाड़ी परीक्षण कर अपने दवाईखाने से दवाई देकर उसे स्वस्थ करता है, परहेज आदि भी बताता है किस वस्तु को खाना है किसको नहीं आदि। सब कुछ बताता है, दवाईयां तो उसके दवाईखाने में रखी हुई है यदि तुम्हें पता होती तो स्वयं ही उठा लेते। लेकिन यह सब एक वैद्य को ही पता होता कि कौन सी बीमारी है और इसकी उचित दवा क्या है और कहां रखी है और कितनी मात्रा में खानी है आदि-आदि। यदि तुम स्वयं ही औषधी खोजने लगे तथा खाने लगे तो तुम स्वस्थ होने के बजाय अधिक बीमार हो सकते हो। सद्गुरु भी एक वैद्य की भांति तुम्हारी कमी को देखता है, तुम्हारी समस्या कहां है। तुम्हारी कौन सी ग्रंथि निस्तेज है, तुम्हारे शरीर पर क्या बंधन लगे हुये हैं और वह किस प्रकार से खुलेंगे। किस प्रकार से तुम्हारी समस्या का समाधान होगा। उसके उपायों पर तुमसे सलाह करता है, कौन सा मंत्र, साधना, दीक्षा आदि तुम्हें प्राप्त करना है जिससे तुम्हारे जन्मों-जन्मों की बंद ग्रंथियां खुल सके तथा तुम्हारी समस्या का समाधान हो सकें। तुम ऐश्वर्यशाली तथा सौभाग्य सुख-सुविधाओं का भोग कर मोक्ष को प्राप्त हो सको। तुम्हारे भीतर साधनाओं की प्यास तीव्रतम हो जाये, जो मैं कह रहा हूं उसे केवल सुनने तक ही सीमित मत रखो। तुम्हें तो मेरे कहे अनुसार उस पथ पर गतिशील होना है, जहां मंजिल तुम्हारे सामने दृष्टि गोचर है। मेरी बातों को तुम अपने दिमाग की खुराक न बनाओ बल्कि उन बातों को आचरण में डालकर अपना अनुभव बना डालो। जब अनुभव बनेगा तो ही तुम ईश्वर की समीपता को अनुभव करोगे। तुम्हें भरोसा करने के लिये इसीलिये कहता हूं कि तुम जाग सको और अपने आप पर गर्व कर सको और उस ईश्वर की खोज में स्वयं को समर्पित कर सको।
और ईश्वर को स्मरण, उसकी याद उसकी प्रार्थना उसका ध्यान एकान्त में किया जा सकता है, गहराई के साथ। किसी का संग किसी के साथ में होना उसकी याद में सहायक नहीं हो सकता। यदि दस या 100 लोग एक जगह बैठ कर ध्यान लगाने की विधि अपनाये तो भी अपना ध्यान नितान्त अकेले का ही ध्यान होगा। जब तुम अकेले उसकी याद में खो जाओगे तो दूसरे तुम्हारे आस-पास क्या है, क्या कर रहें हैं, तुम्हे इसका भान भी नहीं रहेगा। यदि तुम्हें अपने आस-पास का सब कुछ पता है तो वह प्रभु का ध्यान नहीं कहा जा सकता। यह केवल और केवल सबसे अलग-थलग होने की क्रिया है और अलग होने का उपाय क्या है? वह उपाय केवल ईश्वर का ध्यान करना ही है करते रहो, करते रहो एक दिन तुम सब कुछ भूल कर उसमें डूब जाओगे जो तुम्हें सबसे अलग कर देगा। क्योंकि यहां सभी धन को याद कर रहें हैं, पद को याद कर रहें हैं, यदि तुम भी इनको ही याद करोगे तो तुम भी समाज का एक हिस्सा हो जाओगे अन्यथा ईश्वर को याद करोगे तो तुम समाज से अलग दिखलाई पड़ोगे। लोग तुमसे नाराज भी होंगे, शिक्षा भी देंगे, तुम्हें गलत भी बतायेंगे लेकिन तुम यदि ईश्वर को पाओगे तो बिल्कुल अकेले होकर पा सकते हो क्योंकि तुम स्वयं ईश्वर से बात कर सकते हो कि जो तुमने चाहा वह मैं बना हूं। मैंने साधनायें, तप किया है, मैं तप की अग्नि में झुलसकर बुद्ध बना हूं और ईश्वर भी देखता है कि वास्तव में यह भीड़ का हिस्सा नहीं है।
लेकिन इस सब के साथ स्वयं को विशिष्ट मत बना लेना, समझ लेना क्योंकि यह विशिष्टता तुम्हारे अहंकार को बढ़ावा देती है इससे बड़ी उलझन तुम्हारे जीवन में खड़ी होगी जहाँ विशिष्ट हुये तो इस जगत के लोग तुमसे ईर्ष्या पालने लगेंगे। यह ईर्ष्या बाहरी जीवन में तुम्हारे लिये मुश्किले पैदा करेंगी तथा तुम्हारी ईश्वर की तरफ यात्रा, तुम्हारी आंतरिक यात्रा, तुम्हारा भीतर उतरना थोड़ा मुश्किल हो जाता है और यह ईर्ष्या, द्वेष, शत्रुता, अहंकार के टकराने से उत्पन्न होती है, जहां पर दो अहंकार टकरा जाते हैं वहीं पर शत्रुता खड़ी हो जाती है। अतः यदि शत्रुता नहीं करनी है तो अहंकार का, अपनी विशिष्टता का उदघोष मत करना, स्वयं को शून्य समझो, जैसे मैं कुछ भी नहीं, तो तुम्हारे बाहरी जीवन की राहों में कोई अड़चने न आयेंगी और तुम अपनी चेतना को स्वयं के अन्दर उतारने में सफल हो सकोगे ईश्वर को पाने में सक्षम हो सकोगे सिद्धियों को हस्तगत कर सकोगे। हरि ध्यान में मस्त रहकर गुरु कृपा से बाहरी व्यर्थ की बातों में न उलझ कर अहंकार को त्याग दो तो तुम्हें एक दिन हरि अवश्य मिलेंगे। अपने जीवन में दृढ़ नियम, दृढ़ गुण यदि आचरण में लिये तो तुम्हारे जीवन में कोई आपदा, व्यर्थ की समस्यायें, उलझने आयेंगी ही नहीं।
1- दया- दया भाव यदि तुम्हारे अन्दर है तो क्रोध जो स्वयं ही चला जाता है। जब तुम्हें क्रोध नहीं आयेगा तो दूसरा भी क्रोध नहीं कर सकता। जब तुम्हारे अंदर दया भाव भरा हुआ होता है, तो सभी लोग भी तुम्हारे ही दया से आपूरित हो जाते हैं। यही क्रिया प्रति-क्रिया का नियम है जैसा कोई सोचता है वैसा बन जाता है जैसा कोई बनता है उसे वापस वही मिल जाता है। तुम किसी के प्रति जो भाव रखते हो उसके भाव भी तुम्हारे प्रति वैसे ही हो जाता है। तुम क्रोध में आकर गालियां देते हो तो दूसरे भी क्रोधित होकर तुम्हें गालियां बरसाता है। तुम दूसरे से प्रेम करो तो तुम पर भी प्रेम वर्षा ही होगी। अतः दया भाव से तुम अपने जीवन की अनेकों समस्याओं को आने से पूर्व ही समाप्त कर डालते हो।
2- नम्रता- जीवन में किसी भी प्रकार का अहंकार न करना, सदैव नम्र, बने रहना इसी से तुम कार्यों की सिद्धि प्राप्त कर लोगे।
3- दीनता- किसी पद अथवा धन प्रतिष्ठा की दौड़ न करना यदि यह सब तुम पर है भी तो भी दीन बने रहना इससे तुम सबके प्रिय बने रहोगे।
4- क्षमा- जीवन में सभी से भूल आदि होने पर बहुत सी गलतियां, हानि हो जाती है उस भूल को अधिक तूल न देकर क्षमा करने की क्षमता का गुण तुम्हारे अन्दर होना चाहिये। इससे तुम शत्रुता से बचे रहोगे।
5- शील- यह शील जीवन में एक स्वभाव बन जाता है जैसे जीवन में सद्कार्य, ध्यान, अहंकार दीनता, दया, नम्रता, क्षमा आदि का जीवन में आचरण किया जाता है तो यह स्वभाविक रूप साधक में स्वयं प्रकट होना शुरु हो जाता है। शील वास्तविक आचरण का नाम है, इसमें ऐसा नहीं कि अन्दर कुछ और बाहर कुछ। जैसा है वैसा ही व्यक्ति दिखाई देता है क्योंकि पाखंडी लोग बाहर से दिखावा कुछ करते है तथा अन्दर से वे कुछ और ही होते हैं।
6- संतोष- यह गुण जीवन में अति महत्वपूर्ण है। जो भी मिल जाये उसी में तृप्त हो जाये। जिसे संतोष मिल गया वह सत्य को भी प्राप्त कर लेगा और यदि संतोष का भाव नहीं है तो ईश्वर के प्रति भी तुम असंतोष से भरे होंगे। आप ईश्वर से भी शिकायत करते रहोगे कि मुझे यह नहीं मिला, वह भी नहीं मिला मुझे यहां क्यों जन्म दिया मैं यहां पर बड़ा दुखी हूं, दूसरे सभी सुखी हैं और यह असंतोषी मन के कारण तुम्हारा ध्यान भी नहीं लग पाता। अतः केवल ईश्वर के प्रति शिकायत नहीं केवल अनुग्रह का भाव कृतज्ञता का भाव रखें।
इन छः बातों को ध्यान कर जीवन में आचरण करें तो तुम निश्चित रूप से मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे। ईश्वर के ध्यान में तुम्हारी मुक्ति निश्चित होगी।
परम पूज्य सद्गुरुदेव
कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी
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