





‘रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग’ का निर्माण इसी स्थान पर हुआ था। जिसे पार कर भगवान राम व उनकी सेना लंका पहुंची थी। यह वही स्थान है जहां पर भगवान राम ने लंका विजय के उपरान्त 14 वर्षीय वनवास यात्रा पूर्ण कर अयोध्या लौटते समय भगवान शिव की पूजा-स्तुति की थी। रावण भगवान ब्रह्मा का पौत्र था और इसके फलस्वरूप ब्राह्मण पुत्र भी था। उसकी हत्या करने पर भगवान राम को ब्रह्म हत्या का दोष लगा था। जिसका निवारण करना आवश्यक था। इस स्थान पर भगवान विष्णु तथा भगवान शिव दोनों के ही प्रकट होने से यह स्थान वैष्णव व शैव दोनों के लिए ही पूजनीय है और इसी कारण दिव्यतम पावन तीर्थ स्थल है।
शास्त्रों में श्री राम को आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श मित्र एवं आदर्श राजा के रूप में जीवन के विविध क्षेत्रों में उनके अनुपम चरित्र की सुन्दर अभिव्यक्ति की गई है। अद्वितीय सौन्दर्य, आदर्श, मर्यादा के वे शक्ति पुंज थे। श्री राम के उदात्त जीवन में असत्य एवं अंधकार का तुमुल युद्ध अभिव्यक्त हुआ है। उनका समस्त जीवन अनैतिकता एवं अधर्म के विरूद्ध प्रबल संघर्ष है। अन्त में विजय सत्य एवं प्रकाश की होती है। श्री राम में संस्कार प्रधान भारतीय आर्य संस्कृति को जीवन में आसुरी संस्कृति से मुक्त होने का मूल मंत्र प्रदान किया।
आज मानव जिस महाविनाश के गर्त की ओर तेजी से चला जा रहा है, उससे बचने के लिये साधकों को महान से महान त्याग करके मर्यादा का निर्वाह करने वाले श्रीराम और उनके आदर्शों की ही आवश्यकता है। क्योंकि जीवन में परिवारिक, सामाजिक कर्तव्यों का पालन त्याग और आदर्शों के कसौटी पर ही संभव है। हमारा दुर्भाग्य रहा है कि मर्यादा पुरूषोत्तम जैसा श्रेष्ठ आदर्श अपने पास होने के बावजूद भी हम अन्धकार में भटकते रहें हैं। जिन लोगों के पास नारायण अवतार व वैष्णव पीठ की अधिष्ठाता के अवतार पुरूषोत्तम श्रीराम और भगवान सदाशिव श्यति पापम् स्वरूप त्रिशक्तियों के अभीष्ट देव हों, वे साधक साधिकायें, शिष्य-शिष्यायें और सम्पूर्ण आर्यावत फिर भी जीवन की आवश्यक वस्तुओं को ना पूर्ण कर पायें, तो इससे बड़ी विडम्बना और दुर्भाग्य आपका क्या होगा? समुद्र के पास रहकर यदि आप प्यासे रहो तो इसमें समुद्र का क्या दोष?
आज इस आपा-धापी और प्रतिस्पर्धा के युग में मानवीय मूल्यों का दिन-प्रतिदिन ह्रास होता जा रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि हम एक ऐसा मार्ग चुनें जो हमें श्रेष्ठता, मर्यादा पुरूषोत्तम युक्त बनने की गति- शीलता व ऊर्जा और चेतना से युक्त होने का श्रेष्ठतम मार्ग तो सिर्फ गुरूदेव के सानिध्य में संभव है। भगवान राम की तरह पुरूषोत्तममय व शिव शक्तियों से युक्त जीवन ऐश्वर्य, धन-सुख, समृद्धि, सम्पन्नता के साथ पाप- ताप से मुक्त स्वच्छ, पवित्र जीवन निर्माण की क्रिया पूज्य गुरूदेव के दिव्य सानिध्य में नववर्ष पूर्ण लक्ष्मी वृद्धि साधना महोत्सव 26-27 दिसम्बर को रामेश्वरम् में सम्पन्न होगा। पूर्ण चैतन्य दिव्यता युक्त ज्योतिर्लिंग स्वरूप भगवान सदाशिव की नगरी में समुद्र स्नान के बाद सभी चौबीस तीर्थ कुण्ड के जल से साधकों का अभिषेक स्वयं पूज्य गुरूदेव के दिव्य कर कमलों से होगा। साथ ही महामृत्युजंय अभिषेक, दुर्गा सरस्वती के वेदोक्त मंत्रें से नव चण्डी हवन, सर्व काल संहारक हनुमान शक्ति दीक्षा, ज्वाला मालिनी सौभाग्य धनदा लक्ष्मी दीक्षा प्रदान की जायेगी।
जिससे कि दिव्य तीर्थ स्थल पर सद्गुरूदेव के सानिधय में इस तरह की पूर्ण रूपेण साधनात्मक क्रियायें करने से जैसे वे साधक पूर्णमदः पूर्णमिंद युक्त हो सके हैं। पंजीकरण अनिवार्य
पंजीकरण शुल्कः 4100/- पंजीकरण राशि में राज-राजेश्वरी चैतन्य दीक्षा, नववर्ष उन्नति प्रदायक चन्द्र ज्योत्सना माला व महा मृत्युजंय दीर्घायु शक्ति युक्त रामलिंगम् लॉकेट प्रदान किया जायेगा।
अन्य प्रक्रिया में न्यौछावर राशि की अतिरिक्त व्यवस्था आवश्यक है।
सम्पर्कः- जोधपुर कार्यालयः- 0291-2517025, 2517028, 07568939648, 08769442398
सभी बड़े शहर से मदुरई और रामेश्वरम् के लिए रेल की सुविधा है।
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