





धूमावत्यै प्रबल प्रकटां
पूर्णो रोग वतंसं
ज्ञानों दव भवत भवतां
पूर्ण चित्या व चित्यं
पूर्ण सदा वै वदः
दीर्घो मसय मनोवांछित सदं ,
सिद्धि सर्वा प्रसन्नं।।
शक्ति के दो रूप हैं, दो स्वरूप हैं, दो प्रकार के प्रयोग हैं और शक्ति की सर्वोच्च स्वरूप महाविद्या हैं यानि संसार में जितने भी देवी-देवता हैं उनमें से दस देवियों को महात्वपूर्ण माना है। शक्ति त्रिगुणात्मक है- महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती। इन तीनों को दस रूपों में विभक्त किया गया है और उनको दस महाविद्या कहा गया है और संसार की श्रेष्ठतम साधनायें या विद्यायें इन दस महाविद्याओं में समाहित है।
अगर दस महविद्याओं को सिद्ध कर लेते हैं तो जीवन में किसी और साधना को करने की जरूरत ही नहीं होती। शक्ति के दो भाग हैं, एक भाग तो शत्रुओं को परास्त करने के लिए, एक हराने लिए, शत्रुओं का दमन करने के लिए धूमावती, महाकाली, त्रिपुर भैरवी, छिन्नमस्ता और बगलामुखी का प्रयोग किया जाता है और जीवन की सारी इच्छओं की पूर्ति के लिये जीवन में धन, यश, मान, सम्मान, सौंदर्य, सम्मोहन प्राप्ति के लिये तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, कमला और मातंगी की साधना सम्पन्न की जाती है।
उन्हीं महाविद्याओं में एक है धूमावती जिसका प्रांरभ में मैने श्लोक उच्चरित किया धूमावती भी दो स्वरूप है। एक स्वरूप के द्वारा शत्रुओं पर वज्र की तरह प्रहार किया जा सकता है। शत्रु कोई भी हो वह अपने आपमें पूर्ण रूप से परास्त हो जाये, मन से, चिंतन से और वह साधक का कोई अहित न कर पाये। उस शत्रु ने हमारे ऊपर जुल्म किये हैं, तकलीफ़ें दी होगी, परेशानी दी होगी। उस शत्रु के पूर्ण दमन के लिए धूमावती साधना श्रेष्ठ है। और दूसरा स्वरूप धूमावती का रचनात्मक है जो कि धन प्रदान करने वाली, यश प्रदान करने वाली सम्मान प्रदान करने वाली स्वस्थ्य प्रदान करने वाली और जीवन में सभी दृष्टियों से पूर्णता प्रदान करने वाली महाविद्या है। यह महाविद्या जीवन में सब कुछ प्राप्त कराने वाली देवी है। वह सब कुछ जो हमारी आकांक्षा है, अभिलाषा है। हम वह सब प्राप्त कर सकें जो जीवन में हमारी इच्छायें है, विचार है, धारणायें है।
और धूमावती महाविद्या साधना या कोई भी महाविद्या साधना ऐसी नहीं है कि उसे आप मखौल की तरह या मजाक की तरह करें। इस साधना को या किसी भी साधना को मजाक की तरह करेंगे तो कोई फ़ल आपको प्राप्त नहीं हो पायेगा, कोई लाभ आपको नहीं मिलेगा। कोई सिद्धि या सफ़लता आपको प्राप्त नहीं हो पायेगी। यदि आपको साधना में सफ़लता प्राप्त करना है तो आपको एकाग्रचित्त होना पड़ेगा पूर्ण मनोयोग से साधना को सम्पन्न करना पड़ेगा। तभी आपको मनोनुकूल सफ़लता या सिद्धि प्राप्त हो पायेगी। यदि आपको एम- ए- क्लॉस पास करनी है तो रात-भर जागना पड़ेगा, आंखें लाल हो जायेगी, शरीर दुबला हो जायेगा, इतने प्रयत्नों के बाद आप एम-ए- में फ़स्ट क्लास ले पायेंगे। खेलते-कूदते हुये, नहीं पढ़ते हुये भी चौथी पास कर ही सकते है। पर एम-ए- क्लॉस पास नहीं कर सकते और एम- ए क्लॉस को भी चौथी क्लॉस की तरह पास करने की सोचते है और ऐसा सोचते है इसलिये आपको सफ़लता प्राप्त नहीं हो पाती। जो एम- ए- की पढ़ाई करते हैं उन्हें आप देखें तो पायेंगे कि उन्हें न खाना अच्छा लगता है, न पीना अच्छा लगता है जब इम्तिहान पास आ जाता है तो नाच, गाना, खेलकूद सब बंद हो जाते है। बस एक ही धुन, एक ही लगन होती है कि मुझे प्रथम श्रेणी में पास होना है। यह धुन, यह लगन आपमें लगे तो सफ़लता मिलेगी।
साधना में ऐसी लगन हो और पूर्ण निष्ठा के साथ आप उसमें उतरें तो ही आप सिद्धि या सफ़लता प्राप्त कर सकते है। नहीं तो आपका प्रयत्न बेकार हो जायेगा अगर आप बस एक औपचारिकता के रूप में साधना करते हैं तो यदि आप दिन भर झूठ बोलते रहें, उल्टे काम करते रहे, जैसा मन किया खाते पीते रहे और फि़र शाम को चार मालाये कर ली तो फि़र आपको सफ़लता नहीं मिल सकती। ऐसे करें तो बीस बार भी साधना करें तो सफ़लता आपको मिलेगी नहीं और ठीक ढंग से करें पूर्ण निष्ठा, एकाग्रता से करें तो पहली बार में ही सफ़लता मिल जायगी, इसमें कोई संदेह नहीं। ये साधना या कोई भी साधना इस प्रकार सिद्ध नहीं हो सकती। आपने साधनाओं को मजाक का विजय बना लिया है जबकि वह सबसे गंभीर कार्य है, सबसे गहन कार्य है। इतना सरल यह कार्य होता तो संसार के सारे लोग ही महाविद्याओं को या देवी देवताओं को सिद्ध कर लेते। फि़र तो किसी के शत्रु होते ही नहीं। फि़र तो जीवन में कोई गरीब रहता ही नहीं।
आप साधना तो करते है, प्रयत्न तो करते हैं जितनी मैं मालायें बताऊं उतनी करते हैं, मगर आपमें पूर्ण सचेष्टता नहीं है जब तक सचेष्ट नहीं होंगे तब तक आप साधना मे सफ़ल नहीं हो सकते। एक चेष्टा होनी चाहिये और चेष्टा का अर्थ है की चौबीस घंटे एक धुन हो कोई काम करने की चौबीस घंटे हमारे बंट गये है। उसमें कुछ हिस्सा पत्नी को मिल गया, अपनी तबीयत को ठीक करने में लग गया है, कुछ नौकरी या व्यापार में लग गया है, कुछ अपने शरीर को सुन्दर बनाने में लग गया है और थोड़ा बहुत गुरूजी को दे दिया है। उसके बाद कहीं दस पांच मिनट बचें वे आप साधना में लगाते है। इतने हिस्सों में जीवन को बांटोगे तो साधना कहां से सिद्धि होगी। ऐसे कोई भी साधना सिद्धि नही हो सकती चाहे आप सौ साल लगे रहें। पूरी की पूरी अपनी शक्ति आप इस कार्य में लगायेंगे तो ही सफ़लता प्राप्त हो पायगी। पूरा का पूरा आपका ध्यान, आपका चिंतन आपकी साधना में हो, तभी आप अच्चकोटि के साधक बन सकते हैं। पूरे मनोयोग से साधना में उतरें। फि़र आपको न नौकरी की चिंता हो, न व्यापार की चिंता हो, न पत्नी की चिंता हो, न घर की चिंता हो, न स्वास्थ्य की चिंता हो, न शरीर की चिंता हो। केवल एक चिंता हो कि इस साधना को कैसे सिद्ध किया जाए। जब केवल एक आपका चिंतन होगा तो आपकी साधना सिद्ध होगी। यह हमारी सोच गलत है जो कि हम ऐसा नहीं कर रहे है। यह हमारी कमी है कि हम एकाग्रचित नहीं हो पाते। साधना सिद्ध नहीं होती तो यह गुरू का दोष नही, न ही साधना या मंत्र का दोष है। यह हमारा स्वयं का अपना दोष है कि हम एक लक्ष्य नहीं हो पाते। हमारा एक ही लक्ष्य हो, एक ही चिंतन हो, एक ही धारणा हो। जब अर्जुन द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीख रहा था, तो उसका एक ही लक्ष्य था कि कैसे मैं सर्व श्रेष्ठ धनुर्धर बनूं?
दिन भर एक ही काम में लगा रहता सुबह तीर चलाने का अभ्यास करता दिन में भी, रात को एक बजे भी। दिन में कम से कम बाइस घंटे तो वह तीर चलाने का अभ्यास करता रहता था और हम चौबीस घंटाओं में केवल आधा घंटा साधना करते है बाकी सारे समय दूसरे कामो में लगे रहते हैं और फि़र असफ़ल हो जाते है तो गुरू को दोष देते हैं, देवी-देवताओं को दोष देते है, मंत्र को दोष देते हैं। यों साधना करेंगे तो असफ़ल होना ही है। अगर एम- ए- इस ढंग से करेंगे तो फ़ेल होंगे ही होंगे क्योंकि केवल बीस परसेंट नंबर आयेंगे। पूरी क्लॉस ऐसे फ़ेल हो जायेंगे। बीस में से भी पंद्रह आएयेगे थर्ड क्लॉस। तीन आयेंगे सैकेण्ड क्लॉस, एक या दो आयेंगे फ़स्ट कलॉस। मगर वो आयेंगे जिनकी लगन होगी। जो निश्चय कर लेंगे कि मुझे यह काम करना ही है वे ही सफ़ल होना है, श्रेष्ठ हो सकते है, उच्चता प्राप्त कर सकते है। आपको भी सफ़लता प्राप्त हो सकती है यदि आपकी एक जीवन शक्ति हो, जीवन में निश्चय का भाव हो, एक दृढ़ता हो कि हर हालत में मुझे सफ़ल होना ही है और साधना में सिद्धि को प्राप्त कर लेना है। जब अच्छा एटमॉस्फ़ीयर नहीं होगा तो भी साधना नहीं हो पायेगी। साधना के लिए एक वातावरण का निर्माण करना जरूरी है। या जिस कमरे में आप साधना कर रहे हैं तो चुप रहे, मौन रहे, यथा संभव तो घर का वातावरण शांत होगा। तनाव कम होगा, लड़ाई-झगडे फि़र होगे नहीं।
अगर बेटा बोल रहा है तो आप शांत रहें। पत्नी झीं-झीं कर रही हो तो आप शांत रहें, मौन रहें। साधना के समय न कुछ उल्टा बोलना है, न पलटकर कर जवाब देना है। जो वह बोले उसे बोलने दीजिये। आप सुनिये ही मत। जो वह कहे वह करिये ही मत। बस खत्म। ऐसा आप कर पाए, ये तो वो शांत वातावरण हो पायगा। अब आप पत्नी को अगर समझांये-तू समझती नहीं हैं। मुझे साधना करनी हैं, मैं साधना करूंगा तो महाकाली आयेगी, धूमावती आयेगी हमारी मनोकामनायें पूर्ण हो जायेंगी। और तुम भी सोचोगे साधना से कुछ होगा नहीं, वाइफ कह ठीक रही है। ऐसा आपका चिंतन हो गया तो सच में कुछ नहीं होगा।आपको अपने ऊपर कान्फ़ीडैंस होना चाहिये और अपने घर के वातारण को भी अनुकूल बनाना चाहिये। फि़र जो गुरू विधान बताये उस विधान के अनुसार नहीं करेंगे तो भी सफ़लता नही मिल पायेगी आपको।
आपको सफ़लता कहां मिलती है वह मैं आपको समझा रहा हूं। मैं आपको कहूं दीपक लगाना चाहिये और आपने कभी दीपक लगाया, कभी नहीं लगाया तो उससे कैसे होगा? मैं कहूं एक ही स्थान पर उसी जगह रोज मंत्र जप होना चाहिये और आपने आज यहां जप कर लिया, कल मंदिर जाकर लिया तो उससे बात नहीं बनेगी। लगन आप में है नहीं, आप सरल रास्ता ढूंढते हैं। चलो आज यहां मंत्र जप कर लेते हैं, कल वहां कर लेंगे अब दूसरी जगह का वातावरण कैसा है, शुद्धता है या नहीं है कुछ कह नहीं सकते, और आप बाहर जा रहे हैं, मीट खा रहें हैं तो वह साधना के विधान के विपरीत है। जैसा आप अन्न खायेंगे वैसी आपकी बुद्धि हो जायेगीं। इसलिये शुद्ध अन्न जो आपके घर का होता है जो आपकी खरी कमाई का अन्न होता है उससे आपको सफ़लता मिल पायेगी। एक साधु था और वह बड़ा वीतरागी साधु था, त्यागमय साधु था। शरीर पर एक लंगोट के अलावा कुछ पहनता ही नहीं था और पास में कुछ रखता नहीं था, न पैसा, न सामान। एक बनिये के घर गया तो वह बनिया उसका शिष्य था। तो उस बनिये ने कहा- मैं आपका शिष्य हूं, एक रात मेरे घर में विश्राम करें।
शाम को साधु वहां ठहर गये। जो कमरा था बहुत अच्छा सुसज्जित, उस कमरे में बनिये ने पलंग बिछा दिया, इत्र का छिड़काव कर दिया और शाम को अच्छा भोजन करा दिया। भोजन करके साधु पलंग पर लेटे तो सामने वहां बनिये की पत्नी का सोने का हार लटका हुआ था। वह बनिये का पर्सनल रूम था। अब साधु ने सोचा- यहां कोई देख, तो रहा नहीं है, इसे जेब में डाल लेता हूं। सवेरे चला जाऊंगा कोई मुझ पर डाउट कर ही नहीं सकते क्योंकि मैं तो गुरू हूं। बनिये की पत्नी शक करेगी तो किसी और पर करेगी मुझ पर करेगी ही नहीं। नौकरों पर करेगी, मुझ पर कर ही नहीं सकती।
और हार जेब में डालकर वह सो गया और भरपूर नींद भी आ गई। सुबह वह शौच आदि कार्यों से निवृत होने जंगल में गया और अचानक उसको धक्का लगा कि आज पचास साल की मेरी तपस्या कैसे खंडित हो गई। मैंने हार कैसे चुरा लिया? करूंगा क्या मैं इस हार का? किसको पहनाऊंगा? और वापस आकर उसने चुपचाप हार टांग दिया। फि़र उसने सोचा चिंतन किया कि यह हुआ क्यों? आज तक मैंने किसी की सूई भी नहीं ली, कभी देखा ही नहीं सोने के टुकडे या चांदी के टुकडे की ओर। फि़र आज कैसे, कुबुद्धि पैदा हो गई? उसने बनिये को बुलाया। साधु ने पूछा-तुम क्या काम करते हो? बनिये ने कहा-मैं आपको नहीं बता सकता क्या काम करता हूं। बस आप खुद समझ लीजिये। मैं भला आपको क्या बताऊं? तो साधु ने कहा- कुछ तो काम करते होंगे। परिश्रम करते होंगे। व्यापार करते होंगे। अपनी मेहनत करते होंगे।
बनिये ने कहा- मेहनत तो क्या मैं तस्करी करता हूं। इधर का माल उधर करता हूं। बस यूं समझ लीजिये हेरा- फ़ेरी करता हूं और यूं मैं कमाता हूं। मगर आपको उससे क्या? मैं आपको अवश्य दक्षिणा दूंगा। आप चिंता मत करिये। साधु समझ गया कि उसने रात जो अन्न खाया वह तस्करी का अन्न है। इसलिए उसकी कुबुद्धि हुई। अब आप किसी के यहां जाकर भोजन करें, उसका अन्न कैसा होगा, पता नहीं। ऐसा अन्न खायेंगे तो आपका मन भटकेगा। वे खुद हैं तस्कर, वे आपको भी तस्कर बनाने की काशिश करेंगे। वे पूजा पाठ करते नहीं वे आपको भी ऐसी ही बुद्धि देंगे कि तू फ़ालतू यह सब साधनायें कर रहा है। इससे कुछ होगा क्या? दुपटटा ओढ़ने से क्या होगा? ऐसा तो सब ओढ़ लेते है।
और उनकी ऐसी बातों से उनके विचारों से आपका मन भी भ्रमित हो जायेगा। मैं आपको उदाहरण देकर बता रहा हूं कि ये कारण ऐसे है। जिनकी वजह से असफ़लता मिलती है साधना में। अन्न का भी 99 परसैंट फ़र्क पड़ता है और अपने घर का जो अन्न होगा वह आपके परिश्रम का होगा। चाहे बुद्धि परिश्रम हो, चाहे शारीरिक परिश्रम हो। मैं शरीर का परिश्रम नहीं करता बुद्धि का परिश्रम करता हूं। ईट ढोता नहीं, गारा मिटटी लाता नही। शारीरिक परिश्रम नहीं है पर मानसिक परिश्रम है। मैं मानसिक परिश्रम करता हूं शिष्यों के साथ और उससे मुझे दो पैसे मिलते है। तो वे बेईमानी के पैसे नहीं है। मगर मैं कोई चीज चुरा लू, यहां आपका सामान पड़ा है वह चुरा लूं तो वह बेइमानी का पैसा होगा। या मैं यह कह दूं कि तुम साधना मत करों बस पैसे चढ़ाओं, हो जायेगा सब ठीक तो वह भी बेईमानी का पैसा है मेरा। जितना मैं करूं उतना मिलता है तो वह मेरी ईमानदारी का पैसा होगा।
मैं आपको ज्ञान देता हूं साधनाओं का और ऐसी साधनायें कि अगर आप करें एक निष्ठता के साथ तो अवश्य ही आपका जीवन पूर्ण रूप से रूपांतरित हो जायेगा। हजारों साधकों ने, योगियों ने संन्यासियों ने इन साधनाओं को सिद्धि किया हैं हजारों सफ़ल भी हुये, मगर करोड़ों असफ़ल भी हुये और जैसा कि मैंने बताया असफ़लता के कारण ये हैं। अगर आप सिन्सेयरली काम करेंगे तो सफ़लता मिल जायेगी और यदि आप में सिन्सेयरिटी नहीं है साधनाओं को सिद्धि करने का संकल्प नहीं है, ठीक प्रयत्न नहीं हैं तो सफ़लता नहीं मिल सकती, साधना में सिद्धि नहीं मिल सकती।
इसमें फि़र गुरू का दोष देना या धूमावती को दोष देना बेकार है। आप खुद विश्लेषण कर सकते हैं। आप खुद देख सकते है कि क्या यह सही पथ है? क्या गुरूजी ने बताया वही मार्ग है? क्या मै शुद्ध विचार रखता हूं? क्या उन्होंने जो नियम बताये उनका मैं पालन कर रहा हूं? क्या उनके बताये गये विधान के अनुसार मैं कार्य कर रहा हूं? अगर आप नहीं कर रहे हैं तो फि़र दोष सारा आपका है। कहीं एक भी गलती आप करते हैं तो साधना के दौरान तो सफ़लता मिल नहीं सकती। कार में दो पुर्जे होते है और केवल एक पुर्जा निकाल दें। छोटा सा पेंच निकाल दें। कार रूक जायेगी आपकी। चलेगी ही नहीं, गांरटी की बात है। एक सौ निन्यान्वें पुर्जे सही हैं। बस एक पुर्जा निकाल दिया आप ने स्टियरिंग का तो स्टियरिंग भटक जायेगा और गाड़ी जाकर टकरा जायेगी आपकी।
और आप सोचते हैं गुरूजी ने दस दिन साधना करने को कहा है, एक दिन न करें तो क्या फ़र्क पड़ेगा। एक दिन लो, दीपक नहीं लगायें तो क्या फ़र्क पड़ा। मैं कहता हूं- एक पेंच निकाल दिया तो क्या फ़र्क पड़ा? गांरटी है गाड़ी नही चल पायेगी और साधना में सफ़लता भी नहीं मिल पायगी अगर एक छोटी सी कमी भी रह जाए। या तो पूरी मशीन होगी तो गाडी चलेगी या हिलेगी भी नहीं। बीच में आप नहीं चल सकते। कभी आपने मंत्र जप किया, कभी नहीं किया, कभी रात दस बजे किया, बारह बजे कर लिया, कभी अपने घर कर लिया तो कभी किसी के घर जाकर कर लिया तो आप खुद सोच लीजिये कि जब एक छोटी सी कमी के कारण गाड़ी नहीं चल सकती तो महाविद्या जैसी साधना कैसे सिद्ध होगी?
आप उसे सीरियसली नहीं लेते। आपको सोचना चाहिये क्यों नहीं हुआ। आपकी आंखों में आंसू होने चाहिये कि क्यों मिली मुझे असफ़लता। कहां मुझसे कोई गलती हुई कहां कमी रह गई, गड़बड़ कहां थी मंत्र गड़बड़ नहीं, गुरू गड़बड़ नही, साधना गड़बड़ नहीं फि़र तुम्हें असफ़लता क्यों मिली? आप विश्लेषण करें तो अवश्य आपको कमी मिल जायेगी। जैसे साधु क्या जरूरत थी? मै करूं लगाया कि कहां क्या कमी थी? आप विश्लेषण करते ही नहीं विचार नहीं करते चिंतन नहीं करते इसलिये आप अपनी कमियों को ढूंढ नहीं पाते और आपको असफ़लता मिल जाती है। प्रयोग चाहे छोटा हो या बड़ा हो, मंत्र बड़ा हो या छोटा हो, चाहे साधना दो घंटे की हो या एक घंटे की हो यह बहुत महत्वपूर्ण बात नहीं है। बंदूक की गोली लगने में एक सैकेण्ड लगता है और चने के दाने जितनी एक गोली होती है। इतनी छोटी सी होती है पर लगीं नहीं और आदमी खत्म।
किसी ने गोली चलाई और सेकेण्ड के हजारवें हिस्सें में आकर आपको लगी। एक सैकेण्ड भी नहीं लगा और इतना बड़ा गोली भी था नहीं। चने के आकार की गोली थी और आप मर गये। कई केवल मंत्र बड़ा होने या लंबी चौड़ी साधना होने से ही सफ़लता नहीं मिल पाती। छोटी साधना हो पर सही हो, छोटा मंत्र हो पर प्रामाणिक हो। गोली भी सही हो, बंदूक भी सही हो और चलाने वाला भी सही हो तीनों बाते आवश्यक है। यह सोचना ऐसा भ्रम करना कि यह मंत्र तो इतना छोटा है इससे क्या हो जायेगा, इस मंत्र में ऐसा है ही क्या इससे आप और भ्रम ही पैदा करेंगे। साधना में सफ़ल नहीं हो सकते। आप पूछते है कि इस छोटे से मंत्र में ही क्या? मैं पूछता हूं आपके नाम में ही क्या? मदनलाल आपका नाम है, क्या विशेषता है आपके नाम में, कौन से बहुत बडे काम आपने कर लिया? सैकड़ों मदनलाल दिल्ली में घूम रहे हैं, उनमें से आप भी एक हैं। नाम में कोई विशेषता नहीं है। वह तो व्यक्ति के विचार या उसके कार्य उसे विशेज बनाये है। गांधी सैकड़ों गुजरात में पैदा हुए, कोई एक ही थोडे़ पैदा हुआ। मगर गांधी अपने कार्यों, अपने विचारों से पूरे भारत वर्ष में मशहूर हुये।
रविन्द्रनाथ टैगोर हुये तो नाम तो रविन्द्रनाथ सैकड़ों लोगों का है। मैं यहां प्रवचन दे रहा हूं हो सकता है यहां भी रविन्द्रनाथ बैठा हो कोई। मगर रविन्द्रनाथ टैगोर में विशेषता थी उनमें एक साधना का तत्व था, उन्होंने अपने जीवन में एक अद्भुत गीत की रचना की गीताजंलि की रचना की तो उन्हें नोबेल प्राइज मिला। एक धुन एक लगन पर चले वो। जब वे संगीत का अध्ययन करते थे। आधा घंटा सोते थे और तब भी क्यों सोऊं। उसकी एक लगन थी तब वे रविन्द्रनाथ टैगोर कहलाये। पैदा होते ही वे मशहूर नहीं हो गये थे। पैदा होते ही कोई महात्मा गांधी नही बन गये थे। पैदा तो आप और मै जैसे हुये वैसे ही वे पैदा हुये थे। उतने ही हाथ थे, उतने ही पांव थे, उतनी ही आंखे थी, उतना ही एक माइंड था। उनमें एक धुन और लगन थी और आपमें धुन लगन है तो साधना तो बहुत साधारण बात है आप दसों महाविद्याओं को सिद्धि कर सकते है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि जो साधना गुरू कराये या जो साधना गुरू दे आप वैसे करें। ये महाविद्या साधनायें पूर्ण रूप से जीवन को परिवर्तित करने की साधनाये हैं। ये कोई मूंगफ़ली खाने की साधनायें नहीं है कि बस में बैठे और मूंगफ़ली खाने लगे।
यह गंभीर विषय है साधना का और चाहे कोई भी साधना हो उसमें गंभीर होने की आवश्यकता है। चाहे संगीत की साधना हो, चाहे ज्ञान की साधना हो, चाहे प्रवचन देने की साधना हो चाहे कोई भी साधना हो। उसे करते समय आपमें तड़फ़ हो, लगन, हो बेचैनी हो, चिंतन हो, गहराई हो, तब उसमें सफ़लता प्राप्त हो सकती है। अगर आपमें लगन होगी तो संदेह ही नहीं कि साधना में सिद्धि प्राप्त होगी ही, यह गांरटी की बात है।
और आप महाविद्या साधनायें अगर पूर्णता के साथ सम्पन्न करते हैं तो कुछ ही दिनों में आपको अपने जीवन में अनुकूलता मिलने लग जाती है। ऐसा नहीं है कि आज साधना की तो छः महीने बाद सफ़लता मिले या एक साल बाद सफ़लता मिले। ये दस महाविद्या तुरंत सफ़लता देने वाली देवियां है। आप स्वंय साधना करके देख सकते हैं कि कितनी आपको अनुकूलता प्राप्त होती है। और अगर विशेष दिनों में ये साधनायें, ये दस महाविद्या साधनायें सम्पन्न करते हैं तो और भी तीव्रता के साथ सफ़लता मिलती हैं। किसी शुभ मुहूर्त या महाविद्या जयंति या नवरात्रि, चाहे चैत्र नवरात्रि हो या शारदीय नवरात्रि हो, तब यदि महाविद्या साधना सम्पन्न करते है। तो अवश्य ही पूर्ण सफ़लता मिलती ही है।
ये नवरात्रि के दिन अपने आपमें पूर्ण चैतन्यता युक्त दिवस कहे जाते है। और इनमें यदि शक्ति की साधना सम्पन्न की जायें तो अद्भुत लाभ प्राप्त हो सकते हैं। निश्चय ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सकती है। अगर आपकी पूर्ण एकाग्रता हो और पूर्ण लगन हो और जीवन में कोई भी समस्या हो शत्रु बाधा हो, राज्य बाधा हो, स्वास्थ्य की समस्या हो, धन संबंधी समस्या हो, परिवारिक समस्या हो, विवाह देर से हो रहा हो, शिक्षा में कमी हो, कोई समस्या हो हरेक के लिये महाविद्या साधना श्रेष्ठ है। और आपने एक बार कोई भी महाविद्या सिद्ध कर ली, तो काल भी आपके सामने टिक नहीं सकता, क्योंकि महाविद्या साधना के उच्च कोटि मंत्र और सिद्ध मंत्र है। इन्द्र ने स्वयं एक महाविद्या को सिद्ध किया था। इन्द्र ने छिन्नमस्ता धयान किया और मंत्र प्रयोग किया और इस प्रयोग के करने के बाद उसने युद्ध किया वह राक्षसों पर विजयी हुआ, स्वर्ग के सिंहासन पर बैठा और उसके बाद उसे किसी प्रकार की समस्या आई ही नहीं अगर आप श्रीमद्भागवत् पढें या इन्द्र पुराण पढें तो उसमें साफ़-साफ़ इसी प्रकार का वर्णन है।
ऐसी ही तीव्र शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की साधना है छिन्नमस्ता साधना और उसका मंत्र इतना तीव्र है कि शास्त्रों में कहा गया है कि तलवार अगर म्यान से निकल जाती है तो शत्रुओं का संहार करके ही म्यान में वापस जाती है और यह मंत्र उच्चरित हो जाता है शत्रु का दमन करने के बाद ही शांत होता है। तब तक उसकी डयूटी होती हैं छिन्नमस्ता की, वह आपकी रक्षा करें और शत्रु का दमन करें। दमन का अर्थ यह नहीं कि वह शत्रु मृत्यु को प्राप्त हो जाये। दमन का अर्थ किसी को मारना नहीं है, इसका अर्थ है कि वह परास्त हो जाये, आपके सामने घुटने टेक दें, आपका कार्य कर दें, जैसा आप चाहते हैं वैसा हो जायें, शत्रु के विचार परिवर्तित हो जाये और वह शत्रुता भूल जाये।
दसों महाविद्याओं के मंत्र बडे़ ओजस्वी तेजस्वी और अद्भुत और अनिर्वचनीय है। छिन्नमस्ता की ही तरह त्रिपुर भैरवी भी एक महाविद्या है जो कि छिन्नमस्त से भी महत्वपूर्ण महाविद्या कही गई है और त्रिपुर भैरवी को सिद्ध करने के लिए मुझे चार बार असफ़लता मिली थी शुरू-शुरू में और मैंने निश्चय कर लिया था कि संन्यास जीवन छोडो, सिद्धि-विद्धि कुछ होती नहीं और गुरूजी को कह दिया था सच्चिदानंद जी नहीं वे तो बाद में मिले। जो गुरू थे शुरू में उनसे मैंने कह दिया था कि त्रिपुर भैरवी कुछ होती नहीं। उन्होंने कहा तुम बैठो मैं तुम्हें इसकी गोपनीय विधि समझाता हूं और एक बार मेरे कहने से तुम केवल आठ दिन और मंत्र जप करना और फि़र देखना कि तुममें कितनी ताकत आ जाती है। हनुमान ने जो साधना की थी या रावण ने जो साधना की थी या बाणासुर ने जो साधना की थी वहीं साधना वहीं गोपनीय विधि वही रहस्य उन गुरू ने मुझे समझाया। मैने सोचा चलो एक बार और एक्सपैरिमैंट कर लेते हैं और मैं मन मार करके बैठा था। मगर उसके बाद ताकत इतनी हीट शरीर में आई थी कि मैं रोज छः घंटे नदी में पड़ा रहता तो हीट शांत होती। ऐसा मन करता कि दीवार पर मुम्का मारूं, पत्थरों पर मुक्के मारूं। आठ दस दिन वैसा ही रहा। मुझे लगता कि इस ताकत को कहां निकालूं ऐसी शरीर में क्षमता आ गई थी।
त्रिपुर भैरवी मंत्र की साधना से व्यक्ति में साधक में ऐसी क्षमता आ जाती है कि वह ठोकरों से भी हिमालय को उड़ा देता है। ठीक ऐसी ही एक अन्य अद्भुत साधना है महाविद्या काली की। महाकाली का अर्थ है काल पर विजय प्राप्त करने वाली देवी जीवन को पूर्णता देने वाली देवी सर्वत्र विजय प्रदान करने वाली देवी और हिम्मत, साहस, बल, शौर्य, तेज, क्षमता और पौरूज प्रदान करने वाली देवी। कलौं चण्डी विनायकौ कलियुग में चंडी अर्थात काली को सिद्ध करना सबसे उत्तम है क्योंकि कलियुग में जब तक बल, साहस, तेज, ताकत और क्षमता नहीं होगी तब तक जीवन में पूर्णता आना संभव नहीं है। इसिलये शास्त्रों में महाकाली के माध्यम से ही जीवन में श्रेष्ठता, पूर्णता, पौरूष, हिम्मत, साहस और क्षमता प्राप्त हो सकती है। तभी हम जीवन में उस उच्चता तक पहुंच सकते हैं जो हमारा लक्ष्य है।
और महाकाली यंत्र जो कि पूर्ण सिद्धि किया हो वह घर मे अगर ऐसी जगह डाल दें जहां किसी की नजर न पडे। आपका कच्चा आंगन हो तो वहां गाड़ दें या फ़र्श हो तो थोड़ा खोद कर वहां रख दें और ऊपर फि़र पत्थर लगा दें। ऐसा हो जाए तो फि़र उस घर में लड़ाई, झगड़ा, अकाल मृत्यु, रोग नहीं होते। फ़ैक्ट्री हो तो वहां भी गाड़ सकते है मगर उस यंत्र पर आपकी दृष्टि न जायें और वह पूर्ण सुदर्शन चक्र की तरह आपकी रक्षा करता ही रहता है और फि़र आपके घर में न अकाल मृत्यु होगी, न अड़चन होगी। महाकाली यंत्र स्वयं मैने अपने जीवन में प्रयोग किया है। और प्रत्येक वर्ष समय निकाल कर मैं महाकली साधना करता हूं। इतनी तेजस्वी साधना है यह। और जिस प्रकार ताकत, साहस, बल के लिए महाकाली, छिन्न्मस्ता, बगलामुखी धूमावती महाविद्या साधनाएं है उसी प्रकार जीवन में पूर्णधन, यश, सम्मान के लिये तारा, कमला, त्रिपुर संदरी, भुवनेश्वरी की भी साधनायें है।
लाखों साधनायें है और हजारों मंत्र है, उनमें से दस महाविद्याओं को महत्वपूर्ण माना गया है। उनमें जैसे एक काली महाविद्या है जो शत्रुओं के संहार के लिये है फि़र भुवनेश्वरी महाविद्या है जो पूर्ण सम्पन्नता प्रदान करती है, फि़र बगलामुखी महाविद्या है जो शत्रुओं का संहार करने में सहायक या मुकदमें में सफ़लता के लिए सहायक है, फि़र धूमावती अत्यंत प्रचंड देवी है जो सब कष्टों को समाप्त करती है। इस प्रकार दस महाविद्या हैं और उनमें तारा महाविद्या को भी श्रेष्ठ माना गया है जो कि आर्थिक उन्नति और आकस्मिक धन प्राप्ति में सहायक है और तारा के विजय में कहा गया है।
महाविद्या सथागं भव देव रूपं
तारा वर्तै धान्य धनं च,
पुतं वतां पौत्र मदैव स्वास्थ्यं
देहं सदा है भव देव नित्यं।
महाविद्या साधनाओं को इसलिये अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया कि आज के युग में भी हम ईमानदारी के साथ सम्पन्न बनना चाहते हैं। हम न बेईमानी करना चाहते और न ही किसी के सामने हाथ फ़ैलना चाहते है, न बाधायें, कठिनाई चाहते हैं। इन सबको दूर करने के लिए तारा साधना श्रेष्ठ मानी गई है। तारा आर्थिक उन्नति के लिए श्रेष्ठतम महाविद्या है। किसी भी प्रकार का ऋण हो वह समाप्त हो जाता है और आकस्मिक धन प्राप्ति के लिये तारा विशेष रूप से सहायक है। हम उम्मीद न करें और धन प्राप्त हो जाता है। व्यापार वृद्धि और नौकरी में उन्नति भी तारा साधना द्वारा संभव है।
आज से पैंतालीस साल पहले मैंने तारा महाविद्या की साधना का प्रयोग किया था। इस महाविद्या की साधना का मैं इच्छुक था और संन्यासी जीवन था। संन्यासी का अर्थ यह नही कि उसे धन की आवश्यकता ही न हो। मैं जब संन्यासी था तो मेरे साथ हजार बारह सौ शिष्य होते थे। हजार बारह सौ को सुबह खाना खिलाना और शाम को खाना खिलाना एक संन्यासी के लिए कठिन होता है और भीख मैं मांगता नहीं था शिष्यों को भी कहा हुआ था कि भीख तुम्हें नहीं मांगनी है। संन्यासी अगर भीख मांगता तो वह देगा भी क्या लोगों को। मैंने तारा को सिद्धि किया हुआ था और कभी कोई कमी महसूस हुई ही नहीं। मगर उससे भी बहुत पहले जब मैं तारा सिद्धि करना चाहता था तो जो गुरू मिले एक संन्यासी थे जिनकी उम्र नब्बे वर्ष थी। अभी भी है वो। उनसे मैंने निवेदन किया कि मैं तारा साधना में सिद्धि चाहता हूं और आप तारा महाविद्या में अपने आपमें सर्वश्रेष्ठ है तो तारा प्रत्यक्ष हो, मैं पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लूं ऐसा मैं चाहता हूं।
उन्होंने कहा-मैं साधना सिद्ध करा दूंगा मगर शर्त एक रहेगी कि सेवा के द्वारा ऐसा संभव है। छः महीने तू मेरी लंगोट धोयेगा तो मैं तारा सिद्धि कराऊंगा। अब छः महीने का समय इतना लंबा चोड़ा और मेरे लिए एक-एक दिन की इतनी वैल्यू थी कि एक साधना सीख लूं फि़र आगे बढूं। मैंने कहा छः महीने की अवधि देने का कोई फ़ायदा है क्या? देना चाहते है तो अभी दे दीजिये। नही तो मना कर दीजिए, कोई भरोसा तो है नहीं। छः महीने बाद आप दे ही देंगे। आप कहेगे निखिल तुमने यह गलती कर दी सेवा में, एक मिनट में मेरे छः महीने बेकार हो जाएंगे। उन्होंने कहा- संशय आत्मा विनश्यति। संशय करने वाला शिष्य सफ़लता प्राप्त नहीं कर सकता। या तो मेरा भरोसा कर या चला जा।
मैं वहां रूका, रोज आंगन लीपता, सेवा करता। देहरादून से आगे सहस्त्र धारा है, वहां से भी पैंतालीस किलोमिटर आगे आश्रम था तब उनका। मैं छः महीने रहा और छः महीने बाद उन्होंने मुझे तारा दीक्षा दी और साधना बताई और उसके बाद मुझे कभी भी किसी के आगे हाथ नहीं फ़ैलाना पड़ा और न आगे चलकर मैंने अपने संन्यासी शिष्यों को कहीं हाथ फ़ैलाने दिया। इस प्रकार जूझते हुए मैंने एक-एक महाविद्या का सिद्ध किया और आपका भाग्य सोने की कलम से लिखा हुआ है कि आप मेरे पास आते हैं ऊपर पंखा चला रहा होता है। और आप मिनट में मुझसे साधना का ज्ञान प्राप्त कर लेते है। अब आप खुद सोच लीजिए कि मेरी तकदीर अच्छी है या आपकी तकदीर अच्छी है। इतने परिश्रम के बाद मुझे ये साधनायें मिली। और यह मेरी गुरू रूप में डॅयूटी है कि किसी के आगे तुम्हारा हाथ नहीं फ़ैले।
गुरू की डॅयूटी है कि शिष्यों को गरीब न रहने दें। मैं नही चाहता कि तुम भिखारी रहो, तुम्हारे ऊपर कर्जा हो। और महाविद्याओं जैसी साधनायें होते हुए तुम दरिद्र हो तो यह तुम्हारी न्यूनता है। मेरी न्यूनता नहीं हैं क्योंकि मैं तो तुम्हें सही ज्ञान दे रहा हूं। तुम उसका ठीक से प्रयोग न करो तो कमी तुम्हारी हैं। मैं तो बता रहा हूं। कि महाविद्या साधना अपने आपमें श्रेष्ठ है, शत्रुओं, समस्याओं, रोगों, बाधाओं के निवारण के लिये भी और पूर्ण धन सम्पन्न, यशवान, ऐश्वर्यवान होने के लिये भी।
आपके लिये तो केवल आवश्यक है कि आप आगे बढ़ कर इन महाविद्या साधनाओं को प्राप्त कर लें और पूर्ण श्रद्धा समर्पण एवं विश्वास के साथ इनको सम्पन्न करें। फि़र जीवन में आपके कोई कमी व्याप्त हो ही नहीं सकती। इन साधनाओं के प्रति आपकी श्रद्धा जाग्रत हो और आप पूर्ण लगन के साथ, पूर्ण क्षमता के साथ इन्हें सम्पन्न कर सकें, ऐसा ही मैं हृदय से आशीर्वाद दे रहा हूं, कल्याण कामना करता हूं।
सद्गुरूदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंदजी
नवरात्रि महापर्व का शक्ति युक्त मंगलमय आशीर्वाद
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