





यह एक ध्रुव सत्य है कि व्यक्ति अपने जीवन में अधंकार से बहुत अधिक डरता है, और अंधकार में वह अकेला होता है और उसे मानसिक भय सताने लगता है, राक्षस, भूत-पिशाच भी अधंकार में ही विचरण करते हैं, प्रकाश में देवता विचरण करते हैं। हम प्रतिदिन देव पूजा प्रातः काल सूर्योदय के समय सम्पन्न करते है, उसके पीछे यही भावना होती है, कि जिस प्रकार सूर्य उदय होकर जगत् का अंधकार मिटा रहे हैं, उसी प्रकार दैवीय शक्ति हमारे जीवन में आकर अंधकार को पूर्ण रूप से दूर करें।
जिस प्रकार दीपावली का तात्पर्य घोर अधंकार में प्रकाश फैलाना है, और उसे स्थायी रूप से जीवन में उतारना है, इसीलिये हम नित्य प्रतिदिन गुरू पूजन भी अपने जीवन में करते हैं, क्योंकि गुरू शब्द का तात्पर्य ही अंधकार को समाप्त करने वाला है, इसीलिये शास्त्रों में गुरू वंदना में कोई धन, अर्थ, इच्छापूर्ति, काम इत्यादि की मांग नही की गई है, केवल यही प्रार्थना की गई है कि-
अर्थात् जो अपनी ज्ञान श्लाका से हमारे नेत्र खोल दे, और उनमें ज्योति भर दे, जिससे हमारे जीवन का अंधकार पूर्ण रूप से दूर हो, उन गुरू को प्रणाम करता हूं।
गुरू एक प्रकाश स्तम्भ है, जो शिष्य के जीवन में पूर्ण कुण्डलिनी जागरण के माध्यम से उसकी अज्ञान की कालिमा को मिटाता है। क्योंकि संसार में सारे दुःखों का मूल कारण अज्ञान ही है। जिस कार्य का हमें ज्ञान नहीं होता है, और जिस कार्य में हमारी बुद्धि से हम विजय प्राप्त् नही कर सकते हैं, वह जीवन की बाधा लगती है और जब उस कार्य को करने का तथा उस समस्या के निवारण का उपाय आ जाता है, तो वह बाधा बहुत छोटी लगती है, और उसके कारण से मन-मस्तिष्क दुःखी नहीं होता और दुःख का मूल कारण भी अज्ञान ही है, इस प्रकार दीपावली पर्व मूल रूप से गुरू पर्व है, हम यह प्रार्थना करते हैं कि हमारे जीवन में अंधकार सदैव के लिये समाप्त हो जाये, और हम ज्ञान से पूर्ण रूप से युक्त हो सकें।
और यदि जीवन के किसी मोड़ पर ऐसे सर्व समर्थ चैतन्य सद्गुरू का सानिध्य मिले तो तो बिना ना-नुच किये, बिना विकल्प एवं कुतर्क के उनके चरणों को पकड़ लेना ही चाहिये। यह सौभाग्य कभी-कभी और किसी विशेष जीवन में ही प्राप्त होता है, यह अद्वितीय क्षण होता है, क्योंकि मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा का एकमात्र साक्षीभूत तत्व सद्गुरू ही होता है। आनन्द ही शाश्वत है, जिसकी मानव को सदैव से प्यास है, वह आनन्द तब तक नहीं मिल पाता, जब तक अन्दर उतरने की क्रिया नहीं होती, इसीलिये मनुष्य के अन्दर अभी तक पर्त दर पर्त दर्द ही दर्द रिस रहा है।
विज्ञान तो देह तत्व से ऊपर उठ नही सका है। विज्ञान से मानव के अहं की तुष्टि होती है। जहां बुद्धि है, जहां तर्क है, वहां तृप्ति और श्रद्धा नहीं होती है, और जहां श्रद्धा नहीं है, वहां आनन्द की प्राप्ति कैसे हो सकती है? आनन्द का उद्वेग तो हृदय के भीतर से होता है, इसलिये विज्ञान के माध्यम से मनुष्य को चेतना नहीं दी जा सकती। हृदय कमल के विकास को, मन एवं प्राणश्चेतना को केवल ज्ञान से ही समझा जा सकता है, और अन्दर उतरने की क्रिया केवल ज्ञान से ही सम्भव होती है और ज्ञान का सूत्रधार सद्गुरू होता है। सद्गुरू एक चेतना पुंज है, जो सर्वत्र फैला हुआ है। जिस दिन भी सद्गुरू ने आपका हाथ थामा, उसी दिन से उस शक्ति और आनन्द के स्रोत को पाया जा सकता है।
यह उपनिषद् वाक्य इसीलिये सार्थक हैं, क्योंकि शरीर के भीतर उतरने के बाद वहां समस्त देवी-देवता दृष्टिगोचर होते ही हैं। बाहर भले ही हम कितने भी प्रयास करें, किन्तु परमानन्द पाने के लिये अपने अन्दर जाने की क्रिया करनी ही पड़ेगी और उसके लिये गुरू ही एकमात्र माध्यम है। गुरू के द्वारा शक्तिपात के माध्यम से जब प्रसुप्त कुण्डलिनी ऊर्ध्वगामी होती है, तब साधक के वर्तमान एवं जन्मान्तरों के दोष पूर्ण रूप से विघटित हो जाते हैं, उसके बाद क्रमशः चक्रों के जाग्रत होते ही दिव्यत्व प्राप्ति की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं।
सद्गुरू के अनुग्रह वश जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है, तब उसमें क्रमशः स्पन्दन होता चला जाता है। गुरू की दिव्य शक्ति से साधक की कुण्डलिनी प्रेरित होकर देह को शुद्धता प्रदान करती है। और कुण्डलिनी उन विभिन्न चक्रों को उद्घाटित करती हुई विशेष अनुभूतियों को प्रदान करती है। इस प्रकार गुरू प्रदत्त शक्तिपात दीक्षा और विशेष कृपा वश साधक की देह से सभी न्यूनताओं का आवरण हट जाता है। जीवन तो उसको कहते हैं, जो शुरू से लेकर अन्त तक सभी दृष्टियों से पूर्ण रहें। हमारे जीवन में किसी प्रकार का भी अभाव न रहे, क्योंकि जीवन के दो पक्ष हैं- एक पक्ष है भौतिक, दूसरा पक्ष है आध्यात्मिक दोनों का समन्वय करके चलना ही पूर्णता कहा जाता है।
भौतिकता का अर्थ है- धन, यश, मान, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र, वाहन, भवन, भोग आदि और आध्यात्मिकता का अर्थ है- कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार जागरण, शक्तिपात, सद्गुरू, तपस्या, साधना सिद्धि, पूर्णता, दिव्यता, तेजस्विता, दैवीय सिद्धता आदि। एक तरफ जहां भोग है, वहीं दूसरी तरफ योग है, एक तरफ जहां गृहस्थ जीवन के कर्तव्य हैं। वहीं दूसरी तरफ सन्यसत भाव से अपने जीवन के परम लक्ष्य की ओर गतिशील होना है। इन दोनों का समन्वय केवल गुरू के द्वारा ही सम्भव है और यह समन्वय जब पूर्ण रूप से स्थापित हो जाता है। तब व्यक्ति अपने भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता, सिद्धि, सफलता, धन, सुख-समृद्धि, प्रसन्नता, आनन्द, काम-शक्ति, सौन्दर्य, आकर्षण, सम्मोहन सब कुछ प्राप्त कर लेता है।
समर्पित श्रेष्ठ शिष्यों के जीवन का अत्यन्त सौभाग्यशाली क्षण होगा जब वे स्वयं जगत पराशक्ति योगमाया के स्वामी और कुण्डलिनी जागरण शक्ति प्रदाता सद्गुरू नारायण के अवतरण भूमि पर सहस्त्र चक्र जागरण की क्रियायें देवत्व तीर्थ भूमि पर सम्पन्न करेंगे। सद्गुरूदेव की तपः शक्ति और दीपावली पर्व का ज्योर्तिंमय प्रकाश की चैतन्यता में घटित होने वाली यह अद्भुत क्रिया निश्चिंत रूप से प्रत्येक गृहस्थ साधाक के जीवन में श्रेष्ठता, धवलता, उज्ज्वलता, पूर्णता, धन सुदृढ़ता, प्रसन्नता, आरोग्यता से युक्त करने में पूर्णता समर्थ है। ऐसे विशिष्ट योग में वही साधक भौतिक और आध्यात्मिक पूर्णता को अपने जीवन में रचा-पचा सकेगा। जो जीवन की छोटी-मोटी बाधाओं से जूझते हुये सभी लक्ष्मियों की चेतना प्राप्त करने की संकल्प शक्ति से युक्त होगा। साथ ही अपने भीतर व बाहर षोड़श श्रृंगार रूपी सौन्दर्य, कान्ति, ओज, तेज, काम शक्ति, लक्ष्मी धन से प्रकाशित होने की ऊर्जा व भौतिक जीवन को सभी रसों से सराबोर होने की क्रियात्मक शक्ति से युक्त होने हेतु रूप अनंग शक्ति दीक्षा, कामदेव चैतन्य पूर्णत्व दीक्षा, कर्ण पिशाचिनी श्रीं शक्ति दीक्षा और शाकम्भरी अष्ट लक्ष्मी दीक्षा प्रदान की जायेगी।
सद्गुरूदेव की जन्मस्थली चेतनामय भूमि पर सर्वथा प्रथम बार सप्त चक्र युक्त कुण्डलिनी जागरण शक्तिपात दीक्षा की क्रिया सम्पन्न होगी। जिससे साधक सद्गुरूदेव की तपः शक्ति चेतना को पूर्णरूपेण आत्मसात कर सके साथ ही द्विभुजा लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, महालक्ष्मी, श्रीदेवी, वीर लक्ष्मी, द्विभुजा शक्ति लक्ष्मी, अष्टभुजा चैतन्य लक्ष्मी, प्रसन्न लक्ष्मी से युक्त हो सके। और अपने जीवन को कुण्डलिनी शक्ति युक्त सद्गुरूमय चेतना से आप्लावित कर सकेगें।
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