





तंत्र भी जीवन की एक मस्ती ही है, जिसके सुरूर से आंखों में गुलाबी डोरे उतर जाते हैं, तंत्र का साधक ही अपने भीतर उफनती शक्ति की मादकता का सही मेल होली के मुहूर्त से बैठा सकता है क्योंकि तंत्र का जानने वाला ही सही अर्थो में जीवन जीने की कला जानता है। वह उन रहस्यों को जानता है जिनसे जीवन की बागडोर उसके ही हाथ में रहती है और उसका जीवन संयोगों पर आधारित न होकर उसके ही वश में होता है, उसके द्वारा ही गतिशील होता है। और उन साधनाओं और दीक्षाओं को प्राप्त कर सकता है, जो न केवल उसके जीवन को संवार दे बल्कि इससे भी आगे बढकर उसे ऊंचे और ऊंचे उठाने में सहायक हो।
यह सम्पूर्ण सृष्टि जिसका प्रत्येक कण दूसरे कण से जुड़ा है और ईथर के माध्यम से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में तादात्म्य हुआ है, यदि पूरे विश्व में कहीं पर भी कोई हलचल होती है तो सचेत साधक को वह स्पर्श अवश्य करती है। यह स्थिति साधना के माध्यम से कोई भी प्राप्त कर सकता है। अंतर केवल इतना होता है कि जहां सफल या सिद्ध साधक प्रत्येक क्षण का महत्व जानता है और तर्क-कुतर्क छोड़कर अपने गुरु के बताए ढंग से साधना में गतिशील रहता है, वहीं आम व्यक्ति अपना अधिकांश समय और ऊर्जा आलोचना व संदेह में गवां देते है। वास्तविक साधक जानता है कि उसे किस क्षण कौन सी साधना करनी चाहिए और वह प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों के प्रति चौकन्नी दृष्टि रखते हुये सामान्य साधनाओं की अपेक्षा तंत्र की साधनाओं को प्रमुखता देता है।
होली को मस्ती, उमंग, जोश के पर्व के रूप में एक सामाजिक आवरण पहना दिया है, जिस अवसर पर व्यक्ति सब कुछ भूलकर एक जोश में खो जाय, चिन्ताओं से मुक्त हो एक स्वतंत्र रूप में अपने हृदय के भीतर मुक्ति अनुभव कर सके, लेकिन इसके पीछे तांत्रेक्त रूप में बहुत बड़ी महिमा-छिपी है। होली पर्व को उतनी ही मान्यता प्राप्त है जितनी दीपावली पर्व को है, और वास्तव में दीपावली का नववर्ष के रूप में लक्ष्मी पूजा साधना के रूप में महत्व है, उतना ही तांत्रोक्त दृष्टि से होली का महत्व है। होली पर्व का वास्तविक रूप से प्रारम्भ होलाष्टक से हो जाता है।
वर्तमान समय में यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य होता है कि होलिका दहन को और होली पर्व को उतना महत्व नहीं दिया जाता, जितना कि दूसरे दिन रंग से होली को अश्लील वचन बोलने और थोड़े पढ़े लिखे लोगों द्वारा शराब पार्टियों का आयोजन करना, क्या यही होली का तात्पर्य है कि नंगे होकर नाचें, भद्दे अश्लील मजाक करें, यह तो होली का बड़ा ही विकृत स्वरूप है, जो कि वास्तविक रूप का बिल्कुल उल्टा और सत्य से परे है।
ऐसी मान्यता है कि होलिकाष्टक से होली तक का समय एक विशेष तांत्रिक समय है उस समय किसी बड़ी नवीन वस्तु का क्रय करना, नया वाहन लेना, नये मकान की पूजा, गृह प्रवेश, विवाह आदि वर्जित है। होलिका दहन से पहले स्त्रियां पूरी श्रद्धा से पूजा करती है और पूजन सामग्री का कुछ अंश होलिका को अर्पण करती है। उसी समय नवजात शिशुओं, जो कि पिछली होली के बाद से अब तक जन्म लेते हैं, उन्हें तिलक किया जाता है और होलिका दहन के बाद उसके चारों ओर सात परिक्रमा दी जाती है, क्योंकि इससे नवजात शिशुओं के रोग समाप्त हो जाते है, और विशेष काल के प्रभाव से बालक भूत-प्रेत बाधा से मुक्त होता है, उस पर किसी की नजर नहीं लग सकती, यह सिद्ध तथ्य है।
होलिका अग्नि पर्व है क्योंकि हम उस अग्नि की पूजा करते है, जिससे साधना के बल पर होलिका देवी भक्त प्रह्लाद को अपने गोद में लेकर बैठी, लेकिन अग्नि ने उन्हें अपने प्रभाव से मुक्त रखा, यह साधना, तपस्या और प्रभु कृपा का फल है। जो अग्नि पूजक तांत्रिक होते है उनके कई उदाहरण मैंने देखे है, कि वे जलते हुए अंगारों पर इस प्रकार चलते है मानों सामान्य जमीन पर चल रहे हो। होलिका दहन के समय जो चारों ओर खड़े रहकर उसकी पूजा करते है, उन्हें उस विशिष्ट अग्नि के ताप से शक्ति प्राप्त होती है, जिससे उनके जीवन के दोष शांत होते है, आवश्यकता है मन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास की।
इस अवसर पर आप भी कुछ कीजिये, साधना के द्वार हर उस व्यक्ति के लिए खुले है जो कि जीवन में आस्था रखता है, अपने ऋषि मुनियों द्वारा लिखे गये मंत्रों को मानता है और जीवन में कुछ करना चाहता है, केवल भौतिकवादी जीवन से फल प्राप्ति नहीं हो सकती, क्षणिक सुख तो मिल सकता है, लेकिन भीतर ही भीतर सब कुछ खाली रहता है।
होलिका दहन और चन्द्र ग्रहण! जो आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण सिद्धि प्रदायक है ऐसे ही विशेष क्षणों में सफलता और सिद्धि प्राप्त होती ही है जो नक्षत्रें के ऐसे सुयोग जिसमें होली और चन्द्र ग्रहण एक ही समय में घटित होने से श्रेष्ठ साधक अनुमान लगा सकता है कि ऐसे श्रेष्ठतम मुहूर्त में सिद्धियां साधक के सम्मुख हाथ बांधे खड़ी रहती है। और सिद्धि प्राप्त कर साधक जीवन में निरन्तर-निरन्तर हर दृष्टि से उन्नति प्रगति कर सकेगा।
यह होली का पर्व हर दृष्टि से साधक के जीवन में से दुःख कष्ट, शत्रु बाधा, भूत-प्रेत, तंत्र बाधा निवारण के लिए और पूर्णता प्राप्त करने का सिद्ध मुहूर्त है। ऐसे श्रेष्ठ मुहूर्त में साधना या दीक्षा प्राप्त की जाये तो सिद्धि प्राप्त होती ही है। इसमें कोई संदेह नहीं। आप सभी को कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर में हृदय भाव से निमंत्रण है और ऐसे श्रेष्ठ क्षणों का लाभ पूज्य सद्गुरुदेव के सानिध्य में प्राप्त करे।
कामाख्या कामरूप क्रियात्मक चेतना साधक की सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करती है और जीवन में आनन्द, सुख, सौभाग्य तथा साधनाओं में सिद्धि प्राप्त होती है इसी हेतु चन्द्र ग्रहण और होलिका के सुश्रेष्ठतम अवसर पर 22-23 मार्च 2016 को कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर में चन्द्र ग्रहण युक्त कामाख्या कामरूप होलिका महोत्सव साधना शिविर सम्पन्न होगा। जिसमें कामाख्या कामरूप चैतन्य दीक्षा, राज राजेश्वरी वैभव कमला महाविद्या दीक्षा, नृसिंह भैरव शक्ति दीक्षा, चन्द्रेश्वर सम्मोहन वशीकरण होलिका यक्षिणी लॉकेट, अक्षुण्ण धन लक्ष्मी साधना, हवन, अंकन की श्रेष्ठतम क्रियायें सम्पन्न होंगी। जिसके माधयम से साधक की कामनाओं एवं इच्छाओं को पूर्ण होकर जीवन में सौन्दर्य, सम्मोहन, वशीकरण, निर्भयता, शत्रु शमन और अक्षुण्ण धन वैभव के साथ चैतन्य शक्ति को पूर्णताः से आत्मसात कर सकेंगे।
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