





कहा जाये तो भारतवर्ष की प्रत्येक भूमि का कण-कण देवमय तीर्थ, ऋषि-मुनियों के तपस्यांश से चैतन्य और पवित्र है। फिर भी कुछ ऐसे पवित्र, चैतन्य स्थल हैं, जिसका महत्व सर्वोपरि है। जिनके बारे में विचार करने से मन और अधिक आस्था और शक्ति भाव से पुलकित और आनन्दमय हो जाता, जीवन में असीम शांति की अनुभूति होती है। इन पवित्र स्थलो में सप्तपुरी- अयोध्या वाराणसी, मथुरा हरिद्वार उज्जैन द्वारिका, कांचीपुरम के दर्शन, पूजन का लाभ व्यक्ति सामान्य प्रयासों से कर लेता है, परंतु जिन सबसे महत्वपूर्ण, दुर्लभ देवमय पूर्णतः पुण्यदायी चार धाम भारतवर्ष में शीर्षस्थ स्वरूप में चैतन्य स्थल बद्रीनाथ, द्वारिका, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम् में पूजन, साधना, दर्शन कर सांसारिक मनुष्य अपने आपको बहुत अधिक सौभाग्यशाली और श्रेष्ठमय समझता है। इसके प्रभाव से उसकी आस्था उसे जीवन में सम्बलता देती है। जिस प्रकार समुद्र मंथन के पश्चात् निकले अमृत का पान करने से देवमय तेजस्वी शक्तियों का अभ्युदय हुआ, उसी तरह हजारों-हजारों प्राण-योनियों में मंथन के पश्चात् प्राप्त मनुष्य योनि में आकर मनुष्य किसी धाम के दर्शन, साधना, पूजन का अमृतपान कर अपने सम्पूर्ण जीवन के दुर्गति, पाप-दोष, कठिनाई, दुख, बीमारी से निजात पा लेता है, साथ ही उसका सम्पूर्ण जीवन सुखमय, आनन्द युक्त बन जाता है। ऐसा ही बद्रीनाथ धाम दिव्यतम स्वरूप में विद्यमान है।
प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति अपने मन में यह अभिलाषा अवश्य ही संजोये कर रखता है, कि वह अपने जीवन में एक बार चार धामों की यात्रा करेगा ही। परन्तु वह गृहस्थ जीवन के चक्रों में घिर कर असहाय सा हो जाता है। भौतिक जीवन की अनेक इच्छाओं को पूर्ण करने के प्रयासों में सम्पूर्ण जीवन ही निकल जाता है, अन्त में जब उसकी शारीरिक क्षमता ऐसे दुरुह स्थानों की यात्रा के लिये सामर्थ्य नहीं जुटा पाती तो उसमें नीरसता व्याप्त होने लगती है और वह अपने बचे हुये जीवन में स्वयं को ही कोसता रहता है। यह अनमोल मानव जीवन सिर्फ कुछ कागज के टुकड़े और सम्बन्धों को एकत्रित करने के चक्कर में व्यर्थ चला जाता है और व्यक्ति साक्षात देवमय स्थानों की यात्रा से वंचित रह जाता है। लेकिन यदि व्यक्ति में दृढ़ संकल्प, साहस और अपने इष्ट, गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा, समर्पण हो तो इस दुर्लभ, प्राणवान, आनन्दमय क्षण से सराबोर हो सकता है।
कहा जाता है- देवतागण, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, अप्सरायें भी ज्ञानी, चेतनावान ऋषि-मुनियो, महात्माओं, गुरुओं के सानिध्य में देव तीर्थ स्थल दर्शन के लिये लालायित रहती हैं। वे भी मानव शरीर धारण कर अपने गुरु की सानिध्य में इन देवमय स्थलों पर पूजन, साधना सम्पन्न करते हैं, यदि समस्त तीर्थों को एक मानव शरीर की आकृति का स्वरूप दिया जाये तो यह कहना बिलकुल भी अनुचित ना होगा कि बद्रीनाथ धाम समस्त तीर्थों का हृदय स्थल है।
इस भाव-भूमि की महत्ता अपने आप में अवर्चनीय है। इसकी रज अपनी एक अलग ही विशिष्टता और महत्व लिये हुये है। उसका सम्पूर्ण विवेचन कुछ पृष्ठों पर सम्भव नहीं, इसके लिये तो आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य के मन की आंखे जाग्रत हों, साथ ही उससे भी अधिक महत्वपूर्ण उस देव-भूमि की चैतन्य शक्तियों को आत्मसात की क्रिया समझाने वाले, प्रदान करने वाले महापुरूष की, जो सही रूप में देव-शक्तियों के साक्षीभूत् दर्शन करा सके, हमे उस दिव्य भाव-भूमि पर लाकर खड़ा कर दें, जिससे हम वास्तविक रूप से देवमय बनने की ओर अग्रसर हो सके।
भगवान शिव स्वयं कहते हैं- यह बद्री क्षेत्र अनादि काल से सिद्ध है, जैसे वेद भगवान के शरीर है, उसी प्रकार यह भी है। इस क्षेत्र के अधिपति साक्षात् भगवान नारायण हैं। काशी में तथा कैलाश मानसरोवर में पार्वती सहित मेरी जो महत्ता शास्त्र में उल्लेखित है, उससे अनन्त गुनी अधिक महत्ता बद्रीनाथ धाम की है।
बद्रीनाथ क्षेत्र में 5 प्रमुख शिला तीर्थ हैं, जिन्हें नारद शिला, मार्कण्डेय शिला, गरूड़ शिला, वाराही शिला, नारसिंही शिला कहा जाता है, इन्हीं शिलाओं पर नारद देव, ऋषि मार्कण्डेय, कश्यप पुत्र गरूड़ ने बद्री क्षेत्र में अनेक वर्षों तक तपस्या की। इन शिलाओं का अपना विशिष्ट महत्व है।
वाराही शिला के बारे में कहा जाता है कि भगवान वाराही हिरण्याक्ष नामक दैत्य को मारकर बद्रीक्षेत्र में आये इसी शिला पर प्रलयकाल की समाप्ति तक रहें और वाराही शिला के रूप में वहीं निवास किया।
नारसिंही शिला के बारे में भी यही कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद भगवान नृसिंह बद्रीनाथ क्षेत्र में चले गये, एक दिन तपस्वी ऋषियों के दल ने भगवान नृसिंह का दर्शन बद्रीनाथ क्षेत्र में किया और उनकी स्तुति और प्रार्थना कर भगवान से कहा हे! विश्वमुख! विश्वभावन! जगदीश्वर कृपा करके आप कभी भी बद्री क्षेत्र का त्याग ना करें। तभी से भगवान नृसिंह सदैव के लिये सिला रूप में आज भी बद्रीनाथ धाम में विद्यमान हैं।
इन्हीं तीर्थ स्थलो में कपाल, ब्रह्म, वसुधारा, सोम कुण्ड, द्वादशादित्य, चतुः स्त्रोत, सत्यपद, लोकपाल, दण्ड पुष्करिणी, गंगा संगम, कूर्मोद्धार इत्यादि तीर्थ स्थल विद्यमान हैं, ऐसे दिव्यतम चैतन्य देव-स्थल के दर्शन से जीवन की अनेक आधि-व्याधि, भय, दरिद्रता और कलह सदैव के लिये समाप्त हो जाती है।
साथ ही भगवान अग्निदेव विराजमान हैं, जिनकी अग्नि समान ताप से अनेक-अनेक जन्मों के पाप भस्मीभूत होते हैं। हिमालय में स्थित बद्रीनाथ धाम को देव भूमि कहा जाता है, जहां से नर से नारायण बनने की क्रिया प्रारम्भ होती है। यदि साधक पूर्ण श्रद्धा, भाव और समर्पण के साथ अपने गुरु के सानिध्य में इन दिव्य स्थलों की चेतना आत्मसात करने की क्रिया सम्पन्न कर लें, तो उसके जीवन के सभी अभीष्टों का पूर्ण होना निश्चित होता ही है।
गुरु तो सदैव से शिष्य को प्रदान करने के लिये तत्पर रहते हैं, जो भी शिष्य जिस मनोभाव से उनके शरणागत होता है, चाहे वह आध्यात्मिक इच्छा हो अथवा भौतिक सभी मनोकामनाओ की पूर्ति होती है। सिद्धाश्रम चैतन्य दिवसों में अलकनन्दा के पावन तट पर सहस्त्र चक्र जागरण पूर्ण अमृतमय जीवन निर्माण की क्रिया परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश जी व सम्पूर्ण गुरु परिवार के सानिध्य में सम्पन्न होगा। ऐसे दुर्लभ योग का साक्षी सम्पूर्ण शिष्य वर्ग को होना ही चाहिये।
क्योंकि अनेक-अनेक जन्मों के बाद प्राप्त यह मानव जीवन, उसके अनेक जन्मों के पश्चात् और सैकड़ो जन्मों के पुण्योदय पर प्राप्त समर्थ, सक्षम, चेतनावान, वेद-वेदज्ञ के ज्ञानी सद्गुरु का सानिध्य और उस पर भी उनके सानिध्य में पवित्र, दिव्यतम, पूर्ण चेतनामय भगवान नारायण के निवास स्थल बद्रीनाथ धाम में पूजन, साधना, मंत्र जप, अंकन, विशिष्ट शक्तिपात दीक्षा व कुण्डिलनी जागरण की साधनात्मक क्रिया सम्पन्न करने का अवसर प्राप्त हुआ है।
यह दुर्लभ अवसर तो सिर्फ उनके लिये है, जो साहसी हैं, जिनके पैरों को गृहस्थ की बेडि़यों ने बांध ना सका, जो समाज से अलग हटकर अपने जीवन में कुछ अद्वितीय प्राप्त करना चाहते हैं, जो असंभव को संभव करने की क्षमता मन में संजोय कर रखते हैं। वो भौतिक और गृहस्थ जीवन की निज आने वाली समस्याओं को गुरु सानिध्य मे साधना द्वारा समाप्त करना चाहते हैं, जिनके हृदय में सद्गुरु नारायण विराजमान हैं, वो सद्गुरु नारायण की तपोस्थली की पावन भूमि को स्पर्श कर अपने देह के कण-कण को नारायणमय करने के लिये अवश्य ही पहुंचेगा।
सर्व प्रथम पंजीकृत साधकों के लिये 17 मई को हरिद्वार में पहुंचने के बाद ठहरने, विश्राम, भोजन की व्यवस्था स्वामी नारायण मंदिर, निकट सप्तऋषि आश्रम, पावन धाम, भूपतवाला, हरिद्वार में की गयी है।
इस यात्रा का प्रबन्ध शिविर आयोजन से बहुत पहले से व्यवस्थित करना होता है। इस स्वरूप में साधकों के ठहरने, भोजन, आने-जाने के लिये बसों की व्यवस्था, टेंट, होटल, गरम बिस्तर आदि अनेक-अनेक तरह की सामग्री हरिद्वार से ही संभव हो पाती है, अतः जो भी साधक-शिष्य सद्गुरुदेव नारायण का दिव्यपात प्राप्त करना चाहें और अपने जीवन को सर्व भौतिक सुखमय बनाने के इच्छुक हों वे ही पंजीकरण करायें। इस हेतु अपना व अपने पिता का नाम जन्म तारीख, जन्म स्थान अवश्य लिखे जिससे उसकी गणना कर पूर्ण व्यक्तिगत रूप से चैतन्य मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त साधनात्मक सामग्री निर्मित हो सकेगी ।
सरकारी नियमानुसार अपना परिचय पत्र और उसकी दो फ़ोटो कापी अवश्य साथ रखें ।
सर्वप्रथम यह ध्यान रखें कि आप कितने भी श्रेष्ठ आयोजक, कार्यकर्ता या समर्पित शिष्य रहें हों परन्तु ऐसे दिव्यतम स्थान पर आप केवल साधक ही हैं, अतः प्रत्येक का पंजीकरण अनिवार्य है, धार्मिक व साधनात्मक यात्रा हेतु परिवार के सभी सदस्यों के साथ पंजीकरण कराने से सांसारिक सुखों को पूर्ण रूपेण समवेत स्वरूप में प्राप्त कर सकेंगे।
न्यून मानसिकता, ओछी सोच व सदैव अनिर्णय के भाव से ग्रसित शिष्य नहीं आये। जिस साधक में सजगता, चेतना, ठोस निर्णय लेने की क्षमता होगी वे ही शिष्य अपने आपको अहम् ब्रह्मस्मि युक्त करने हेतु पंजीकरण करायेंगे।
वैशाख मास की अक्षय एकादशी के दिव्यतम अवसर पर जीवन अमृतमय प्राप्ति साधना व कर्ण पिशाचिनी शत्रुहन्ता दीक्षा तथा सिद्धाश्रम शक्ति दिवस पर वैभव धन लक्ष्मी साधना, सहस्त्र चक्र कुण्डलिनी जागरण दीक्षा, दिव्यतम पवित्र अलकनन्दा नदी, ब्रह्म कपाल मंदिर, गणेश गफ़ुा व चैतन्य स्थानों पर प्रदान की जायेगी। उक्त साधनात्मक क्रियायें बस यात्रा, भोजन, बद्रीनाथ में ठहरने की व्यवस्था पंजीकरण शुल्क में सम्मिलित है।
17 मई 2017 बुधवार को हरिद्वार पहुंचना अनिवार्य हैं, पंजीकृत साधकों के लिये ही ठहरने और भोजन की व्यवस्था हरिद्वार में 17 मई सांय 04 बजे से 18 मई प्रातः 4 बजे तक ही संभव हो सकेगी।
18 मई 2017 को प्रातः 04 बजे से आराम दायक बसों से बद्रीनाथ धाम की यात्रा प्रारम्भ करना आवश्यक होगा तब ही सांय 06 बजे तक बद्रीनाथ पहुंचना संभव हो सकेगा। रूद्र प्रयाग के पास रतूड़ा स्थान पर भोजन, चाय प्रदान की जायेगी।
प्रातः 04 बजे के बाद बद्रीनाथ की यात्रा के लिये रवाना होने पर किसी भी स्थिति में उस दिन बद्रीनाथ पहुचना संभव नहीं होगा और बीच में ही साधक को स्वयं की व्यवस्था से ही ठहरना होगा और दूसरे दिन बद्रीनाथ पहुंच सकेंगे।
बहन, बेटियां, मातायें किसी भी स्थिति में अकेली नहीं आये। अस्थमा, हृदय रोगी, गठिया रोगी व अन्य बीमारी से युक्त साधक इस शिविर में भाग नहीं लें। पूरी यात्रा में सामान की और स्वयं की सुरक्षा की जिम्मेदारी साधक की स्वयं की रहेगी।
अकाल मृत्यु, दोषो, क्लिष्ट रोगो से निवृत्ति हेतु महामृत्युज्ंय रूद्राभिषेक, दुर्गति नाशक सौभाग्य प्रदायक निखिल शक्ति व शिव गौरी नारायण दीक्षा, हवन, अंकन का न्यौछावर अलग से न्यूनतम रूप में प्रदान कर सिद्धाश्रम शक्ति युक्त हो सकेंगे।
बद्रीनाथ धाम में ठहरने हेतु Dormitory में अलग-अलग पलंग की व्यवस्था की गयी है।
22 मई 2017 को प्रातः 5 बजे से हरिद्वार लौटने की व्यवस्था बसों द्वारा होगी। हरिद्वार पहुंचने पर वंहा ठहरना या अपने घर को लौटने की व्यवस्था साधक को स्वयं ही करनी होगी।
पंजीकरण शुल्क केवल कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर या गुरुधाम दिल्ली में व्यक्तिगत रूप से जमा करायें। ड्रॉफ़ट या सीधे खाते में जमा कर पंजीकरण REGISTRATION कराना होगा। पंजीकरण शुल्क J 11000 ( Eleven Thousand Only)
पंजीकरण शुल्क भेजने के लिए आप प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान जोधपुर कार्यालय के फोन नं- 0291-2517025, 2517028, साथ ही मोबाईल नं- 7895727019, 8010088551 पर संपर्क कर विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,