





प्रथम प्रभुतं प्रणमेव रूपं, गुरुवै सहम्यं सहदेव नित्यं
अचित्यं रूपं मपर वदैव, दव्यं परेशा प्रणनां परेशं
फिर आ गई गुरु पूर्णिमा लेकिन आज भी सद्गुरुदेव द्वारा दिये गये ये प्रवचन शाश्वत सत्य है जो पूरे मन मस्तिष्क को हिलाकर रख देते हैं। इस प्रवचन में एक ऐसा ही आहवान हैं जिसे सुनकर पढ़कर एक एक रक्त-कण स्पन्दित होने लगता है-
शास्त्रों में सैकड़ों ग्रंथ, हजारों ग्रंथ लिखे गए हैं, कोई एक या दो ग्रंथ नहीं, जब चारों वेदों की रचना हुई तो उन चारों वेदो को समझने के लिए उपनिषदों की रचना हुई। उपनिषद् लिखे गए और 108 उपनिषदों में भी ऋषि अपनी पूरी बात नहीं कह पाए। उन 108 उपनिषदों की वजह से ही हमारी माला के मनके 108 होते हैं। इसीलिए 108 की संख्या हम शुभ मानते हैं।
और इसीलिए उन 108 उपनिषदों में गुरु उपनिषद् सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि वशिष्ठ ने यह कहा कि- उपनिषदों वै गुरुर्वै संताम्यो अगर सब कुछ प्राप्त करना है तो गुरु उपनिषद् के अलावा कोई ग्रंथ प्रामाणिक नहीं है।
विश्वामित्र ने इसी प्रकार की बात कही है, अत्रि ने इसी प्रकार की बात कही है। यहां तक शंकराचार्य ने यह कहा कि मैंने अपने जीवन में समस्त ग्रंथों को निचोड़ा है, पीया है, अनुभव किया है और मैं दावे के साथ यह कह सकता हूं कि गुरु उपनिषद् से बड़ा कोई ग्रंथ नहीं है। चाहे ऋगवेद हो, चाहे यजुर्वेद हो, चाहे सामवेद हो चाहे अथर्वेद हो। इसलिए नहीं है कि उन वेदों को समझने के लिए गुरु की ही आवश्यकता होती है। वही समझा सकता है कि वेद क्या हैं, वही समझा सकता है उपनिषद् क्या हैं, वही समझा सकता है कि जीवन क्या है, वही समझा सकता है कि पूर्णता क्या है।
और मैंने जो श्लोक दिया है, वह गुरु उपनिषद् का श्लोक है और इस श्लोक में बहुत ही उत्तम कोटि की बात कही गई है, उत्तम कोटि की बात इसलिए कि ठीक इसी श्लोक को शंकराचार्य ने भी कहा अपने शंकरभाष्य में जो कि उनका सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है और जिसका आज पूरे संसार में अनुवाद हुआ है। फ्रेंच में अनुवाद हुआ है, उसका सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ है, इसका इंग्लिश में अनुवाद हुआ है। कठिन ग्रंथ है फिर भी इस बात को स्वीकार किया है। अंग्रेज विद्वानों ने अमेरीकीयों ने, फ्रांस के, जापान के, जर्मनी के विद्वानों ने भी कि इसमें जो भी तथ्य है वह अपने आप में अद्वितीय हैं। और वही भाव शंकराचार्य ने अपने श्लोक में कहा है कि-
सदावै परेशं गुरुर्वै पदे पूर्ण मदैव नित्यं
अचित्यं रूप सहितं सदैवः आत्मानुभूति परंम परसं परैव
उस श्लोक का अर्थ और उस श्लोक का अर्थ एक ही है। पर वह श्लोक लिखा गया आज से 3000 साल पहले। इसलिए सैंतीस हजार साल तक यह विचार हमारे शास्त्रों में मंथन करता रहा कि यही जीवन का सार है, यही जीवन का आधार है, यही जीवन की पूर्णता है। ऐसा इस श्लोक में क्या हैं? क्यों इस श्लोक को इतनी महत्ता दी गई है?
इस श्लोक में यह बताया गया है कि व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है ही नहीं। पूर्ण तो प्रभु पैदा करता है। जब एक गर्भ में बालक होता है तो वह पूर्ण होता है। इसलिए पूर्ण होता है कि बहुत अच्छा उसको भीतर अनुभव होता है। इस श्लोक के भाष्य की बात कर रहा हूं मैं श्लोक का अर्थ तो बाद में करूंगा। इस श्लोक का भी भाष्य किया गया, इसका सरलार्थ किया गया, उस सरलार्थ का भी सरल अर्थ किया गया तब लोगों को कुछ समझ में आया।
उसने कहा कि बालक जब गर्भ में होता है तो वैसी ही सुख सुविधा होती है जैसी किसी करोड़पति को अपने ड्रांइग रूम में बैठने पर होती है। ड्रांइग रूम में न सर्दी लगती है न गर्मी लगती है क्योंकि एयर कंडिशन होता है, हीटर लगा होता है, एक सोफा लगा होता है बहुत अच्छा, उसे किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती है और भोजन की चिंता नहीं होती, खाने कमाने की चिंता नहीं होती, सब कुछ सुविधाएं होती हैं।
ठीक वैसी ही सुविधाएं उस गर्भ के बालक को होती हैं। कोई तकलीफ नहीं होती, न सर्दी, न गर्मी, न बरसात, न चिंता, न परेशानी, न तनाव और इसके बावजूद भी वह उन सब सुखों को लात मार करके जन्म ले लेता है। इसलिए उसको पूर्ण माना गया है। इतनी सुख सुविधाओं को लात मार करके और उस कोलाहल भरे विश्व में वह आ जाता है क्योंकि जन्म होते ही सैकड़ों बंधन उसके गले में पड़ जाते हैं, जिस मिनट में पैदा हुआ, अगर सात बजकर इक्तालिसवें में पैदा हुआ तो इक्तालिसवें मिनट में ही उसके 200 बंधन पड़ गए। किसी ने कहा मैं तुम्हारा चाचा हूं, यह एक बंधन, दूसरे ने कहा कि मैं तुम्हारा पिता हूं, तीसरी ने कहा मैं तुम्हारी मां हूं, चौथी ने कहा मैं तुम्हारी दादी हूं, पांचवी ने कहा मैं तुम्हारी नानी हूं। बस बंधन ही बंधन।
एक सैंकेंड नहीं हुआ है और इतने बंधन उसके गले में पड़ गए। और ज्यों-ज्यों जन्म लेकर बड़ा होता रहता है त्यों त्यों और बंधन उसके शरीर को जकड़ते रहते हैं। कोई कहता है मैं तेरी प्रेमिका हूं, कोई कहती है मैं तुम्हारी पत्नी हूं। अंतिम क्षणों तक उन बंधनों के जकड़ा हुआ वह चिता पर जाकर सो जाता है। जन्म से पहले वह ब्रह्म है, जन्म से पहले निर्विकल्प है, जन्म से पहले उसको किसी प्रकार का मोह नहीं है। मोह नहीं है इसलिए उस सुख सुविधा को, उस आनन्द को वह छोड़कर जन्म ले लेता है। इसलिए गर्भ के बालक को ब्रह्म कहा है और गर्भ से जन्म लेने के बाद उसको मनुष्य कहा गया है। उस क्षण जब जन्म होता है, उन्मुक्त भाव से उस बंधन के भाव में आता है तो वह बहुत व्यथित होता है, रोता है, बहुत दुखी होता है, रोने चिल्लाने लग जाता है।
और फिर वह दास गुलाम सा बन जाता है। एक जंगल के शेर को पकड़ कर लाएं और पिंजरे में डालें तो वह ताजा शेर जो आया है जंगल से, बहुत चीखता है, हुंकार भरता है, शलाखें तोड़ने की कोशिश करता है, उछलता है, कूदता है। बहुत रोता है चीखता है और फिर शांत हो जाता है। ठीक वैसे ही वह मनुष्य शांत हो जाता है। तो फिर इन सारे बंधनों को कैसे तोड़ेगें, हम वापस उस स्टेज तक कैसे पहुंचेंगे हम। अगर बंधन में ही मर जाएं हम गुलाम की तरह ही मर जाएंगे, कैदी की तरह ही मर जाएंगे तो फिर जीवन का सार क्या हुआ। मैं आपको ऐसा उपदेश नहीं देता कि आज सब बंधनों को छोड़ दे। मैं यह भी उपदेश नहीं दे रहा कि तुम सब कुछ छोड़-छाड़ कर भगवान का भजन करो, उससे ही सब कुछ हो जाएगा। शंकराचार्य कहते हैं कि यों कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता।
अगर पूर्णता प्राप्त ही नहीं हुई तो जीवन का अर्थ क्या हुआ, जीवन का मर्म क्या हुआ जीवन का सार क्या हुआ। जीवन का आनंन्द क्या है फिर? अगर तुम यह सोच रह हो कि तुम जीवन का आनन्द प्राप्त कर रहे हो तो यह तुम्हारी मृग तृष्णा है। यह तुम्हारी भूल हैं। हम सब अपने आप में एडजस्ट होने की कोशिश करते हैं कि हम बहुत सुखी हैं।
मगर सुखी आप इसलिए है कि उस सुख को आपने देखा नहीं तो आप इसको सुख मान रहे हो। तुमने उस आनंद को देखा ही नहीं तो तुम कैसे कह सकते हो कि यह पूर्ण आनंद है। तुम्हारी जगह तुम्हारे मकान में जहां तुम रहते हो वहां किसी करोड़पति को रख दें तो वह कहेगा दो कमरों के मकान में कैसे रहेंगे, यहां नहीं रह सकते, बहुत गड़बड़ है।, कोई सुख कोई सुविधा नहीं है।
वह दुखी अनुभव कर रहा है और आप सुखी अनुभव कर रहे हैं। इसलिए कि आपने उस जीवन को नहीं देखा, भौतिक दृष्टि से। जिसने जीवन का आनन्द प्राप्त किया ही नहीं, जिसने जीवन में परमहंस अवस्था को प्राप्त नहीं किया, जिसने अपने जीवन में साधना की नहीं, जो अपने जीवन में ध्यान में मेडिटेशन में गया ही नहीं वह कैसे समझेगा कि मेडिटेशन क्या है, ध्यान का आनंन्द क्या है?
जब तुमने कोई चीज खाई ही नहीं तो उस चीज का आनन्द भी आप कैसे अनुभव कर सकते हैं, कैसे उसका वर्णन कर सकते हैं। जिसने मिठाई नहीं खाई वह मिठाई का वर्णन नहीं कर सकता। खाने के बाद कह सकता है अच्छी है, बुरी है। इस श्लोक के पहले अर्थ में कहा गया है यह सार तथ्य है क्योंकि उस बंधन से उस आनन्द तक पहुंचने की जो क्रिया है अगर वह प्राप्त नहीं हुई तो फिर जीवन व्यर्थ है। फिर तो कीड़े मकोड़ों वाला जीवन है। वह तो हरेक जी लेता है। तुम जीवन जी नहीं रहे हो तुम भोग रहे हो। दोनों में अंतर है। मैं जीवन जी रहा हूं तुम भोग रहे हो। यह डिफरेंस है।
भोगने और जीने में अंतर यह है कि तुम हर हालत में दुखी होते रहते हो। नौकरी में चार दिन नहीं गए तो घबराहट कि क्या कहेगा अफसर। पत्नी जोर से बोली तो घबराहट, दो दिन पत्नी नहीं बोले तो भी घबराहट, कि क्या हो गया इसको। हम पूछे की भई तकलीफ क्या है तुझको, क्यों नही बोल रही है, काहे को गुस्सा हो गई है बोले तो तकलीफ, न बोले तो तकलीफ। संतान हो तो तकलीफ, संतान नहीं हो तो तकलीफ। बूढे मां बाप घर में हो तो तकलीफ नहीं हो तो तकलीफ पैसा ज्यादा आए तो तकलीफ कि इन्कम टैक्स वाले आ जांएगे, चोर आ जाएंगे और नहीं हो तो तकलीफ। और तुम उस तकलीफ में सांस लेते रहते हो। और बहुत सुखी महसूस करते हो कि मैं बहुत सुखी हूं।
वह कुत्ता जिसके गले में पट्टा बंधा होता है बहुत अपने आप गर्व से ऊंचा उठकर चलता है कि इस गली के कुत्ते में कुछ नहीं है मैं बहुत बड़ा हूं मेरे गले में पट्टा है। वह भी अकड़ कर चलता है। यह नहीं सोचता कि तेरे गले में पट्टा बंधा हुआ है, जंजीर लिए हुए वह साथ में चल रहा है। मगर वह अकड़ कर चलता है और ज्योंहि वह गली का कुत्ता भौंकता है वह फट से उसके पांव में आकर खड़ा हो जाता है। अगर पट्टा बंधे होने से ही जीवन में आनन्द, आता हो तो भी उसको कुत्ता ही कहते हैं शेर नहीं कहते हैं। शेर के गले में पट्टा नहीं होता। जीवन में अगर तुम आकाश में उड़े ही नहीं तो आप आकाश का आनन्द भी नहीं ले सकते कि आकाश का आनन्द क्या है। एक तोते को पकड़ा बहेलिये ने और पिंजरे में डाल दिया। अब पिंजरे के तोते में बड़ा गुरुर कि उसको कोई तकलीफ नहीं है, तकलीफ इसलिए नहीं कि उसके पांवो में पैंजनिया पहना दी उस मालिक से उसे हरी मिर्च खाने को मिलती है, अनार के दाने खाने को मिलते हैं और बिल्ली उस पर झपटा मार नहीं सकती क्योंकि पिंजरे में बंद है और वह बहुत खुश है कि पिंजरे में बंद है। अब उसका छः महीने या साल भर पिंजरे में रहने दीजिए और फिर बाहर निकालिए आप छोड़ दीजिए, वह उड़ ही नहीं सकता, उड़ना भूल गया वो, वो थोड़ा पंख फड़ फड़ा कर थोडा ऊपर उडे़गा और धम्म से नीचे जमीन पर गिर जाएगा और मालिक को मालूम है कि बाहर बैठा रहने दें तो भी कहां जाएगा क्योंकि उड़ नहीं सकता।
तुम्हारी हालत भी वैसी ही हो गई है पिंजरे में बैठे हो और पिंजरे में बैठे हो और पिंजरे के सीखचे एक पत्नी है, बेटे हैं आसपास के लोग है, चाचा है, चाची है। चारों तरफ तीलियां बांधी हुई है और तुम बहुत खुश हो, कभी अनार के दाने खाने को मिल जाते हैं, कभी हरी मिर्च खाने को मिल जाती है और तुम बड़े खुश हो, पैरों में पैंजनिया बांधी है, पैंजनियां बजाते रहते हो। बाहर निकलते हो थोड़ा पंख फड़फड़ाने की कोशिश करते हो धम्म से बैठ जाते हो और वापस पिंजरे में घुस जाते हो। पिंजरे में बहुत सुख है, बहुत आनन्द है वहां कोई डर नही है। यह सब तो सही है। मगर उस आकाश में उड़ने वाले तोते से तुम तुलना नहीं कर सकते, वह आनन्द कुछ और है जो पंख फैला कर एक मील तक उड़ कर चला जाता है, उस आनन्द को तुम ले ही नहीं सकते उस आनन्द को तुमने देखा ही नहीं उस आनन्द को तुम्हें बताएगा कौन कि आकाश में उड़ने में यह आनन्द है। और अगर उस आनन्द को देखा नहीं तो उस पिंजड़े में पड़े-पड़े तुम मर जाओगे। उसमें तो कुछ बहुत बहादुरी है नहीं क्योंकि तुम्हें उन्होंने पिंजड़े में डाल दिया और पिंजडे में डाला तुम्हारे बाप ने, मां ने, दादा ने, दादी ने कि हम दुखी हैं तो यह सुखी नहीं रहना चाहिए।
यह क्यों सुखी है इसकी भी शादी करो वे कहते हैं बेटा शादी कर लें, बेटा शादी कर ले। वह कहता है कि मैं नहीं करना चाहता तो दादी रोती है कि पोते का मुंह नहीं देख कर मरूगी तो नरक में जाउंगी, बेटा एक बार पोते का मुंह दिखा दे, और बेटा बहुत बहादुरी से खड़ा होता है कि लाओ शादी कर लेते हैं, और वह सोचता है बहुत बहादुर है, बहुत खुश होता है और घर में ढोल इसलिए बजते हैं कि साला ठीक फंसा। हम तो फंसे हुए हैं ही, अब यह भी फंसा जिंदगी भर रो, कमाता रह और खिलाता रह। पिंजड़े का तोता है अब फडफडाता रह, जाएगा ही कहां।
अभी तक तो चिंता थी की कोई गुरु मिल गया बीच में और उड़ा कर ले गया तो क्या करेंगे पर अब वे निश्चिंत है कि यह कहीं नहीं जाएगा। और वह सोचता है कि घर से बाहर रहूंगा तो पत्नी मर जाएगी मेरे बिना शाम को बेचारी पांच बजे इंतजार करती रहती है और तुम चिता पर जाकर सो जाओ तो वह इंतजार कुछ नहीं करेगी, दूसरे दिन से खाना खाने लगेगी, पांचवें दिन तो खाना खाएगी ही खाएगी। गारंटी के साथ खाएगी। तुम्हारा यह एहसास है कि वह मर जाएगी।
तुमने उस आनन्द को देखा नहीं। शंकराचार्य कह रहे हैं कि आनन्द को नहीं देखा। आकाश में उड़ने के आनन्द को नहीं देखा तो फिर जीवन का क्या महत्व है। पिंजरे में पड़े रहे में आनन्द नहीं है। कौन समझाएगा तुम्हारे जो पंख मर गए हैं उनको ताकत कौन देगा? कैसे मिलगी ताकत? तुम्हारे पास तो ताकत की विद्या नहीं है। और तुमने अगर नल के पानी को ही पीकर ही जिंदगी पार कर ली, कुंए के पानी को पीकर के, तालाब के पानी को पीकर के और ज्यादा जोश होगा तो गंगा का पानी पी लेंगे तो क्या वह आनन्द प्राप्त हो जाएगा। मानसरोवर का पानी कभी पिया नहीं तुमने। स्वच्छ और एकदम शीतल पचहत्तर मील लंबी झील, एक दो मील नहीं पचहत्तर मील की कल्पना करिए। इतनी लंबी इतनी चौड़ी झील इतनी गहरी कि ढाई सौ फिट गहरी। और इतना साफ पानी कि आप एक सिक्का डाल दीजिए पानी के अंदर तो ढाई सौ फीट नीचे भी उसके अक्षर पढ़ लीजिए कि उसने 1975 लिखा हुआ है। इतना साफ पानी अपने जिंदगी में देखा नहीं। ऐसी झील भी आपने देखी नहीं। इसलिए नहीं देखी कि आप हंस बने ही नहीं। हंस नहीं बने तो मानसरोवर जा नहीं सकते। कौए बन सकते हो, बगुले बन सकते हो, और तुम बगुले हो। हंस के भी सफेद पंख होते हैं तुम्हारे भी सफेद पंख हैं और एक बार बगुले ने सोचा कि हंस उड़ता है हम भी उड़े। हममें फर्क क्या है उसके भी चोंच है मेरे भी चोंच है। इसके सफेद पंख है मेरे भी सफेद पंख है। यह पक्षी है, मैं भी पक्षी हूं। इसमें कौन सी बड़ी बहादुरी है।
हंस उड़ा और बगुला भी उड़ा। आधा किलोमिटर जाते ही बगुला नीचे थककर गिर पड़ा और हंस उड़ता चला गया आकाश में 200 मील उड़कर वापस भी आ गया। और हंस ने डुबकी लगाई मानसरोवर में तो पांच किलोमीटर दूर जाकर बाहर निकला। जब तुमने मानसरोवर को देखा नहीं तो उस आनन्द को नहीं देख पाओंगे। उस ताल तलैयास के पानी में वो आनन्द नहीं है जो मानसरोवर के पानी में है। जब तुमने देखा ही नहीं तो कौन दिखाएगा तुम्हें? और घर वाले तुम्हें दिखाने नहीं देंगे नहीं क्योंकि वे तो एक ही बात सोचेंगे कि यह जाना नहीं चाहिए कहीं भी और इसके लिए सौ प्राकर के नाटक होंगे। पत्नी रोएगी, चीखेगी, चिल्लाएगी, पूछेगी कहा जाते हो, उन गुरुओं के पास कुछ नहीं हैं, तुम घर में क्यों नहीं रहते।
चाचा कहेगा दिमाग खराब है तुम्हारा कुछ नहीं है, वे तुम्हें ठग रहे हैं मूर्ख बना रहे है, कमाओं धमाओ, हम नहीं गए तो हमारा क्या बिगड़ गया, हम कौन से मर गए, तुम भी नहीं मरोगे तुम कहां जा रहे हो। और फिर भी जाने लग जाओ तो पत्नी भूखी रह जाएगी। मरने लगेगी, बेहोश होने लगेगी, नाटक करेंगी। और तुम मन मार कर रह जाओंगे, तुम सोचोगे इस बार नहीं अगली बार जाएंगे। और हर बार यही सोचोगे अगली बार जांएगे, अगली बार जाएंगे। और फिर बहुत सुन्दर स्त्री जिसका नाम मृत्यु है वह आपको थपकी देकर सुला देगी। इस जिंदगी में फिर गुरु नहीं मिलेगा, इसलिए नहीं मिलेंगे कि तुममें वह ताकत नहीं, हौसला नहीं। जब डुबकी लगाने की ताकत आएगी नहीं तो देख भी नहीं सकोगे तुम। उस समुद्र के किनारे बैठ जाइए तो लहर आएगी वह कुछ घोंघे लाएगी, कुछ सीपी लाएगी। उनसे झोली भरकर चले जाओगे घर। मोती नहीं ला सकते। तुमने मोती का अनन्द लिया ही नहीं। एक चमकदार शुभ्र मोती नहीं मिलेगा जब समुद्र में छलांगे लगाने की ताकत नहीं है। इसलिए नहीं है कि तुम्हारे पंखों को मार दिया गया है, तुम्हारे घर वालों ने तुम्हारी ताकत को खत्म कर दिया है। और कभी मैं उत्तेजित करता भी हूं कि तुम चिंता मत करो, हंस तोता बन कर देख लिया अब हंस बन कर देखो, और फिर दोनों में से जो अच्छा लगे वह मानिए। यह कहता हूं मैं। मगर तुम उड़ने की कोशिश करते हों दो तीन बार फड़-फड़ करते हो और फिर जमीन पर टिक जाते हो।
मैं पूछता हूं कि क्या हुआ? तुम कहते हो कि गुरु जी घरवाली बहुत दुखी थी, निकला आपके घर आ रहा था, मगर वह बीमार हो गई गुरुजी और उसने खाना नहीं खाया रोने लगी गुरुजी, आप बात मानिए। मैं तो मान रहा हूं। तुमने एक सींखचा और ज्यादा बढ़ाया हुआ है। दूसरों के 18 तीलियां है तुम्हारे 19 तीलियां हैं। तुम मानसरोवर नहीं जा सकते, तुम आकाश में उड़ भी नहीं सकते तुम उस आकाश का आनन्द नहीं ले सकते क्योंकि आकाश में उड़ने की क्या क्षमता है, पंखों को फैलाकर के ऊंचा उठने की क्या क्षमता है, मानसरोवर में डुबकी लगाने का क्या आनन्द है तुम अनुभव नहीं कर सकते। और शंकराचार्य कह रहे हैं कौन समझाएगा तुम्हें कि यह आनन्द और है, कौन तीन सौ मील तक तुम्हें उड़ा कर ले जाएगा। कौन से जाएगा? चाचा, चाची मां, बाप, भाई, बहन? उनके खुद के पंख मरे हुए है। वो तुम्हे कहां से उड़ाएगे। जो मुर्दे हैं वे तुम्हें कहां से जीवन दान देंगे। जिनमें खुद क्षमता नहीं वे तुम्हें क्या समझाएंगे। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि तुम पत्नी को छोड़ दो, मैं ऐसा भी नहीं कह रहा हूं तुम अपने चाचाजी को छोड़ दो, मैं नहीं कहता अपने मां बाप को छोड़ दो। मैं कह रहा हूं कि उनके बीच रहकर भी अपने पंखों को फैलाकर आकाश में उड़ने की कला सीखिए। उनके बीच रहकर के। आप पूछेंगे गुरुजी ऐसा कैसे हो सकता है। तो उदाहरण अपना खुद का प्रस्तुत करता हूं कि मेरी भी पत्नी है, पुत्र है पोते पोतियां हैं, भाई हैं, बहन हैं, संबंधी रिश्तेदार हैं, और तुम से ज्यादा बड़ा कुनबा हैं, पूरे विश्व में अस्सी लाख शिष्य हैं, इतना बड़ा कुनबा है, उन सबकी तकलीफें सुनता हूं। उन सबकी परेशानियां सुनता हूं और फिर भी मुस्कराता रहता हूं। आकाश में उड़ता भी हूं और डुबकी लगाता भी हूं। अगर मैं इतना सब कुछ होते भी उड़ सकता हूं तो मैं उदाहरण दे के समझा रहा हूं कि आप भी कर सकते हैं। मैं कोई भगवा कपड़े पहने संन्यासी या साधु नहीं हूं।
तुम्हारी तरह सारी जिम्मेदारियों को भी झेलते हुए उस आनन्द को प्राप्त कर सकता हूं। इसलिए चिंता मुझे व्याप्त होता नहीं तनाव होता नहीं। इसलिए रात को सोते ही मुझे नींद आ जाती है। इसलिए चेहरे पर एक ओज है एक मस्ती है और मैं तुम्हारे चेहरे पर भी वैसी ही चाहता हूं। शंकराचार्य कह रहे हैं कि यह सब कुछ तुम्हें गुरु ही समझा सकता है, तब जब तुम अपने आप को गुरु में पूरी तरह से स्थापित कर दो। गुरु को पूर्ण रूप से अपने आप में समाहित कर दो। और गुरु को पूर्ण रूप से समाहित करने का तात्पर्य क्या है? कैसे स्थापित कर दे, कैसे समाहित कर दें। समाहित का अर्थ है अपने आपमें मिला देना जैसे पानी से पानी मिलता है, दूध से दूध मिलता है और तुम्हारे अन्दर गुरु समाहित हो सकता है, बहुत सरल कला है। और प्रत्यक्ष समाहित होने से कितना फायदा होगा? जो कुछ ज्ञान तुमने प्राप्त किया ही नहीं वह ज्ञान अपने आप मिल जाएगा आपको मिलेगा क्यों नहीं वह ज्ञान को लेकर आपके अन्दर समाहित हो जाएगा। एक गरीब घर की लड़की जिसके घर में खाने को रोटी नहीं और एक लखपति से शादी कर ले तो लखपति से शादी करते ही वह भी लखपति बन जाती है। आधा सेकेण्ड लगता है, ज्योंहि शादी हुई वह भी लखपति बन जाती है, ज्योंहि आपकी मेरी शादी हो जाएगी, तो जो भी मेरा ज्ञान है, आनन्द है, वह सब कुछ तुम्हे प्राप्त हो जाएगा। क्योंकि तुमने मेरे साथ शादी की है इसलिए कबीर ने कहा है। मैं तो राम की बहुरिया, वह कह रहा है मैं राम की बहु हूं क्योंकि जब राम मेरे अन्दर व्याप्त हो जाएगे तो वह सब कुछ मुझे प्राप्त हो जाएगा जो राम के पास है। फिर भी वह कह रहा है-
गुरु गोविंद दोनों खड़े काके लागूं पाय बलिहारी गुरु आप ने गोविन्द दीयो बताए।
वह गुरु को कह रहा है कि आपकी बलिहारी आपकी कृपा है आपकी वजह से मैं गुरु को देख सका हूं। मगर कबीर यह भी कह रहा है। कबीरा यह घर प्रेम का गुरु का जो घर है, पैसे देने से गुरु का घर नहीं मिल सकता।
कबीरा घर प्रेम का खाला का घर नाहिं सीस उतारे भू घरे वो पयसे घर माहिं।
खाला का अर्थ है, मौसी, मां की बहन। इस गुरु के घर में, गुरु के हृदय में वो प्रवेश कर सकता है जो पहले अपना सिर उतार दे। एकदम अपने आपको न्यौछावर कर दे कि देखा जाएगा, चैलेंज वही इस घर में घुस सकता है। जुआरी घुस सकता हो क्योंकि वह लगा देगा दांव पर। अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा देता है, पांच लाख भी लगा देता है। वो या तो डूब जाएगा या उस पार चला जाएगा। शंकराचार्य कह रहे है कि ऐसा समर्पण जब मानस में आएगा, और जब सिर को उतारेगा तो गुरु तक पहुंचेगा। सिरे को उतारने के दो अर्थ हुए। सिर का अर्थ है घमण्ड, बुद्धि। तुम्हारे पिता क बुद्धि है कि यह गुरुजी नया करते हैं, ये तो खुद घर में बैठे हैं, मेरा बेटा बिगड़ जाएगा, मेरे घर से भी जाएगा। उनकी चिंता यह नहीं कि कुछ सीख लेगा। उनको चिंता यह है कि घर से चला जाएगा। यह गुरु जी के घर में बैठा रहेगा। नौकरी नहीं करेगा चार दिन तो तनख्वाह कट जाएगी। उनका रोना, अपने खुद के स्वार्थ का है। तुम्हारे लिए रोना नहीं है। तुम्हारे लिए परेशान नहीं है, होते तो जैसे ही तुम मरते तुम्हारे पीछे वे भी मरते। तुम चिता में जाते तो वो भी आग में जाकर कूद जाते। लेकिन एक भी ऐसे मरा नहीं। पिछले इतिहास में तो मुझे मिला नहीं कि कोई मरा और उसकी पत्नी भी मर गई। रोती है, चीखती है, नहीं रोती तो लोग कहते हैं इसे दुख नहीं है क्या? पति मर गया क्यों नहीं रोती। इसलिए वह रोती है, चीखती है जोर जोर से। अरे! तुम चले गए, तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा। मेरा क्या होगा और दूसरे दिन खाना खा लेती है। कहती है खाना गले से उतर नहीं रहा है पर क्या करें खाना पड़ेगा।
और तुम अंहकार में डूबे हुए थे कि मेरे बिना पत्नी का क्या होगा बच्चों का क्या होगा, गुजारा कैसे होगा। यह अंह, इसको सिर कहते हैं घमण्ड को सिर कहते हैं कि मेरे बिना इसका क्या होगा। इसको उतारें पहलें। सीस उतारे भू घर जो छोड़ दे उसको वह इस प्रेम के घर में पहुंच सकता है। यह समर्पण का भाव है इसलिए शंकराचार्य ने कहा कि अपने आपमें पूर्णत संन्यासी बन जाएं। गृहस्थ रहते हुए भी संन्यासी बन जाएं। कोई चिंता नहीं करें। साल भर कर के देख लें, या तो साल भर में डूब जाएंगे, फिर जिंदगी भर कह देंगे कि कुछ नहीं गुरु के पास में, गुरु के पास जाने से कुछ फरक नहीं हैं या तो यह चैलेंज के साथ कहेंगे। और नहीं तो हंस बनकर घर आएंगे और बता देंगे कि हंस बनने का यह आनन्दं है। ये सब जो बगुले हैं, मेरे घर में उनकी अपेक्षा मेरे पंख ज्यादा शुभ हैं ज्यादा ताकतवान है उड़ने की मुझमें क्षमता है। यह सब तुम अपने घर में रहकर प्राप्त नहीं कर सकते। उस घर में बैठे के कर सकते हों और बैठने की क्रिया यह है कि जब तुम कुछ दे दोंगे तो अपने आपमें गुरु को प्रत्यक्ष कर दोंगे। तो अपने आपमें गुरु को प्रत्यक्ष कर दोगे। तुम कुछ चुकोंगे नहीं तुम कुछ हाथ से चूकोंगे नहीं।
तुम्हारे अंदर तो गुरु को स्थापित करने की जगह ही नहीं है। अगर गुरु बेचारा चाहे भी तुम्हारे हृदय में जाना तो तुम्हारे दिल में स्वार्थ, छल, झूठ, कपट, व्यामिचार, बदमाशी इतनी अधिक ठूस-ठूस कर भरी है। मैं खड़ा होऊं भी तो कहां होऊं। जगह है ही नहीं। और फिर उस पर बुद्धि इतनी होती है। पहले उसको थोड़ा साफ कर दीजिए। पहले इतनी जगह बनाइए कि गुरु बैठ सके आकर के, और वह तब हो सकता है जब चैलेंज के साथ आप गुरु के साथ हो जाएंगे। और गुरु के साथ होने का तात्पर्य हैं कि जो गुरु के अनुकूल कार्य है वह करें। मैं अपने स्वार्थ के लिए नहीं कह रहा हूं मैं गुरु हूं इसलिए नहीं कह रहा हूं। मैं तो उन शास्त्र की बात कर रहा हूं, शंकराचार्य की बात कह रहा हूं। तुम मेरे लिए कुछ कार्य करोंगे तब भी मुझे कुछ फर्क पड़ेगा नहीं करोगे तब भी को फर्क नहीं पड़ेगा। जब इतने साल तुमने मेरा कोई कार्य नहीं किया तो कौन सा डूब गया मेरा कुनबा? और तुम कर लोगे तो कौन सा मैं भगवान बन जाऊंगा और मुझे भगवान बनने की इच्छा है नहीं, जब मैं भगवान हूं तो मुझे भगवान बनने की ख्वाहिश नहीं है।
भगवान का तात्पर्य है कि जो पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर सके वह भगवान नहीं कहते। जहां पूर्णत्व प्राप्ति हो, जहां एकदम से किसी प्रकार का तनाव नहीं हो। चिंता नहीं हो। और में चिंता मुक्त हूं तनाव मुक्त हूं, चिंता रखता ही नहीं। यह तनाव तो होता है कि वह शिष्य आया नहीं, क्या हुआ? तुम्हारे प्रति एक मोह ग्रस्तता है कि तुम क्यों नहीं मिले। अगर तुम तकलीफ में हो तो मैं तकलीफ महसूस करता हूं और तुम्हें लाइन पर लाने के लिए चाबुक भी मारता हूं। मारता हूं जरूर मारता हूं, महीने-महीने तुम से नहीं भी बोलता हूं। गुस्सा भी करता हूं। और प्यार भी करता हूं। यह तो क्रिया कलाप है। कृष्ण को कहा कि बहुत अय्याशी था बहुत प्रेम करने वाला था। कई लोगों ने कहा कि यह बिना गोपियों के रह नहीं सकता वह ऐसा था, ऐसा था, राधा के पीछे भटकता था, वह कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ा, कपड़े चुरा तथा, सब कुछ था। और हमने माना कि वह बहुत ही प्रेमी जीव है। मगर जब आक्रूर उनको लेने को आए और रथ पर बैठा रथ रवाना हुआ तो पीछे मुड़ कर देखा ही नहीं कि गोपियां खड़ी हैं या नहीं खड़ी हैं। उन्मुकत भाव से चला गया। मिला तब भी उसी भाव से और रवाना हुआ तो भी उसी भाव से। पीछे पलट कर नहीं देखा। और हम कहीं जाए और पीछे पलटें तो पीछे उस पत्नी या प्रेमिका को कहते हैं कि तू चिंता मत करना, मैं वापस आउंगा, तू क्या घबराती है, मैं तेरे साथ में हूं, मैं लेटर लिखूंगा तुम मुझे लेटर लिखना यह मेरा पता है, तेरे बिना कैसे रहूंगा, दो बार फिर वापस मुड़कर देखते हैं। कृष्ण ने मुड़कर नहीं देखा। अनासक्त भाव था। और जब यह अनासक्त भाव जीवन में आता है तब प्रेम भी करते हैं तो अनासक्त भाव से मन में कुछ ऐसा स्वार्थ नहीं है। तुम्हारी आंख गंदी हो सकती है, मेरी आंख गंदी नहीं है। मेरा मस्तिष्क भी गंदा नहीं है। मेरे विचार भी गंदे नहीं है क्योंकि मैं उस आकाश में उड़ने के क्षमता रखता हूं। उस आकाश को नापा हैं मैंने। देखा है उसे फिर नाप कर दिखा सकता हूं।
मगर जब जमीन पर उतरना पड़ता है तो बगुलों के बीच खड़ा भी होना पड़ता है क्योंकि यह मेरी इच्छा है कि मैं इन बगुलों को हंस का रूप दे सकूं। तब मेरे जीवन की सार्थकता है। मैं इनको हंसा बना सकूं, उड़ा के दिखा सकूं कि यह आनन्द है, डुबकी लगवाकर दिखा सकूं कि यह आनन्द है, बाकी गृहस्थ में आने का मुझे कोई आनन्द था नहीं। मैं तो संन्यासी रहा हूं और अपने आपमें बहुत अद्वितीय संन्यासी रहा हूं जहां हिमालय का कण कण इस बात का एहसास करता है कि संन्यासी रूप ऐसा होता है। क्या जरूरत थी मुझे गृहस्थ में आने की। मगर मैं गृहस्थ नहीं बनता तो लोगों को समझा नहीं सकता था। संन्यासी गृहस्थ के लोगों को समझाएं तो इफैक्ट पड़ता नहीं है। इसलिए तुम्हारे बीच आकर खड़ा होना पड़ेगा। मुझे बात करनी पड़ेगी। मगर तुम इतने न्यून हो कि तुम समझ लेते हो कि गुरु जी वैसे ही हैं जैसे हम हैं। यह तुम्हारा भ्रम है तुम्हारी आंख का भ्रम है। तुम्हारी आंख में कमजोरी है तो जहां बगुले बैठे हैं, वहां हंस भी बैठे हैं तुम समझोगे यह भी बगुला है। हम को चिंता नहीं है क्योंकि वह जानता है कि मैं हंस हूं। मुझे क्या है कि लोग भले ही मुझे हंस कहें या बगुला कहें। उसमें क्या अंतर आ जाएगा। इसलिए शंकराचार्य इस श्लोक में कह रहे हैं कि जब कुछ क्षणों को लिए पूरे अनासक्त भाव से जुड़ जाओंगे तो अपने आप तुम्हारे अन्दर गुरु समाहित हो जाएगे। समाहित तो होंगे ही पर एक्टीविटी से, क्रिया से चिंतन से।
प्राण यह नहीं कह सकते कि शरीर मुझे कुछ दे और शरीर यह प्राणों को नहीं कह सकता है कि मुझे यह दो। दोनों आपस में एक दूसरे से जुडे़ हुए है। वह स्थिति जब आती है तब वह शिष्य होता है और गुरु की वह स्थिति जब आती है जब वास्तव में वह गुरु हो। वास्तव में गुरु के ऊंचे की स्टेज गुरु के ऊपर की स्टेज ‘सद्गुरु’ है, जो तुम्हें उस ‘सद्’ सद् का मतलब है पूर्णता की और अग्रसर करने की क्रिया, ‘सद्’ का मतलब है पूर्ण और प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है। अपूर्ण है ज्ञान से, अपूर्ण है चिंतन से, अपूर्ण है विचार से, अपूर्ण है सुख से, अपूर्ण है परिवार से, और अपने आप से अपूर्ण है। क्योंकि अपूर्ण है इसलिए आप लोग मृत्यु की तरफ चलें जाते हैं। पूर्ण आदमी तो मृत्यु की और जा ही नहीं सकता। पूर्ण में से अगर पूर्ण निकाल दे तब भी पूर्ण बचेगा। एक शून्य में से एक शून्य निकाल दे तो पीछे एक या दो नहीं बच सकते, शून्य ही बनेगा और उस शून्य में एक शून्य बचेगा। इसलिए शून्य नहीं मिट सकता और शून्य को हम पूर्णता कहते हैं। कोई शून्य कहते हैं कोई पूर्ण कहते हैं।
इसीलिए पूर्ण मिट नहीं सकता और जो मिट जाता है वह जो मर जाता है जो समाप्त हो जाता है जो श्मशान की ओर जा सकता है वह पूर्ण नहीं बन सकता। इसलिए जो उस रास्ते पर नहीं जाता रूक जाता है वह पूर्ण है। पैदा होते ही व्यक्ति मृत्यु की ओर ही जाता है यह स्वभाविक क्रिया है मगर कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते है जो बीच में रूक जाते है और वे रूक जाते हैं उस समय बीच में कहीं सद्गुरु मिल जाए, गुरु तो मिल जायेंगे गुरु तुम्हें मिल जायेंगे हरिद्वार में, गुरु तुम्हें मिल जायेंगे मथुरा में, वृन्दावन में, कई जगह गुरु मिल जायेंगे और कई बार तुम नहीं ढूढ़ोंगे तब भी गुरु मिल जायेंगे। मगर सद्गुरु नहीं मिल सकता।
क्योंकि सद्गुरु आत्मा और प्राण का पूर्ण रूप से सम्बन्ध स्थापित करने वाला होता है। बाकी सब तो वह गुरु है और गुरु कुछ स्वार्थी है और गुरु खुद कुछ लेने की इच्छा रखता हो गुरु कुछ पाने की क्रिया करता है तो वह गुरु तो बन सकता है उसको हम गुरु कह सकते हैं मगर वह सद्गुरु नहीं बन सकता। सद्गुरु यदि खुद ही लेने की इच्छा रखेगा तो वह क्या देगा तो वह लेकर क्या करेगा। यदि मेरी इच्छाएं ही खत्म नहीं हुई मैं पूर्ण बन ही नहीं सकता और जब मैं पूर्ण नहीं तो तुम्हें पूर्ण बना नहीं सकता इसलिए वस्त्रों को, या शरीर को ढ़ांचे को देखकर के हम गुरु को नहीं पहचान सकते।
सद्गुरु की पहचान वह है कि जो अत्यन्त ही सरल और सामान्य जीवन व्यतीत करने वाला हो। सामान्य का मतलब है फकीर नहीं, वह अगर मखमली गद्दे पर सुलाएं हुआ तो नीद ले सकता है और दूसरे दिन उसको बिल्कुल टाट पर सुला दे तब भी उसी मस्ती के साथ में नीद ले सकता हैं यह उसके जीवन का एक चिंतन है वहां पर भी वह उतना ही सुखी है, वहां पर भी वह उतना ही सुखी है। यदि किसी ने पांच हजार रूपये दे दिये तब भी वह सुखी है और यदि किसी ने कुछ भी नहीं दिया है तब भी उसके मन में उसके प्रति कोई आक्रोश नहीं है ऐसा व्यक्ति सद्गुरु बन सकता है।
इसीलिए यह नहीं कि शिष्य की ही कसौटियां है कठोपनिषद् कहता है कि शिष्य से भी गुरु बनना बहुत कठिन है और गुरु जो स्वयं पूर्ण हो और उस पूर्ण की परिभाषा कठोपनिषद् में कहा है- पूर्णत्व त्वां गुरुत्वां सदेवं वे वर्णन सहित वदाम परेणं गुरु से सद्गुरु को पहचानने की तीन क्रियाएं है, हम किस तरीके से सद्गुरु को पहचाने। गुरु और सद्गुरु में अंतर कैसे करें? आंखों से ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि नकली चीज बहुत ज्यादा चमकती है अगर सोने को रख दीजिए और पीतल पर सोने की पालिश कर रख दीजिए तो वह ज्यादा चमकेगा। नकली जो हीरे बनते है वह असली से बहुत ज्यादा प्रकाश देने वाले बनते हैं, और तुम्हारी आंखें नकली है, तुम्हारा शरीर नकली है, तुम्हारा चिंतन नकली है, तुम्हारे विचार नकली है इसलिए नकली व्यक्ति नकली से ज्यादा जल्दी सम्बन्ध स्थापित कर सकता है इसलिए तुम उस गुरु के मोह पाश में ज्यादा फंस जाते जो केवल याचक वृत्ति वाला है जिसको मैं कई बार प्रवचन में भिक्षुक कहता हूं जो भीख मांगने वाला हो, भिक्षुक है। वे गुरु बन ही नहीं सकते गुरु शब्द को शर्मिन्दा करते है, इसलिए गुरु अगर तुम्हारे प्रारब्ध में है तो कहीं बीच में मिल ही जाते हैं। वह उस तुम्हारी यात्रा में जो यात्रा जन्म से मृत्यु की ओर है उस रास्ते पर तुम जा रहे हो और यह जरूरी नहीं कि ऐसा सद्गुरु तुम्हारे पिता को कहीं मिल जाए, यह भी नहीं कि तुम्हारे दादाजी को मिल जाए या परदादा को मिल गए हो, नहीं भी मिले। तुम्हारे जीवन में भी नहीं मिले और यह भी हो सकता है, तुम्हारे जीवन में मिले और तुम नहीं पहचान सके और हो सकता है कि तुम्हारे पाप और कर्म इतने फूटे हुए हों कि वह मिल भी जाए तो तुम पास में से निकल जाओ, उसमें कुछ नहीं हो सकता।
मगर उस कठोपनिषद् में कहा है सद्गुरु की पहचान की तीन स्थितियां है और वह स्थितियां है वह अत्यन्त उच्चकोटि का जीवन जी सकता है अत्यन्त सामान्य जीवन में भी सामान्य जीवन में भी आनन्द की स्थिति में रह सकता है। राजा के महल में उसी मस्ती के साथ महल में सो सकता है, और चौबीस तरह के पकवानों को खाकर भी तृप्ति महसूस कर सकता है। मगर ठीक शाम को उसी आनन्द के साथ किसी झोपड़ी में आनन्द के साथ सो सकता है और शाम हो तो उसी आनन्द के साथ रूखी सूखी रोटी खा करके शांति महसूस कर सकता है। दूसरा उस गुरु की यात्रा सद्गुरु की पहचान के बारे में कठोपनिषद् स्पष्ट करता है जिसके शब्दों में कुछ प्रभाव हो जिसके सामने शब्द नृत्य करते हो, वह शब्दों का प्रवाहमान स्वरूप हो और शब्द को शक्ति कहा गया है। ‘अभिदा लक्षिणा भिदीना शब्द’ शब्द अपने आप में शक्ति है, जो उस शक्ति का स्वामी हो और वे सब उसके सामने नृत्य करते हों जिस शब्द को वह ले, पकड़े और व्यक्त करे उसके लिए वह शब्दों की न्यूनता नहीं रहती और जब शब्द को व्यक्त करते हैं तो वह शब्दों के माध्यम से बात को सामने वाले के मन में उतार देता है, हृदय में उतार देता है, प्राणों में उतार देता है, और सामने वाला एक दम से शांत हो करके सुनता ही रहता है। एहसास करता है कि एक नवीन जीवन कुछ नवीन चिंतन है, इन शब्दों में व्याख्या हैं।
यदि शब्द है और कुछ भी प्राप्त नहीं हो रहा है तो जो शब्दों पूर्ण रूप से अधिकार रखता हो ऐसा अधिकार नेता भी रखता है और नेता भी बहुत सुन्दर भाषण देता है मगर वह हृदय में नहीं उतरता है वह दिमाग में उतरना है वह कहता है कि मैं पांच साल में ऐसा कर दूगां, शब्दों का जादूगर तो वह भी है, वह भी डेढ घंटे भाषण देता है और भाषण इतना कि हजारों लोग सुनते हैं मगर वे हृदय में नहीं उतरते, वह दिमाग में उतरते हैं, दिमाग सोचता है हो सकता है कि यह नल लगा देगा और सड़कें ठीक कर देगा और मेरा यह काम अभी करवा देगा यह सब मस्तिष्क के काम है वास्तव में हृदय में अपने शब्दों को उतार सके वह कठिन क्रिया है। वह क्रिया कोई नेता नहीं कर सकता वह तो केवल सद्गुरु ही कर सकते है।
इसलिए उसके माध्यम से उस गुरु को पहचान सकते है और तीसरा सद्गुरु की पहचान यह है कि ‘तुम्हारे अत्यन्त समीपता’ तुम अनुभव कर सको। वह हिमालय कोई काम का नहीं अगर हिमालय में हम जा नहीं सके वह हिमालय क्या काम का है उसकी अपेक्षा वह पहाड़ी हमारे लिए ज्यादा ‘वेल्युवल’ है जिस पर हम चढ़ तो सकें, जिस पर हम चल तो सकें। वह गंगा किस काम की जहां हम जा भी नहीं सके इसलिए वह गुरु जो महीने भर में एक बार तुम्हें झाकी दें और तुम्हे मिले ही नहीं, मां आए नहीं, दो महीने में एक बार बाहर निकलती थी तुम्हें झाकी देती थी और बन्द हो जाती थी। मै। सोचता हूं कि ऐसे सद्गुरु नहीं हो सकते, नाथद्वारा में श्रीनाथ जी का मंदिर है पट खुलते है बस कुछ सेकन्ड की झाकी देते है और झट से पट बन्द कर देते है ऐसे तो भगवान नहीं बन सकते, भगवान नहीं मिल सकते, यह पुजारियों ने उन भगवान को जबरदस्ती बन्द कर दिया है। वह भगवान कैसे जिनको हम देखकर तृप्ति अनुभव नहीं कर सकते हमारी तृप्ति हो ही नहीं। वह गुरु कैसा जो तुम्हारी समीपता अनुभव कर ही नहीं सकता जिनके पास हम हर क्षण उपस्थित हो सके और जो हमारे पास उपस्थित रहे, हर क्षण हमारे उत्तर देने वाले होना चाहिये जो हमारे दुख में, सुख में, चिंतना में, विचार में अनुरक्तता महसूस कर सकता हो जो तुम्हारे परिवार का एक सहायक हो, मागदर्शक हो, एक गुरु हो, एक पिता हो, एक चिन्तक हो, और तुम्हारे दुख में उतना ही दुखी हो तुम्हारे सुख में उतना ही सुखी हो। तुम्हारे बीच में उतनी ही प्रसन्नता अनुभव कर सकता हो और जब ऐसी स्थिति बनती है तब गुरु और शिष्य का सम्बन्ध शरीर और प्राणों का बन जाता है।
और जब यह सम्बन्ध बन जाता है तो उस प्राणों को शरीर से अलग कर नहीं सकते कर सकते हैं साधना के माध्यम से। यदि शरीर और प्राणों में थोड़ी दूरी हो भी जाती है तो शरीर उसमें बहुत तड़पता है, कहते हैं कि तुम मेरे प्राण स्वरूप हो और जब तुम जाते हो तो बहुत बैचेनी आती है, जब तुम्हारी याद आती है मन बड़ा बहुत बैचेन हो जाता है। जो अत्यन्त प्रिय होता है हम उससे जब दूर जाते हैं तब बड़ी ही एक छटपटाहट सी महसूस होती है। इसलिए कि प्राणों का कुछ हिस्सा दूर बैठा है और यह छटपटाहट सी बने यह गुरु की ड्यूटी है जिस शिष्य में छटपटाहट बने, शिष्य का गौरव है क्योंकि यह छटपटाहट उसे जीवन की पूर्णता की ओर अग्रसर कर सकता है, क्योंकि उस छटपटाहट में स्वार्थ नहीं है, इस छटपटाहट में तुम्हारा उस गुरु से कोई शरीर का सम्बन्ध नहीं है।
मैं कई बार कह चुका हूं कि तुम्हारा मेरा कुछ सम्बन्ध नहीं है, मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूं, मैं तुम्हारा बाप नहीं हूं, मैंने तुम्हें पैदा किया, नहीं शरीर से मैं तुम्हारा भाई भी नहीं हूं। तुम्हारी बहन भी नहीं हूं, मैं तुम्हारा बहनोई भी नहीं, तुम्हारा साला भी नहीं हूं, मैं तुम्हारे परिवार का नहीं, तुम्हारे समाज का नहीं हूं, तुम्हारा सम्बन्धी नहीं हूं, मैं तुम्हारा कुछ हूं ही नहीं क्योंकि तुम्हारा मेरा शरीर का सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा मेरा प्राणगत सम्बन्ध है, आत्मागत सम्बन्ध है। इसलिए तुम मुझे एक बार देख भी सकोगे तो तुम्हारे प्राण से देख सकोगे शरीर से नहीं देख सकोगे। इस कुर्त्ते को पहन कर तुम मुझे पहचान भी नहीं सकोगे और जब तुम्हारे साथ में गुरु होगा तो तुम सोचोंगे तो गुरु जी तो वही सामान्य है, तुम नहीं पहचान सकोंगे क्योंकि तुम देख रहे हो स्थूल दृष्टि से शरीर को और जिस दिन तुम अपने प्राणों से देख लोंगे उस दिन तुमको छटपटाहट पैदा होगी उस दिन मैं दो घंटे नहीं आऊ तो तुमको व्याकुलता होगी गुरुजी दो घंटे हो गए अभी आए नहीं। चला जाऊंगा तो तुम व्याकुलता सी अनुभव कर लोंगे गुरु जी आज आए नहीं सुबह के बाद दो घंटे हो गये गुरुजी को आज देखा नहीं व्याकुलता एक आकुलता, बैचेनी एक छटपटाहट हो या शिष्य का सबसे बड़ा गौरव है। यह शिष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है यह शिष्य की सबसे बड़ी पूंजी है।
और अगर शिष्य है तो और ऐसी स्थिति में शिष्य गुरु के बिना रह नहीं सकता और गुरु भी शिष्य के बिना रह नहीं सकता क्योंकि वह गुरु है पिता नहीं वह भाई नहीं कोई सम्बन्धी नहीं वह गुरु है और गुरु का पहला और अन्तिम कर्त्तव्य है शिष्य को अपने में पूर्ण कर देने की क्रिया है अगर ऐसा नहीं करता तो भिक्षुक है। फिर तो वह तुम्हारी भीख खाकर तुम्हारे पांच रूपये पर जीवन यापन करने वाला है। वह हो सकता है कि तुमसे पांच लाख रूपये इकट्ठे कर लिये हो, धोखे से, छल से, कपट से, शिष्यों को मूर्ख बना करके ऐसा कर सकते है और करते हैं मंदिर बना देते है और एक आश्रम बना देते हैं और ऐसा करते है और मैं भी ऐसा कर सकता था, मैं इससे ज्यादा आश्रम बना सकता था। मेरी क्षमता इतनी है कि चाहे उन गुरुओं से एक हजार गुरुओं को मिलाकर जो पिण्ड बनाया जाएं उनसे ज्यादा सक्षम था, भी हूं, और रहूंगा भी। मगर मैं इस प्रकार के ढकोसले बाजी में विश्वास नहीं करता हूं।
यह तुम्हारी न्यूतनता है कमियां है तुम्हें तो यह होना चाहिए कि गुरुदेव मुझे और आंच दीजिये इतनी तेज इतना, वेदना, इतना, दुख, दीजिये कि मैं कुन्दन बन सकूं। कि मैं सोना बन सकूं, ऐसा सोना कि मैं कि मैं देवताओं का मुकुट बन सकूं। देवताओं के सिर पर खड़ा हो सकूं। और मैं चाहता हूं कि तुम उस जगह पहुंच सकों। चाहता हूं कि जो तुम्हारी पीढि़यां नहीं कर सकी वह तुम कर सको। मैं चाहता हूं कि तुम सूर्य की तरह दैदीप्यमान हो सकों। प्रकाश दे सको, चेतना दे सको, और जीवन का प्रत्येक दिन पूर्णता से भरा है, तुम पूर्ण बनो ऐसा ही आशीर्वाद दे रहा हूं। पूर्ण तरह से आशीर्वाद है तुम जीवन में सफलता और पूर्णता प्राप्त कर सको।
तुम्हारा अपना नारायण दत्त श्रीमाली जिसे तुम चाहा तो निखिलेश्वरानन्द कहो या सद्गुरु कहो, हूं मैं तुम्हारा अपना
सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी
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