





भगवती जगदम्बा सकल विश्व की मातृ स्वरूपा आध्यात्मिक देवी हैं, जो अपने भक्तों और साधकों की उसी प्रकार से रक्षा करती है जिस प्रकार से एक मां अपने अबोध बालक की रक्षा और पालन करती है। वह छोटा बच्चा तो कुछ भी नहीं जानता, न उसे इस बात का ज्ञान होता है कि मां का ममत्व क्या होता है, न उसे इस बात की चिन्ता होती है कि मां कितने कष्ट और दुःख झेल कर उसका पालन पोषण कर रही है और न उसे इस बात की फिक्र होती है कि यदि कोई विपत्ति बाधा या परेशानी आ जायेगी तो मां को कितना तनाव, कितनी वेदना और कितना दुःख सहन करना पड़ेगा। इसीलिये तो बालक निश्चिंत होता है, इसीलिये तो मां की गोद में निर्भीक होकर वह विश्राम करता है, और मां सभी दृष्टियों से उस बालक की रक्षा करती है, उसका मार्ग दर्शन करती है, उसका पालन पोषण करती है, और उसके जीवन में आने वाली बाधाओं को, दूर करने में सदैव तत्पर रहती है।
भगवती जगदम्बा का भी ऐसा ही स्वरूप है। वह केवल देवी ही नहीं वह केवल मातृ स्वरूपा ही नहीं, अपितु उसके तो कई नाम, कई स्वरूप, कई चिन्तन कई विचार, कई धारणायें हैं। वह देवताओं का पुंज हैं क्योंकि भगवती जगदम्बा का तो जन्म हुआ ही नहीं। जब देवताओं पर विपत्ति आई जब राक्षसों ने देवताओं पर प्रहार किये जब देवताओं के लिये कोई भी आश्रय स्थल नहीं रहा, जब देवताओं ने अनुभव किया कि इन राक्षसों से छुटकारा पाना अत्यंत कठिन है तब समस्त देवताओं के शरीर से तेज पुंज निकला, ब्रह्मा के शरीर से भी, विष्णु और रूद्र के शरीर से भी इन्द्र और वरूण के शरीर से भी। जितने भी देवता थे उन सभी के शरीर से तेज पुंज निकल कर जो मूर्ति बनी, जो मूर्त रूप बना, जो अवतरण हुआ उसे जगदम्बा, कहा गया – जो सहस्र भुजाओं वाली, जिनके हाथों में शस्त्र, चेहरे पर अद्भुत तेज जो युद्ध में हुंकार करने वाली और जो शेर पर आरूढ़ शत्रुओं का दमन करने में तत्पर निरंतर अग्रसर होने वाली और देवताओं की सभी प्रकार से रक्षा करने वाली एक जीवन्त स्वरूप में देवताओं के सामने प्रकट हुई।
देवताओं ने देखा कि यह स्वरूप तो अपने आप में अद्भुत है, विलक्षण है, इसकी तेजस्विता तो अपने आप समस्त संसार में प्रकाशित हो रही है। इसकी हुंकार से सारा विश्व चलायमान होने लगा है, इसकी आवाज से दैत्यों के हृदय कांपने लगे हैं, जो प्रहार करने में वज्र की तरह समर्थ है। मगर साथ ही साथ मातृ स्वरूपा भी है जो अपने भक्तों की सदैव रक्षा करने में तत्पर रहती है। जो एक साथ ही महाकाली बनकर शत्रुओं का प्रचण्ड दमन करने में समर्थ है, महालक्ष्मी बनकर शिष्यों और साधकों को संपन्नता देने में समर्थ है, मां सरस्वती बनकर जो मनुष्यों को बुद्धि और चेतना देने में समर्थ है। ऐसी त्रिगुणात्मक स्वरूपा भगवती जगदम्बा का देवता लोग शत्-शत् वंदन करने लगे।
भगवती जगदम्बा कोई देवी ही नहीं अपितु, समस्त विश्व की अधिष्ठात्री है जो निद्रा रूप में भी विद्यमान है, क्षुधा रूप में भी विद्यमान है, पालन पोषण करने में भी विद्यमान है, बुद्धि के क्षेत्र में भी श्रेष्ठता और अद्वितीयता देने में समर्थ है जिसके सैकड़ों नाम हैं, सैकड़ों स्वरूप हैं, जिसके हाथ में अक्ष, परशु, गदा, कलश, धनु, दण्ड और विविध आयुध हैं जिनके द्वारा वह शत्रुओं पर प्रहार करती है, आने वाली परेशानियों और तनावों को दूर करने में समर्थ है, जो अपने आप में ही श्रेष्ठ और अद्वितीय हैं, ऐसी मूर्ति, ऐसे विग्रह को देखकर देवताओं ने हर्ष तो अनुभव किया ही उन्हें यह भी विश्वास हुआ कि आने वाले समय में मानव जाति के कल्याण के लिये भक्तों और साधकों की समस्याओं को दूर करने के लिये इससे श्रेष्ठ कोई विग्रह नहीं हो सकता।
क्योंकि यह एक मात्र ऐसा विग्रह है जो प्रहार करने में भी समर्थ है, जो उत्पत्ति करने में भी समर्थ है, जो पालन करने में भी समर्थ है। जो शत्रुओं का संहार करने में काल स्वरूप है, तो भक्तों की रक्षा और सहयोग करने में मातृ स्वरूप है। इसकी आराधना इसका चिंतन, इसकी धारणा, और इसका विचार अपने आप में जीवन का एक सौभाग्य है, जीवन की एक पूंजी है। मार्कण्डेय एक अद्भुत और अद्वितीय ऋषि हुये हैं। उन्होंने अपने मार्कण्डेय पुराण में जगदम्बा के संपूर्ण स्वरूप का चिन्तन किया, विचार किया। उनकी उत्पत्ति उनके कार्य और किस प्रकार से भगवति जगदम्बा को प्रसन्न किया जाये, साधा जाये, उनसे सहयोग लेने के लिये प्रयत्न किया जाये इसका विस्तृत विवेचना मार्कण्डेय ने अपने ग्रंथ में किया और उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवती जगदम्बा तो भगवान शिव मृत्युंजय का साक्षात विग्रह है, क्योंकि शिव अर्थात कल्याण वही हो सकता है जहां शक्ति है।
शिव और शक्ति का अदभुत समन्वय है। जो मनुष्य कायर है, बुजदिल है, जो हताश परेशान और चिन्तित है वह कल्याणमय नहीं बन सकता। वह न तो अपना कल्याण कर सकता है और न समाज, देश और विश्व का कल्याण कर सकता है। यह तभी हो सकता है जब उसमें शक्ति का संचरण हो, जब उसमें निर्भीकता आये जब उसमें प्रहार करने की क्षमता आये। और यह स्थितियां-बलवान होना क्षमता प्राप्त करना, निर्भीकता होना, प्रहार होना और कल्याणमय होना यह जीवन की पूर्णता है।
इसीलिये इसे शिव और शक्ति का सायुज्य रूप माना गया है। जो शिव भक्त हैं उन्हें तो शक्ति की साधना करनी ही चाहिये क्योंकि बिना शक्ति के शिव की आराधना हो ही नहीं सकती। और जो शक्ति के उपासक है, उनके लिये तो भगवान शिव आराध्य है ही जो मृत्यु पर विजय प्राप्त करने में जो आने वाली बाधाओं को दूर करने में, जो काल को दूर धकेलने में समर्थ हैं।
इसीलिये शिव और शक्ति का समन्वय उनकी साधना और आराधना जीवन की पूर्णता मानी गई। मार्कण्डेय पुराण में बताया गया कि जो साधक पूर्ण स्वरूप के साथ भगवति जगदम्बा को स्पष्ट कर लेता है, साध लेता है उसकी आराधना करता है उसे अपने हृदय में स्थापित करता है वह निश्चय ही शिव का प्रिय बन जाता है। ऐसा व्यक्ति त्रैलोक्य विजय प्राप्त करने में भी समर्थ होता है। उसके जीवन में किसी प्रकार का अभाव या परेशानी, चिन्ता या तकलीफ हो ही नहीं सकती। वह निर्भीक होकर विचरण करने में समर्थ होता है।
सैकड़ों देवताओं की साधना या आराधना करने की अपेक्षा मात्र जगदम्बा की साधना करने से भी समस्त देवताओं की साधना संपन्न हो जाती है क्योंकि भगवती जगदम्बा तो समस्त देवताओं के तेज स्वरूप का पुंज है। और इसीलिये शास्त्रों में जगदम्बा को श्रेष्ठतम आराध्या मानी गई, जीवन की पूर्णता माना गया, जीवन की श्रेष्ठता और अद्वितीयता माना गया। जो साधक जगदम्बा को छोड़कर अन्य देवताओं की साधनाओं में समय व्यतीत करता है वह वैसा ही है जैसे जड़ में पानी न देकर पत्तों और डालियों को सींचता है। जीवन की पूर्णता और पौधे का लहलहाना तो जड़ में पानी देने से ही संभव है। ठीक इसी प्रकार से जीवन को निर्भीक और निश्चिन्त बना देने की कला और क्रिया तो जगदम्बा साधना से ही संभव है। और जो इसकी साधना सीख लेता है, जो जगदम्बा की साधना सम््पन्न कर लेता है, जिसे जगदम्बा को प्रसन्न करने की कला ज्ञान है उसके जीवन में किसी प्रकार का अभाव कैसे रह सकता है।
फिर जगदम्बा की साधना का कहीं कोई निषेध है ही नहीं, चाहे वह शैव हो, चाहे वैष्णव हो, विष्णु की आराधना करने वाला हो, चाहे तांत्रिक हो, चाहे योगी हो, चाहे संन्यासी हो, चाहे, गृहस्थ हो, चाहे किसी भी धर्म को मानने वाला हो, चाहे किसी भी चिन्तन या विचार का प्रणेता हो, जगदम्बा की साधना तो सबके लिये सर्व सुलभ है। किसी भी युक्ति से, किसी भी स्थिति में जगदम्बा की साधना संपन्न की जा सकती है। सैकड़ों प्रकार हैं, जगदम्बा की साधना संपन्न करने के मंत्रों के माध्यम से, स्तुति-आराधना के माध्यम से, तंत्र के माध्यम से, योग के माध्यम से, रूद्रायमल के माध्यम से, श्मशान साधना के माध्यम से, वैष्णव साधना के माध्यम से दैविक क्रिया साधना के माध्यम से, अघोर पंथ से, नाथ पंथ से, और जितने भी पंथ, जितने भी संप्रदाय उन सभी संप्रदायों में भगवति जगदम्बा की साधना का चिन्तन है, विचार है।
बड़े आश्चर्य की बात है कि एक मात्र जगदम्बा की ही ऐसी साधना है जो प्रत्येक पंथ और प्रत्येक संप्रदाय में विद्यमान है। प्रत्येक प्रकार का व्यक्ति, साधक, संन्यासी, योगी इस प्रकार की साधना को संपन्न करने में गौरव अनुभव करता है। और फिर कलियुग में तो कलौ चण्डी विनायकौ कलियुग में तो केवल गणपति और जगदम्बा ही शीघ्र सिद्धि देने वाले देवता माने गये हैं। अन्य देवताओं की साधना जहां कठिन है, लंबी है, वहां जगदम्बा की साधना सरल है, सामान्य है स्पष्ट है, जो शीघ्र सिद्धि दायक है, जिसकी साधना करने से हाथों हाथ फल मिलता है। वह चाहे रक्षा करने की साधना हो, वह चाहे धन प्राप्त करने की साधना हो, वह चाहे व्यापार वृद्धि की साधना हो, वह चाहे परिवार की सुरक्षा और परिवार की उन्नति की साधना हो, वह चाहे स्वास्थ्य कामना की साधना हो और चाहे अन्य फल इच्छा की साधना हो। सभी प्रकार की इच्छाओं का परिपालन जगदम्बा की साधना में निहित है। और साधक जब साधना संपन्न करता है तो साधना संपन्न होते-होते ही उसको फल अनुभव होने लग जाता है उसका कार्य संपन्न हो जाता है। इसीलिये तो कलियुग में जगदम्बा की साधना को सर्वश्रेष्ठ, साधना कही गई है, इसीलिये तो कलियुग में समस्त साधकों को स्पष्ट किया गया कि जो जगदम्बा साधना नहीं कर सकता या नहीं करता वह अपने आप में ही नुकसान प्राप्त करता है क्योंकि इस साधना से जीवन की संपूर्णता का बोध स्वतः होने लगता है, क्योंकि इस साधना के माध्यम से साधक वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है जो उसका अभीष्ट लक्ष्य है। चाहे मुकदमें में विजय प्राप्त करनी हो या चाहे आर्थिक उन्नति की इच्छा हो।
यह अलग बात है कि इस साधना को समझना और सीखना आवश्यक है। पर इस साधना में जटिलता नहीं है। विशेष क्रिया कलाप नहीं है। किसी प्रकार की न्यूनता नहीं है। जगदम्बा की साधना तो अत्यंत सरल और सामान्य है जिसे कोई भी बालक या वृद्ध, साधक या साधिका, सधवा या विधवा, मजदूर या मालिक कर सकता है। चाहे शैव हो, चाहे वैष्णव हो चाहे किसी भी जाति का हो, वर्ण का हो, रंग का हो- जगदम्बा की साधना के द्वार तो सबके लिये खुले हैं। यह एक ऐसी साधना है जो कम से कम उपकरणों के द्वारा संपन्न की जा सकती है। इसमें कोई लंबा-चौड़ा मंत्र नहीं होता, लंबी चौड़ी क्रिया कलाप नहीं होती, किसी प्रकार का नुकसान नहीं हो सकता। मार्कण्डेय ने स्पष्ट कहा है कि यदि कोई साधक जगदम्बा की साधना संपन्न करता है और साधना बीच में ही छूट जाये, साधना अधूरी रह जाये, अनुष्ठान किसी कारण से पूरा न हो सके या अनुष्ठान में कोई त्रुटि रह जाये तब भी उसे कोई विपरीत प्रभाव देखने को नहीं मिलता, तब भी उस साधक का किसी प्रकार से अहित नहीं होता।
यह अलग बात है कि अगर साधना को बीच में ही छोड़ दिया जाता है तो उसका जितना फल मिलना चाहिये उसका उतना फल न मिले, उसका कुछ आंशिक फल ही मिले पर यह स्पष्ट है कि फल अवश्य मिलता है। साधक को किसी प्रकार का विपरीत फल नहीं प्राप्त होता, साधक का अहित नहीं होता। इसीलिये तो शास्त्रों में जगदम्बा की साधना को जीवन की श्रेष्ठतम साधना मानी गई है। इसीलिये तो मानव जाति के कल्याण के लिये इस साधना को प्राथमिकता दी गई। इसीलिये तो जीवन के सारे अभावों को दूर करने वाली यह साधना बताई गई। इसीलिये तो वेद, उपनिषद, पुराण आदि प्रत्येक ने जगदम्बा की साधना को महत्व दिया है, उन्होंने अनुभव किया, विचार किया कि इस साधना के द्वारा हम अपनी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, समाधान ही नहीं उन बाधाओं और संकटों का पीछा छुड़ा सकते हैं। और जीवन को ज्यादा सुगम, ज्यादा सरल, ज्यादा सुखमय बना सकते हैं।
जगदम्बा साधना अपने आपमें ही एक परिपक्व और पूर्ण साधना है वह चाहे नवार्ण मंत्र साधना हो वह चाहे स्तोत्र साधना हो वह चाहे स्तुति हो और वह चाहे चण्डी प्रयोग हो। श्मशान प्रयोग से भी चण्डी को सिद्ध किया जा सकता है और घर में बैठ कर भी भगवती की साधना संपन्न की जा सकती है। दिन को या रात्रि को, सुबह या शाम किसी भी समय जब साधक मनोयोग पूर्वक साधना करने की इच्छा प्रकट करे उस समय इस साधना को किया जा सकता है। यही तो इसकी विशेषता है। इसीलिये इसे जीवन का एक अद्भुत प्रयोग कहा गया है। मैंने अपने जीवन में स्वयं अनुभव किया है कि जो कार्य अन्य प्रकार से या अन्य देवताओं की साधना से संपन्न नहीं होता वह भगवति जगदम्बा की साधना से शीघ्र, सहज, और सामान्य तरीके से भी संपन्न हो जाता है। मैंने कई बार इस साधना के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान किया है, और उन स्थितियों को प्राप्त किया है जो अपने आप में अपराजेय हैं, अप्रतिम हैं, अद्वितीय हैं। जो श्रेष्ठता और उच्चता अन्य साधनाओं के माध्यम से प्राप्त नहीं हो सकती वह इस साधना के द्वारा सहज संभव है, शरीर को किसी भी परिस्थिति में अनुकूल बना लेना, कहीं पर किसी भी प्रकार से विचरण कर लेना, शत्रुओं के बीच भी स्थित प्रज्ञ बने रहना और शरीर के चक्रों को जाग्रत कर लेना, कुण्डलिनी और सहस्त्रार के रहस्यों को प्राप्त कर लेना, ब्रह्माण्ड में रह कर ब्रह्माण्ड के रहस्यों को ज्ञात कर लेना भी इस साधना के द्वारा संभव है तो भौतिक जीवन की कामनाओं की पूर्ति भी इस साधना के द्वारा सहज संभव है।
चाहे किसी भी प्रकार की इच्छा हो, चाहे किसी भी प्रकार का चिंतन हो, ऐसा हो ही नहीं सकता कि हम इस साधना को संपन्न करें, और उसका फल प्राप्त न हो। और इसके साथ-साथ संन्यास जीवन की उच्चता को भी प्राप्त करना और श्रेष्ठतम गुरू को प्राप्त कर लेना इस साधना के द्वारा ही संभव है। गुरू की प्रसन्नता और गुरू की निकटता प्राप्त कर लेना केवल जगदंबा साधना के द्वारा संभव है। समस्त विद्याओं ज्ञान और साधनाओं में निष्णात हो जाना, उच्चतम भाव भूमि पर स्थापित हो जाना, कंठ में सरस्वती को स्थापित कर हजारों-हजारों, श्लोकों और ग्रंथों को स्मरण कर लेना केवल मात्र जगदम्बा साधना के द्वारा सहज संभव है और साथ ही इस साधना के द्वारा वह सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है जो हमारा अभीष्ट है। मैं कुछ ऐसी ही साधनायें स्पष्ट कर रहा हूं जो प्रत्येक साधक या व्यक्ति के लिये आवश्यक, उपयोगी और अनिवार्य है।
भगवती जगदम्बा की साधना और पूजा अर्चना अपने आप में एक अनिवर्चनीय जीवन का सोपान है, जब जीवन का सौभाग्य उदय होता है तब साधक भगवति जगदंबा की साधना, पूजा विधिवत कर पाता है। यह आवश्यक नहीं है कि यह साधना नवरात्रि में ही हो, यह वर्ष में किसी भी दिन किसी भी समय कर सकते हैं, और साल के सारे 365 दिन भगवती जगदम्बा के ही दिन कहे जाते हैं वे चाहे नवरात्री के दिन हो और चाहे किसी भी प्रकार का अन्य पर्व, त्यौहार और उत्सव हो। जीवन में समस्त प्रकार के दुख ताप, कष्ट, पीड़ा, अभाव और शत्रुओं के नाश के लिये भगवति जगदम्बा का साधना से ज्यादा उत्तम और कोई साधना विधि नहीं है। यदि मंत्र जप न भी किया जाये और विधिवत पूजन अर्चन कर दिया जाये तब भी अपने आप में श्रेष्ठतम उपलब्धि प्राप्त होती। इसके लिये किसी विशेष मुहुर्त या विशेष समय की भी आवश्यकता नहीं होती। तथ्यों का यदि ध्यान साधक रखें तो ज्यादा अच्छा रहता है। प्रथम तो साधक स्नान करके पीले वस्त्र पहन कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठे। सामने भगवति जगदम्बा का चित्र स्थापित हो। कुछ साधना सामाग्री भी हो जिसमें जलपात्र, कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य और घी का दीपक हो। साधक पूर्ण शांतचित्त से साधना करे। प्रातः काल सूर्योदय से पहले का समय ज्यादा अचित रहता है और रात्रि को यदि साधना की जाये तो रात्रि को दस बजे के बाद समय ज्यादा उचित रहता है। साधक को चाहिये कि पूर्ण क्षमता और भावना के साथ इस साधना को संपन्न करें।
जगदम्बा साधना के कई स्वरूप हैं। मैं इनमें से कुछ स्वरूपों की साधना यहां स्पष्ट कर रहा हूं। एक तो नवार्ण मंत्र साधना है। नवार्ण मंत्र साधना का तात्पर्य अपने जीवन की समस्त आध्यात्मिक इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति करना है, ज्ञान प्राप्त करना, कंठ में वाग्देवी सरस्वती को स्थापित करना, सहस्त्रार जाग्रत कर कुण्डलिनी के माध्यम से ब्रह्माण्ड की चेतना को प्राप्त करना यह सभी नवार्ण मंत्र की साधना से सहज संभव हैं। या फिर ध्यान की गहराइयों में उतरना, सूक्ष्म शरीर और सारे सातों शरीरों को जाग्रत करना, सिद्धाश्रम में प्रवेश प्राप्त करना, यह सब भी नवार्ण मंत्र साधना द्वारा संभव हो सकता है। परंतु आवश्यक है कि साधक पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता से साधना संपन्न करें, मंत्र जप पूर्ण करें। इसके लिये नवार्ण यंत्र की आवश्यकता होती है जो अपने आपमें ही सिद्ध हो, चेतना युक्त हो, प्राण प्रतिष्ठित एवं दिव्य हो क्योंकि यंत्र का सीधा संबंध साधक के चित्त पर और उसकी क्रिया पर होता है जिसकी वजह से उसे साधनाओं में सिद्धि प्राप्त होती है। इस नवार्ण मंत्र के नौ अक्षर हैं इसीलिये यह नववर्ण या नवार्ण मंत्र कहा गया है।
हकीक माला से या स्फटिक माला से रात्रि को इस साधना को संपन्न करें और नौ लाख मंत्र जप इक्कीस दिन में संपन्न कर लें। इसके लिये समय अवधि और मंत्र जप संख्या निश्चित है। अनुष्ठान के रूप में साधना करने से ही तो सिद्धि प्राप्त होती है। इससे साधक स्वयं हिसाब लगा लें कि उसे रोज कितना मंत्र जप संपन्न कर सकता है। वह चाहे तो एक ही बैठक में मंत्र जप संपन्न कर सकता है और चाहे तो दिन में दो बार या तीन बार बैठ कर भी मंत्र जप संपन्न कर सकता है।
उच्च कोटि के योगी और संन्यासी जो ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानने के लिये प्रेरित होते हैं वे नवार्ण मंत्र की साधना से श्रेष्ठता प्राप्त करते है। वे चाहे अन्य साधनायें संपन्न करें या नहीं करें नवार्ण साधना तो संपन्न करते ही हैं। और यह बात भी निश्चित है कि जब तक नवार्ण सिद्धि प्राप्त नहीं हो जाती तब तक हृदय कमल विकसित नहीं हो सकता, तब तक मूलाधार जाग्रत नहीं हो सकता, तब तक चेतना पुंज स्पष्ट नहीं हो सकता, तब तक कुण्डलिनी जागरण नहीं हो सकता, तब तक ब्रह्माण्ड भेदन नहीं हो सकता, तब तक सातों शरीरों को जाग्रत नहीं किया जा सकता, तब तक सहस्त्रार भेदन नहीं हो सकता। यह सब कुछ तो नवार्ण साधना के द्वारा ही संभव है क्योंकि इसका प्रत्येक बीज अपने आप में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के प्रतीक हैं।
यह मंत्र अपने आपमें अहंकार को समाप्त करने वाला है, यह व्यक्ति को अच्छी प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर करने में सहायक है, और मानसिक तनावों को दूर करने में यह मंत्र सर्वोत्तम है, क्योंकि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने आप को अपने परिवेश को, जीवन को, जीवन के रहस्यों को समझ सकता है, आत्मसात कर सकता है। वह इस मंत्र के द्वारा अन्य सभी साधनाओं में सिद्धि प्राप्त कर सकता है और वह सब कुछ अनुभव कर सकता है जो जीवन के लिये आवश्यक है। मात्र जिंदा रहना या मात्र सांस लेते रहना ही जीवन नहीं है, या खाना पीना, बच्चे पैदा करना ही जीवन नहीं है अपितु जीवन के बारे में चिंतन करना मनन करना और समझना भी जरूरी है। इसीलिये शास्त्रों में कहा गया है कि जो जीवन में पूर्णता चाहते हैं उन्हें चाहिये कि वे नवार्ण साधना को संपन्न करें।
यह साधना किसी भी महीने की किसी भी तिथि को संपन्न की जा सकती है केवल इसमें नवार्ण यंत्र की आवश्यकता होती है इसके अलावा किसी भी प्रकार के दीप या अगरबत्ती की अनिवार्यता नहीं होती। आप चाहे तो लगा सकते हैं किन्तु ऐसा अनिवार्य नहीं है। इसमें यह भी नहीं देखा जाता कि साधक किस दिशा की ओर मुख करके बैठा है या किस प्रकार का आसन प्रयोग कर रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि साधक पूर्णता के साथ, श्रद्धा के साथ और पूर्ण एकाग्रता के साथ नवार्ण मंत्र की निश्चित संख्या का जप संपन्न कर ले। और यह नवार्ण मंत्र है – ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। इसमें बिन्दुओं का उच्चारण म का नहीं ग का है, एम नहीं, एंग है। यह अपने आपमें छोटा सा मंत्र होते हुये भी अत्यंत तीव्र प्रभाव उत्पादक है, तुरंत असर पैदा करने वाला है और सारे शरीर को चेतना युक्त बनाने में और मन को शुद्ध करने में सक्षम एवं समर्थ है। क्योंकि इस मंत्र के द्वारा जीवन को चेतना युक्त बनाया जा सकता है।
इस मंत्र के द्वारा जीवन मे पूर्णता, श्रेष्ठता और उच्चता की ओर अग्रसर हो सकता है। क्योंकि इस मंत्र के द्वारा जहां महालक्ष्मी को प्रसन्न कर अपार धन वैभव प्राप्त किया जा सकता है वहीं महाकाली को आशीर्वाद प्राप्त कर शत्रुओं, चिंताओं, कष्टों एवं समस्याओं से मुक्त किया जा सकता है। क्योंकि इस मंत्र के द्वारा ही महासरस्वती को भी सिद्ध कर ज्ञान एवं बुद्धि को प्राप्त किया जा सकता है। और साथ ही साथ भगवति जगदम्बा को प्रसन्न कर उनके साक्षात दर्शन करने के लिये यह मंत्र अद्वितीय एवं सर्वोत्तम है। यह जरूरी है कि इस साधना को संपन्न करने से पूर्व यदि साधक या साधिका किसी योग्य गुरू से नवार्ण दीक्षा प्राप्त कर लेता है तो उत्तम रहता है। या दूसरे शब्दों में कहा जाये तो उसे नवार्ण दीक्षा प्राप्त करनी ही चाहिये क्योंकि इससे नवार्ण मंत्र अपने आप में ही साधक के शरीर, मन और आत्मा में स्थापित हो जाता है। और सारा रोम-रोम, शरीर का एक एक कण नवार्ण मंत्र उच्चरित करने लग जाता है।
यह दीक्षा अपने आपमें जटिल है और किसी सामान्य गुरू के बस की बात नहीं है कि वह इस प्रकार की दीक्षा प्रदान कर सके। यह तो एक तेजस्वी दीक्षा है। एक दिव्य दीक्षा है, एक सर्वश्रेष्ठ दीक्षा है और जो स्वयं समर्थ गुरू हैं, जिन्होंने जगदम्बा, साधना को पूर्णता के साथ संपन्न कर रखा है, जिन्होंने भगवती जगदम्बा को प्रत्यक्ष प्रकट किया है, जिन्होंने जगदम्बा के पूर्ण बिंब को अपने हृदय में जाग्रत कर स्थापित किया वही इस साधना का प्रामाणिक ज्ञान प्रदान कर सकता है। यदि साधक को या शिष्य को या किसी भी व्यक्ति को ऐसे समर्थ और क्षमतावान गुरू प्राप्त हो जायें और चाहे उसने अन्य किसी भी प्रकार की दीक्षा प्राप्त की हो, उसे चाहिये कि उस गुरू से प्रार्थना कर इस प्रकार की दीक्षा को प्राप्त करें। अपने शरीर में नवार्ण मंत्र को स्थापित करें, अपने भीतर भगवती जगदम्बा की चेतना को आत्मसात करें और फिर उनकी बताई हुई विधि के अनुसार नवार्ण मंत्र का जप कर अनुष्ठान संपन्न करें। ऐसा करने पर नवार्ण सिद्धि प्राप्त होती ही है। यदि साधक चाहे, या उसकी इच्छा हो तो यह अनुष्ठान संपन्न होते होते भगवति जगदम्बा के साक्षात स्वरूप दर्शन हो जाते हैं। यही तो इस मंत्र की विशेषता है, उच्चता है, दिव्यता है और यह जीवन में चाहिये ही क्योंकि हम साधना संपन्न करें, और मां भगवती जगदम्बा हमारे सामने साक्षात जाज्वल्यमान स्वरूप में उपस्थित हो, हम, गदगद कंठ से उनकी स्तुति करें, उनके चरणों में बैठें, उनका वरद हस्त अपने सिर पर अनुभव करें, उनके दर्शन करें, उनका आशीवाद प्राप्त करें और अपने जीवन को धन्य कर के उस जीवन को पूर्णता दे सकें।
यह सब कुछ इस मंत्र जप और इस अनुष्ठान के द्वारा संभव है। जगदम्बा की साधना के एक दूसरे प्रकार का अनुष्ठान भी है जो समस्त भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करने में सहायक है। हमारे जीवन में कई प्रकार की इच्छायें, चाहे या न चाहें होती ही है- धन की इच्छा व्यापार वृद्धि की इच्छा, नौकरी में प्रमोशन की इच्छा, शरीर को स्वस्थ बनाये रखने की इच्छा, धन की रक्षा करने की इच्छा, राज्य की तरफ से किसी प्रकार की अड़चन या बाधा न आये इस प्रकार की इच्छा सुखी परिवार या कुटुंब की इच्छा, पुत्र प्राप्ति की इच्छा, परीक्षा में सफलता प्राप्त करने की इच्छा, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की या मुकदमे में सफलता प्राप्त करने की इच्छा, एक मकान बनाने की इच्छा, शीघ्र एवं अनुकूल विवाह संपन्न होने की इच्छा परिवार में प्रसन्नता और शांति की इच्छा परिवार में प्रसन्नता और शांति की इच्छा ऐसी कई इच्छायें हो सकती हैं। और इन इच्छाओं की पूर्ति के लिये कोई अलग-अलग विधान नहीं है, अलग-अलग मंत्र नहीं है, एक विशिष्ट मंत्र के माध्यम से इन समस्त इच्छाओं की पूर्ति सहज संभव है। यह विधि अपने आप में गोपनीय और दुर्लभ रही है। उच्चकोटि के एक सिद्धाश्रम के योगी से यह साधना प्राप्त हुई थी जिन्हें जगदम्बा का अभीष्ट ज्ञान और सिद्धि प्राप्त थी, जो सही अर्थों में जगदम्बा में लीन हो चुके थे, जिनके सामने जगदम्बा प्रत्यक्ष प्रकट होती ही थी, और स्वयं भगवती जगदम्बा ने इस मंत्र विग्रह और इस अनुष्ठान को स्पष्ट किया था।
इसीलिये जो मैं प्रयोग बताने जा रहा हूं वह अपने आप में दुर्लभ और अप्रतिम है जिसके माध्यम से हम अपने जीवन की सारी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, जिसके माध्यम से हम सभी कष्टों का निवारण कर सकते है जिसके माध्यम से हम अपने जीवन की सभी इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं। जिसके माध्यम से हमारे जीवन में जो न्यूनता है, जो कमी है, जिसकी वजह से हम परेशान है, जो अभाव, बाधा और पीडा है उन सबको इस साधना के द्वारा दूर किया जा सकता है। एक प्रकार से देखा जाये तो यह मंत्र दो तरीके से सहयोग देता है। रचनात्मक जो हमारी इच्छाओं की पूर्ति करता है, निषेधात्मक जो हमारे अभावों को दूर करता है। किसी भी प्रकार की इच्छा की पूर्ति होना इस साधना की विशेषता है और प्रत्येक साधक या शिष्य या व्यक्ति को इस प्रकार की साधना जीवन में संपन्न करनी ही चाहिये।
यदि व्यक्ति नवरात्रि के दिनों में भगवती जगदम्बा की साधना करता है तो यह श्रेष्ठतम होता है। नवरात्रि के सारे दिन पूर्ण पर्व कहे जाते हैं। ये सारे दिन अपने आप में तेजस्विता युक्त होते हैं, और साधक जो इन दिनों में साधना करना चाहता है, वह इन्हें दिवसों पर गुरू से चामुण्डा दीक्षा प्राप्त कर सभी साधनाओं में पूर्णता प्राप्त कर सकता है। चामुण्डा दीक्षा का तात्पर्य है कि अपने आप में पूर्ण पवित्र और दिव्य बनकर अपने आप को दक्ष बनाते हुये योग्य बनाते हुये उस तेजस्विता युक्त भगवती जगदम्बा की साधना को संपन्न करने के लिये अपने आपको प्रेरित करता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि साधक नवरात्रि के एक दिन पूर्व यथा संभव मौन रहकर अपनी शक्ति का संचय करे और उसके बाद सद्गुरू से चामुण्डा दीक्षा प्राप्त करें और यदि सद्गुरू कहीं और हों, शरीर उपस्थित नहीं हों तो फोटो भेजकर उसके माध्यम से दीक्षा प्राप्त करें। वास्तव में यह सौभाग्य होता है कि व्यक्ति भगवती जगदंबा के सानिध्य में उनके चारणों में पूर्ण तेजस्विता युक्त, ऋषि तुल्य जीवन जीते हुये निरंतर गुरु मंत्र और नवार्ण मंत्र का जप करते हुये अपने शरीर के सभी चक्रों की जागरण क्रिया की और अग्रसर होते हुये जगदम्बा साधना संपन्न करता है। यह साधना संपन्न करना अत्यंत आह्लाद और प्रसन्नता का सोपान है।
जीवन में प्रत्येक प्रकार के रागरंग – भोग, यश, मान, पद, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य इनकी इच्छा रहनी ही चाहिये और इन सबकी प्राप्ति केवल और केवल शक्ति साधना या भगवति जगदम्बा के द्वारा ही संभव है। मार्कण्डेय ने एक अद्वितीय ग्रंथ, मार्कण्डेय पुराण की रचना की जो शिव के ऊपर पूर्ण ग्रंथ है तो उसके शक्ति के ऊपर भी पूर्ण ग्रंथ है। और उनके द्वारा लिखा गया शक्ति का ग्रंथ ही कई वर्षों से मान्य है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में भगवती जगदम्बा को साक्षात किया, और उनके कई रूपों को साक्षात प्रत्यक्ष करके दिखाया और उन्होंने कहा-
भगवती जगदम्बा के कई स्वरूप हैं नवदुर्गा भी उनके ही रूप हैं और भगवती जगदम्बा का ध्यान लिखते समय ऋषि ने कहा कि-
उन्होंने भगवती जगदम्बा से प्रार्थना करते हुये कहा है कि मेरे जीवन की सभी कामनायें पूर्ण हों और जीवन में कामनाओं का पूर्ण होना आवश्यक है, क्योंकि यदि व्यक्ति पैदा हो और अपूर्ण जीवन में रह जाये तो ऐसा व्यक्ति मनुष्य नहीं कहलाता। व्यक्ति अपूर्ण पैदा जरूर होता है। मगर अपूर्णता के साथ यदि अपनी इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति न करें, यदि जो जीवन का उल्लास और उमंग है वह प्राप्त नहीं करें, उच्च कोटि का धन, उच्च कोटि की शिक्षा या उच्च कोटि का सौंदर्य प्राप्त नहीं करें तो ऋषि कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति मनुष्य नहीं है। उसने अपने जीवन को संवारा नहीं, सजाया नहीं, व्यर्थ ही गंवा दिया। और सभी इच्छाओं की पूर्ति केवल मात्र जगदम्बा साधना से ही संभव है।
और जीवन में आध्यात्मिकता प्राप्त करनी हो, सिद्धाश्रम पहुंचना हो तो यह भी केवल जगदम्बा साधना द्वारा ही संभव है। जीवन की अंतिम परिणती केवल सिद्धाश्रम जाने में है। न कोई स्वर्ग है न नर्क है। स्वर्ग और नर्क दोनों कल्पना की चीजें हैं। वास्तविक जीवन का इनसे कोई संबंध नहीं हमें बहलाने के लिये कि हम गलत रास्ते पर न चले इसलिये नर्क की व्याख्या की गई है) नर्क जैसी कोई चीज नहीं है। जीवन का सार सिद्धाश्रम प्राप्ति है और यह इच्छा भी भगवति साधना द्वारा शीघ्र, सहज संभव है। परंतु आवश्यक है कि व्यक्ति पूर्ण विश्वास के साथ, श्रद्धा के साथ अनुष्ठान करें। इसलिये जगदम्बा साधना द्वारा न केवल भौतिक उन्नति अपितु आध्यात्मिक उन्नति भी संभव है। जीवन में भौतिकता भी उतनी ही आवश्यक और महत्वपूर्ण है जितनी आध्यात्मिकता। आप चाहे कितने भी विद्वान बन जायें, कितने भी योग्य बन जायें, चाहे कितने भी सौंदर्यवान बन जायें मगर जब तक धन की पूर्ण प्राप्ति हमारे जीवन में नहीं हैं तब तक जीवन आगे अग्रसर नहीं हो सकता। गुरूदेव के पास जाने के लिये रेल के टिकट के लिये धन आवश्यक है ही। बहुत कोई स्त्री सुंदर है, अच्छे वस्त्र पहनना चाहती है, तो नहीं पहन सकती बिना धन के। आप तीर्थ यात्र करना चाहें तो नहीं कर सकते बिना धन के।
अर्थ जीवन में महत्वपूर्ण है ही और पूर्ण संपन्नता के लिये भी कोई श्रेष्ठतम साधना है तो वह भगवती जगदम्बा की ही साधना है। जीवन में धर्म अर्थ काम मोक्ष चारो आवश्यक है, परंतु ऋषि भी कहते हैं कि मोक्ष या आध्यात्मिकता से पहले अर्थ की आवश्यकता है क्योंकि अर्थ से 80 प्रतिशत काम तो आपके पूर्ण हो जायेंगे। आज का युग ऐसा ही है जहां धन के आधार पर पूरा समाज टिका हुआ है। यह बात हमारे ऋषि जानते थे इसलिये उन्होंने मोक्ष से पहले अर्थ को महत्ता दी और परिश्रम से धन प्राप्त नहीं हो सकता, उतना धन प्राप्त नहीं हो सकता जितना हम चाहें, आपको पांच हजार की नौकरी है तो आप पांच हजार ही कमा सकते हैं, थोड़ा और काम किया तो सात हजार रूपये हो जायेंगे, मगर उससे धन का प्रवाह नहीं बन सकता कि जितना खर्च करें, कम नहीं हो, बढ़ता ही रहे। जितना चाहे उतना धन प्राप्त हो, धन का प्रवाह हो। ऐसा जीवन में तभी संभव हो सकता है जब हम पूर्णता के साथ अपने जीवन में जगदम्बा साधना को संपन्न करते है।
और हमारे ऋषियों ने कहा है कि श्रेष्ठ और बुद्धिमान व्यक्ति इस जीवन का पूर्ण आनन्द लेते हैं और इसके बाद सिद्धाश्रम में प्रवेश करके उस अद्वितीय वातावरण का आनन्द लेते हैं जो आत्मिक है। और इन सभी इच्छाओं, उच्चतम कामनाओं को पूर्ण करने का यदि कोई उपाय है तो वह है जगदम्बा साधना। और जीवन में सभी रंग हों, स्वास्थ्य भी हों, अच्छा वातावरण हो, शिक्षा हो, पढ़ाई, सुंदर भवन हो, प्रेम हो, सौंदर्य हो, और वह सब कुछ हो जो हम जीवन में चाहे। और यही नहीं हम इस जीवन को ही नहीं सुधारें, अपने आगे के जीवन को भी सुधारें कोई ऐसी क्रिया हो कि जो हम चाहें वह हो जाये यह बहुत बडी घटना है। यह विस्फोटकीय घटना है, उपलब्धि है कि हम जो चाहें वह हो जाये।
और इस उपलब्धि का अगर कोई आधार है तो वह है भगवती जगदम्बा साधना और इच्छायें धन की भी हो सकती है सिद्धाश्रम प्राप्ति की भी हो सकती हैं। हम सिद्धाश्रम जाने की क्षमता प्राप्त कर सकें। और हजारों ग्रंथ में सिद्धाश्रम के बारे में इतना अधिक वर्णन है कि वहां सभी देवता आने के लिये तरसते हैं, वहां अप्सरायें नृत्य करती हैं, वहां सिद्धयोगा झील है, वहां दो हजार साल आयु के योगी हैं, संन्यासी हैं भगवान श्री कृष्ण है, और इतना अद्वितीय है वह सिद्धाश्रम जहां न बुढापा आ सकती है, न रोग हो सकता, न ही मृत्यु हो सकती है, वह कल्पवृक्ष और कामधेनु है। तो ऐसा अद्वितीय दृश्य भी हम अपने जीवन में देख सकें, ऐसा भी केवल संभव है भगवति जगदंबा की साधना के द्वारा। यही जीवन की श्रेष्ठता है यही जीवन की पूर्णता है। इस जीवन को भी भोगे, इस शरीर का भी आनन्द लें, और फिर उस जीवन में चले जायें जो अपने आप अद्वितीय है। भौतिकता और सिद्धाश्रम का रास्ता एक ही है जिसे जगदम्बा साधना कहा गया है। सभी रंग जीवन के हम भोगें। आकस्मिक धन प्राप्ति के कोई तरीका हो और आकस्मिक धन प्राप्ति पाप नहीं है, चोरी करना पाप है, किसी को धोखा देना पाप है लेकिन यदि हम भगवति जगदंबा से या किसी महाविद्या से कोई चीज प्राप्त करते हैं तो वह पाप नहीं है। हम किसी से छीन नहीं रहे हैं।
जीवन में सिद्धाश्रम प्राप्ति, या आकस्मिक धन प्राप्ति, या पूर्ण रूप से गुरुत्व को हृदय में स्थापित करना ये उपलब्धि और ये कार्य केवल नवरात्रि में ही संभव है। इसलिये संभव हो सकते हैं क्योंकि नवरात्रि का वातावरण नवरात्रि के दिन दिव्यता लिये हुये हैं, अद्वितीय हैं। आप किसी भी दिन दीवाली नहीं मना सकते कि घर के आगे दिये लगा दें तो लोग आकर कहेंगे पागल है, यह क्या हो रहा है। आज दिवाली का मुहूर्त ही नहीं तो आप नहीं मना सकते आज दिवाली आज आप होली भी नहीं मना सकते, क्योंकि होली का दिन एक निश्चित है, एक वातावरण है एक उमंग है। दिवाली का अलग दिन है, रक्षा बंधन का अलग दिन है। ठीक इसी प्रकार से नवरात्री के भी अपने आप में अलग दिन है। और प्रत्येक दिन का अपना एक अलग महत्व है। यदि आपके पास जगदम्बा साधना का ज्ञान है और आप उसको संपन्न नहीं करते, नवरात्रि के दिनों में इस साधना को नहीं कर पाते तो वास्तव में ही आपसे अधिक दुर्भाग्यशाली कोई नहीं है और यदि आप जगदम्बा की साधना को पूर्णता के साथ नवरात्रि में संपन्न कर लेते हैं तो फिर आपसे अधिक सौभाग्यशाली कोई नहीं है, क्योंकि इस साधना के द्वारा हम सभी इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं, हम जीवन में उच्चता और श्रेष्ठता प्राप्त कर सकते हैं। और आप अपने जीवन में ऐसा कर पायें, आप जगदंबा साधना को संपन्न कर अपने जीवन को ऊर्ध्वमुखी बना पायें ऐसा ही मैं आपको आशीर्वाद देता हूं, कल्याण कामना करता हूं।
सद्गुरूदेव निखिलेश्वरानन्द जी महाराज
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