





उनकी बढ़ती ख्याति को देखकर देवराज इन्द्र का सिंहासन डोल उठा। देवराज ने सोचा कि अवश्य ही महर्षि दधीचि इन्द्रासन को प्राप्त करने के लिये इतनी घोर तपस्या में तल्लीन हैं। यदि ऐसा हुआ तो उनके तेज बल से अवश्य ही इन्द्रासन उन से छिन जायेगा। ऐसी स्थिति में मेरा क्या होगा? कौन मुझे सम्मान देगा? कौन मुझे देवराज कह कर पुकारेगा? यह सारा वैभव, भोग, विलास सब तो छिन जायेगा मुझ से! ऐसा सोच कर देवराज ने महर्षि दधीचि की तपस्या को भंग करने के लिये अनेकों अप्सराओं को भेजा। देवराज की आज्ञा पर वे अप्सरायें महर्षि दधीचि के तप स्थान पर पहुंची व उन्हें रिझाने में संलग्न हो गईं। पर महर्षि दधीचि तो टस से मस न हुये। अपने अनेकों प्रयास के बाद भी वे अप्सरायें असफल ही रहीं और अंत में अपनी हार मान कर सभी वापस लौट गईं।
इधर अपनी कठोर परिश्रम से महर्षि दधीचि ने ब्रह्मविद्या को सिद्ध कर लिया था जिसके फल स्वरूप इन्होंने किसी भी मृत व्यक्ति को जीवित करने की सिद्धि प्राप्त कर ली थी। जब इन्द्र को यह ज्ञात हुआ कि अप्सरायें असफल हो कर लौटी हैं तो देवराज के क्रोध की कोई सीमा न थी। ऐसा होना स्वाभाविक भी था क्योंकि देवताओं के राजा की एक तरह से हार ही हुई थी। क्रोध में आकर देवराज अप्सराओं को दण्ड देने ही वाले थे कि तभी किसी देव ने उद्घोष किया, ‘क्रोधित न हो देवराज इन्द्र! यह तपस्या तो महर्षि दधीचि ने ब्रह्मविद्या में सिद्धि प्राप्त करने के लिए की थी’।
एकाएक देवराज का क्रोध शांत हो गया और उन्होंने राहत की सांस ली। अपने इन्द्रासन की ओर देखते हुये देवराज मन ही मन अत्यन्त प्रसन्न हो रहे थे। एकाएक देवराज के मन में विचार आया, ‘ब्रह्मविद्या! यह तो वही विद्या है जिसे जानने के उपरान्त कोई भी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त नहीं होता। ऐसी विद्या तो मुझ जैसे राजा के पास होनी परम आवश्यक है। मुझे महर्षि दधीचि से इस विद्या को प्राप्त करना चाहिये।’ ऐसा सोचकर देवराज इन्द्र महर्षि दधीचि के आश्रम की देवराज ने उनका अभिनन्दन किया और अपने आने का कारण बताया।
महर्षि दधीचि ने उनका उचित सम्मान तो किया पर उन्होंने देवराज को ब्रह्मविद्या का ज्ञान देने से इन्कार कर दिया। महर्षि दधीचि के इन्कार से देवराज हतप्रभ रह गये, उन्हें यह समझ में नहीं आया कि महर्षि दधीचि ने उन्हें यह विद्या देने से इन्कार क्यों किया।
देवराज इन्द्र ने अत्यन्त ही विनम्रता से पूछा कि महर्षि दधीचि ने उन्हें यह विद्या देने से इन्कार क्यों किया? इस पर महर्षि दधीचि ने कहा देवराज इन्द्र उन्हें इस विद्या को प्राप्त करने के लिये उचित पात्र नहीं लगे और इसी कारण से उन्होंने इस विद्या को देने से इन्कार कर दिया है। यह सुनना था कि देवराज का क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुंचा। देवराज इन्द्र ने यह प्रण लिया कि यदि महर्षि दधीचि ने यह विद्या किसी और को प्रदान की तो वह महर्षि दधीचि का सिर धड़ से अलग कर देंगे। इतना कह कर इन्द्र क्रोध में अपने पैर पटकते हुए वापस इन्द्रलोक आ गये।
इधर अश्विनी कुमार को भी पता चला कि महर्षि दधीचि को ब्रह्मविद्या का ज्ञान है तो वो महर्षि दधीचि के आश्रम में पहुंचे और उन्हें अपना गुरु मान कर उनकी सेवा करने लगे। एक दिन महर्षि दधीचि ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उनसे मनचाहा वर मांगने की आज्ञा दी। महर्षि दधीचि के मुख से ऐसे वचन सुनकर अश्विनी कुमार ने ब्रह्मविद्या के ज्ञान को प्राप्त करने की इच्छा बताई। महर्षि दधीचि तो पहले ही परख चुके थे कि अश्विनी कुमार उचित पात्र हैं पर उन्होंने अश्विनी कुमार को इन्द्र के प्रण के बारे में भी बताया। उनकी बात सुनकर अश्विनी कुमार ने एक उपाय बताया।
अश्विनी कुमार ने महर्षि दधीचि के सिर को काट कर उसकी जगह एक अश्व का सिर लगा दिया और महर्षि दधीचि के सिर को सुरक्षित स्थान पर रख दिया। फिर महर्षि दधीचि ने अश्विनी कुमार को ब्रह्मविद्या का ज्ञान प्रदान किया। इधर जैसे ही इन्द्र को यह ज्ञात हुआ कि महर्षि दधीचि ने ब्रह्मविद्या का ज्ञान अश्विनी कुमार को प्रदान किया है, वह तुरन्त आये और महर्षि दधीचि के अश्व मुख को उनके धड़ से अलग कर दिया और अश्विनी कुमार पर क्रोधित होते हुये उसे इन्द्रलोक से निकाल दिया। इधर इन्द्र के जाने के उपरान्त अश्विनी कुमार ने पुनः महर्षि दधीचि के सुरक्षित रखे मुख को उनके धड़ से जोड़ा और ब्रह्मविद्या के ज्ञान से उन्हें पुनः जीवित कर दिया। ऐसी प्रक्रिया कर के न केवल महर्षि दधीचि ने ब्रह्मविद्या के ज्ञान को जीवित रखा, अपितु गुरु-शिष्य परम्परा को भी आगे बढ़ाया।
कुछ समय उपरान्त वृत्रासुर नामक राक्षस ने देवलोक पर आतंक मचाना प्रारम्भ कर दिया। उसकी शक्ति के सामने सभी देवता पराजित होते चले गये। अब देवराज इन्द्र को पुनः देवलोक पर खतरा मंडराता हुआ प्रतीत हो रहा था। वृत्रासुर ने ब्रह्मा जी को अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न कर यह वर प्राप्त कर लिया था कि उसकी मृत्यु किसी भी अस्त्र या शस्त्र से नहीं हो और न ही किसी लकड़ी या धातु से बने किसी भी पदार्थ से हो। इस कारण से उस पर देवताओं के द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले सभी अस्त्र-शस्त्र बेकार होते जा रहे थे। अंततः वह दिन भी आया जब देवराज को इन्द्रलोक से निष्कासित होना पड़ा। सभी देवता इस असमंजस में थे कि किस प्रकार से इस दैत्य पर विजय प्राप्त की जाये।
सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे रक्षा के लिये निवेदन करने लगे। तब ब्रह्मा जी ने बताया कि उनकी रक्षा केवल पृथ्वी लोक पर रह रहे महर्षि दधीचि ही कर सकते हैं। महर्षि दधीचि ने अपनी तपस्या से अपनी हड्डियों को इतना कठोर बना लिया है कि वही वृत्रासुर का नाश करने में सक्षम है। ब्रह्मा जी के वचन सुन सभी देवता महर्षि दधीचि के आश्रम में पहुंचे। देवराज इन्द्र तो अपनी करनी के कारण उनसे आंख भी नहीं मिला पर रहे थे। पर महर्षि दधीचि ने सभी देवताओं का सहर्ष स्वागत किया। उनके आने का कारण जानते ही महर्षि दधीचि ने देवताओं से आग्रह किया कि वो उनको मार कर उनकी हड्डियों को ले लें। यह सुन कर सभी देवता सकते में आ गये क्योंकि कोई ब्रह्म हत्या का दोष अपने ऊपर नहीं लेना चाहता था। उनकी बाते सुनकर महर्षि दधीचि ने अपने प्राण स्वतः त्याग दिये और उनकी रीढ़ की हड्डियों से इन्द्र का वज्र बना जिसे प्रयोग कर इन्द्र वृत्रासुर को मार कर पुनः देवलोक को प्राप्त करने में समर्थ हो सके।
इधर महर्षि दधीचि की पत्नी जब लौटी तो अपने पति को मृत देख कर अत्यन्त ही भाव विहवल हो गईं। उन्होंने उसी क्षण प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया परन्तु देवताओं ने उनके गर्भवती होने के कारण उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी। यह सुनकर उन्होंने अपने गर्भ को एक पीपल के पेड़ को सौंप कर मृत्यु का वरण किया। उस गर्भ से सही समय आने पर एक बालक का जन्म हुआ और वह बालक आगे चल कर ऋषि पिप्लाद बने। पीपल के वृक्ष से जन्म लेने के कारण उनका यह नाम पड़ा।
महर्षि दधीचि का व्यक्तित्व इतना महान था कि आज तक उनके जैसे त्यागी और दानी व्यक्ति का जन्म संसार में नहीं हुआ। जो मनुष्य के लिये ही नहीं अपितु देवताओं के लिये भी पूजनीय हैं। ऐसे उच्चकोटि के महाऋषि को कोटि-कोटि नमन है। मानव जीवन व संसार के कल्याण में किया गया उनका यह त्याग सदा ही स्मरणीय रहेगा।
सांसारिक व्यक्ति की धारणा होती है कि आद्या शक्ति और सृष्टि की पालन करने वाली महालक्ष्मी का चिंतन, ध्यान, आराधना के माध्यम से शक्ति युक्त हो आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो सके। इसी हेतु आद्या शक्ति स्वरूपा मां समलेश्वरी के चैतन्य भूमि पर 19-20 सितम्बर को समलेश्वरी धनदा लक्ष्मी साधना महोत्सव सम्बलपुर में सम्पन्न होगा। जिससे जीवन के शुभ-निशुम्भ रूपी अवरोधों व सभी दुगर्ति का शमन कर साधक पराक्रमी योद्धा की भांति जीवन के सभी क्षेत्र में विजयी और चंहुमुखी प्रगति की ओर बढ़ सकेगें।
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