





और जो मनुष्य सद्गुरु के समीप जाने की हिम्मत करते हैं वे ही साहसी होते हैं। वे परवाने की भांति होते हैं गुरु रूपी शमा में जल जाने को आतुर। सद्गुरु के दिव्य प्रकाश में नहाने के लिये, उसमें डूब कर स्वयं को धन्य-धन्य होने के लिये। सद्गुरु जीवों के प्रति करूणा से भरे होते हैं वे ईश्वर की वाणी को पहचानते हैं, वे दुष्टों पर भी उपकार ही करते है। एक बार कुछ दुष्ट प्रवृत्ति के लोग एक संत को परेशान करने के लिये अवसर की तलाश में रहते थे लेकिन समाज के डर के कारण वे कुछ भी न कर पाते। परन्तु एक बार वह संत पुरूष नदी पार करने के लिये एक नाव में बैठकर दूसरे गांव में जाना चाहते थे तो वे दुष्ट लोग भी उसी नाव में आकर बैठ गये तथा नाव के नदी के मध्य में जाने पर वे संत के सिर पर प्रहार करने लगे तथा कहने लगे बुला अपने भगवान को देखते हैं यहां पर कौन आता है तुम्हारी सहायता के लिये। तभी आवाज आती है – हे सज्जन पुरूष! तुम कहो तो अभी नाव उलट दूं और इन दुष्टों को समाप्त कर दूं। लेकिन वे संत पुरूष शांत ही बैठे रहें और ईश्वर को याद करते रहे।
तभी फिर आवाज आई हे सज्जन पुरूष! तुमने कोई जवाब नहीं दिया इन दुष्टों को दण्ड देना आवश्यक है, तब वह संत बोले- तुम ईश्वर नहीं हो सकते तुम्हारी आवाज, तुम्हारे कृत्यों की रूप रेखा तो शैतान से मिलती-जुलती प्रतीत होती है। यदि तुम्हें मेरी सहायता ही करनी है तो इन सब की बुद्धि उलट दो। यह सुन कर पहली आवाज फिर नहीं आई तथा एक अन्य गंभीर वाणी सुनाई दी। हे वत्स! तू सच्चा संत है तूने मेरी वाणी भी पहचान ली और अपने संत स्वभाव पर भी दृढ़ रहा। इस सब वार्तालाप को सुन कर वे दुष्ट संत के चरणों में गिर कर क्षमा मांगने लगे तथा कभी दोबारा ऐसा न करने की प्रतिज्ञा करने लगे। ऐसा स्वभाव एक संत का, एक सद्गुरु का ही हो सकता है जिसका सान्निध्य पाकर पापात्मा भी शुद्ध होकर भगवान की समीपता को पा जाते हैं।
सद्गुरु के समीप वही आ सकता है जिसके हृदय में, प्राणों में कुछ झंकृत हुआ हो तथा वह स्वयं को तैयार कर चुका हो फना होने के लिये। जो कुछ भी तुम्हारे पास होगा वह सब कुछ तुम्हें दे देना होगा सद्गुरु को। तुम्हारे अंदर जो भी कूड़ा-कचरा है, अज्ञान है वह सब सद्गुरु की समीपता पाकर उनकी दिव्य ज्योति में जल जायेगा, भस्म हो जायेगा तभी तुम शुद्धतम रूप में निखर पाओगे। जिस प्रकार सोना भी आग में ही निखरता है उसी प्रकार सद्गुरु के तप की आंच तुम्हें भी प्रखर बना देगी और तुममे भी शाश्वत ज्योति प्रकाशित हो सकेगी। तुम्हारी मूढ़ता भस्मीभूत हो सकेगी। यदि तुम्हारा संपर्क गलत के साथ हो गया है तो तुम फिर सद्गुरु के समीप न आ सकोगे, तुम उनसे डरोगे, तुम उनसे दूर भागने की कोशिश करोगे।
कोई भी बुद्धत्व को उपलब्ध पुरूष अथवा सद्गुरु दूसरे की गद्दियों पर नहीं बैठता। वह अपना सिंहासन स्वयं निर्मित करता है, उसमें सामर्थ्य होती है वह मठों का निर्माण करता है, लेकिन उन पर बैठता नहीं। राम अनेक राज्यों को जीतते हैं लेकिन किसी पर बैठते नहीं। लंका विभीषण को दे देते हैं, किष्किन्धा सुग्रीव को दे देते है। कृष्ण सर्वत्र विजय होते हैं लेकिन राज्याभिषेक अन्यों का करते हैं। इसी प्रकार सद्गुरु भी निर्बल को सफल बनाते है। असमर्थ को समर्थ बनाते है, वे अभिषेक करते है शिष्यों का।
और जीवित जागृत सद्गुरु के पास जाने से मनुष्य डरता है लेकिन मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह ईश्वर को याद करे, याद करता ही है, कैसे भी करे, कुछ भी कारण हो क्योंकि उसका जन्म ही उस ईश्वर को पाने के लिये हुआ है। अतः यह स्वभाविक है कि वह ईश्वर की ओर उन्मुख हो। इस प्रकार अग्नि का स्वभाव है कि उसकी गति ऊर्ध्वगति है। और मनुष्य सद्गुरु के पास जाने से इसलिये डरता है क्योंकि सद्गुरु उसका अहम तोडता है, उसका स्व समाप्त हो जाता है। अतः मनुष्य ने अपनी बुद्धि का प्रयोग कर मंदिर का, मस्जिद का, गुरुद्वारों का, गिरजाघरों का निर्माण कर लिया। वहां जाने में उन्हें कोई भय नहीं होता क्योंकि वहां जाने पर केवल उन्हीं की तरफ से सब कुछ मांग, प्रार्थना आदि जो भी क्रिया होती है केवल मनुष्य की ही होती है। किसी दूसरे की, ईश्वर की, मूर्ति की, तस्वीर की, खुदा की तो कोई क्रिया नहीं होती लेकिन जब तुम किसी सद्गुरु के पास जाते हो तो वहां क्रिया स्वमेव घटती है और तुम्हारे पाप-दोष समाप्ति की ओर अग्रसर होते है जिससे तुम्हें पीडा अनुभव होती है और तुम मोह माया के कारण भाग खड़े होते हो।
तुम किसी भी कक्षा में पढ़ कर डिग्री ले लो, पी-एच-डी- कर लो, किसी भी उच्च से उच्च पद पर हो, बडे धनपति हो, बुद्धिमान हो, होशियार हो लेकिन सद्गुरु का दर्शन करने पर एक उत्कंठा हृदय में अवश्य उठती है, उनकी समीपता पाने के लिये, उनका स्पर्श करने के लिये। और यह सब सद्गुरु मे अदम्य आकर्षण के कारण होता है, जिसके कारण राजा हो या रंक डिग्री धारक हो या अनपढ़, नर हो या नारी, जड़-चेतन, अमीर-गरीब आदि सभी उसके आकर्षण में बन्धे होते हैं। और लोग सन्यास लेते हैं, उनके लिये सन्यास लेने का अर्थ है सब कुछ छोड़-छाड कर भागना। लेकिन वे सन्यास लेते हैं समाज से, परिवार से दुःखी होकर, संत्रस्त होकर। वे गेरूएं वस्त्र धारण कर लेते हैं क्या गेरूएं वस्त्र धारण करने को ही सन्यास कहते हैं? क्या उन्हें शांति मिलती है? कितने सन्यासियों को साक्षात्कार हुआ है? यदि गैरिक वस्त्र धारण करने पर ही पूर्णता मिल सकती है तो आज अधिकतम लोग बुद्धत्व को उपलब्ध होते। लेकिन लोग सन्यास मजबूरी में लेते हैं क्योंकि उनकी प्रतिरोधात्मक शक्ति क्षमता समाप्त हो जाती है और वे सन्यास की ओर भागते है और हिमालय की ओर गमन करते है शांति पाने के लिये और हिमालय में जाकर तो सभी शांति पा जाते हैं। वहां अशांति जैसी कोई चीज नहीं है लेकिन यह शांति हिमालय की शांति होती है। सन्यासी की शांति नहीं। सन्यासी के अंदर तो वहां भी अशांति का वातावरण व्याप्त है।
अतः सन्यास लें तो मन का सन्यास लें जिससे शोर-गुल से भरे हुये बीच बाजार में भी तुम शांतिपूर्वक रह सको, ईश्वर से जुडे़ रह सको, सद्गुरु की समीपता अनुभव कर सको, चाहे कहीं भी रहो सन्यास किसी भी वस्तु स्थिति से भागना नहीं है। वह तो उस परम पिता परमेश्वर को पाने के लिये स्वयं की तैयारी है कि हे परमेश्वर! अब मैं केवल तुम्हारे लिये या स्वयं के लिये जिऊंगा तुम्हारे अतिरिक्त तुमसे कम में कोई समझौता नहीं यदि ऐसा संकल्प कर सन्यास लिया जाये तो यही श्रेष्ठ होता है। समाज से भागना सन्यास नहीं, ईश्वर की प्राप्ति के लिये सन्यास लेना ही श्रेष्ठ है जो भी पूर्णता तक पहुंचे उन्होंने उस परम पिता परमेश्वर की खोज के लिये ही सन्यास ग्रहण किया।
सन्यास का मतलब यह नहीं है कि सब कुछ त्याग करके, छोड़-छाड़ कर वन में भाग जायें। सन्यास का अर्थ है कि अब सब कुछ ईश्वर के ऊपर छोड़ दें। ‘जिस विध राखें राम’ जैसे भी ईश्वर रखना चाहे वैसे में ही आन्नदमय रहना सन्यास है। अगर वह कहता है कि गृहस्थ में रहो, परिवार में रहो तो यह भी सही है, वह कहता है व्यापार करो तो यह भी सही है, वह कहता है नौकरी करो तो वह भी सही है ईश्वर को प्राप्त करने के लिये अपना पेशा छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर कभी किसी को कुछ त्यागने को नहीं कहता, उसने तो एक से बढ़कर एक भोग्य सामग्री हमारे लिये उपलब्ध करायी है इस धरा पर। आप सभी का आनन्द लें और ईश्वर को धन्यवाद दें।
यह सब भी तो उसी की कृपा का फल है क्या कबीर गृहस्थ नहीं थे? क्या उन्हें पूर्णता नहीं मिली? क्या उन्होंने अपना पेशा छोड दिया? ईश्वर का साक्षत्कार प्राप्त करने के पश्चात भी उन्होने अपना कर्म नहीं छोड़ा। वे दिन भर कपड़ा बुनते थे। उनके शिष्यों ने बड़ा विरोध किया, उन्हें बडी शरम महसूस होती थी कि हमारा गुरु कपडे़ बुनता है। उन्होंने कबीर पर बड़ा जोर दिया कि आप छोड़ो यह सब काम-काज, हम आपकी सभी व्यवस्था करेंगे। लेकिन कबीर कहां मानने वाले थे? वे कहते थे कि मैं तो छोड दूं लेकिन मेरा राम छोड़ने दे तो ही छोडूं। उसने ही कह रखा है कि तू बुन, मेरे लिये बुन, मैं खरीदूंगा तेरी चादर, मुझे चाहिये तेरी बुनी हुई चादर। और जब खरीदने वाला भी राम ही हो तो और प्रेम से बनाई चादरें। उसी की याद में सब काम हो रहा है। उसी पर सब छोड़ दिया है तो फिर गृहस्थ में रहो या सन्यास में, समाज में रहो या वन में, क्या फर्क पड़ता है, सब कुछ उसे ही समर्पित है।
हो सकता है कि तुम सन्यास लेकर ईश्वर से दूर हो रहे हो क्योंकि ईश्वर तो सभी जगह उपस्थित है। वह तुम्हारे परिवार में, तुम्हारे माता-पिता में, तुम्हारे पुत्र में, तुम्हारे आस-पास ईश्वर उपस्थित हो सकता है और है ही। तुम्हारे आस-पास पशुओं में, पक्षियों में पेड-पौधों में आप ईश्वर की उपस्थिति देख सकते हो। तुम इन सब की सेवा करके ईश्वर की ही प्रत्यक्ष सेवा कर रहे हो और ईश्वर भी तुम्हें साथ-साथ फल प्राप्ति करा देते हैं। तुम्हें दूध की प्राप्ति हो रही है अथवा दूध से बने पदार्थ तुम्हें प्राप्त हो रहे हैं तो यह तुम्हारी गोमाता की की गई सेवा का फल है। तुम भोजन कर रहे हो तो पोधों कि जो सेवा तुमने की है उसके बदले तुम अन्न खा रहे हो। पुत्र की सेवा कर रहे हो तो उसका सुख तुम्हारे कार्य के बोझ को हल्का कर रहा है। माता-पिता की सेवा कर रहे हो, उनके आशीर्वाद से सफलता मिल रही है। गुरु सेवा कर रहे हो तो उसका फल तुम निरन्तर भौतिक एवं आध्यात्मिक मार्ग पर गतिशीलता प्राप्त कर रहे हो। ऐसा नहीं है कि ईश्वर सेवा के बदले तुम्हें फल देने में देर करता है। वह तो अप्रत्यक्ष रूप में किसी न किसी प्रकार तुरंत चुका देता है। केवल तुम्हारी दृष्टि चाहिये। ईश्वर की उपस्थिति तो प्रत्येक जगह है। तुम उसे कहां वन में ढूंढ़ने चले हो?
यह जो जीवन मिला है इसके बहुमूल्य क्षणों को व्यर्थ न जाने दो, उल्लास पूर्वक, आनन्द पूर्वक, गुनगुनाते हुये इसे जियो। कबीर कपड़ा बुनते है और प्रेम से गुनगुनाते हुये बुनते है और ईश्वर को पा जाते हैं। तुम भी चाहे बगीचे में पौधों को पानी दे रहे हो, खेत में पानी दे रहे हो, आफिस में कार्य कर रहे हो अथवा दुकान पर बैठे हो या फिर अन्य कोई परिश्रम कर रहे हो तो वहां पर भी ईश्वर से साक्षात्कार कर सकते हो। वह कण-कण में विद्यमान है। उसी की कृपा से सब कुछ हो सकता है, हो ही रहा है, अपने प्रयास से नहीं और सब कुछ उसी पर छोड़ना होगा, चाहे सन्यासी हो या गृहस्थ। इस दुनिया में सब कुछ देने वाला तो एक ईश्वर ही है। उसे ही हर रूप में सर्वत्र देखने का भाव चिंतन होगा – तो ही यह जीवन नृत्य युक्त उत्सव की भांति बन जायेगा अमृतमय बन जायेगा केवल यही स्मरण रखना है –
और यह वास्तविकता है कि इस धरा पर ईश्वर अदृश्य रूप में सभी जगह सदैव उपस्थित रहता है। लेकिन कहीं न कहीं किसी स्थान पर ईश्वर प्रकट रूप में भी अवश्य विराजमान होता है। वह सद्गुरु रूप में होता है यदि तुम पुरानी तस्वीरों से मुक्ति पाओ तो ही उसे पहचान पाओगे, जरूर पहचान लोगे।
ईश्वर भी मनुष्य की चिंता करता है, वह हमेशा किसी न किसी को पैदा कर देता है। यदि एक जागृत व्यक्तित्व इस धरा से विदा लेता है तो दूसरा जागृत व्यक्ति पैदा हो जाता है। यह सिल सिला निरंतर-निरंतर चलता रहता है, लेकिन तुम लोग जीवित जागृत सद्गुरु को देख नहीं पाते। बुद्ध को वह ढाई हजार वर्ष हो गये, कुछ लोग अभी भी उनकी पूजा कर रहे है। जब कि अब पूजा करना व्यर्थ है, यदि वास्तव में बुद्ध से प्रेम है तो किसी जीवित जागृत बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्तित्व की खोज कर लो। उस समय बुद्ध के अंदर ईश्वर का प्रकाश था, आज ईश्वर का प्रकाश किसी अन्य में उतर आया होगा। आज किसी नये दीपक में ईश्वर का प्रकाश होगा, वह दीपक अन्य पुराने दीपकों के समान न होगा। ईश्वर तो नित्य नूतन दीपकों का, बुद्धों का निर्माण करता रहता है।
जब भी कोई हृदय ध्यान में शून्य हो जाता है उसी में परमात्मा का प्रकाश उतर आता है। अतः किसी ऐसे व्यक्तित्व को खोज लों जो स्वयं जागा हुआ हो, वह ही तुम्हें जगा सकता है। स्वयं सोया हुआ किसी अन्य को कैसे जगा सकता है यदि पचास व्यक्ति भी आपस में यह कह कर सो जाये कि मुझे जगा देना तो जब सब ही सो जायेंगे तो जगाने वाला कौन होगा? जो जागा हुआ है वही तो सोते हुये को जगा सकता है। वह आवाज देकर, हिला-डुला कर, पानी के छींटे देकर जगा सकता है तब भी नहीं उठोगे तो कोई अन्य उपाय तुम्हें जगाने का करेगा। यदि फिर भी नहीं उठे तो कोई और मार्ग तलाश लेगा। अगर फिर भी नहीं उठें तो घर में आग लगा देगा।
आग की लपटे उठती देख कर तो जागोगे, जागोगे ही नहीं भाग खडे़ होओगे- सद्गुरु कुछ भी कर सकता है क्योंकि उसका लक्ष्य तुम्हें जगाना है और तुम्हारे जीवन का उद्देश्य, परम लक्ष्य जागना है। इस सब के लिये सब कुछ दांव पर लगाया जा सकता है। सब कुछ खो कर (सांसारिक) भी यदि हरि मिले तो बड़ी बात है लेकिन सद्गुरु ही सहायक हो सकते हैं।
और यह जागना केवल क्षण मात्र का खेल है भले ही तुम जन्मों-जन्मों से सोये हुये हो, सद्गुरु के स्पर्श से, सद्गुरु के जादू से तुम एक क्षण में ही जाग सकते हो। और सद्गुरु वही है जो जादू कर दें लेकिन उसके सिर पर कर सकता है जो अपना शीश सद्गुरु के चरणों में झुका दें। यदि शीश ही नहीं झुका तो सद्गुरु भी क्या कर सकता है? तुम्हारा शीश सद्गुरु के चरणों में झुके तो जादू हो जायेगा। और सद्गुरु इस शीश रूपी खोपड़ी को खाली करने के उपाय करता रहता है, अनेकों माध्यम के द्वारा। ध्यान के द्वारा, प्रार्थना के द्वारा, पूजा के द्वारा, उपासना के द्वारा, साधना, आराधना के द्वारा यह सब क्रिया-कलाप वह शिष्य को देता है तो केवल इसीलिये कि शिष्य का सिर, शिष्य की खोपड़ी रिक्त हो जाये, शून्य हो सके और इतना शून्य हो जाये कि उसमें कुछ नया भरा जा सकें, ईश्वर को उतारा जा सकें।
एक बार एक संत के पास एक उच्च कोटि के आचार्य गये। संत की कुटिया पहाड़ी के शिखर पर थी। आचार्य बड़ी लम्बी यात्रा कर तथा पसीने से तर-बतर होकर कुटिया पर पहुंचा तथा संत से पूछा क्या ईश्वर है? तब संत ने कहा- आप कृपया थोड़ा विश्राम ले लें, आप बडी दूर से चलकर आये है, थक गये होंगे। मैं आपके लिये चाय बनाकर लाता हूं, आप चाय पीजियेगा फिर आराम से बैठ कर बात करेंगे।
आचार्य को इतने सम्मान की आशा भी नहीं थी कि संत उनके लिये चाय बनायेंगे। आचार्य बैठ गये और कुछ समय पश्चात् संत चाय ले आये और आचार्य के हाथ में खाली कप थमा दिया और केतली से चाय उडेलने लगे। कप भरने के पश्चात भी संत नहीं रूके तथा चाय उडे़लते रहे। कप भरने के पश्चात् कप के नीचे की प्लेट भी भर गयी फिर भी नहीं रूके फिर चाय नीचे ढुलकने लगी तब आचार्य चिल्लाया तुम होश में तो हो या पागल हो। अब सारी चाय नीचे फर्श पर फैल जायेगी, मेरे कप में एक बूंद चाय को रखने की भी जगह खाली नहीं है फिर भी तुम भरे जा रहे हो।
तब संत बोले कि तुम समझदार व्यक्ति मालूम पड़ते हो मैं तो सोच रहा था कि तुम केवल कर्म-काण्ड करने वाले आचार्य हो लेकिन तुम में समझ बाकी है तुम इतना तो समझ ही गये कि कप में चाय को रखने की जगह नहीं है। उसमें और चाय नहीं आ सकती और मैं तुमसे एक बात पूछता हूं कि तुम जरा अपनी आंखे बन्द कर देखो कि तुम्हारी खोपड़ी भरी हुई है या नहीं अगर भरी है तो मैं उसमें कुछ नहीं डाल सकूंगा। खोपड़ी खाली करके आओ अन्यथा यहां पर मेरे समीप रहो तो तुम्हारी खोपड़ी खाली करने के उपाय करूं। यह जो सब जानकारी तुमने एकत्र की है वह कोई लाभदायक नहीं। सद्गुरु का सत्संग सबसे पहले शिष्य की खोपड़ी को रिक्त करने का ही कार्य करता है। उसके सभी कार्य उल्टे ही प्रतीत होते हैं क्योंकि उससे मिलने से पहले तुम्हारे विद्यालयों ने, समाज ने, परिवार ने तुम्हारी खोपड़ी में भिन्न-भिन्न प्रकार की परम्पराओं, विचारों, नियमों, कर्म-काण्डों आदि-आदि से भरा है। वे सदैव भरने का ही कार्य करते हैं और सद्गुरु सदैव तुम्हें खाली करने का उपाय करते हैं। तुम सब कार्यों में अपनी बुद्धि का उपयोग करते हो तो फिर कुछ भी संभव नहीं। मेरी एक भी विधि, एक भी उपाय पर प्रयोग करते रहोगे तो सफलता के निकट पहुंच जाओगे।
सबसे मुख्य बात यह है कि तुम जिस वस्तु को पाना चाहते हो उसकी तुम्हें पूर्ण विधि भी आनी चाहिये। अगर बिना विधि-विधान के हम ध्यान करने लगे तो यह वैसे ही होगा जैसे हम किसी विषय के बारे में न जानते हो और उसकी परीक्षा में बैठ जायें तो उसका फल अनुत्तीर्ण होगा, हम समुद्र से मोती निकालना तो चाहे लेकिन उसकी गहराई आदि को जान समझ कर ही मोती निकालने की कोशिश करना श्रेयस्कर रहेगा। ठीक इसी प्रकार ध्यान को सही प्रकार समझकर ही ध्यानस्थ हुआ जा सकता है। ध्यान क्या है- ध्यान एक अहोभाव है। ध्यान स्वयं में डूब जाने की क्रिया है, स्वयं को मिटा देने का नाम ही ध्यान है। निर्विचार मन ही ध्यान है। सभी भ्रमों के तिरोहित होने का नाम ध्यान है। स्वयं की आत्मा का परिष्कृत रूप परमात्मा ही ध्यान है। सभी चिंतन मनन का त्याग करना ही ध्यान है। मन से अलग होना ही ध्यान है। आत्मा की अनुभूति का नाम ध्यान है। जब अपनी आत्मा की आवाज की स्पष्ट अनुभूति हो वह ध्यान है।
किन्तु ध्यान के मार्ग पर अकेले ही चलना पडता है कोई संगी-साथी, रिश्ते-नाते आदि साथ नहीं दे सकते, कोई दूसरा सहायक नहीं हो सकता केवल ओर केवल संकल्प के बल पर ही आगे बढ़ना होता है। अपना दीपक स्वयं ही बनना होता है। इसलिये बुद्ध कहते हैं- ‘अप्प दीपो भव’ अर्थात् अपना दीपक स्वयं बनो दूसरा कोई तुम्हें प्रकाश नहीं दिखायेगा, यह एकाकी खोज है।
सभी महापुरूषों का, सभी बुद्धों का, सभी सद्गुरुओं का ध्यान के बारे में एक ही संकेत है, एक ही अर्थ है कि भूतकाल तथा भविष्य को न देख कर वर्तमान को देखें उसके साक्षी बनो क्योंकि वर्तमान में ही तुम्हारे भीतर परमात्मा की ज्योति उतर सकती है, तुम्हें उसका दर्शन हो सकता है। यदि तुम अभी सहज व शांत हो जाओ तो तुम अभी ध्यान में डूब सकते हो, समाधि में जा सकते हो, ईश्वर से साक्षात्कार कर सकते हो।
गुरु को ध्यावो अर्थात गुरु का ध्यान करो, गुरु की पूजा करो, गुरु के वचनों को आत्मसात करो, गुरुमय बनकर गुरु कृपा प्राप्त करो तथा मोक्ष को प्राप्त हो जाओ।
सद्गुरुदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी
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