





ऊँ अस्तित्व की गूंज है। वह कोई शब्द नहीं है, कोई ध्वनि नहीं है, वह तो अनाहत नाद है। उसको कोई उत्पन्न नहीं कर रहा है, वह तो अस्तित्व के होने का ढंग है। जैसे पहाड़ से नदी बहती है तो कलकल का नाद होता है, जैसे पक्षी गीत गा रहे है, हवायें चलती है तो पेड़ो से सरसराहट पैदा होती है- ऐसा अस्तित्व के होने का ढंग ऊँकार है। उसको कोई उत्पन्न नहीं कर रहा है। उसके पैदा होने के लिए दो चीजों के आघात की जरूरत नहीं है, इसलिए अनाहत है! वह आहत नाद नहीं है। हथेली बजाना- आहत नाद है दो चीजें टकराती है- ध्वनि पैदा हो जाती है। ऊँकार कोई टकराहट से पैदा नहीं हो रहा है। इसलिए ऊँकार अद्वैत है। जो टकराहट से पैदा होगा। उसमें तो दो की जरूरत है, एक हाथ से ताली नहीं बजती। ऊँकार एक हाथ की ताली है।
संसार का अर्थ है- भूतकाल+भविष्य। जो नहीं होता है उसकी तस्वीरें टांगे हुए हो, उसकी तस्वीरों की याद तुम्हें रूला रही है और जो अभी घटित हुआ नहीं है, उसकी तृष्णा का जाल फैलाया हुआ है, उन 100 सपनों में 99 तो कभी पूरे होंगे नहीं, इसलिए रूलाएंगे ही कांटों की तरह चुभेंगे, दर्द छोड़ जाएंगे और जो एक पूरा होगा वह भी कभी नहीं होता, पूरा होकर भी पूरा नहीं होता। धन चाहोगे तो धन मिल जाये परन्तु धन मिलने के बाद हैरानी होती है कि धन तो मिल गया, लेकिन जिस इच्छा से धन चाहा था वह इच्छा तो पूरी नहीं हुई। सोचा था धन मिलेगा तो तृप्ति हो जाएगी। वह संतोष तो उतना ही दूर है जितना पहले था। इस संसार से मुक्त होने का एक ही उपाय है और वो है- वर्तमान के क्षण में जितनी समग्रता से जीओ। उसे ही ध्यान और संन्यास कहते हैं, वही समस्त गुरूओं के उपदेश का सार है। क्षण के आगे-पीछे मत जाओ, क्षण पूर्ण है। और जब क्षण बीत जाये तो उसमें रूकावट मत डालो, बीत जाने दो प्रसन्नता, आनन्द से और जो नहीं मिला है उसमें हिसाब-किताब मत लगाओ, जब मिलेगा, जब सामने होगा, उस समय फलित होगा तुम्हारे चेतना के दर्पण में। तब उसे जीना और जब तक नहीं मिला है तब तक योजना मत बाँधो।
एक व्यक्ति का विवाह नहीं हुआ इसलिए रो रहा है सिर पीट रहा है और एक विवाहित हो गया है, इसलिए रो रहा है और सिर पीट रहा है और ऐसा सारे जगत में घटित हो रहा है। धीर-धीरे तोड़ो जमीन टूटेगी कभी चट्टानों पर पानी की धार को गिरते देखा है। चट्टानें बड़ी मजबूत होती है। शुरू में लगेगा असंभव है कि पानी की धार भी कभी चट्टानों को तोड़ पाएगी। रस्सी आते-जाते कठोर चट्टान पर भी निशान छोड़ देती है। पानी की धार भी गिरते-गिरते चट्टान तोड़ देती है, चट्टानों को रेत कर देती है। ऐसी ही प्रक्रिया ध्यान है। ध्यान एक कोमल प्रक्रिया है। जैसे कोई फूल और तुम्हारे मन की आदतें चट्टानों की तरह कठोर, वजनदार बहुत भारी है पर घबराओं मत वे मर चुकी हैं और तुम्हारा फूल जैसा ध्यान जीवित है और जीवन में असली ताकत है, आदत चाहे कितनी भी कोमल क्यों न हो। जीवित फूल मुर्दा चट्टानों को तोड़ देगा। तुमने कभी देखा होगा कि चट्टानों में से बीज फूट कर वृक्ष बन जाते है। चट्टान दरक जाती है। जीवित था बीज, चट्टान को तोड़ गया, पेड़ फूट आया। चट्टानों में से पेड़ो को निकलते देख कर तुम्हें हैरानी नहीं हुई कभी? जीवन की अद्भुत शक्ति होती है, एक छोटा सा बीज कितनी ऊर्जा लिए हुये था! न केवल अंकुरित ही हुआ खुद टूटा ही नहीं बल्कि चट्टान को भी तोड़ गया है।
इसी प्रकार आज जो बीज की तरह है ध्यान है वह कल पेड़ बनेगा, उसमें फूल भी आएंगे और फल भी आयेंगे और सुगंध भी उठेगी। चिंता मत करो मुश्किल सा लगता है, लेकिन संभव होता है ऐसा मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं। मुझे भी असंभव सा लगता था, सालों असंभव सा ही लगता रहा। लेकिन मैं अधीर नहीं हुआ। जितना असंभव लगा मैंने उतनी ही अपनी ऊर्जा लगा दी, चुनौती स्वीकार की। बस चुनौती को स्वीकार करने की बात है। फिर ध्यान एक अद्भुत अभियान है। चाँद-तारो पर पहुंचना आसान है, ध्यान या समाधि में पहुंचना सरल है कठिन नहीं। मगर चांद-तारों पर पहुंच कर भी क्या करोगे?
संसार में दो तरह के व्यक्ति होते हैं- भोगी और त्यागी- त्यागी भोगी से अलग है, क्योंकि वह शरीर को सब कुछ नहीं मानता, वह शरीर को इतना मूल्य का भी नहीं मानता कि उसका त्याग करना भी सार्थक हो सके। जिसका मूल्य ही नहीं, उसका तुम कभी त्याग करते हो? क्या तुम रोज कहते हो, घर के बाहर जोर से चिल्ला कर कि आज फिर घर के कूड़े का त्याग कर दिया। देखो, कैसा महादानी हूं! घर का कूड़ा त्याग करते वक्त कोई भी तो घोषणा नहीं करता। तुम घोषणा करोगे तो लोग पागल समझेंगे।
लेकिन जब कोई त्यागी घोषणा करता है कि मैंने लाखों पर लात मार दी तो वह भोगी ही है। अभी भी लाखों का मूल्य है। अभी भी समझता है इसका कुछ सार है। पहले भोग के लिए पकड़ा था, अब छोड़ा है, लेकिन मूल्य की पकड़ तो नहीं छूटी। लाखों को लात मार दी जब कोई आदमी कहता है लाखों को लात मार दी तो समझ लेना कि लात ठीक से लग नहीं पाई, चूक गई। लग ही जाती तो लाखों का हिसाब रखता क्या? ना तो योगी भोगी है और ना त्यागी- वह इन दोनों से अलग है। वह एक अनूठा ही व्यक्तित्व है। वह कुछ-कुछ भोगी जैसा है, कुछ-कुछ त्यागी जैसा है। उसने भोग और त्याग के बीच सामंजस्य खोज लिया। उसने भोग और त्याग के बीच संगीत खोज लिया। क्योंकि परमात्मा भोग में भी है और त्याग में भी। परमात्मा भोगी और त्यागी दोनों में छिपा है। उसने यह राज ढूढ लिया, उसने देख लिया की भोग एक किनारा है और त्याग दूसरा किनारा और परमात्मा तो बीच में बहती हुई नदी की धारा है।
व्यक्ति अपने जीवन में क्रांति की शुरूआत बना सकता है। अगर वह याद रख सके तो, तुम रोज-रोज धनी होते जाओगे। तुम रोज-रोज एक बड़े साम्राज्य के मालिक होते जाओगे। यह भी हो सकता है कि बाहर से देखने पर एक दिन तुम गरीब हो जाओ, लेकिन अन्दर तुम्हारे सम्राट होगा। और अगर तुम धन, पद-प्रतिष्ठा, प्रेम सब इकट्ठा करने में लग गये तो यह हो सकता है कि ऊपर से एक दिन तुम सम्राट दिखाई पड़ो, लेकिन अन्दर तुम दीन और दरिद्र। परमात्मा तुम्हारे अन्दर का आंकलन करता है। वह तुम्हारे बही-खाते नहीं देखेगा, वह तुम्हारी अंतरात्मा देखेगा। वहां वही लिखा जाता है जो तुम लुटाते-बाँटते हो। फिर बाँटने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वस्तुएं ही बांटो। जो तुम्हारे पास हो, तुम गीत गा सकते हो तो गीत गाओ। तुम प्रेम दे सकते हो, प्रेम दो। अगर तुम ज्ञान दे सकते हो, ज्ञान दो, ध्यान दे सकते हो, ध्यान दो। तुम जो दे सकते हो, जो तुम्हारे पास है, तुम उसी को बांटने का माध्यम बन जाओ और तुम रोज-रोज पाओगे, जो तुम बांट रहे हो वह बढ़ता जाता है और अधिक बढ़ता जाता है। कहां तुम बूंद थे और एक दिन देखोगे कि सागर बन गये।
तुम स्वयं एक सागर हो। तुम्हारी चेतना की एक छोटी सी लहर इस सारे संसार को डूबा सकती है। ऊपर से देखो तो बूंद हो अन्दर से पहचानो तो सागर हो। ऊपर से देखो तो बहुत छोटे अन्दर से देखो तो तुम्हारी कोई शुरूआत नहीं कोई अंत नहीं। ऊपर से देखो तो क्षणभंगुर और अन्दर से देखो तो सनातन, शाश्वत। ऊपर से देखो तो नाम है, धाम है, पता-ठिकाना है, विश्लेषण है, जाति है, धर्म है, देश है, अन्दर से देखो तो तुम अनिर्वचनीय हो।, ब्रह्म-स्वरूप हो तुम! तुम्हारे चैतन्य में उठी छोटी सी लहर सारे अस्तित्व को भिगो देगी। जिस समय तुम तैयार हो जाओंगे, जैसे सागर में नदी खोने को राजी हो जाती है, गिर जाती है, तो खोती नहीं है पूरा सागर उसका अपना हो जाता है। लेकिन उसके लिए तो नदी को भी बड़ी लंबी यात्रा करनी पड़ती है। गंगोत्री से लेकर समुद्र तक आते-आते गंगा को कितनी यात्रा करनी पड़ती है। गंगा बहती है उस सागर से एकाकार होने के लिए लेकिन सागर तो बड़ा दूर है गंगा को नहीं पता फिर भी गंगा उसी को खोजती हुई अनंत यात्रा करती है। उसी गंगा के किनारे तीर्थ बनते चले जाते हैं।
हमने क्यों नदियों के किनारे तीर्थ बनाए है? कारण है। क्योंकि नदियां सागर की तरफ जा रही है, खोने की तरफ जा रही है, मिटने की तरफ जा रही है। जहां तुम्हें खोने का बोध मिले, जहां शून्य होने की सामर्थ्य मिले। इसलिए गंगा पर हमने तीर्थ बनाए हैं। वह गंगा जा रही है सागर की तरफ और शायद उसे भी पक्का पता नहीं है। तुम मेरे पास आ गए हो, शायद तुम्हें भी ठीक-ठीक पता नहीं, तुम क्यों आ गए हो। अनंत-अनंत कारण ले जाते हैं, संयोग लाते हैं, जन्मों-जन्मों की यात्रा ले आती है। तुम्हें पता भी नहीं हो सकता।
शक्ति की तपोभूमि प्रयाग त्रिवेणी को वेद का मूल बीज कहते है, गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम स्थल शिव स्वरूप में है, तीर्थ दो प्रकार के होते है प्रथम कामना पूर्ति करने वाला और दूसरा मोक्ष प्रदान करने वाला है। जहां पर महाकुंभ मेले का आयोजन हजारों वर्षों से हो रहा है और इसी के प्रभाव से प्रयाग की भूमि भक्त को अमृत स्वरूप कामना और मोक्ष दोनों ही प्रदान करती है। ऐसी ही तेजमय और पूर्ण देव स्वरूप भूमि पर आद्या शक्ति का महापर्व पूज्य गुरुदेव के सानिध्य में शक्ति के पूर्ण चैतन्य दिवसों में भौतिक और आध्यात्मिक कामनाओं की पूर्ति में निरन्तर वृद्धि हेतु शारदीय नवरात्रि अमृत सिद्धि साधना महोत्सव का आयोजन 27, 28 सितम्बर को त्रिवेणी संगम तट, इलाहाबाद (उ- प्र-) में सम्पन्न होगा।
गुरु अपने किसी भी मानस पुत्र-पुत्रियों को दुखी संताप युक्त और हताश नहीं देखना चाहता। गुरु जीवन को श्रेष्ठ रूप से जीने के लिए आपके हाथ में शक्ति के उत्साह का वज्र थमा देते हैं। हमारी इन सप्तपुरियों में श्रेष्ठतम उज्जैन की पावन भूमि व क्षिप्रा नदी में चेतना शक्ति है जो हमारे पाप दोषों को धोती है। अपने पूर्व जन्मों के दोषों और पितृ दोषों के स्वरूप जीवन में जो मलिनता आती है, उसका पूर्णरूपेण हरण कर काल भैरव शिव-शक्ति द्वारा आप अपना भौतिक और आध्यात्मिक जीवन अपनी इच्छानुसार जी सकते हैं। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के पितृ दिवसों में प्राचीन महाकाल ज्योतिर्लिंग स्वरूप महादेव की नगरी में चैतन्य शक्ति पीठ मंदिर में पूजा व स्तुति करने से साधक अपने पूर्वजों के मोक्ष प्राप्ति की क्रिया क्षिप्रा तट पर कर अपने जीवन को सभी सुखों से युक्त कर सके साथ ही सांसारिक सुखमय जीवन, पुत्रोत्पत्ति, आयु वृद्धि, निरन्तर मंगल कार्यों में वृद्धि की प्राप्ति होती ही है। इसी हेतु कालभैरव महामृत्युंजय पितृ दोष मुक्ति साधना शिविर का आयोजन 19-20-21 सितम्बर को महाकालेश्वर मंदिर प्रांगण, उज्जैन (म-प्र-) में स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज के दिव्य आशीर्वाद और सद्गुरुदेव के सानिध्य में सम्पन्न होगा। इन तीन दिवसों में आत्म शुद्धि, पूर्व जन्मकृत दोष, सर्व पितृ दोष निवारण तर्पण, पिण्ड दान, कालसर्प दोष मुक्ति नव ग्रह हवन, शिव-गौरी लक्ष्मी साधना, महामृत्युंजय शिव स्वरूप स्व रूद्राभिषेक की चेतना को साधक आत्मसात कर आने वाले शक्ति पर्व पर क्रियाशील हो सकेगे। ऐसे दिव्य स्थलों पर गुरु के सान्निध्य में यात्रा करने से पूर्णता की प्राप्ति होती है क्योंकि जहां दो भाव मिलते है वहां पूर्णता आती ही है।
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