





श्रावण का महीना शिव उपासना का ही महीना कहलाता है। सोमवार भगवान शिव का प्रिय दिन है। भगवान शिव को आशुतोष के नाम से भी बुलाते है। आशुतोष का अर्थ होता है सर्व अनुकूलता प्रदान करने वाले देवता। मासों में श्रावण मास भगवान शंकर को विशेष प्रिय है। श्रावण मास में की गयी साधना से शीघ्र ही मनोकामना पूर्ति होती है। श्रावण माह में सोमवार का दिन विशेष महत्व रखता है। सोमवार को शिव उपासना की कृपा प्राप्ति का द्वार माना गया है।
भगवान शिव तो पल में प्रसन्न होने वाले और साधक की सभी प्रकार से मनोकामना पूर्ण करने वाले महादेव हैं, शिव प्रसन्न होते हैं तो राम को लंका पर विजयश्री का आशीर्वाद् प्रदान देते हैं और पुरूषोत्तम मय बनाने की चेतना देते हैं, कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष बना देते हैं, इन्द्र को अमोघ वज्र देकर देवताओं के अधिपति बना देते हैं और ब्रह्मा को पूर्ण चैतन्य सिद्ध बना देते हैं।
भगवान शिव के पुत्र गणपति सभी विघ्नों, उपद्रवों, बाधाओं और अड़चनों को समाप्त करने वाले देवता हैं, उनकी पत्नी मां जगदम्बा पार्वती शक्ति स्वरूपा हैं, और शत्रुओं का नाश करने में अग्रणी हैं, वे स्वयं अन्नपूर्णा के अधिपति हैं, भूतों के स्वामी हैं, देवताओं के प्रिय हैं, और योगियों के आराध्य हैं।
भगवान शिव को श्रावण मास अत्यन्त प्रिय है, शिव पुराण में स्पष्ट रूप से लिखा है कि श्रावण का पहला दिन गृहस्थों और योगियों के सौभाग्य का द्वार खटखटाता है और जो इस द्वार को खोल देता है या श्रावण मास में विशिष्ट शिव साधना सम्पन्न कर लेता है, उसके भाग्य में लिखा हुआ दुर्भाग्य भी सौभाग्य में बदल जाता है, यदि उसका जीवन दरिद्रता पूर्ण है, तब भगवान शिव की यह साधना उस दरिद्रता को मिटा कर सम्पन्नता पूर्ण बना देती है।
श्रावण माह को रसेश्वर माह से भी पुकारा जाता है क्योंकि भगवान शिव रस सिद्धान्त के प्रवर्तक, नटराज रूप में नृत्य के प्रवर्तक, त्रिनेत्र रूप में ज्ञान के प्रवर्तक, नीलकंठ रूप में संसार के विष को अपने अंदर समाये हुये आराध्य देव है। श्रावण माह का महत्व निम्न कारणों से और अधिक बढ़ जाता है-
श्रावण माह में शिव से सम्बन्धित कोई भी साधना सम्पन्न की जा सकती है। क्योंकि वे उस समय गगन मण्डल में बादलों के ऊपर सीधे पृथ्वी की ओर दृष्टि पात करते हुये लौकिक प्राणियों पर तथा जीव-जन्तु वनस्पति इत्यादि पर अपनी कृपा बरसाते रहते हैं।
श्रावण माह में इन्द्र भी शिव के अधीन होता है। और इन्द्र को लक्ष्मीपति, ऐश्वर्यवान तथा देवताओं का राजा एवं जगत में भौतिक सूत्र का स्वरूप माना गया है। इसलिये श्रावण में साधना करने से इन्द्र की भी कृपा प्राप्त होती है। श्रावण माह में कन्याओं तथा युवकों द्वारा की गई साधना से उन्हें अभीष्ट वर-वधू की प्राप्ति होती है।
श्रावण मास में शरीर स्थित जल तथा आकाश स्थित जल का सीधा सम्पर्क बनता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी शरीर में 70 प्रतिशत जल ही है। और यह ध्रुव सत्य है कि जल ही जल को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। जिस प्रकार समुद्र में जब ज्वार उठता है तो लहरें तीव्र हो जाती हैं उनकी उछाल तीव्र हो जाती है उसी प्रकार श्रावण माह में मन का प्रवाह तीव्र होकर भगवान शिव द्वारा आकाश में स्थित होकर उस मन का शिव स्वरूप के साथ संगम होता है। इस हेतु प्रेम, माधुर्य, वशीकरण, सम्मोहन, आकर्षण, अनंग, रति, अप्सरा, योगिनी इत्यादि से सम्बन्धित साधनायें श्रावण माह में अवश्य सम्पन्न करनी चाहिये।
उपरोक्त विवेचन एक शास्त्रोक्त और वैज्ञानिक विवेचन है। क्योंकि पुराणों में वर्णित प्रतीक कथाओं का हर स्थिति में एक गूढ़ रहस्य है विवेचन है। कथाओं को केवल कथा मानने से उसके रहस्य को हम नहीं समझ सकते। उनके मूल भाव की ओर जाना आवश्यक है।
वर्षा के काल को श्रावण माह माना गया है, उस समय ऐसा लगता है कि प्रकृति रूपी शक्ति पृथ्वी भी आकाश रूपी शिव को अपने साथ एकाकार करने के लिये तत्पर है, कहीं बीज बोये हुये हों या नहीं हों प्रकृति में से अपने आप हरियाली प्रकट हो जाती है। यह हरियाली पृथ्वी के शुष्क सौन्दर्य को संवार देती है, इसीलिये श्रावण मास को शिव कल्प या शैव कल्प कहा गया है। जिस प्रकार शिवलिंग में पुरूष और प्रकृति का मिलन है, उसी प्रकार श्रावण मास भी ब्रह्माण्डीय शिवलिंग और पृथ्वीरूपी प्रकृति का महामिलन है। इस कल्प में, इस काल में शिव की किसी भी रूप में आराधना की जाये वह अधूरी नहीं रह सकती क्योंकि शिव साकार निराकार हर रूप में विद्यमान हैं, जहां जीवन है वहां शिव है, जहां श्रावणमाह है वहां शिव अपनी कृपा प्रदान करने के लिये आतुर रहते हैं।
श्रावण मास प्रेम और अनंग का प्रतीक भी है और प्रेम और अनंग के देव शिव से अधिक कौन हो सकते हैं, जिन्होंने अपनी प्रत्येक लीला में ‘एकोहि रूद्र’ होते हुये पूरी सृष्टि में अनेकानेक रूद्र उत्पन्न किये हैं। जब मन में प्रसन्नता हो, रस भाव हो, सौन्दर्यभाव हो तो रसेश्वर शिव की साधना अवश्य करनी चाहिये और जहां शिव पूजा, शिवलिंग पूजा हो वहां आद्याशक्ति, गौरीपूजा, गणाधिपति गणपति पूजा, शौर्य पति कार्तिकेय पूजा, रिद्धि और सिद्धि की पूजा जीवन में शुभ और लाभ की प्राप्ति के लिये आवश्यक है।
पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार दक्षप्रजापति ने अपनी 27 कन्याओं का विवाह चन्द्रदेव से कर दिया, परन्तु चन्द्रमा का अनुराग एकमात्र रोहिणी से रहा, जिससे अन्य 26 उपेक्षित हो गई। इस पर दक्ष ने चन्द्रमा को शाप दे दिया – ‘जा तू क्षयी हो जा!’ फलतः सुधाकर का सुधावर्षण कार्य रुक गया और चराचर में त्राहि-त्राहि होने लगी।
चन्द्रमा की प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को भगवान मृत्युंजय की आराधना करने की सलाह दी। छः मास के महामृत्यंजय मंत्र जप व कठोर तप से भगवान मृत्युंजय प्रगट हुये और चन्द्रमा को अमरत्व प्रदान किया और कहा ‘शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से तुम्हारी एक-एक कला बढ़ जायेगी और प्रत्येक पूर्णिमा को तुम पूर्ण चन्द्र युक्त हो सकोगे। इस प्रकार संसार में पुनः सुधाकर की सुधा किरणों का संचार होने लगा।
भगवान महामृत्युंजय शिव का वह रूप है, जिसकी साधना कर साधक समस्त रोगों, आकस्मिक दुर्घटनाओं, अकाल मृत्यु आदि के योंगों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर सकता है। दुःसाध्य रोगों के निवारण हेतु भी यह साधना श्रेष्ठ है। इस साधना को करने के लिये ‘महामृत्युंजय यंत्र’ ‘आपदहारिका’ और ‘मृत्युंजय माला’ की आवश्यकता होती है। प्रातः शुद्ध होकर साधना में सफलता के लिये गुरूदेव से प्रार्थना करें-
त्वमेव माता च पिता —
इसके बाद गणपति का स्मरण करें –
विघ्नराज नमस्तेऽस्तु पार्वती प्रियनन्दन,
गृहाणार्चामिमां देव गन्धपुष्पाक्षतैः सह।
ऊँ गं गणपतये नमः।
सामने थाली में कुंकुम से ‘ऊँ’ व स्वस्तिक बनायें।
‘ऊँ’ पर ‘महामृत्युंजय यंत्र’ एवं स्वस्तिक पर
‘आपदहारिका’ को स्थापित करें। दाहिने हाथ में जल लेकर
संकल्प करें-
ऊँ मम आत्मनः श्रुति पुराणोक्त फल प्राप्ति
निमित्तं अमुकस्य (नाम) शरीरे सकल रोग निवृत्तिं
पूर्वकं आरोग्य प्राप्ति हेतु महामृत्युंजय मंत्र जपं करिष्ये।
जल को भूमि पर छोड़ें व महामृत्युंजय का ध्यान करें
मृत्युंजय महादेव सर्वसौभाग्यदायकं
त्राहि मां जगतां नाथ जरा जन्म लयादिभिः।
इसके बाद ‘ऊँ ह्रौं जूं सः प्रसन्न पारिजाताय स्वाहा’ मंत्र बोलते हुये एक-एक कर 21 बिल्व पत्र यंत्र पर चढ़ायें। आरोग्य प्राप्ति की कामना करें, फिर ‘महामृत्युंजय माला’ से निम्न मंत्र की 5 माला जप करें-
‘रूद्र संहिता’ मे वर्णन आता है, कि एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया पर भगवान शिव को नहीं बुलाया। यहां तक कि अपनी पुत्री सती को भी नहीं बुलाया, क्योंकि वह शिव की भार्या थीं। फिर भी जिद्द करके सती अपने पिता के यज्ञ में शामिल होने पहुंचीं, लेकिन उन्होंने वहां अपने पिता दक्ष से पतिदेव शिव के प्रति अपमानजनक शब्द सुने और इस दुःख को सहन न करने के कारण उन्होंने वहीं यज्ञ कुण्ड में कूद कर प्राण त्याग दिया।
जब यह समाचार भगवान शिव तक पहुंचा, तब भगवान शिव ने रौद्र रूप धारण कर अपने गणों को भेजकर दक्ष के विशाल यज्ञ का विध्वंस कर दिया। भगवान रूद्र अपने साधक के जीवन में आयी सभी बाधाओं का उसी प्रकार विध्वंस कर देते हैं, जिस प्रकार उन्होंने यज्ञ का विध्वंस कराया था। साधक के जीवन में अनेक प्रकार की बाधायें आती है- वह कोई शत्रु बाधा हो सकती है, कोई तंत्र बाधा हो सकती है, किसी कार्य की सफलता में आ रही रूकावट हो सकती है। भगवान रूद्र अपने साधक के कार्यों में आ रही हर विघ्न, अड़चन को समाप्त कर उसे पूर्ण सफलता और विजय प्रदान करते हैं।
दूसरे शब्दों में यह कार्य सिद्धि साधना भी है, जिसे सम्पन्न कर साधक अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि कर सकते हैं। इसके लिये साधक के पास ‘नर्मदेश्वर शिवलिंग’ ‘रूद्र माला’ एवं ‘रौद्रसाक्षी’ होना आवश्यक है। संक्षिप्त रूप से गुरू पूजन करें व गणपति ध्यान करें। इसके बाद ‘नर्मदेश्वर शिवलिंग’ को किसी पात्र में स्थापित करें। एक पात्र में पंचामृत बनाकर उसमें ‘रौद्रसाक्षी’ को डुबो दें। इसके बाद भगवान रूद्र का ध्यान करें-
सर्वव्यापिन मीशानं रूद्रं वै विश्वरूपिणम्,
गंगाधरं दशमुखं सर्वाभरण भूषितम् ।
ऊँ साम्ब सदा शिवाय नमः।
अब नीचे दिये पांच श्लोकों का उच्चारण करें, प्रत्येक श्लोक के साथ शिवलिंग पर एक बिल्व पत्र अर्पित करें, इस प्रकार पांच बिल्व पत्र शिवलिंग पर चढ़ायें-
पश्चिमं पूर्ण चन्द्राभं जगत् सृष्टिकराज्ज्वलम् ।
सघोजातं यजेत् सौम्यं मन्दस्मित मनोहरम् ।।1।।
उत्तरं विद्रुमप्रख्यं विश्वस्थितिकरं शुभम् ।
सविलासं त्रिनयनं वामदेव प्रपूजयेत ।।2।।
दक्षिणं नीलजीभूत संहारकारकम् ।
वक्र भ्रुकुटिलं घोरभघोराख्यं तमर्चयेत् ।।3।।
यजेत् पूर्व मुखं सौम्यं बालार्क सदृशप्रभम् ।
तिरोधान कृत्यपरं रूद्रं तत्पुरूषाभिधम् ।।4।।
ईशानं स्फटिकप्रख्यं सर्वभूतानुकम्पिनम् ।
अतीव सौम्यमोंकार रूपं ऊर्ध्वमुखं यजेत् ।।5।।
ऊँ साम्ब सदा शिवाय नमः।
इसके बाद ‘रूद्र माला’ से सर्व बाधा निवारण एवं कार्य सिद्धि के लिये 5 माला मंत्र जप करें-
माला व शिवलिंग को पूजा स्थान में रखें। रौद्रसाक्षी को अगले दिन किसी शिव मन्दिर में चढ़ा दें।
महाभारत के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सलाह दी थी, कि वह यदि महाभारत में विजयी होना चाहता है, वह यदि कौरवों की असंख्य सेना पर सफलता पाना चाहता है, वह यदि मृत्यु को जीतना चाहता है, और वह यदि जीवन में पूर्ण सफलता के साथ भाग्योदय चाहता है, तो भगवान शिव की ‘पाशुपतास्त्रेय साधना’ के अलावा और कोई ऐसी साधना नहीं है, जो कि जीवन में विजयश्री दिला सके।
पाशुपतास्त्रेय साधना को प्राप्त करने के लिये विश्वामित्र जैसे दुर्धर्ष ऋषि को भी पांच हजार वर्ष तक तपस्या करनी पड़ी थी। मार्कण्डेय जैसे ऋषि ने एक स्वर में स्पष्ट किया है, कि पाशुपतास्त्रेय साधना प्राप्त करना ही जीवन का सौभाग्य है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये, उनसे समस्त साधनाओं में सिद्धि और सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करने के लिये यही प्रयोग श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है।
श्रावण मास में किये जाने वाले इस पाशुपते साधना के ‘शिव पुराण’ में कई लाभ बताये गये हैं-
इस साधना में बाण लिंग स्वरूप पंचमुखी रूद्राक्ष की मुख्य रूप से आवश्यकता होती है। पंचमुखी रूद्राक्ष को बेल पत्र का आसन देकर किसी पात्र में स्थापित करें और निम्न ध्यान मंत्र करें-
ऊँ ध्यायिे नत्यं महेशं रजत गिरि निभं चारू चन्द्रावतंसं,
रत्नाकल्पोज्ज्वालांगं परशु मृग वराभीति हस्तं प्रसन्नं।
पप्रासीनं समन्तात् स्तुत मम् गणे र्व्याघ्र-कृत्तिं वसानं,
विश्वाद्यं विश्व वन्द्यं निखिल-भय-हरम् पचं वक्त्रं त्रिनेत्रम।।
अब अपने सिर पर एक पुष्प रखें तथा पंचमुखी रूद्राक्ष के सामने भी एक पुष्प रखकर अपने और शिव के परस्पर प्राण सम्बन्ध स्थापित करते हुये निम्न उच्चारण करें-
पिनाक-धृक् इहावह इहावह, इह तिष्ठ इस तिष्ठ,
इह सन्निधेहि इह सन्निधेहि, इह सन्निधतस्व, यावत
पूजां करोम्यहं। स्थानीयं पशुपतये नमः।
इसके बाद ‘रूद्रयामल तंत्र’ के अनुसार ‘पाशुपति माला’ से निम्न मंत्र की एक माला मंत्र जप करें-
यह सम्पूर्ण प्रकार की सफलता देने वाला मंत्र है और इसके माध्यम से पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। शास्त्रों में इसे ‘अष्टाष्ट मंत्र’ या ‘अष्ट शिव मंत्र’ कहते हैं, जो अपने आप में अद्वितीय है। प्रयोग समाप्ति के बाद आरती करें। बाद में रूद्राक्ष माला व पंचमुखी रूद्राक्ष को पूजा स्थान में ही रखें।
भगवान शिव का ही एक नाम रसेश्वर भी है।
भारतीय शास्त्रों में ‘रस’ की धारणा पारद से की गई है। पारद के लिये कहा गया है-
रसनात्सर्वधातूनां रस इत्यभिधीयते
जरारूग्मृत्युनाशाय रम्यते वा रसो मतः ।
अर्थात् जो समस्त धातुओं को अपने में समाहित कर लेता है और जो बुढ़ापा, रोग व अकाल मृत्यु निवारण के लिये पूजन किया जाता है, वही यौवन रस की संज्ञा से विभूषित है।
पारद को भगवान शिव का वीर्य कहा गया है, और इसी रस के कारण भगवान शिव नित्य आनन्द में मग्न रहते हैं, यही रस मग्न होने की क्रिया से उन्हें रसेश्वर भी कहा गया है। रस का अर्थ है आनन्द, मस्ती, प्रफुल्लता, जोश, तरंग। भगवान शिव को यदि देखा जाय, तो उनकी सवारी नन्दी बैल और पार्वती जी की सवारी शेर दोनों ही परस्पर वैरी। भगवान शिव के गले में नाग और शिव के ही पुत्र कार्तिकेय की सवारी मोर दोनों परस्पर वैरी। सांप और शिव पुत्र गणेश का वाहन चूहा भी परस्पर वैरी हैं। अब शेर बैल पर झपटे, कि सांप चूहे पर झपटे या मोर सांप पर झपटे, भगवान शिव किसी भी प्रकार की चिन्ता से मुक्त अपने ही रस में मग्न हैं। यही आनन्द की स्थिति प्राप्त करना ही जीवन में रस घोलना है। और भगवान रसेश्वर की साधना से यह सम्भव है।
इस साधना को सम्पन्न करने के बाद व्यक्ति अपने आप में प्रसन्नचित्त हो जाता है, उसके तनाव चिन्ता, व्याधि सभी समाप्त हो जाते हैं, उसकी देह में नवीन तरंग, मस्ती, उमंग व जोश का संचार हो जाता है। छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आना, तनाव में आ जाना सब दूर हो जाता है। यदि घर में किसी भी प्रकार का क्लेश हो, लड़ाई झगड़ा होता हो, तो वह सब समाप्त हो जाता है। व्यक्ति स्वयं तो प्रसन्न रहता ही है, उसके सम्पर्क में आने वाले लोग भी उससे खुश रहते हैं, क्योंकि उसके जीवन में रस समाविष्ट हो जाता है।
इस साधना में शिव-गौरी बाहु, रसेश्वरी पारद गुटिका तथा पांच कमल बीज की आवश्यकता होती है। इसमें माला की आवश्यकता नहीं होती है। पहले संक्षिप्त गुरू पूजन व गणेश स्मरण कर लें। हाथ में जल लेकर मन में संकल्प करें कि ‘मैं (नाम बोलें) जीवन में समस्त तनाव, क्लेश, अशान्ति, द्वन्द्व की निवृत्ति एवं जीवन में पूर्ण आनन्द तथा रस प्राप्ति के लिये रसेश्वर साधना संपन्न कर रहा हूं।’
सामने शिव-गौरी बाहु को किसी पात्र में स्थापित करें। बाहु के बायीं ओर अक्षत की ढेरी पर ‘रसेश्वरी पारद गुटिका’ को स्थापित करें।
दोनों हाथ में पांच कमल बीज लेकर भगवान शिव का निम्न ध्यान मंत्र बोलते हुये बीज को बाहु पर अर्पित करें।
ऊँ नमः शम्भावाय च नमस्कराय च शिवाय च
शिवतराय च महेशं रजतगिरिनिभं चारूचन्द्रावतंसम्,
रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीति हस्तं प्रसन्नम् ।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतमरगणैर्व्याघ्रकृतिं वसानम्,
विश्वाद्यं विश्वन्द्यं निखिलभयहर पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ।।
निम्न मंत्र बोलते हुये बाहु पर बिल्वपत्र चढ़ायें ।
ऊँ भवाय नमः। ऊँ मृडाय नमः। ऊँ रूद्राय नमः। ऊँ
कालान्तकाय नमः। ऊँ हाराय नमः। ऊँ कालकरणाय
नमः। ऊँ लास्य प्रियाय नमः। ऊँ रसेश्वराय नमः।
प्रत्येक मंत्र बोलते हुये बाहु पर अक्षत चढ़ायें-
ऊँ शर्वाय नमः। ऊँ महेशाय नमः। ऊँ उग्राय
नमः। ऊँ भीमाय नमः। ऊँ ईशानाय नमः। ऊँ महादेवाय
नमः। ऊँ भद्राय नमः। ऊँ रसेश्वराय नमः।
एक-एक मंत्र बोलते हुये बाहु पर कुंकुंम चढ़ावें-
ऊँ अघोराय नमः। ऊँ शर्वाय नमः। ऊँ विरूपाय नमः।
ऊँ विश्वरूपिणे नमः। ऊँ त्रयम्बकाय नमः। ऊँ कपर्दिन
नमः। ऊँभैरवाय नमः। ऊँ शूलपाणये नमः। ऊँ ईशानाय
नमः। ऊँ महाकालाय नमः। ऊँ रसेश्वराय नमः।
फिर निम्न मंत्र को आधे घण्टे तक बिना माला जपें-
साधना समाप्ति पर शिव-गौरी बाहु को पूजा स्थान में रख दें व अन्य सामग्री को शिव मन्दिर में अर्पित कर दें।
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