





राजकुमारी विद्योत्तमा ने पूछा- मनुष्य के जीवन में अत्यधिक महत्व किसका होता है, कर्म का या भाग्य का?’ विद्वानों ने उत्तर दिया ‘भाग्य का! जब मनुष्य का भाग्य साथ नहीं देता तो उसकी विद्या, बुद्धि और पुरुषार्थ सभी साथ छोड़ देते है। इसका तात्पर्य यही हुआ कि भाग्य मनुष्य के जीवन में ज्यादा प्रबल है।’ ऐसे वचन सुनकर राजकुमारी विद्योत्तमा ने कहा, ‘हे पंडित! यदि आप भाग्य में ही भरोसा करते है तो आपने इतनी मेहनत कर इतने शास्त्रों का अध्ययन क्यों किया? यदि आप यह मानते है कि सब कुछ भाग्य पर ही निर्भर है तो आपने इतनी मेहनत कर यहां तक आने का कष्ट क्यों किया? यदि आपका यह मानना है कि भाग्य में ही सब लिखा होता है, तो आप मुझ से विवाह करने क्यों आए, मैंने ही क्यों नहीं आपके घर आकर आपसे विवाह का प्रस्ताव रखा? आपके इन सभी कर्मों को देख कर तो यही लगता है कि आप भी कर्म में ही विश्वास रखते है।’
राजकुमारी विद्योत्तमा के इन वचनों को सुनकर वह विद्वान मूक हो गया और उसने अपनी पराजय स्वीकार की। कई विद्वानों को हराने के उपरान्त अब तो राजकुमारी के हृदय में घमण्ड भी स्थान पा ही चुका था! जहां एक ओर स्त्री में घमण्ड विराजमान हो चुका हो, भला पुरुष समुदाय उसे सहन कर भी कैसे सकता था।
‘अब तो इस घमण्डी राजकुमारी विद्योत्तमा को सबक सिखाना ही पडे़गा।’ ऐसा सोचकर सभी विद्वानों ने यह निश्चय किया कि इस घमण्डी राजकुमारी विद्योत्तमा की शादी, संसार के सबसे मूर्ख पुरुष से करा कर ही उनका प्रतिशोध समाप्त होगा। ऐसा निश्चय कर वह ऐसे पुरुष की खोज में निकल पडे़। काफी खोज-बीन के बाद उन्हें एक पुरुष मिला जो उसी डाल को काट रहा था जिस पर वह खड़ा था। उसे देखते ही उनकी आंखों में चमक आ गई। उसे बुला कर उन्होंने पूछा कि क्या वो विद्योत्तमा राजकुमारी से शादी करने का इच्छुक है। वह युवक बचपन से ही महामूर्ख था और इन्हीं वचनों को सुन कर ही वह बड़ा हुआ था। उन विद्वानों ने उसे यह समझाया कि जब उसकी शादी राजकुमारी से हो जाएगी तो राजकुमारी स्वयं उसे विद्वान बना देगी, भला एक विदूषी अपने पति को मूर्ख रहने दे सकती है क्या! वह व्यक्ति तुरन्त उन विद्वानों के जाल में फंस गया। शर्त बस यह थी कि वह अपना मुंह बंद रखेगा!
अगले दिन वह उन विद्वानों के साथ राजसभा में पहुंचा। विद्योत्तमा को बताया गया कि यह युवक उच्च कोटि का विद्वान है पर अभी उसकी मौन साधना चल रही है। वह विद्योत्तमा के प्रश्नों का उत्तर केवल इशारों में देगा। घमण्ड में चूर विद्योत्तमा ने शर्त स्वीकार करने में एक क्षण भी न लगाया। विद्योत्तमा ने प्रश्न के रुप में अपनी एक उंगली उठाई। उत्तर में युवक ने दो उंगलियां उठाई। विद्वानों ने कहा, ‘राजकुमारी! आपने एक उंगली उठाई और कहा कि ब्रह्म एक है। उत्तर में इस युवक ने कहा कि भले ही ब्रह्म एक है पर उसके दो रुप है, साकार और निराकार। क्या आपको यह उत्तर स्वीकार है?’ विद्योत्तमा ने उत्तर को स्वीकार कर दूसरे प्रश्न के रुप में अपने हाथ को आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाया। उत्तर में युवक ने अपनी मुट्ठी दिखाई। विद्वानों ने कहा, ‘राजकुमारी जी! आपका प्रश्न था पंच महाभूत, अर्थात जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश को ही ब्रह्म कहते है।’ विद्योत्तमा ने हामी भरी। पंडितों ने कहा, ‘उत्तर में युवक ने कहा, जिस प्रकार पांचों उंगलियां मिल कर मुट्ठी का रुप धारण करती है, ठीक उसी प्रकार जब ये पांचों तत्व मिलते हैं तभी वे ब्रह्म को प्राप्त होते है।’
उन विद्वानों के सटीक उत्तरों को सुनकर राजकुमारी को अपनी हार माननी पड़ी और फिर खूब धूमधाम से शादी सम्पन्न हुई । पर राजकुमारी विद्योत्तमा की खुशी ज्यादा समय तक टिक न सकी। जल्द ही उस युवक की मूर्खता पूर्ण हरकतों से विद्योत्तमा को समझ में आ गया कि उसके साथ धोखा हुआ है और उसका पति महामूर्ख है। वह मौका मिलते ही उस युवक को उलाहना देती रहती और उसे उसके मूर्ख होने का आभास कराती रहती। एक दिन क्रोध में आकर उसने पूछा, ‘जब मैंने तुम्हें एक उंगली दिखाई तो बदले में तुमने दो उंगलियां क्यों दिखाई थी ?’ उत्तर कुछ इस प्रकार मिला, ‘मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि आपने कहा कि आप मेरी एक आंख फोड़ देंगी, तो मैंने कहा कि मैं आपकी दोनों आंखें फोड़ दूंगा।’ राजकुमारी ने फिर पूछा, ‘फिर मुट्ठी दिखाने के पीछे क्या भाव था?’ उत्तर मिला, ‘आपने कहा कि आप मुझे थप्पड़ मारेंगी तो मैंने कहा कि मैं आपको घूंसा मारुंगा।’
अब तो राजकुमारी के क्रोध की कोई सीमा न थी। स्वयं के साथ हुए इतने बड़े छल से उसने क्रोध में आकर अपने पति को बहुत कोसा और रात में ही उसे धक्के मार कर महल से बाहर निकलवा दिया। उसने उसे कहा कि वह बिना सींग का पशु है जिसे जीने का कोई हक नहीं है। पत्नी की बातें सुनकर उस युवक के दिल पर गहरी चोट पहुंची और वह खुद को समाप्त करने के लिए निकल पड़ा। एक नदी को देख कर उसने उसी में ही जल समाधी लेने की ठानी। जल में कुछ गहराई में जाते ही उसके सामने एक मेमना उछल कर आ गया। उसने उसे बचाने के लिए उसे गोद में उठा लिया। तभी कुछ लोग उस मेमने को लेने आ गए। उस युवक को उन्होंने कहा- ‘इसे लौटा दो। इसकी बलि मां काली को दी जाएगी।’ युवक ने अपने भोलपन में पूछा, ‘इसकी बलि क्यों दे रहो हो?’ लोगों ने कहा- ‘इसकी बलि से मां हम पर प्रसन्न हो जाएंगी।’ युवक ने फिर अपने भोलपन में पूछा, ‘यदि पशु की बलि से मां प्रसन्न होती है, तो आप लोग पशु की जगह मनुष्य की बलि क्यों नहीं देते?’
लोगों ने कहा, ‘आजकल कोई भी ऐसा वीर पुरुष कहां जो अपनी बलि मां को चढ़ा दे। वैसे भी कोई मनुष्य भला अपने आप को क्यों मरवाएगा। चलो उस मेमने को हमें सौंप दो।’ स्वयं के जीवन से निराश युवक ने फिर कहा, ‘आप मुझे ले चलें। मैं दूंगा अपनी बलि मां को!’ लोग उसे बलि चढ़ाने के लिए मंदिर में ले आए।
पर विधि का विधान तो कुछ और ही था। जैसे ही जल्लाद का खड्ग उठा, तभी जोर की आंधी आई और ऐसा महसूस हुआ कि जैसे प्रलय निकट ही हो। ऐसे वातावरण को देख सब वहां से भाग खड़े हुए। युवक ने मां काली की मूर्ति की ओर अश्रुपूरित नजरों से देखते हुए कहा, ‘मां ! मुझे तुमने भी अस्वीकार कर दिया। अब तुम ही बताओ, कि मैं कहां जाऊं?’ अकास्मात युवक को आत्मज्ञान हुआ कि वह जीवन में हार मानकर क्यों खुद को नष्ट करने के लिए दृढ़ संकल्प है। यही संकल्प वह मेहनत कर स्वयं को विद्वान बनाने के लिए क्यों नहीं करता है।
अब उसके मन में विद्वान बनने की भावना जाग्रत हुई। इसके लिए वो एक योग्य गुरु की तलाश में भटकने लगा जो उसे ज्ञानवान बना सके। एक दिन जब वो जंगलों के बीच से गुजर रहा था तब उसके जीवन में उसके गुरु कालीचरण का आगमन हुआ। उनको देखते ही वह युवक उनके चरणों में गिर पड़ा। उन्होंने उस युवक को अपना शिष्य बना कर उसे गुरु दीक्षा प्रदान की और साथ ही ‘काली साधना’ प्रदान की। कई दिनों की कठोर साधना के बाद गुरु ने उसे उस साधना में सिद्धि प्रदान कर उसे कालीदास का नाम प्रदान किया। काली की सिद्धि प्राप्त करने पर उसकी सारी मूर्खता जड़मूल समाप्त हो गई और वो उच्च कोटि का विद्वान बन गया। उसकी विद्या को देख कर उनकी पत्नी विद्योत्तमा ने भी उसे स्वीकार कर लिया और उसके साथ किए गए अभद्र व्यवहार के लिए क्षमा मांगी।
यही कालीदास आगे चलकर इतने उच्चकोटि के विद्वान बने, जो विक्रमादित्य के नौ रत्नों में से एक हुए और जिन्होंने मेघदूत, शाकुंतलम, श्रृंगार रस आदि कई अद्भुत ग्रंथों की रचना की। आज भी कालीदास को विश्व के श्रेष्ठतम रचनाकारों में से एक माना जाता है। इस संदर्भ से यह सार्थक है कि जन्म से मनुष्य का बुद्धिमान होना या न होना उसके हाथ में नहीं होता है परन्तु गुरु सेवा द्वारा, गुरु के बताए मार्ग पर एकनिष्ट होकर मेहनत करने से मनुष्य जीवन में अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करता ही है। भले ही वह जन्मकाल में नितान्त मूर्ख हो, परन्तु सच्ची श्रद्धा, सेवा, समर्पण द्वारा वह उच्चकोटि का विद्वान बन सकता है।
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