





आज का यह प्रवचन उपनिषद के इस महान श्लोक से कर रहा हूं जिसमें प्राण स्पष्ट रूप से कहता है कि मैं ही देह में स्थित अग्नि के रूप में ताप दे रहा हूं। प्राण ही सूर्य रूप में प्रकाश दे रहा है, प्राण ही बादल रूप में रस वर्षा कर रहा है, प्राण ही वायु रूप में जीवन दे रहा है। प्राण ही पृथ्वी रूप में आश्रय दे रहा है, प्राण ही रचयिता रूप में भोग्य जगत को उत्पन्न कर रहा है। संसार में जो मरण धर्मा ‘सत् असत्’ है और जो अमरण धर्मा ‘अमृत’ है सब प्राण ही है।
लेकिन इसके साथ यह भी सत्य है कि शरीर और आत्मा या शरीर और प्राणों को अलग अलग रूप में नहीं कर सकते है। बिना शरीर के प्राणों की कल्पना नहीं हो सकती है और बिना प्राणों के शरीर की कल्पना नहीं हो सकती। वे दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, शरीर है और जीवित शरीर है तो प्राण है और प्राण है इसलिये वह शरीर कहलाता है नहीं तो वह मुर्दा कहलाता है। गुरू और शिष्य का भी वैसा ही सम्बन्ध है यदि वह चेतना युक्त गुरू हो और चेतना युक्त शिष्य हो। और यह सत्य है कि कोई भी व्यक्ति गुरू के चरण छूने से या दीक्षा लेने से ही शिष्य नहीं बन सकता। यदि मैं तुम्हें दीक्षा दे भी दूं तब भी तुम शिष्य नहीं बन सकते शिष्य बनने का मूल चिंतन तब बनता है क्योंकि दीक्षा देने का मतलब है ‘फालोवर’ आप मेरे अन्दर आइये। आप मेरे सिद्धान्तों को मानने की और अग्रसर है। यदि यह चिन्तन है, विचार है, कि मैं उसकी और बढने की कोशिश करूंगा तो यह अनुयायी हुआ। अनुयायी शब्द बना और शिष्य शब्द बनता है, जब गुरू और उसका शिष्य का शरीर और प्राणों का सम्बन्ध मिल जाता है। जब उसके बिना शिष्य रह न सकें और शिष्य के बिना गुरू न रह सके।
जिस प्रकार से बिना प्राणों के शरीर रह नहीं सकता उसको जलाना ही पड़ता है और बिना शरीर के प्राणों का आधार नहीं बन सकता है इसलिये कठोपनिषद अपने आप में एक सुन्दर व्याख्या है। और इस कठोपनिषद में इन्हीं प्रश्नों के उत्तर दिये है और मैंने उस प्रवचन में एक बात बताई थी कि अवश्य ही गुरू का ऋण शिष्य के ऊपर इतना अधिक है कि यदि शिष्य अपने जीवन को समर्पित भी कर दें सर्वस्व भी दे दें तब भी गुरू के ऋण को चुका नहीं सकता। इस शब्द को सबसे कहने से पहले मैंने गुरू और शिष्य की परिभाषा व्यक्त की है। अनुयायी या गुरू की परिभाषा नहीं दी है। शिष्य का चिंतन केवल गुरू होता है गुरू के अलावा कुछ नहीं होता है। गुरू का चिंतन केवल शिष्य होता है उसके अलावा और कुछ नहीं होता है। गुरू का चिंतन यह होता है कि शिष्य को अपने समान बना दें। अपने ज्ञान की, अपनी चेतना की, प्राणों की ओर अपनी ऊंचाई तक उसको अग्रसर करे। और जब शिष्य दूसरों को मार्ग दिखाने में सक्षम हो जाता है अपनी बात को दूसरे के मन में उतारने की क्रिया जान लेता है। अपने शब्दों को अपने वचनों को अपनी क्रियाओं को अपनी साधनाओं के माध्यम से जब दूसरे के शरीर में, प्राणों में उतर जाता है तब गुरू को सबसे ज्यादा प्रसन्नता होती है।
तब गुरू उस बात को एहसास करता है कि मैंने जो परिश्रम किया है वह सार्थक हुआ है और जब मैं यह बात कहता हूं तो इसके बीच में कहीं पर भी स्वार्थ चिंतन नहीं है इसके बीच में वह चिंतन नहीं है कि शिष्य गुरू को कुछ दें या धन दे, या वस्त्र दे, आभूषण दे, यह इस बीच में कहीं पर भी कुछ नहीं आया। यह तो परस्पर एक आत्मिक सम्बन्ध है। प्राण यह नहीं कह सकते कि शरीर मुझे कुछ दे और शरीर यह प्राणों को नहीं कह सकता है कि मुझे यह दों। दोनों आपस में एक दुसरे से जुड़े हुये है। वह स्थिति जब आती है तब वह शिष्य होता है और गुरू की वह स्थिति जब आती है जब वास्तव में वह गुरू हो। वास्तव में गुरू के ऊंचे की स्टेज गुरू से ऊपर की स्टेज ‘सद्गुरू’ है, जो तुम्हें उस ‘सद्’ सद् का मतलब है पूर्णता की ओर अग्रसर करने की क्रिया, ‘सद्’ का मतलब है पूर्ण और प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में अपूर्ण है। अपूर्ण है ज्ञान से, अपूर्ण है चिंतन से, अपूर्ण है विचार से, अपूर्ण है सुख से, अपूर्ण है परिवार से, और अपने आप में अपूर्ण है। क्योंकि अपूर्ण है इसलिये आप लोग मृत्यु की तरफ चलें जाते हैं। पूर्ण आदमी तो मृत्यु की ओर जा ही नहीं सकता। पूर्ण में से अगर पूर्ण निकाल दे तब भी पूर्ण बचेगा। एक शून्य में से एक शून्य निकाल दे तो पीछे एक या दो नहीं बच सकते, शून्य ही बनेगा और उस शून्य में एक शून्य जोड़ दे तब भी शून्य ही होगा। इसलिये शून्य नहीं मिट सकता और शून्य को हम पूर्णता कहते है। कोई शून्य कहते है कोई पूर्ण कहते है।
इसीलिये पूर्ण मिट नहीं सकता और जो मिट जाता है वह जो मर जाता है जो समाप्त हो जाता है जो श्मशान की ओर जा सकता है वह पूर्ण नहीं बन सकता। इसलिये जो उस रास्ते पर नहीं जाता, रूक जाता है वह पूर्ण है। पैदा होते ही व्यक्ति मृत्यु की और ही जाता है यह स्वाभाविक क्रिया है मगर कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते है जो बीच में रूक जाते है और वे रूक जाते है उस समय बीच में कहीं सद्गुरू मिल जाये, गुरू तो मिल जायेंगे गुरू तुम्हें मिल जायेंगे हरिद्वार में, गुरू तुम्हें मिल जायेंगे मथुरा में, वृन्दावन में, कई जगह गुरू मिल जायेंगे और कई बार तुम नहीं ढूंढोगे तब भी गुरू मिल जायेंगे। मगर सद्गुरू नहीं मिल सकता।
क्योंकि सद्गुरू आत्मा और प्राण का पूर्ण रूप से सम्बन्ध स्थापित करने वाला होता है। बाकी सब तो वह गुरू है और गुरू कुछ स्वार्थी है और गुरू खुद कुछ लेने की इच्छा रखता हो गुरू कुछ पाने की क्रिया करता है तो वह गुरू तो बन सकता है उसको हम गुरू कह सकते हैं मगर वह सदगुरू नहीं बन सकता। सद्गुरू यदि खुद ही लेने की इच्छा रखेगा तो वह क्या देगा तो वह लेकर क्या करेगा। जब मैं तुमसे कुछ भिक्षा मांगने की कल्पना करूंगा कि तुम मेरे पैर दबाओगे तुम मेरे चरण धोओगे तब मैं गुरू ही रहा, यदि मेरी इच्छायें ही खत्म नहीं हुई मैं पूर्ण बन ही नहीं सकता और जब मैं पूर्ण नहीं तो तुम्हें पूर्ण बना नहीं सकता इसलिये वस्त्रों को, या शरीर के चिंतन को या शरीर के ढांचे को देखकर के हम गुरू को नहीं पहचान सकते। सद्गुरू की पहचान वह है कि जो अत्यन्त ही सरल और सामान्य जीवन व्यतीत करने वाला हो। सामान्य का मलतब है फकीर नहीं, वह अगर मखमली गद्दे पर सुलाये हुआ तो नींद ले सकता है और दूसरे दिन उसको बिल्कुल टाट पर सुला दे तब भी उसी मस्ती के साथ वह नींद ले सकता है। यह उसके जीवन का एक चिंतन है वहां पर भी वह उतना ही सुखी है, वहा पर भी वह उतना ही सुखी है। यदि किसी ने पांच हजार रूपये दे दिये तब भी वह सुखी है और यदि किसी ने कुछ नहीं दिया है तब भी उसके मन में उसके प्रति कोई आक्रोश नहीं है ऐसा व्यक्ति सद्गुरू बन सकता है।
इसीलिये यह नहीं कि शिष्य की ही कसौटियां है कठोपनिषद कहता है कि शिष्य से भी गुरू बनना बहुत कठिन है और गुरू जो स्वयं पूर्ण हो और उस पूर्ण की परिभाषा कठोपनिषद में कहा है- ‘पूर्णत्व त्वां गुरूत्वां सदेवं वे वर्णन सहित वदाम परेणं’ गुरू से सद्गुरू को पहचानने की तीन क्रियायें है, हम किस तरीके से सद्गुरू को पहचाने। गुरू और सद्गुरू में अंतर कैसे करें? आंखों से ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि नकली चीज बहुत ज्यादा चमकती है अगर सोने को रख दीजिये और पीतल पर सोने की पालिश कर रख दीजिये तो वह ज्यादा चमकेगा। नकली जो हीरे बनते है वह असली से बहुत ज्यादा प्रकाश देने वाले बनते हैं, और तुम्हारी आखें नकली है, तुम्हारा शरीर नकली है, तुम्हारा चिन्तन नकली है, तुम्हारे विचार नकली है इसलिये नकली व्यक्ति नकली से ज्यादा जल्दी सम्बन्ध स्थापित कर सकता है इसलिये तुम उस गुरू के मोह पाश में ज्यादा फंस जाते जो केवल याचक वृत्ति वाला है जिसको मैं कई बार प्रवचन में भिक्षुक कहता हूं जो भीख मांगने वाला हो, भिक्षुक है। वे गुरू बन ही नहीं सकते गुरू शब्द को शर्मिन्दा करते हैं, इसलिये गुरू अगर तुम्हारे प्रारब्ध में है तो कहीं बीच में मिल ही जाते हैं।
वह उस तुम्हारी यात्रा में जो यात्रा जन्म से मृत्यु की और है उस रास्ते पर तुम जा रहे हो और यह जरूरी नहीं कि ऐसा सद्गुरू तुम्हारे पिता को कहीं मिल जाये, यह भी नहीं कि तुम्हारे दादाजी को मिल जाये या परदादा को मिल गये हों, नहीं भी मिले। तुम्हारे जीवन में भी नहीं मिले और यह भी हो सकता है, तुम्हारे जीवन में मिले और तुम नहीं पहचान सके और हो सकता है कि तुम्हारे पाप और कर्म इतने फूटे हुये हों कि वह मिल भी जाये तो तुम पास में से निकल जाओ, उसमें कुछ नहीं हो सकता। मगर उस कठोपनिषद में कहा है सद्गुरू की पहचान की तीन स्थितियां है और वह स्थितियां है वह अत्यन्त उच्चकोटि का जीवन जी सकता हैं, अत्यन्त सामान्य स्थिति में रह सकता है। राजा के महल में उसी मस्ती के साथ महल में सो सकता है, और चौबीस तरह के पकवानों को खाकर भी तृप्ति महसूस कर सकता है। मगर ठीक शाम को उसी आनन्द के साथ किसी झोपड़ी में आनन्द के साथ सो सकता है, और शाम हो तो उसी आन्नद के साथ रूखी सूखी रोटी खाकर शांति महसूस कर सकता है। दूसरा उस गुरू की या सद्गुरू की पहचान के बारे में कठोपनिषद स्पष्ट करता है जिसके शब्दों में कुछ प्रभाव हो जिसके सामने शब्द नृत्य करते हो, वह शब्दों का प्रवाहमान स्वरूप हो और शब्द को शक्ति कहा गया है।
‘अभिदा लक्षिणा भिदीना शब्द’ शब्द अपने आप में शक्ति है, जो उस शक्ति का स्वामी हो और वे सब उसके सामने नृत्य करते हों जिस शब्द को वह ले, पकड़े और व्यक्त करे उसके लिये वह शब्दों की न्यूनता नहीं रहती और जब शब्द को व्यक्त करते है तो वह शब्दों के माध्यम से बात को सामने वाले के मन में उतार देता है, हृदय में उतार देता है, प्राणों में उतार देता है, और सामने वाला एक दम से शांत हो करके सुनता ही रहता है। एहसास करता है कि एक नवीन जीवन कुछ नवीन चिंतन हैं, इन शब्दों में व्याख्या हैं।
यदि शब्द है और कुछ भी प्राप्त नहीं हो रहा हैं तो जो शब्दों पर पूर्ण रूप से अधिकार रखता हो ऐसा अधिकार नेता भी रखता है और नेता भी बहुत सुन्दर भाषण देता है मगर वह हृदय में नहीं उतरता है वह दिमाग में उतरता है वह कहता है कि मैं पांच साल में ऐसा कर दूंगा, शब्दों का जादूगर तो वह भी है, वह भी डेढ घंटे भाषण देता है, और भाषण इतना कि हजारों लोग सुनते हैं मगर वे हृदय में नहीं उतरते, वह दिमाग में उतरते हैं, दिमाग सोचता है हो सकता है कि यह नल लगा देगा और सड़कें ठीक कर देगा और मेरा यह काम अभी करवा देगा यह सब मस्तिष्क के काम हैं वास्तव में हृदय में अपने शब्दों को उतार सके वह कठिन क्रिया है। वह क्रिया कोई नेता नहीं कर सकता वह तो केवल सद्गुरू ही कर सकते है। इसलिये उसके माध्यम से उस गुरू को पहचान सकते है और तीसरा सद्गुरू की पहचान यह है कि ‘तुम्हारे अत्यन्त समीपता’ तुम अनुभव कर सको। वह हिमालय कोई काम का नहीं अगर हिमालय में हम जा नहीं सके वह हिमालय क्या काम का है, उसकी अपेक्षा वह पहाड़ी हमारे लिये ज्यादा ‘वेल्युयेबल’ है जिस पर हम चढ तो सकें, जिस पर हम चल तो सकें।
वह गंगा किस काम की जहां हम जा भी नहीं सके इसलिये वह गुरू जो महीने भर में एक बार तुम्हें झांकी दें और तुम्हें मिले ही नहीं, मां आये नहीं, दो महीने में एक बार बाहर निकलती थी तुम्हें झांकी देती थी और बन्द हो जाती थी। मैं सोचता हूं कि ऐसे सद्गुरू नहीं हो सकते, नाथद्वारा में श्रीनाथ जी का मंदिर है पट खुलते है बस कुछ सेकन्ड की झांकी देते है और झट से पट बन्द कर देते है ऐसे तो भगवान नहीं बन सकते, भगवान नहीं मिल सकते, यह पुजारियों ने उन भगवान को जबदस्ती बन्द कर दिया है। वह भगवान कैसे जिनको हम देखकर तृप्ति अनुभव नहीं कर सकते हमारी तृप्ति हो ही नहीं। वह गुरू कैसे जो तुम्हारी समीपता अनुभव कर ही नहीं सकता जिनके पास हम हर क्षण उपस्थ्ति हो सके और जो हमारे पास उपस्थित रहे, हर क्षण हमारे उत्तर देने वाले होना चाहिये जो हमारे दुख में, सुख में, चिन्तन में, विचार में अनुरक्तता महसूस कर सकता हो जो तुम्हारे परिवार का एक सहायक हो, मार्गदर्शक हो, एक गुरू हो, एक पिता हो, एक चिन्तक हो, और तुम्हारे दुख में उतना ही दुखी हो तुम्हारे सुख में उतना ही सुखी हो। तुम्हारे बीच में उतनी ही प्रसन्नता अनुभव कर सकता हो और जब ऐसी स्थिति बनती है तब गुरू और शिष्य का सम्बन्ध शरीर और प्राणों का बन जाता है।
और जब यह सम्बन्ध बन जाता है तो उस प्राणों को शरीर से अलग कर नहीं सकते कर सकते है साधना के माध्यम से। यदि शरीर और प्राणों में थोड़ी दूरी हो भी जाती है तो शरीर उसमें बहुत तड़पता है, कहते हैं कि तुम मेरे प्राण स्वरूप हो और जब तुम जाते हो तो बहुत बेचैनी आती है, जब तुम्हारी याद आती है मन बड़ा बहुत बैचेन हो जाता है। जो अत्यन्त प्रिय होता है हम उससे जब दूर जाते है तब बड़ी ही एक छटपटाहट सी महसूस होती है। इसलिये कि प्राणों का कुछ हिस्सा दूर बैठा है, और यह छटपटाहट सी बने यह गुरू की ड्यूटी है जिस शिष्य में छटपटाहट बने, शिष्य का गौरव है, क्योंकि यह छटपटाहट उसे जीवन की पूर्णता की और अग्रसर कर सकता है, क्योंकि उस छटपटाहट में स्वार्थ नहीं है, इस छटपटाहट में तुम्हारा उस गुरू से कोई शरीर का सम्बन्ध नहीं है। मैं कई बार कह चुका हूं कि तुम्हारा मेरा कुछ सम्बन्ध नहीं है, मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूं, मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूं, मैं तुम्हारा बाप नहीं हूं, मैंने तुम्हें पैदा किया नहीं शरीर से मैं तुम्हारा भाई भी नहीं, मैं तुम्हारी बहन भी नहीं हूं, तुम्हारा बहनोई भी नहीं, तुम्हारा साला भी नहीं हूं, मैं तुम्हारे परिवार का नहीं, तुम्हारे समाज का नहीं हूं। तुम्हारा सम्बन्धी नहीं हूं, मैं तुम्हारा कुछ हूं ही नहीं क्योंकि तुम्हारा मेरा शरीर का सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा मेरा प्राणगत सम्बन्ध है, आत्मागत सम्बन्ध है।
इसलिये तुम मुझे एक बार देख भी सकोगे तो तुम्हारे प्राण से देख सकोगे शरीर से नहीं देख सकोगे। इस कुर्त्ते को पहन कर तुम मुझे पहचान भी नहीं सकोगे और जब तुम्हारे साथ में गुरू होगा तो गुरू जी तो वही सामान्य है, तुम नहीं पहचान सकोगे क्योंकि तुम देख रहे हो स्थूल दृष्टि से शरीर को और जिस दिन तुम अपने प्राणों से देख लोगे उस दिन तुमको छटपटाहट पैदा होगी उस दिन मैं दो घंटे नहीं आऊ तो तुमको व्याकुलता होगी गुरूजी दो घंटे हो गये अभी आये नहीं। चला जाऊंगा तो तुम व्याकुलता सी अनुभव कर लोगे गुरू जी आज देखा नहीं व्याकुलता, एक आकुलता, बैचेनी एक छटपटाहट हो यह शिष्य का सबसे बड़ा गौरव है। यह शिष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है यह शिष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। और अगर शिष्य है तो और ऐसी स्थिति में शिष्य गुरू के बिना रह नहीं सकता क्योंकि वह गुरू है पिता नहीं वह भाई नहीं कोई सम्बन्धी नहीं वह गुरू है और गुरू का पहला और अन्तिम कर्त्तव्य है शिष्य को अपने में पूर्ण कर देने की क्रिया है अगर ऐसा नहीं करता तो भिक्षुक है। फिर तो वह तुम्हारी भीख खाकर तुम्हारे पांच रूपये पर जीवन यापन करने वाला है।
वह हो सकता है कि तुमसे पांच लाख रूपये इकट्ठे कर लिये हो, धोखे से, छल से, कपट से, शिष्यों को मूर्ख बना करके ऐसा कर सकते है और करते है मंदिर बना देते हैं और एक आश्रम बना देते है और ऐसा करते है और मैं भी ऐसा कर सकता था, मैं इससे ज्यादा आश्रम बना सकता था। मेरी क्षमता इतनी है कि चाहे उन गुरूओं से एक हजार गुरूओं को मिलाकर जो पिण्ड बनाया जायें उनसे ज्यादा सक्षम था, भी हूं, भी रहूंगा, मगर मैं इस प्रकार के ढकोसले बाजी में विश्वास नहीं करता हूं। मेरे पीछे पांच हजार अनुयायी बने यह चिन्तन मेरा नहीं है, मेरे पीछे दस भी बने और दस भी नहीं, मेरे पीछे में पांच भी बना सकूं तब भी मेरे जीवन की पूरी सार्थकता बन सकती है क्योंकि पूरे लम्बे चौड़े आकाश में फलक में एक ही सूर्य है जो पूरे संसार को प्रकाशित कर सकता है। हजार तारे मिलकर भी सूर्य की बराबरी नहीं कर सकते और मैं एक भी सूर्य बना सका तो मैं सोचता हूं कि हजार तारों से ज्यादा श्रेष्यस्कर है। वे हजार तारे मेरे किस काम में आयेंगे और लोग उन तारों को सूर्य मानते है और गर्व से कहते है कि हमने बीस हजार शिष्यों को खड़ा किया है।
जीवन में महत्वपूर्ण शब्द मुक्ति शब्द बना है, धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष ‘मोक्ष बन्धां मुक्तियसि मुक्ति’ जो सभी प्रकार के ऋणों से मुक्त हो सके उसकी मुक्ति होती है। मुक्ति का मतलब मृत्यु नहीं, मुक्ति का मतलब कोई देव लोक में जाने का भी नहीं, मुक्ति का मतलब है, मन चाहा आकार ग्रहण करना, मन चाहा रूप धारण करना, मन चाही स्थिति प्राप्त करना उसको मुक्ति कहते है। तुम्हारा जन्म हुआ यह कोई अनहोनी घटना नहीं है इसमें कोई विशेषता नहीं है, यह तो एक मामूली स्त्री और पुरूष की क्रिया है, और तुमने जन्म ले लिया इसमें कोई परिवर्तन नहीं आया और उस ब्रह्माण्ड को देखें जो इस लोक के ऊपर से है तो देखेंगे कि सैकड़ों मृत प्राणी जो मरे हुये है वे आत्मायें भटकती रहती है, तड़पती रहती है और वे भटकती इसलिये है कि उनको गर्भ चाहिये और वे किसी गर्भ में प्रवेश चाहती है, और उस समय जो एक आत्मा जो स्वार्थी, झूठ, कपट की है और उस समय एक क्रिया हो रही है गर्भ धारण की रात्रि का टाइम है, गर्भ धारण की क्रिया हो रही है, वो आत्मा उसमें प्रवेश कर लेती है और तुम्हारा प्रविष्ट भी वैसा हो गया इसलिये कोई विशेष क्रिया नहीं हुई। तुम्हारे अन्दर प्रकट करने की क्रिया नहीं है कि तुम जो चाहो वह गर्भ प्राप्त कर सको, वह तुम्हारे पास क्षमता नहीं है।
ये विशेषता है, मोक्ष की यह विशेषता है अगर वह चाहे तो गर्भ धारण करे, गर्भ में प्रवेश करे और जो चाहे वो गर्भ प्राप्त करें उत्तम कोटि के मां और उत्तम कोटि के पिता का गर्भ धारण करें मगर उस आत्मा की विशेषता तब होती है और ऐसा व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति वाला होता है। ऐसा भी हो सकता है कि गर्भ धारण करे ही नहीं और इस जीवन में रहे, सिद्धाश्रम में रहे और वह दो साल, बीस साल, हजार साल, पांच हजार साल, दस हजार साल भी रह सकता है और हजार साल के बाद भी जन्म ले सकता है। राम के बाद और वही तत्व पूरे पच्चीसों जन्मों के बाद उस कृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ में जन्म लिया। पच्चीसों जन्मों वह आत्मा रहीं और अपने आप में पूर्ण सक्षम रूप में रही क्योंकि आत्मा में इतनी ताकत थी जिन दूसरी आत्माओं में सलेक्ट करने की ज्ञान और चेतना अधिकार नहीं हो उनकी मजबूरी है और उस मजबूरी में गर्भ में वह चले जाते है वे उस भीड़ में से कोई भी एक हो सकता है, वह दुष्ट आत्मा हो इसलिये कभी कभी बहुत अच्छे ब्राह्मण के वहां दुष्ट पैदा हो जाता है और कभी बहुत दुष्ट व्यक्ति के वहां प्रहलाद पैदा हो जाता है, और सोचते है कि ऐसा ब्राह्मण सदाचारी के वहां कपूत मांस खाने वाला कैसे पैदा हो गया। इसलिये पैदा कि उस समय उन्होंने उस गर्भ धारण करने की क्रिया को जीवन का आधार नहीं माना एक क्षणिक सुख माना, देह सुख से उत्तमकोटि की आत्मा नहीं आ सकती, एक कर्त्तव्य बोध से उत्तम कोटि की आत्मा आ सकती है, और ऐसी क्रिया मोक्ष प्राप्त करने वाला व्यक्ति खुद सिलेक्ट कर सकता है।
हो सकता है वह सौ साल बाद गर्भ धारण करे, एक श्रेष्ठ आत्मा में विशेषता है तब तक वह जीवित रहता है, पूर्ण प्राण युक्त, चेतना युक्त, शरीर युक्त इसी शरीर में वह इस पृथ्वी तल से थोड़ा ऊपर उठकर वह किसी लोक में जाकर बैठ सकता है। वह उस भीड़ वाली आत्मा में धक्का मुक्की नहीं करती और दुष्ट और अत्यन्त क्रूर आत्मायें क्रूर गर्भ चुनती है। हो सकता है कि हिटलर की आत्मा उस गर्भ का इन्तजार कर रही हो कि कोई ऐसी क्रूरगर्भ मिल जायें और वह उसें प्रवेश करें, सामान्य गर्भ उस क्रूर को पैदा भी नहीं कर सकती, इसलिये क्रूर आत्मायें क्रूर गर्भ को देखती है, जो मा-बाप बहुत दुष्ट हो, दुराचारी हो, असत्यभाषी, उनके पुत्र आप देख लीजिये चाहे दिल्ली में, बम्बई में, कलकत्ता में देख लीजिये वे है उनसे एक इंच ज्यादा ही उनके बेटे होते है उतने ही दुराचारी, उतने ही असत्यभाषण करने वाले, झूठ बोलने वाले, छल करने वाले, और बाप बहुत दुखी होता है कि यह झूठ बोल रहा है, वह यह नहीं देखता कि मैं खुद सारी जिन्दगी झूठ बोल रहा हूं, और जब मैं झूठ बोलूंगा तो झूठ ही पैदा होगा मैं बबूल बोऊंगा तो बबूल ही पैदा होगा वह इस बात को नहीं समझता क्योंकि उसने उस गर्भ को केवल दैहिक सुख के लिये गर्भ पैदा कर लिया, वह क्रिया के शुद्ध पक्ष में नहीं था, चिन्तन युक्त पक्ष में नहीं था एक विशेष क्षण को नहीं पकड़ पाया, एक विशेष आत्मा को अपने अन्दर ले नहीं सका जो मुक्ति प्राप्त करने वाला पुरूष हो वह चाहे तुम हो सकता हो या मैं हो सकता हूं, उस मोक्ष को प्राप्त करने के लिये ऋण मुक्तता जरूरी है।
इसलिये शिष्य अगर मुझे एक गिलास पानी भी पिलाता है तो ऋण मेरे ऊपर चढ़ता है। वह चाहे या न चाहे यह आवश्यक नहीं कि शिष्य चाहे, शिष्य चाहे कि यह मैं तो अपनी इच्छा से करता हूं। मैं चाहूं या न चाहूं और तुम्हारे ऊपर पत्थर फेकूं और उसके उपरान्त भी ऊपर मैं नहीं चाहता कि खून निकले मगर पत्थर फेकूंगा तो गुम्बर होगा ही, खून निकलेगा ही, वह सहज स्वभाविक क्रिया है। यह सहज स्वभाविक क्रिया है कि तुम मेरी सेवा करोगे तो तुम्हारा ऋण मेरे ऊपर चढेगा ही और ऋण रहेगा तो मुक्त नहीं हो सकता मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। सम्भव ही नहीं उस ऋण मुक्ति से, जब मैं जानता हूं कि ऋण है तो मैं उस मुक्ति का उपाय भी जानता हूं और ऋण मुक्ति है शिष्य को प्रवचन देकर के, शिष्य को ज्ञान देकर के, शिष्य के सुख दुख में सरीक हो करके, और शिष्य को पूर्णता की और अग्रसर करके उतनी ही ऋण मुक्तता प्राप्त कर लूं। अगर तुमने दो पैसे दिये तो तुम्हें दो पैसे देने की बात हुई फिर मेरे ऊपर ऋण है तुम्हें रूपया देना कोई कम्पलसरी नहीं है। इसलिये शिष्य जितना देता है शायद उससे ज्यादा प्राप्त करता है। इसलिये गुरू बहुत कम शिष्यों से अपना स्वार्थ युक्त कार्य सौंपते है, अपने हाथों से काम करते हैं, अपनी लंगोट खुद धोते हैं, अपना आसन खुद धोते है, यथा सम्भव शिष्यों को सेवा करने का अवसर कम देते है।
और वे सद्गुरू होते है जो शिष्यों को काम देते है, उनसे काम करवाते है, इसलिये कि वह काम करे और उनका ऋण चढे और वापस उतार सके, दे सके, दे सके तो पूर्णता प्राप्त कर सकें। इसलिये सद्गुरू लालची नहीं होता, स्वार्थी नहीं होता वह शिष्यों को काम सौंपता है, शिष्यों से सेवा लेता है, चाह करके लेता है ज्यादा से ज्यादा लेता है, क्योंकि ज्यादा से ज्यादा देने की उसके पास क्रिया है, उसके पास साधन है और दे करके उसको उस रास्ते की ओर अग्रसर कर सकता है। इसलिये उस रास्ते पर स्थिति आती है वह बिना चिंतन के बिना इच्छा के दें फिर भी गुरू पर ऋण है और गुरू अगर सद्गुरू है तो उस ऋण का अर्थ उसका महत्व उसका मूल चिंतन, गहराई शातना है, और वह चुकाता है चाहे तुम चले जाओ मगर उसके मानस में है कि उस व्यक्ति ने इतनी मेरी सेवा की है। मुझे उसको देना है, और अप्रत्यक्ष रूप से भी उसके जीवन में पूर्णता देकर के उसके जीवन में अनायास धन दे करके, सुख देकर के, पुत्र देकर के, आशीर्वाद देकर के, किसी भी तरीके से वह चुका देता है। और यह चुका देने की क्रिया सद्गुरू के पास होनी चाहिये तब वह सद्गुरू है। नहीं तो गुरू है नहीं तो लालची है, स्वार्थी है, पापी है, ढोंगी है, पाखण्डी है, और अपने आप में गुरू शब्द को एक गन्दी नाली की और अग्रसर करने वाला है।
इसलिये मैंने कहा कि जीवन में गुरू और सदगुरू बहुत मुश्किल से प्राप्त होते है क्योंकि हम पहचान नहीं पाते यह हमारे जीवन का दुर्भाग्य है। हम उससे जुड़ नहीं पाते यह हमारे जीवन का दुर्भाग्य है। हम उससे एकाकार नहीं हो पाते यह हमारे जीवन का दुर्भाग्य है। तुम पानी में रेत मिलाना चाहो तो रेत नहीं मिलेगी, पानी में पानी ही मिलेगा, पहले तुम्हें पानी बनना पड़ेगा और तुम रेत हो, एक माटी हो, उस मिट्टी को अगर मिलायें भी और पानी में घोल भी दें तो दो मिनट बाद मिट्टी नीचे बैठ जायेगी मिक्सप नहीं होगी और मिक्सप नहीं होगी तो वह स्वर्ण जल जिसे निर्मल जल कहते है नहीं बन सकेगा। या तो गुरू उस मिट्टी को उस मिट्टी जिसका कोई मूल्य नहीं है जो निरर्थक है जिसका कोई तत्व चिंतन नहीं है उस मिट्टी को आकार दे, गुरू उसे स्वरूप देकर, दिया बनायें तो थोड़ा सा अंधकार दूर कर सकेगा। और सद्गुरू की ड्यूटी है कि तुम्हें उस आंच में डाले भीषणतम तेज गहरी आंच और तुम तड़प न जाओ कि यह क्या गुरू है यह काम ही काम करवाता है, क्या करवाता है यह क्या गुरू कि हर समय परेशान करता रहता है तो तुम शिष्य नहीं बन सकते, तुम अनुयायी बन सकते हो तुम ढोंगी बन सकते हो, पाखंडी बन सकते हो केवल होठो से गुरू बन सकते हो। सद्गुरू तो तुम्हें आंच देना इसलिये चाहता है कि तुम दीपक, तुम घड़ा बन सको, तुम श्रेष्ठ बन सको। तुम मिट्टी हो और हो सकता है कि तुम उसके आगे जाकर के यौवन जल बना सको वह सहज प्रवाह, गतिशील हो सकता है कि तुम उस मोक्ष के मार्ग की और अग्रसर कर सके, हो सकता है कि तुम्हें उस जगह पहुंचा सके कि जहां तक तुम्हारी दस पीढियां पच्चीस पीढियां नहीं पहुंच सकी।
और इस क्रिया में कोई समाधि की जरूरत नहीं है कोई मंत्र की जरूरत नहीं है, कोई साधना की जरूरत नहीं है कोई माला की जरूरत नहीं है, कोई मंत्र जप की जरूरत नहीं कोई यंत्र की जरूरत नहीं है। यह तो सहज स्वभाविक क्रिया है, केवल समझने की क्रिया है। एक सरल प्रवाह गति है और जितनी भी बाधायें आयेगी और शत्रु सेकड़ौं है और उसमें शत्रु होंगे तुम्हारी मां, तुम्हारी पत्नी, तुम्हारा बेटा, तुम्हारा घर, जब तुम यहां हो तो बीस बार तुम्हें यहां से ले जाने की कोशिश करेंगे। वह कोशिश करेंगे कि यह चले और वापस उसी नरक में जाकर पड़ जाये। जहां वह था इसलिये मैंने कहा कि तुम्हारे शत्रु कई बन सकते है जो अत्यन्त तुम्हारे निकट है वह तुम्हारे घोर शत्रु है। क्योंकि इस रास्ते पर बिल्कुल चलि नीति सफल नहीं हो सकती यह तो निरन्तर चलने की क्रिया अकेले ही चलना पड़ता है। और अकेले चलने में डगमगाने का डर है अगर तुम्हारे साथ अप्रत्यक्ष रूप से तुम्हारा गुरू बैठा है, वह मार्गदर्शक है वह बिलकुल तुम्हें देखता है और बराबर वह देखता है इसमें आंच झेलने की शक्ति है भी नहीं। आंच को आगे झेल नहीं पायेगा तो दीया बन भी नहीं पायेगा टूट जायेगा बिखर जायेगा अभी इस समय एक दम से इस कशमकश में तो आगे जाकर करेगा भी क्या?
इसलिये वह हर बार तुम्हें परखता है और हर बार परखने में तुम्हारे मन के गहराई को भी समझता है। जब तुम्हारे परिवार वाले आते है तो वे कहते है गुरूजी ले जाना है तो ले जाओ एक सेकण्ड में। तुम शायद विश्वास करने वाले हो जो ही वह कहता है ले जा तो कहते है ले जा। मैं नहीं कहता कि नहीं नहीं मत ले जाओ गुरूजी ने कहा है हरिद्वार में ले जाऊ क्यों ले जाओ मैं सिखा रहा हूं कुछ साधनायें सिखा रहा हूं यह बहुत बड़ा ज्योतिषी बनेगा तुम नहीं समझते और तुम्हें सौ दो सौ रूपये मैं दे देता हूं तुम चिन्ता मत करो गुरू तो ऐसा करता है और मगर तुम्हें साधना में सिखा देता हूं पर शायद तुममे बहुत अच्छे संस्कार है साधना के प्राणो की ऊर्जा कुछ तुममे पहुंची है और तुम डट कर खड़े हो। वह आते है फिर भी तुम हट कर खडे़ होते हो उनके सामने खड़े होते मैं नहीं जाता क्योंकि वहां पर तुम्हें सुविधायें ज्यादा है निश्चित रूप से मैं तुम्हें सुविधायें नहीं दे पा रहा हूं तुम्हें उत्तम पकवान भी नहीं खिला रहा हूं। तुम्हारे सोने के लिये पलंग नहीं बिछा सकता हूं तुम्हें मखमलदार गद्दा नहीं दे सकता हूं मगर उसके बावजूद भी मैं जो तुम्हें दे सकता हूं वह संसार में मेरे बावजूद दूसरा कोई नहीं दे सकता है।
और उस रास्ते पर मैं तुम्हें चलाने पर सक्षम हूं। इसलिये कि तुम्हारा प्रत्येक कार्य मेरे ऊपर ऋण है। और उस ऋण को मुझ में चुकाने की पूर्ण क्षमता है। और मैं तुमसे पूरा प्रयत्न करता हूं एक-एक क्षण का तुम्हारा कार्य मेरी डायरी में लिखा हुआ है। तुम्हारे प्रत्येक व्यक्ति का और एक एक क्षण का मूल्य इससे दुगना चुकाता हूं जिससे कि जिन्दगी में भूल चूक ब्याज का कोई हिसाब का कोई हिस्सा बाकी न रह जाये। क्योंकि मैं मुक्ति का मार्ग जानता हूं मैं इस मोक्ष का मार्ग जानता हूं, मैं सिद्धाश्रम जा चुका हूं देख चुका हूं जिस क्षण जब चाहूं जा सकता हूं, क्योंकि मुझे सिद्धाश्रम अच्छा लगता है।
यह तुम्हारी न्यूनता है कमियां है तुम्हें तो यह होना चाहिये कि गुरूदेव मुझे और आंच दीजिये इतनी तेज इतना वेदना, इतना दुख, दीजिये कि मैं कुन्दन बन सकूं। कि मैं सोना बन सकूं, ऐसा सोना कि मैं देवताओं का मुकुट बन सकूं। देवताओं के सिर पर खड़ा हो सकूं। और मैं चाहता हूं कि तुम उस जगह पहुंच सकों। चाहता हूं कि जो तुम्हारी पीढियां नहीं कर सकी वह तुम कर सको। मैं चाहता हूं कि तुम सूर्य की तरह दैदीप्यमान हो सकों। प्रकाश दे सको, चेतना दे सको, और मैं तुम्हें ऐसा ही आशीर्वाद दे रहा हूं। पूर्ण तरह से आशीर्वाद है कि तुम जीवन में सफलता और पूर्णता प्राप्त कर सको।
तुम्हारा अपना नारायण दत्त श्रीमाली जिसे तुम चाहो तो निखिलेश्वरानन्द कहो या सदगुरू कहो, हूं मैं तुम्हारा अपना ही
सदगुरूदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी
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