





इसकी घोषणा प्रातः स्मरणीय सद्गुरुदेव निखिल ने परम पूज्य सदगुरुदेव कैलाश जी के बडे़ पुत्र पूज्य पाद् गुरुदेव विनीत जी के जन्म दिवस 18 मार्च 1986 को उसी दिवस में ही कर दिये थे, सद्गुरुदेव के ही शब्दों में———— तीसरी पीढ़ी के गुरु का जन्म हो चुका, तुम्हारे गुरु की तरफ से यह उपहार तुम्हें सौंप रहा हूं, इस बालक के नेतृत्व में तुम्हें एक नयी दिशा मिलेगी और यह बालक अपनी कर्म शक्ति को आधार बनाकर सम्पूर्ण विश्व में भटके, बिखरे शिष्यों को एक जुट करने में सफल होगा, गुरु चेतना का व्यापक विस्तार करेगा।
इसके सरल स्वभाव, चिंतन, विचार से तुममें सक्रियता आयेगी, एक नयी प्रेरणा जगेगी, तुम चेतनावान हो सकोगे, यह अवसर तुम्हारे जीवन का परिवर्तनकारी क्षण होगा, उस समय में गुरुत्व चेतना का सम्पूर्ण विश्व में विस्तार होगा। सद्गुरुदेव के इन आशीर्वचनों को साक्षात् क्रियान्वित होते देख मन में अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है। यह केवल मेरा ही नहीं अपितु भारत वर्ष और देश-विदेश के हजारों-हजारों शिष्यों का यही भाव इस समय होगा। क्योंकि सद्गुरुदेव निखिल की वाणी कभी मिथ्या हो ही नहीं सकती। प्रकृति अपना मूल चिंतन परिवर्तित कर सकता है। परंतु सद्गरु निखिल की वाणी साक्षात् रूप ना लें, यह असंभव है।
पूज्य विनीत गुरुदेव के विचारों, चिंतन और संकल्प को देखकर ऐसा लगता है कि वह समय निकट है। पूज्य गुरुदेव द्वारा जिस प्रकार दिन-रात परिश्रम किया जा रहा है। वह इसी कड़ी को दृश्यमान कर रहा है, सबसे बड़ी बात कि उनके भीतर परिस्थितियों से जूझने की क्षमता है, सद्गुरुदेव की ही भांति उनकी वाणी में ओजस्विता है, उनकी गंभीरता उनके महान उद्देश्यों को प्रदर्शित करती है। उनको देखकर ही ऐसा प्रतीत होता है कि वे नवीन परिर्वतन के परिचायक होंगे। उनकी क्रिया किसी विशेष योजना का संकेत देती है।
एक दिन अपने संकल्प से परिचित कराते हुये आश्रम के सेवको को वे आशीर्वाद् स्वरूप कह रहे थे, कि सद्गुरूदेव निखिल के सपने ही मेरे जीवन का संकल्प है, उनके अधूरे कार्यों को पूर्ण करना मेरे जीवन का उद्देश्य है, मेरी यह इच्छा है कि पूरा विश्व सद्गुरुदेव के ज्ञान से परिचित हो। उनकी ये बाते हम सभी को भाव-विह्नलित कर रही थीं। क्योंकि यह उन परम पिता परमेश्वर निखिल की ही कृपा है, कि वे हमें तीन-तीन पीढि़यों तक अपनी सूक्ष्म सानिध्यता प्रदान करते रहें, ऐसा चिंतन कर भला कौन सा अभागा शिष्य भाव-विह्नल ना होगा। मैंने यह अनुभव किया कि वे अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये निरंतर-निरंतर प्रयासरत रहते हैं। उन्होने आगे कहा कि शीघ्र ही सद्गुरुदेव के हस्त लिखित पुस्तको का नये आवरण में संपादन क्रम से किया जायेगा। सामान्यतः जो पुस्तक शिष्यों को उपलब्ध नहीं हो पा रहीं है। वह पुस्तक भी कैलाश सिद्धाश्रम से प्रकाशित करने का प्रयास किया जाये। इन कार्यों में आ रही बाधाओं का शीघ्र ही समाधान कर, श्रेष्ठ समय पर इन पुस्तकों का अनावरण परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश जी से करने की प्रार्थना हम सब करेंगे। इनके इस निखिल प्रेम की आंच सभी शिष्यों में अनुभव की जाने लगी हैं। पुरानी मान्यतायें समाप्त होंगी। विशेष नवीन क्रियाओं के संकेत शिष्यों को स्पष्ट रूप से मिलने लगे हैं। यह पूज्यपाद् विनीत गुरुदेव जी के ही प्रयासो का फल है कि पत्रिका अब नये स्वरूप में शिष्यों को प्राप्त होने लगी है। यह समय के अनुरूप नवीन सृजन का द्योतक है, जिसकी सुगंध से सभी शिष्य आनंदित हो रहें हैं और उन्हें सद्गुरुदेव के ज्ञान को विस्तृत रूप से समझने का अवसर मिल रहा है। सम्पूर्ण शिष्य समुदाय आपके इस निर्णय को कोटि-कोटि नमन कर रहा है। साथ ही आपको सम्पूर्ण शिष्य समुदाय की ओर से कोटि-कोटि सधन्यवाद् है।
जिस प्रकार आप आधुनिक समाज से अलग हटकर क्रियाशील हैं और अपने दायित्वों का निर्वाह कर रहें है। यह हम शिष्यों के प्रति आपका प्रेम ही है, जो हमें आपकी ओर खींच रहा है। साथ ही बहुत ही कम समय में आपने कैलाश सिद्धाश्रम दिल्ली, जोधपुर में कार्यालय, पत्रिका सम्पादन का कार्यभार भली-भांति संभाला है, यह हम शिष्यों के लिये वरदान है क्योंकि इससे सद्गुरुदेव कैलाश जी हम शिष्यों के मध्य और अधिक समय दे पायेंगे। साथ ही आपके गुरुपद पर आसीन होने से वे पुस्तक लेखन पर ध्यान केन्द्रित कर पायेंगे। इसके लिये हम शिष्य आपके ऋणी हैं। हमें यह विश्वास है कि शीघ्र ही अपनी ओजस्वी वाणी में शिष्यों का मार्गदर्शन कर शिविर महोत्सव का गौरव बढ़ायेंगे। आपकी शिविरों में उपस्थिति हम सभी शिष्यों की ओर से प्रार्थनीय है।
आप बचपन से ही अपने दादा सद्गुरुदेव निखिल के अत्यन्त निकट रहें हैं। आपने बाल्यावस्था में दादा सद्गुरुदेव निखिल के साथ अधिकतर क्रीडा, खेल-कूद, हर्षोल्लास किया है। उनकी सानिध्यता की छवि आप में स्पष्ट रूप से झलकती है। मुझे यह घटना आज भी भावुक कर देती है, जब आप दादा सद्गुरुदेव और अपने जीवन के बारे में चर्चा करते हुये हमें बताया कि एक बार दादा गुरुदेव कहीं बाहर जा रहे थे। उस समय आपकी आयु लगभग 5-6 वर्ष थी। तब आप भी दादा सद्गुरुदेव के साथ जाने के लिये जिद्द करने लगे आपके द्वारा जिद्द करने पर दादा सद्गुरुदेव ने आपको अपनी गोद में लेकर स्वयं गाड़ी चलाते हुये आपको अपने साथ ले गये। साथ ही गाड़ी की स्टेरिंग आपको सौंप दी और स्वयं ब्रेक को नियंत्रित कर रहे थे। आप द्वारा यह वाक्य सुनाते-सुनाते भावुक होना यह प्रदर्शित करता है कि आप दादा सद्गुरुदेव के अन्यतम निकट और दुलारे थे। वास्तविक रूप से दादा गुरुदेव उस समय ही यह संकेत दे रहे थे कि आने वाले समय में इस निखिल रूपी विशालतम वाहन का संचालन आपको ही करना है। ऐसा वो उसी समय प्रतीत करा रहे थे कि ये बाग-डोर भविष्य में आपको ही संभालनी है।
सद्गुरुदेव कैलाश जी व वंदनीय माता जी की सानिध्यता व आशीर्वाद में यह अर्वचनीय, अद्भुत्, ऐतिहासिक क्रिया इस वर्ष गुरु पूर्णिमा में सम्पन्न हुयी, भारत वर्ष, नेपाल आदि देश-शहर के शिष्य जिसके साक्षी हुये। यह क्षण हमारे जीवन का सौभाग्य है, जिसके साक्षी बन हम गौरवान्वित अनुभव कर रहें हैं।
हम सभी शिष्य अपने मन, कर्म, वचन से आपके प्रत्येक आज्ञा का पालन करने के लिये प्रतिबद्ध है। जो भी आपके द्वारा हमे कार्य दिया जायेगा। उसके भली-भांति पूर्णता के लिये हम निष्ठावान रहेंगे।
क्योंकि हमें यह पूर्ण विश्वास है कि आपके द्वारा लिया गया प्रत्येक निर्णय शिष्यों के हित और निखिल ज्ञान ज्योति को जाज्वल्यमान करेगा।
पारितोष तिवारी
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