





जब शिष्य अपने हृदय, देह, प्राण, रोम-प्रतिरोम में गुरु का स्थापन कर लेता है, तो उसके रक्त के कण-कण से गुरुदेव की ध्वनि उच्चरित होने लगती है। गुरु स्वयं उसके हृदय में आकर स्थापित हो जाते हैं। ऐसा तब होता है जब शिष्य अपने छल, कपट, चालाकी आदि को समाप्त कर देता है— और ऐसा तब होता है जब वह अपने हाड-मांस के शरीर को मल-मूत्र से न भर कर, गुरु के प्रेम से सराबोर कर लेता है।
यह साधना तो ‘स्व’ को समाप्त करने की है और जैसे-जैसे साधक इस साधना में अग्रसर होता है। उसी क्रम में गुरु उसके हृदय में स्थापित होने लगते है, गुरु का स्थापन तो वहीं हो सकता है, जहां रिक्तता होगी, क्योंकि गुरु हाड़-मांस का शरीर नहीं वरन् ब्रह्माण्ड की विराटता को समेटे हुए उसके हृदय में स्थापित होते हैं और यही विराटता वह अपने शिष्य को भी प्रदान कर देते हैं।
शिष्य को तो प्रारंभिक अवस्था बनानी पड़ेगी। दिखाना पड़ेगा, कि उसमें क्षमता है, कि वह विराटता को धारण कर सकता है, उसे अपनी योग्यता सिद्ध करनी ही पड़ेगी, उसे अर्जुन की भांति संधान का अभ्यास करना ही पड़ेगा, कृष्ण की भांति गुरु की सेवा करनी ही पड़ेगी। गुरु के प्रति विश्वास व्यक्त करना ही पड़ेगा, गुरु के लिए समर्पण बनाना ही होगा, इसके विपरित साधक यदि गुरु के हर कार्य को तौलने लगता है, गुरु के कार्य को अपनी बुद्धि की कसौटी पर रखकर उसे देखता है। वहां वह शिष्य नहीं आलोचक बनने लगता है, वह गुरु की क्रिया को नहीं समझ सकता है, विराटता को समझने के लिए विराटता ही धारण करनी पड़ेगी। जब शिष्य पूर्णतया गुरु के अनुरूप होगा तभी वह उनके कार्यों को समझ सकता है।
इसी अग्नि से शिष्य यदि अपने विकारों को समाप्त कर लेता है, तो स्वयं ही उस विराटता को स्थापित कर लेता है। वह स्वयं में ही इतनी क्षमता प्राप्त कर लेता है कि शनैः शनैः विराटता को ग्रहण करता हुआ वह स्वयं पूर्ण हो जाता है।
यही क्रिया तो पूज्य सद्गुरुदेव ने आज के इस वातावरण में भी सम्पन्न करवाई। आज अधिकांश लोगों का चिंतन अत्यधिक स्वार्थपूर्ण हो गया है, वह स्व से हटकर कुछ सोचना ही नहीं चाहता, यदि वह बहुत अधिक विस्तारित हैं, तो वह अपने आस-पास के वातावरण तक ही सीमित रहता हैं, इससे अधिक वह कुछ करने की हिम्मत नहीं कर पाता हैं। गुरुदेव उनकी इस क्षुद्रता को समाप्त कर, उन्हें स्व से ऊपर उठाने की क्रिया कर रहे हैं और यह क्रिया वे अपने लिए नहीं वरन् समाज में व्याप्त उस क्षुद्रता से परिपूर्ण चिंतन को समाप्त करना चाहते है। और गुरु उसे समाज का शिरोमणि बनाना चाहते है।
उनका चिंतन मात्र कल्याण करने की भावना है- शिष्यों में किसी प्रकार की अपूर्णता न रह जाए। वे इसके लिए, अपनी शक्ति, अपनी ऊर्जा को शिष्य में प्रवाहित करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। वे देखते रहते हैं कि कहीं उस चिंगारी को कोई हवा का झोंका बुझा ने दे, समाज कहीं उस चिंगारी पर रेत न डाल दे। दीक्षाओं और साधनाओं के माध्यम से वे निंरतर प्रयत्नशील रहते हैं, कि उनका प्रज्ज्वलित किया हुआ शिष्य रूपी दीपक बुझने न पाए।
शिष्य धर्म ऐसा है, कि यदि चिंगारी लगी है, तो एक दिन आग भी अवश्य धधकेगी, परंतु इसके लिए तो शिष्य को स्वयं ही प्रयत्न करना चाहिए- परंपरा तो यही है, परंतु गुरुदेव तो समस्त परंपराओं को समाप्त करते हुए अपने शिष्यों को विराटता प्रदान करने की क्रिया में गतिशील हैं।
वे निरंतर प्रयत्नशील हैं, सहयोग आपको देना है, क्योंकि गुरुदेव ने इस क्रिया को इतना सरल एवं सहज बना दिया है, कि शिष्य अपने अल्प प्रयासों से ही विराटता को धारण करने में समर्थ हो जाता है और पूर्णता की ओर अपने कदम बढ़ा देता है। परंतु समाज तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार किसी भी दिव्य क्रिया को सहजता से होने ही नहीं देता है, वह हर चिंगारी पर रेत डालने को व्यग्र रहता है, क्योंकि यदि विराटता प्राप्त हो जाएगी तो अहं समाप्त होने लगेगा और व्यक्ति का अहं अपनी समाप्ति स्वीकार नहीं कर पाता है। परंतु पूज्य गुरुदेव ने भी यह निश्चय कर रखा है कि वे किसी भी दीपक को बुझने नहीं देंगे और उसे समर्थ बना देंगे, जिससे कि वह पूर्णता को धारण कर सके। इसके लिए तो निरंतर गुरुदेव से सम्पर्क स्थापित करना ही पडे़गा।
यदि गुरु निश्चय कर लेते हैं, तो उसे पूरा करने की सामर्थ्य भी रखते हैं। वह ऐसी परिस्थितियां भी निर्मित कर लेते हैं, कि उनकी लगाई हुई चिंगारी एक आग में परिवर्तित हो सके। गुरुदेव अपने शिष्यों को पूर्णता प्रदान कर देना चाहते हैं और इस क्रिया को करने में संलग्न भी हैं, पर प्राप्त करने के लिए हमें आगे तो आना ही पड़ेगा। यदि रेत के ढेर में दबने में ही हमें प्रसन्नता है, तो फिर इसमें न्यूनता तो हमारी ही है। आनन्द तो बह रहा है, यदि प्राप्त करना है, तो आगे बढ़ना ही पड़ेगा, पहुंचना ही होगा उस स्थान तक जहां पर यह क्रिया निरंतर चल रही है।
इसे आप गुरु पूर्णिमा के दिन ही सम्पन्न करें।
गुरु पूजन विधि- प्रातः स्नानादि नित्य क्रिया को सम्पन्न कर शुद्ध भावनाओं से पूजा स्थल में जो पहले से ही स्वच्छ कर लिया गया हो, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर आसन बिछा कर बैठें। अपने सामने एक चौकी पर सफेद वस्त्र बिछा कर उसमें पूज्य गुरुदेव का प्राण प्रतिष्ठित चित्र स्थापित करें।
सामग्री- ‘निखिलेश्वरानन्द दिव्य चैतन्य सिद्धि यंत्र’, ‘गुरु प्रत्यक्ष दर्शन गुटिका’, ‘गुरु प्राण संजीवनी माला’।
पूजन से पूर्व शुद्ध घी का दीपक जला लें, घी का दीप पूजन काल में सदैव अपने दाहिनी ओर रखें। निम्न मंत्र से दीपक का पूजन रोली और अक्षत (चावल) से करें-
ऊँ दीप ज्योतिः नमः, ऊँ दीपस्थ देवतायै नमः
प्रार्थना करें-
भो दीप! देव रूपस्त्वं कर्म साक्षी हृविघ्नकृत।
यावत् कर्म समाप्तिः स्यात् तावत्त्वं सुस्थिरो भव।।
इसके बाद दोनों हाथ जोड़ कर अपने इष्टदेव का स्मरण करें-
सर्वमंगल मांगल्यं वरेण्यं वरदं शुभम्।
नारायणं नमस्कृत्यं सर्वकर्माणि कारयेत्।।
पवित्रीकरण
बाएं हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की अंगुली से अपने ऊपर जल छिड़कें-
ऊँ अपवित्रः पवित्रे वा सर्वाबस्थां गतोऽपिवा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं सः बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।
गुरु प्रणाम दोनों हाथ जोड़े-
ऊँ ऐं गुरुभ्यो नमः, ऊँ ऐं परम गुरुभ्यो नमः, ऊँ ऐं
परापर गुरुभ्यो नमः, ऊँ ऐं पारमेष्ठि गुरूभ्यो नमः
जीवन्यासः-अपने हृदय पर दाहिना हाथ रखकर अपनी प्राण प्रतिष्ठा करें-
आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं ह्रौं हंसः
मम प्राणाः इह प्राणाः। आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं
शं षं सं ह्रौं हंसः सहा मम जीवः इहस्थितः।
आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं ह्रौं हंसः मम
सर्वाणि इन्द्रियाणी, वाग् मनः चक्षुः त्वक
श्रोत्र घ्राण जिह्ना इहैव आगत्य सुखं चिरं
तिष्ठतु।
गणपति का ध्यान करें-
ऊँ तत्पुरूषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्
ऊँ गं इदं स्नानं गाणेशाय नमः
ऊँ गं एष गन्धः सचन्दनं सपुष्पं गणेशाय नमः
ऊँ गं एष धूपः साक्षतं गणेशाय नमः
ऊँ गं एष दीपः नैवेद्येन सहितं गणेशाय नमः।
प्रणाम करें- गुरु चित्र को स्नान करावें-
ऊँ ऐं इदं स्नानं श्री गुरु चरणेभ्यो नमः।
(स्नान)
ऊँ ऐं एष गन्धः श्री गुरुचरणेभ्यो नमः।
(तिलक करें)
ऊँ ऐ इदं पुष्पं श्री गुरुचरणेभ्यो नमः।
(पुष्प चढ़ाएं)
ऊँ ऐं एष धूपः श्री गुरुचरणेभ्यो नमः।
(दीप दिखाएं)
ऊँ ऐं इदं नैवेद्यं समर्पयामि। (नैवेद्य अर्पित करें)
गुरु चित्र के सामने एक थाली रखें। अष्ट गन्ध या कुंकुम से त्रिकोण बना लें। मध्य में ऊँ लिखकर ‘निखिलेश्वरानंद दिव्य चैतन्य सिद्धि यंत्र’ को स्थापित करें। ‘गुरुत्व प्रत्यक्ष गुटिका’ दाहिनी ओर स्थापित करें।
स्नानं समर्पयामि श्री गुरु चरणेभ्यो नमः
इसके बाद निम्न मंत्र बोलते हुए कुंकुम से चावल रंग कर बाएं हाथ में लेकर यंत्र पर चढ़ावें।
ऊँ गुं गुरवे नमः, ऊँ गुं परम गुरवे नमः, ऊँ
गुं परात्पर गुरवे नमः, ऊँ गुं पारमेष्ठि गुरवे
नमः, ऊँ गुं अनन्तात्मने नमः, ऊँ गुं
परमात्मने नमः, ऊँ गुं ज्ञानात्मने नमः, ऊँ
अनन्ताय नमः, ऊँ गुं पारिजाताय नमः, ऊँ गुं
ऐश्वर्याय नमः, ऊँ गुं पद्माय नमः, ऊँ गुं
आनन्दकन्दाय नमः, ऊँ गुं संविल्लाभाय नमः,
ऊँ गुं प्रकृतिप्रियाय नमः, ऊँ गुं ज्ञानाय नमः,
ऊँ गुं आधार शक्तये नमः।
ऊँ ऐं एष सांगाय सपरिवाराय सर्वशक्ति
मयाय गुरुदेवाय निखिलेश्वराय नमः।
पीठ पूजाः-निम्न मंत्र बोल कर यंत्र एवं सिद्धि गुटिका पर गन्ध और पुष्प चढावें।
ऊँ ह्रीं एते गन्ध पुष्पे पीठ देवताषभ्यो नमः।
ऊँ ह्रीं एते गन्ध पुष्पे पीठ शक्तिभ्यो नमः।
ऊँ ऐं इदं पुष्पं ब्रह्माण्डस्वरूपाय निखिलेश्वराय नमः।
ऊँ ऐं एष धूपःब्रह्माण्डस्वरूपाय निखिलेश्वराय नमः
ऊँ ऐं एष दीपःब्रह्माण्डस्वरूपाय निखिलेश्वराय नमः
ऊँ ऐं इदं नैवेद्यं ब्रह्माण्डस्वरूपाय निखिलेश्वराय नमः
ऊँ ऐं इदं ताम्बूलं श्री निखिलेश्वराय नमः।
आवरण पूजाः-निम्न मंत्रों से यंत्र पर सुगन्धित पुष्प चढावें।
ऊँ ऐं एष गन्धपुष्पे निखिलेश्वरानन्द देवताभ्यो नमः
ऊँ ऐं एष गन्धपुष्पे परम गुरुभ्यो नमः।
ऊँ ऐं एष गन्धपुष्पे पारमेष्ठि गुरुभ्यो नमः।
इसके बाद गुरु प्राण संजीवनी माला से 11 माला मंत्र जप करें-
मंत्र
ऊँ क्रीं मम सद्गुरुशक्तियै पूर्णेश्वरी वरद् वरद् प्राप्यै नमः
(Om Kreem Mam Sadgurushakteey
Pooranshwari Varad Varad Prapyee Namah)
जप समर्पणः- ऊँ गुह्याति गुह्य गोप्ता त्वं गृहाणास्मत कृतं
जप, सिद्धिर्भवतु में देव त्वत प्रसादान्महेश्वर।
आरती सम्पन्न कर, साधना सामग्री को जल में विसर्जित कर दें।
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