





हे देवी गंगे! तुम देवगण की ईश्वरी हो, हे भगवती! तुम त्रिभुवन को तारने वाली, विमल और तंरगमयी तथा शंकर के मस्तक में विहार करने वाली हो। हे माते! तुम्हारे चरण कमलों में मेरी मति लगी रहे।।
किसी भी तत्त्व के प्रति श्रद्धा उसकी उपयोगिता उसके वैज्ञानिक गुणों के आधार पर होती है। गंगाजी के जल में ऐसे उपयोगी तत्व और रसायन पाये जाते हैं, जो मनुष्य की शारीरिक विकृतियों को ही नष्ट नहीं करते वरन् विशेष गृहस्थ-सांसारिक सुसंस्कार जाग्रत करने में भी वे समर्थ हैं, इसीलिये उनके प्रति इतनी श्रद्धा व्यक्त हो गयी। वैज्ञानिक परीक्षणों से भी ये बातें स्पष्ट होती जा रही हैं।
हे कल्लोलिनि गंगे! तुम जन्म-जन्मान्तरों के दुःखों को दूर करनेवाली हो। अन्तिम समय में मेरे शंकित मन और प्राणों को शान्ति और तृप्ति प्रदान करो। अपने अमृतमय जल की हमारे सम्पूर्ण अंगों में वर्षा करो।
कवियों और शास्त्रकारों द्वारा अभिव्यक्त इस श्रद्धा के पीछे आधारित कल्पनायें और मात्र भावुकता नहीं रही। ‘भगवती गंगा का जल औषधितुल्य है, वह रूप को चमका देता है, रोग का नाश करता है। ‘ये पंक्तियां पढ़ीं तो कुष्ठ रोग से पीडि़त महाकवि पदमाकर कानपुर पहुंचे और ‘पदमाकर-कोठी’ नाम से एक स्थान गंगाजी के किनारे लेकर वहीं रहने लगे। गंगाजी का जल पीना, उसी में स्नान करना, उसी के जल से भोजन बनाना, गंगाजी के ही पावन तटपर विहार करना-यही उनका क्रम हो गया।
जिस रोग को वैद्यों, डॉक्टरों ने असाध्य घोषित कर दिया था, गंगा जल की कृपा से वह रोग अच्छा हो गया तो कवि हृदय से उनके प्रति स्वाभाविक श्रद्धा फूट पड़ी। ‘गंगा-लहरी’ काव्य में सैकड़ों छन्दों से गंगा जल की महिमा का वर्णन सटीक रूप से किया गया है। भारतीय जन-जीवन को आदिकाल से गंगाजी से ऐसे ही दिव्य लाभ प्राप्त हुये हैं, तभी स्थान-स्थान पर उनकी स्तुति और भक्ति-गाथा गायी गयी है।
गंगाजल में जो विशिष्ट गुण पाये जाते हैं, उसी प्रभाव के कारण अनादिकाल से राजाओं से लेकर निर्धनों तक में इसका प्रयोग होता आया हैं मुसलिम शासन काल में भी बादशाहों के महलों में गंगाजल का ही प्रयोग होता था।’ ‘बादशाह अकबर गंगाजल को अमृत समझते थे और उसके आने का प्रबन्ध रखने के लिये उन्होंने कई योग्य व्यक्तियों को नियुक्त किया हुआ था, वह घर में या यात्रा में गंगाजल ही पीते थे। खाना बनाने के लिये वर्षाजल या यमुनाजल, जिसमें गंगाजल मिला दिया जाता था, काम में लाया जाता था।’
बाल गंगाधर तिलक ने गंगाजी को संसार की सभी नदियों से पवित्र माना था। गाँधी जी तो थे ही महान् धार्मिक, उन्होंने भी भगवती गंगा के प्रति प्रगाढ़ निष्ठा व्यक्त की। प्राच्य विद्वानों की दृष्टि में- 2000 वर्ष पूर्व महर्षि चरक ने अनेक प्रयोगों के बाद यह विशेष रूप से ज्ञान प्राप्त किया कि गंगाजल पथ्य है। ‘औषधं जा“नवीतोयं’ गंगाजल औषधि है, इसकी समता संसार की कोई औषधि नहीं कर सकती। चक्रपाणिदत्त ने 1060 वर्ष पूर्व ही खोज करके बताया था कि गंगाजल स्वास्थ्यवर्धक है, गंगाजल श्वेत, स्वादु, स्वच्छ, रूचिकर, पथ्य, भोजन पकानेयोग्य, पाचक, शक्तिवर्द्धक और बुद्धि को बढ़ाने वाला बताया गया है।
आज भी शतशः जीवन से निराश व्यक्ति जिन्हें डॉक्टरों- वैद्यों ने असाध्य घोषित कर दिया, गंगा माता की शरण में गये और स्वस्थ होकर लौटे- पर्वत-शिखरों से जड़ी-बूटियों का स्पर्श करता हुआ जल यहाँ आते-आते काफी दूषित हो जाता है, फिर भी साधारण जल से कई गुना स्वास्थ्यप्रद होता है, अतः गंगा जल एक अनुपम पेय है, संसार में कहीं उसकी समता नहीं।
पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में- विज्ञानाचार्य मार्गरेट क्रिस्टिन बिहार व उत्तर प्रदेश के रसायन परीक्षक थे, उन्होंने अपने वैज्ञानिक यन्त्रों द्वारा परीक्षण करके सिद्ध किया है कि गंगाजल में जैविक कीटाणु नष्ट करने की प्रबल शक्ति विद्यमान है। गन्दे नालों के कीटाणु गंगाजल में मिलने के पश्चात् नष्ट हो गये। इसका समर्थन अमेरिका के सुविख्यात डॉक्टर मि- वाल्टर ने भी किया है। हैजे और आंव की बीमारियों से मरे व्यक्तियों के शवों को जो गंगा में फेंक दिये गये थे, उक्त डॉक्टर महोदय ने कुछ ही फुट नीचे शवों के पास जहां कीटाणुओं की आशा थी उसकी जांच की और एक भी कीटाणु नहीं पाया।
डॉ- नरेश सिंगाले और उनकी टीम में 27 सीनियर डाक्टरों ने बद्रीनाथ में अलकनन्दा स्वरूप में निकलने वाले गंगा जल का समय-समय पर प्रयोग एवं परीक्षण द्वारा सिद्ध किया कि गंगाजल से शरीर के अन्तस क्लिष्ट रोग, अपंगता, सन्निपातज्वर और शरीर की जर्जरता व वृद्धावस्था नष्ट होती है। निरंतर गंगा जल के चरणामृत रूप में सेवन करने से कोई भी बीमारी शरीर पर दुष्प्रभाव नहीं डालती। गंगाजल में रेडियम के समान वस्तु है, जिसमें दुष्टव्रण नष्ट करने की अद्वितीय शक्ति है।’
1557 मील लम्बी गंगाजी में गोमती, घाघरा, यमुना, सोन, गण्डक और हजारों छोटी-छोटी नदियां मिलती चली गयीं, तब भी गंगासागर पर उसकी यह कृमिनाशक क्षमता अक्षुण्ण बनी रही। यह एक प्रकार का चमत्कार ही है। हमारी श्रद्धा का आधार विज्ञान है, जिसे भारतीय तत्त्ववेत्ता आदिकाल से जानते हैं और आज का विज्ञान जिसकी पुष्टि करता है। सद्गुरु ने कहा कि ‘किसी के शरीर की शक्ति जवाब देने लगे तो उस समय यदि उसे गंगाजल दिया जाय तो आश्चर्यजनक ढंग से जीवनी शक्ति बढ़ती है और रोगी स्वयं महसूस करता है कि उसके भीतर किसी सात्त्विक आनन्द का स्त्रोत फूट रहा है।’
सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्द महाराज ने भी चार धाम की अनेकों यात्रा में साधना प्रयोगों से सिद्ध कर दिया कि इस जल में टी-बी-, अतिसार, अस्थमा, कैंसर, अपंगता, हैजा के जीवाणुओं को मारने की अपार शक्ति विद्यमान है। ऐसे ही चेतनामय सर्व औषधि-वनस्पतियों युक्त हिमालय की उतराखण्ड भूमि में अनेकों तरह के रोगों कष्टों संतापों, दुःखों, पाप हारिणी गंगा की अखण्ड धारा स्वरूप में प्रवाहित बद्रीनाथ धाम में सिद्धाश्रम शक्ति पर्व 19-20-21 मई को जीवन अमृतोत्सव प्राप्ति साधना महोत्सव सम्पन्न होगा। इसमें समर्पित ज्ञानी चैतन्य साधक ही भाग ले सकेंगे।
इसके माध्यम से सांसारिक जीवन आरोग्यमय धन-वैभव, यश लक्ष्मी सर्व सुखों से युक्त हो सकेगा। साधकों को तीनों ही स्वरूपों में अलकनन्दा, सरस्वती, मां गंगा, सद्गुरु संस्पर्शित चेतना और गुरु की साधनात्मक क्रियाओं का पूर्ण कोटि गुणा प्रभाव प्राप्त हो सकेगा।
आज संसार धीरे-धीरे हमारी मूलभूत मान्यताओं को मानकर उन ऋषियों के चरणों में श्रद्धावनत हो रहा है, जिनकी तपस्या एवं खोजों के परिणाम स्वरूप हम अपने जीवन को आनन्द, रस, सुख, सौभाग्य युक्त अमृतमय बना सके, ऐसी ही क्रियायें गुरु परिवार के सानिध्य में सिद्धाश्रम शक्ति पर्व पर सम्पन्न होगी।
शोभा श्रीमाली
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