





अनेक कथाएं जुड़ी है इन त्यौहारों से। इन त्यौहारों में ऋषियों ने स्त्री शक्ति को पूर्ण विशेष महत्त्व दिया है, नारी को आदरणीय और पूजनीय माना गया है और कोई भी उत्सव की क्रिया और पूर्णता स्त्री के बिना सम्भव नहीं है अर्थात् प्रत्येक पूजा में स्त्री का सहयोग और सानिध्य अवश्य होता है। जिससे कि मनुष्य पर्वों की महत्त्वतता को समझ कर, अभीष्ट पूर्ति प्राप्त कर सके।
स्त्रियां स्वभाव से एवं प्राकृतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील होती है और अत्यधिक लज्जाशील होने के कारण अपने मन की बात खुल कर दूसरों से व्यक्त नहीं कर पाती। वह बहुत ही गम्भीरता, धीरता को लिए हुए होती है, क्योंकि हमारी आर्य संस्कृति समाज में स्त्री को हमेशा बराबर का दर्जा दिया गया और उसे सहयोगी, सहगामिनी, भार्या, जगत-जननी, पालनहार और परिवार को चलाने वाली शक्ति का स्वरूप समझा गया है, उनके विचारों, भावों इच्छाओं को सृष्टि में मार्ग दर्शन के रूप में स्थान दिया गया है।
छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है, इसकी शुरूआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस चार दिवसीय उत्सव में व्रतधारी लगातार 36 घंटे व्रत रखते है। इस दौरान पानी भी ग्रहण नहीं किया जाता है।
छठ पर्व की शुरूआत महाभारत काल में हुई, कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य देव की परम शक्ति को प्राप्त करने के लिए वह घंटो कमर तक नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य भगवान की कृपा से शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से बलशाली बन कर श्रेष्ठ योद्धा बना। आज भी छठ पूजा में अर्घ्य दान की यह प्रथा इसीलिए प्रचलित है कि पूजा करने वाला भक्त सूर्य के समान तेजस्वी और जाज्लयवान बन सके।
परन्तु आज स्थिति ऐसी नहीं है। कई कारणों से स्त्री अपने मन की इच्छा को खुल कर प्रकट नहीं कर पाती और मन ही मन घुटती रहती है। यह एक विचारणीय स्थिति है और इस स्थिति को भांप कर ही ऐसे पर्वों की संरचना हुई, जो स्त्रियों के लिए ही विशेष रूप से हो।
ऐसे ही पर्वों में से एक है छठ पूजा। स्त्रियों के जीवन में विशेषतः निम्न स्थितियां हो सकती है, जिनसे वे खुल कर बोल नहीं पातीं और मन मसोस कर रह जाती है-
1- हर प्रकार के संकट निवारण के लिये सूर्य सहायक होते है क्योंकि सूर्य संकटमोचक हनुमान के अधिपति है।
2- किसी तंत्र प्रयोग या कुवचनों के श्राप से ग्रसित जन्य कष्ट का निवारण छठ साधना से सम्भव है।
3- सन्तानहीनता, नपुंसकता का नाश छठ साधना से सम्भव होता है।
4- अध्यात्म का तो सूर्य ही आधार है, अतएव कुण्डलिनी जागरण तथा सम्मोहन आकर्षण हेतु सूर्य साधना अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
5- ऐश्वर्य की प्राप्ति छठ साधना के माध्यम से भी सम्भव होती है।
6- मृत्यु पर विजय तथा रोग निवारण के लिये छठ साधना राम बाण की तरह अचूक है। यहां ‘छठ’ का शाब्दिक अर्थ यह है, कि जीवन में हर प्रकार से सूर्य में निहित सभी रंगों को जीवन में सांगोपांग समान रूप से सम्पूर्ण आरोग्यता, धन-धान्य, संतान प्राप्ति, ऐश्वर्यता, यश-कीर्ति, तेजस्वीता को पूर्णता से आत्मसात कर सके। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक सुख जीवन में प्राप्त हो सके और किसी भी क्षेत्र में न्यूनता न रहने पाए।
इस साधना की सबसे बड़ी विशेषता तो यह है, कि साधक-साधिकाओं को अपने मन की बात किसी पर प्रकट करने की आवश्यकता नहीं होती, वह अपनी आकांक्षा इस साधना के द्वारा पूर्ण कर सकती है।
यह सांध्य कालीन चार दिवसीय साधना है और इसे छठी मेला दिवस बुधवार से प्रारम्भ करे। साधना के दिन सांध्य बेला में सूर्य देव को जल चढ़ाकर उनसे मन ही मन साधना में सफलता हेतु आशीर्वाद मांगे।
इस साधना में कोई भी सूती वस्त्र बिना सिलाई किया हुआ धारण करना आवश्यक है, जैसे साड़ी और धोती, आसन पीला हो और यह साधना अपने पूजा स्थान में पूर्व की ओर मुंह कर सम्पन्न करनी चाहिए।
इस साधना में निम्न उपकरणों की आवश्यकता होती है- सूर्य शक्ति यंत्र, अर्पणा, इच्छापूर्ति माला, प्रसाद स्वरूप चावल के लड्डू और दूध व खीर पूजा में रखे।
साधना प्रारम्भ करने से पूर्व स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर, पीले आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाएं और अपने सामने पीले वस्त्र से ढके बाजोट पर ‘सूर्य शक्ति यंत्र’ को स्थापित कर उसका पंचोपचार पूजन सम्पन्न करे।
तदुपरांत उस पर ‘अर्पणा’ अर्पित करते हुए अपनी इच्छा विशेष का उच्चारण कर, उसकी पूर्ति के लिए प्रार्थना करें और फिर ‘इच्छापूर्ति माला’ से निम्न मंत्र का 5 माला मंत्र जप नित्य 4 दिन तक जप करें। नित्य पूजा के बाद उक्त प्रसाद भोजन के साथ साधक ग्रहण करे। पूर्णता दिवस के दिन दुग्ध मिश्रित जल से सूर्य को प्रातः बेला में अर्घ्य दे।
साधना पूर्ण होने के बाद यंत्र, माला तथा अर्पणा को नदी में प्रवाहित करें। आप स्वयं इसके प्रभाव को देख कर दांतो तले ऊंगली दबा लेंगी।
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