





भवन, शयन कक्ष, बाथरूम, रसोई, पूजास्थान, कार्यालय, दुकान, फैक्ट्री, व्यवसायिक प्रतिष्ठान, मंदिर, प्याऊ, अस्पताल, आदि के सही स्थान और सही दिशा में स्थित होने से अनुकूल ऊर्जा और चेतना निरन्तर प्राप्त होती रहती है। सभी की दिशाएं निर्धारित होती है। इसलिए भवन निर्माण या नूतन कार्य प्रारंभ करने से पहले दिशा और मूहुर्त का विशेष महत्व रहता है जिससे उस कार्य में अनुकूलता और वृद्धि का भाव बना रहता है। इन स्थानों का वास्तु अनुरूप सही दिशा में होना अनिवार्य है।
ईश्वर द्वारा प्रकृति का निर्माण हुआ। ईश्वर या प्रकृति के विपरीत निर्माण या कार्य करने पर भांति भांति की बाधाएं, अड़चने, परेशानियों से युक्त जीवन बन जाता है। वास्तु भाव का मुख्य उद्देश्य निरन्तर समुचित ऊर्जा हमारे भीतर समाहित करना और संचारी भाव का प्रवाह निरन्तर बनाये रखना। यह विद्या वर्षों से चली आ रही है। वर्षों पुराने बने धर्म स्थान इस विधान के अनुरूप बने हैं जो आज भी अपनी संस्कृति, मानव, समाज के हितकारी हैं।
वास्तु तत्व क्रिया पांच तत्वों से बनी है। जो सृष्टि के अस्तित्व का स्वरूप हैं। पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल और वायु इन सभी की ऊर्जा के समूचित उपयोग से शक्ति, शांति, समृद्धि धन-संपदा, ज्ञान, सम्मान प्राप्त होता है। वह इन ऊर्जा के स्वरूप हम एक खुशहाल जीवन व्यतीत करते हैं।
आठ दिशाओं का समीकरण से वास्तु विज्ञान होता है। इन आठ दिशाओं में विभिन्ना तरह की ऊर्जा का संचार होता रहता है। जो मनुष्यों पर अपने तरीके से प्रभावित करते हैं। आंठों दिशाओं में आठ तरह के इष्ट हैं। इनका वास्तु यंत्र में अनुकूल दिशा में होना हमारे लिये लाभकारी होता है।
पूर्व इंद्र : इंद्र को देवताओं का राजा कहा गया है। इन्हें स्वर्ग का राजा भी कहते हैं। ये मनुष्य के जीवन वृद्धि में होने वाली क्रियाओं में पूर्ण समृद्धि प्रदान करता है। अर्थात् जीवन हर दृष्टि से सुख आनंद सौभाग्य से परिपूर्ण रहे। इंद्र देवता की कृपा होने पर मनुष्य को जीवन के किसी भी क्षेत्र में पराजित करना असंभव हो जाता है।
पश्चिम वरूण : वरूण को जल का इष्ट माना गया है। इन्हें न्याय के उपासक के रूप में पूजा गया है । वरूण सांसारिक मनुष्य के समस्त अवगुणों को समाप्त करने की शक्ति रखते हैं जिससे समस्त पाषों का क्षय होता है।
उत्तर कुबेर : कुबेर को धन के इष्ट के रूप में पूजा जाता हैं। इन्हें धन का रक्षक कहते हैं व इनकी पूजा से धन का प्रवाह निरन्तर बना रहता है और साथ ही सांसारिक जीवन में सुख सुविधाओं की वृद्धि प्राप्त होती रहती है। अकारण अनायास खर्च व धन का दुरूपयोग नहीं होता । कुबेर की पूजा से कीर्ति व सम्मान की प्राप्ति होती है ।
दक्षिण यम : यम को मृत्यु का देवता माना गया है। मनुष्य के मृत्यु के उपरांत उसकी आत्मा की मुक्ति व मोक्ष की प्राप्ति के लिए यम को पूजा जाता है। मोक्ष की प्राप्ति पर मनुष्य जीवन मरण के चक्रव्यूह से बाहर निकल जाता है और कलिष्ट रोग और अकालमृत्यु का भय नहीं रहता ।
उत्तर-पूर्व शिव : शिव त्रिमूर्ति स्वरूप सृष्टि के परमात्मा, निर्माता, असुर विध्वंसक व अमरता का आशीर्वाद देने वाले कहे गये हैं। इन्हें सबसे अधिक शक्तिशाली देवों के देव महादेव कहा गया है।
उत्तर-पश्चिम वायु देव : वायु देवता को प्राण वाहक कहा गया है। क्योंकि वायु बिना मनुष्य का जीवित रहना संभव नहीं है। वायु देव सृष्टि में निरन्तर वृद्धि के द्योतक माने गये हैं। इसके बिना सृष्टि के समस्त चरा-चर जीव-जन्तुओं का जीवित रहना असंभव है।
दक्षिण-पूर्व अग्नि देवता : अग्नि देवता को त्याग का इष्ट माना गया है। इन्हें पवित्रता का प्रतीक भी माना जाता है। सभी पूजा, अनुष्ठान, यज्ञ अग्नि के बिना संभव नहीं। अग्नि देवता को हमारे प्रार्थना के वाहक कहा गया है। अग्नि से मनुष्य के जीवन में उष्मा, ऊर्जा चेतना का प्रसार होता है। सभी पाप दोष अग्नि में भस्मीभूत हो जाते हैं।
दक्षिण-पश्चिम पितरों : पितरों को हमारे पूर्वज व हमारे जीवन का सभी कायो का वाहक कहा गया है। पितरों की अनुकंपा से हमें सांसारिक देह प्राप्त हुई है। पितरों के प्रसन्न होने पर हमें किसी भी प्रकार की कोई भी कठिनाईओं का सामना नहीं करना पड़ता है। उनके पुण्य हमारे जीवन के सुखों में वृद्धि और सृजन करते हैं।
समस्त दिशाएं स्थायी हैं, इन्हें बदला नहीं जा सकता। जैसा सूर्योदय पूर्व में होना निश्चित है इसी प्रकार वास्तु तत्व का प्रभाव निश्चित है। इसे बदला नहीं जा सकता। आज विकासशील देशों में भवन व उच्च इमारतों का निर्माण वास्तु अनुरूप ही होता है। बड़े-बड़े उद्योगपति कल कारखाने, फैक्ट्री, प्रतिष्ठान आदि वास्तु अनुरूप निर्माण कराते हैं जिससे रचनात्मकता, एवं सभी समस्याओं का निवारण करने की चेतना, सूझबूझ, मन की शांति, खुशहाली बनी रहती है। वास्तु ज्ञान के अनुरूप बना निर्माण पूर्ण वृद्धिदायक और फलदायी होता है। वास्तु कृत्या यंत्र का निर्माण प्रकृति, ईश्वर द्वारा प्रदत्त भौगोलिक, ज्योतिष शास्त्र ब खगोल शास्त्र, विज्ञान के ज्ञान, सृष्टि के पंचभूत तत्वों और आठों दिशाओं की समीकरण से बनता है।
संसार में हर व्यक्ति की यह इच्छा रहती है कि उसके जीवन में सभी सुख-सुविधाओं से युक्त स्वयं का भवन या मकान हो और यह श्रेष्ठतम मनोकामना परिपूर्ण हो सके। यह धारणा सामान्य मनुष्य में निश्चित रूप से रहती है। इसके साथ ही स्वयं के व्यवसाय के रूप में कारखाना, फैक्ट्री या दुकान के माध्यम से आर्थिक समृद्धि की प्राप्ति के लिए धन अर्जन कर सके। यह सामान्य इच्छाएं व्यक्ति जीवन में भरकस प्रयास करके उन स्थितियों को प्राप्त कर भी लेता है। परंतु उसके बाद भी परिवार में क्लेश, अशांति, बच्चों का बीमार रहना, व्यापार में घाटा, शत्रुओं का हावी होना, मानसिक परेशानी, व्याधि, जरा, पीड़ा, अकारण तनाव, धनहीनता आदि अनेक विषम स्थितियां प्रमुख रूप से वास्तु दोष के स्वरूप प्राप्त होती हैं ।
मकान एक महत्वपूर्ण संपत्ति होती है। नये मकान में सही विधि से वास्तु क्रिया के रूप में बदलाव करना काफी कष्ट दायक होता है जिससे हमें विशेष रूप से व्यर्थ की आर्थिक परेशानियां उठानी पड़ती है और जीवन में सुस्थितियां नहीं आ पाती है। लाखों लाखों रूपये व्यय करने के बाद भी जीवन में शांति और समृद्धि प्राप्त नहीं हो पाती है। वास्तु दोष युक्त घर होने से पूरे परिवार में प्रतिकूल परिस्थितियों का विस्तार निरन्तर होता रहता है अर्थात् रोग, कलह, तनाव, धनहीनता, शारीरिक कमजोरी, मानसिक चिंताएं, उत्तरोत्तर जीवन अधोगति की ओर अग्रसर होता रहता है ।
यह संभव नहीं है कि हम अपने घर,भवन, दुकान, कारखाना, फैक्ट्री और फर्म में तोड़ फोड़ कर वास्तु के अनुरूप निर्माण पुनः कर सकें। इस हेतु शास्त्रोक्त रूप में तथा श्रेष्ठ प्रकाण्ड पण्डितों द्वारा अभिमंत्रित चैतन्य वास्तु यंत्र की सही तरीके से स्थापना करने से जीवन की अनेक अनेक कठिनाईयों का निवारण प्राप्त किया जा सकता है। वास्तु यंत्र का मूल उद्देश्य उस व्यक्ति या परिवार से संबंधित सभी दिशाओं में अनुकूल चेतना का संचार करना होता है।
मकान, दुकान, फैक्द्री या व्यवसाय क्षेत्र में वास्तु दोष के निवारण के लिए वास्तु यंत्र स्थापित करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है।
वास्तु कृत्या यंत्र में आठ दिशाओं के स्वामीओं का समावेश होता है। जो हमें पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक कठिनाईयों और अनेक अनेक कष्टों से मुक्त ही नहीं वरन् जीवन में उत्तरोत्तर सुस्थितियां लाते हैं और व्यक्ति जीवन की सभी इच्छाओं को परिपूर्णता से अपने अनुकूल बना लेता है।
वास्तु कृत्या यंत्र अपने आप में एक अद्वितीय और दुर्लभ यंत्र है जिसे गुरूदेव ने अपने सानिध्य में ज्ञान, चेतना तथा अपने मुख से निःसृत मंत्रों तथा ईशान और अग्नि कोण से संस्पर्शित प्राण प्रतिष्ठित कर इस यंत्र को दिव्य और प्राण संजीवन क्रिया से आपूरित किया है । बिना किसी तोड़-फोड़ या स्थान परिवर्तन के भवन, दुकान, फैक्ट्री, कारखाने आदि में आनेवाली बाधाएं वास्तुकृत्या यंत्र के स्थापित करने से समाप्त हो जाते हैं तथा आपके भीतिक और आर्थिक जीवन को सुखमय तथा समृद्धिशाली बनाता है, साथ ही वंश वृद्धि, यश और कीरति की वृद्धि में पूर्ण सक्षम है ।
वास्तु कृत्यायंत्र संबंधित व्यक्ति के अनुकूल सस्वर मंत्रों से चेतन्य कर प्राण प्रतिष्ठित युक्त निर्मित किया जाता है। इस हेतु गुरूदेव से व्यक्तिगत रूप से मिलना आवश्यक है।
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