





उन्होंने सूनी आंखों से मेरी ओर देखते हुए कहा – “में देख रहा हूं भारत वर्ष पर विपत्तियां आने वाली हैं, युद्ध की विपत्ति, संग्राम की विपत्ति, नाश की विपत्ति।” पर दूसरे ही क्षण उनके आंखों में चमक लौट आयी, मगर यह जरूरी है उन्होंने बात की तारतम्यता को जोड़ते हुए कहा – “क्योंकि भारत वर्ष को स्वाभिमान दिखाने का यह सबसे अच्छा मौका है, इस युद्ध से संसार एक बार एहसास कर लेगा कि भारत वर्ष अपने आप में एक सम्पूर्ण शक्ति है ।”
मैंने आश्चर्य के साथ पूछा – क्या। ?
उन्होंने जवाब दिया – “हां! एक पड़ोसी देश उन्माद में भारत वर्ष पर प्रहार कर सकता है और करेगा। निकट भविष्य में यह घटना घटित होने वाली है, मैं देख रहा हूं नरसंहार, मैं देख रहा हूं लाखों युद्ध बंदी, मैं देख रहा हूं इस धरती पर फैला हुआ खून और एक बार फिर वे अपनी आंखों में उदासी लिए आकाश की ओर एक टक देखने लगे ।”
अगले ही तीन-चार महीनों में ये सभी घटनाएं सत्य साबित हुई, मेरी डायरी में आज भी वे पंक्तियां जो श्रीमाली जी के साथ बातचीत की थी अंकित हैं कि यह ठीक है, जरूरी हो गया है युद्ध । इससे हमारा देश अत्यंत स्वाभिमान के साथ विश्व के सम्मुख खड़ा हो सकेगा। उसके बाद ही विश्व में यह एहसास किया कि भारतवर्ष अपने आप में एक पूर्ण शक्ति है।
इसके बाद उनके साथ मेरा सम्पर्क नहीं रह सका, उन्होंने ज्योतिष के सम्मेलनों में भाग लेना कम कर दिया था, यात्राएं उन्होंने कम कर दी, वे अपने आप में खो से गए थे, एक बार दिल्ली में मिलने पर जब मैंने पुछा भी कि आप ने ज्योतिष सम्मेलनों में आना बंद कर क्यों दिया है।
तो उन्होंने उत्तर दिया – हां यह विद्या गौरवमयी विद्या है और जब छोटे और टुच्चे लोगों के हाथों कोई विद्या चली जाती है तो उस विद्या का पतन होने लग जाता है। आस्था हिलने लग जाती है, विश्वास डगमगाने लग जाता है। और मैं देख रहा हूं कि जिन लोगों को ज्योतिष का सामान्य सा भी ज्ञान नहीं है वे भी विश्व प्रसिद्ध ज्योतिषी होने का दावा करने लग गये हैं, तो इस विद्या का पतन होने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है और में इसीलिए उन विश्व प्रसिद्ध ज्योतिषियों में मेरे जेसे आदमी का बैठना अनुकूल अनुभव नहीं करता इसीलिए मैं स्वयं पीछे हट गया हूं ।
और वास्तव में मैंने दुख के साथ अनुभव किया है कि हर गली, हर सड़क, हर मौहल्ले में यदि आदमी को कोई काम नहीं मिलता है तो श्रीमाली जी की चार छः किताबें पढ़कर ज्योतिषी होने का दावा करने लग जाते हैं, और ज्यों ही ज्योतिषी होने का दावा करते हैं, और एक बड़ा सा बोर्ड लगा देते है “विश्व प्रसिद्ध ज्योतिषी ” भारत वर्ष में भारत प्रसिद्ध या प्रान्त प्रसिद्ध ज्योतिषी रहे ही नहीं, जो भी हुए अब वे विश्व प्रसिद्ध ज्योतिषी ही रह गए।
मुझे श्रीमाली जी के बारे में बराबर जानकारी मिलती रहती थी, कभी टेलीफोन के दारा, कभी लोगों के द्वारा, और मेरे मन में प्रबल इच्छा बनी रही कि मैं कुछ समय उनके सानिध्य में व्यतीत करूँ। कुछ ज्योतिष ज्ञान सीखूं। उनके जीवन में अमूल्य खजाना भरा पड़ा है । उनका अनुभव विशाल है और यदि मैं फलित ज्योतिष के कुछ सूत्र उनसे प्राप्त कर पुस्तक के माध्यम से इस देश के सामने रखूं, तो एक बहुत बड़ा देश के प्रति कार्य होगा। मगर चाहते हुए भी वे समय निकाल नहीं पाए और दो-चार बार उनसे भेंट हुई भी तो उन्हें मैंने साधना कार्यों में, पत्रिका में और विशेष शिविरों में व्यस्त होते हुए अनुभव किया। ज्योतिष के साथ उन्होंने भारत की प्राचीन विद्या को पुनर्जीवित करने के लिए एक नई पगडंडी बना ली। उन्होंने कहा भी कि – “भारत वर्ष तो पूरे विश्व की पूंजी है यह अध्यात्म, ये मंत्र, ये योग, यह सब भी भारतवर्ष की थाती है जिसे सुरक्षित रखना आवश्यक है और जीवन का प्रत्येक क्षण मैं इस कार्य में लगा सका तो मुझे एक संतोष सा अनुभव होगा ।” कहते कहते उनके चेहरे पर आत्म विश्वास की गरिमा अनुभव करने लगा।
इसके बाद तीन-चार साल तक उनसे कोई सम्पक नहीं हो पाया। मैं भी साल डेढ़ साल के लिए यूरोप चला गया था, और वे भी शायद अपने इस लक्ष्य के लिए अत्यधिक व्यस्त हो गए थे। मगर मेरे मन में यह कसक अवश्य थी उनके साथ कुछ समय व्यतीत करूं, जब भी समय मिले, जैसे भी हो ।
पिछले दिनों कुछ समय पहले दिल्ली में उनके निवास स्थान पर मुझे भेंट करने का अवसर मिला, तो मैंने देखा कि पहले की अपेक्षा वे काफी कमजोर से हो गए है, पर फिर भी उनके चेहरे पर एक उत्साह, ओज एवं गरिमा थी। एक दर्प का मैंने अनुभव किया, एक आत्मविश्वास का बोध सा मुझे हुआ। उस समय विश्व के मानचित्र पर कुछ भी नए समाचार नहीं थे।
एक दिन शाम के समय में श्रीमाली जी के साथ बाल्कानी में बेठा हुआ था। वे कोई पत्रिका पढ़ते-पढ़ते अचानक गंभीर हो गए। पत्रिका एक ओर रख दी और शून्य में ताकते हुए वे काफी व्यथित, काफी चिंतित, काफी उदास से अनुभव हुए।
मैंने पूछा श्रीमाली जी क्या बात है आप आकाश की ओर ताकते हुए गंभीर हो गए आकाश कितना स्वच्छ है। शाम की लालिमा कितनी सुन्दरता के साथ फैली हुई है।
अचानक उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया यह आकाश की लालिमा सुन्दर नहीं यह रक्त रंजित खून से भरी हुई है। मैं देख रहा हूं, चारों तरफ खून, में देख रहा हूं नर संहार, ऐसा नर संहार जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती निकट भविष्य में आने वाले दिनों में ।
में हक्का-बक्का रह गया। मैंने कहा – “श्रीमाली जी, ऐसा तो कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा है, कहीं कोई युद्ध की स्थितियां रही ही नहीं, इस समय तो विश्व पहले की अपेक्षा ज्यादा खामोश, ज्यादा शांत है।
श्रीमाली जी बोले नहीं मगर वे धीरे-धीरे बुदबुदाए जो देख रहा हूं वह अपने आप में सही है। में इस आकाश की लालिमा में हजारों लोगों का खून बहता अनुभव कर रहा हूं । युद्ध के द्वारा, दर्प और घमण्ड की वजह से अपने आप को प्रसिद्ध करने के घमण्ड की वजह से । में चुप रहा गया और कुछ दिनों में या उसके पांच-सात दिनों के बाद जब मैंने अमेरिका द्वारा ईराक पर आक्रमण के समाचार पढ़े तो तुरन्त ही मेरे दिमाग में श्रीमाली जी की पंक्तियां तैर गयी। अभी चार-पांच दिन पहले तो उनकी बाल्कनी पर जो मुझे सांध्य काली लालिमा सुन्दर दिखाई दे रही थी उन लालिमाओं में खून से सनी हुई अनुभव हो रही थी और आज इस युद्ध मे जो नर संहार हो रहा है जिस प्रकार से आधुनिकतम अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग हो रहा है उससे तो पूरा विश्व खून से रंगने जा रहा है। कितनी अचूक और अद्वितीय भविष्यवाणियां है श्रीमाली जी की! किस प्रकार से वे पहले से ही आकाश के भाल पर लिखी हुई इबारतें पढ़ लेते हैं। और यही नहीं इस प्रकार का नरसंहार, इस प्रकार का युद्ध अनुभव कर वे कितने व्यथित हो उठते हैं। उनके आंखों में कितनी गहराई, कितनी खामोशी, कितनी उदासी तैर जाती है – मैंने उसी दिन अनुभव किया ।
युद्ध के दिनों में ही मैं जानबूझ कर दिल्ली पहुंचा । श्रीमाली जी से मिला, वे अपने कार्यालय में उदास से बैठे थे। कुछ लिखने की इच्छा नहीं हो रही थी। मैंने कहा आपने जो कुछ कहा वह सत्य हो रहा है। जिस प्रकार का यह युद्ध हो रहा है पूरा विश्व चितिंत है कि क्या हो रहा है और इससे बड़ी बात यह है कि जो शक्ति संतुलन है, वह डगमगा रहा है। ईराक तबाह हो रहा है और रूस सामने खड़ा ही नहीं हुआ । यदि रूस कमर कस कर सामने खड़ा हो गया होता तो अमेरिका की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह दुर्धषर्ता के साथ आक्रमण कर बैठता ।
श्रीमाली जी ने मेरी आंखो में ताका, मैंने देखा कि उनकी आंखों में एक खामोशी, एक घना वीरानापन है। उन्होने कहा – यह रूस की मजबूरी है, रूस कमर कस कर खड़ा होने की स्थिति में ही नहीं है क्यों कि मैं तो स्वयं रूस को ही टुकड़े-टुकड़े होते देख रहा हूं, निकट भविष्य में ।
यह चौकाने वाली बात थी मैं एक दम से सकपका गया । हैरान रह गया कि ऐसा केसे संभव हो सकता है, रूस जैसी दुर्जेय शक्ति टुकडे-टुकड़े हो जाए यह संभव हो ही नहीं सकता । कोई विश्वास कैसे करेगा कि रूस खंडित हो सकता है। ऐसा कोई आसार ही नहीं है।
मेंने अपनी आशंका प्रकट की आप क्या कह रहे हैं, रूस टुकड़े-टुकडे हो जाएगा! एक महाशक्ति, एक अद्वितीय शक्ति, जिसने अपनी ताकत से पूरे विश्व को यह एहसास करा दिया है कि वह संसार की किसी भी शक्ति से टक्कर लेने में समर्थ है । यह रूस की वजह से ही तो विश्व शक्ति संतुलन चल रहा है।
श्रीमाली जी ने उस समय जो कुछ कहा वह मेरी डायरी में अंकित है। रूस चाहे ऊपर से अभेद्य कवच की तरह दिखाई दे रहा है मगर अंदर से बिल्कुल खोखला है और वह विनाश के कगार पर है। रूस छोटे-छोटे राज्यों में बंट जाएगा आने वाले कुछ ही समय में, और यह शक्ति संतुलन तो समाप्त हो ही जाएगा। आने वाले दिनों में सम्पूर्ण विश्व पर अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का दबाव बढ़ जाएगा।
मैं उस समय कुछ बोला नहीं पर मेरी आत्मा, मेरा मन इस बात को गवारा नहीं कर रहा था कि किस प्रकार ऐसा हो सकता है यह एक ऐसी भविष्यवाणी थी जिस पर विश्वास किया ही नहीं जा सकता था और फिर उस समय श्रीमाली जो को टोकना अच्छा नहीं लगा, और मैं चुप रह गया और पांच-सात मिनट की बातचीत के बाद में बाहर निकल गया।
परन्तु इतिहास साक्षी है इस भविष्यवक्ता की एक-एक पंक्ति सत्य सिद्ध हुई । रूस जेसी महाशक्ति भी खंडित हुई, रूस छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया और अमेरिका अपने आप में पूर्ण शक्तिशाली बनकर विश्व पर पूर्ण रूप से एकाधिकार स्थापित करने के लिए अग्रसर हो गया। वास्तव में ही मैं अनुभव करता हूं कि श्रीमाली जी को एक अलौकिक शक्ति प्राप्त है, ज्योतिष का उन्होंने गहराई के साथ मंथन किया है। वे आने वाले दिनों को, समय को, वर्षों को भांप लेते है । उनकी प्रत्येक भविष्यवाणी अपने आप में सत्य सिद्ध होती है।
पिछले दिनों जब चीन ने पाकिस्तान को मिसाइलें दी और ऐसा लगने लगा जेसे चीन और पाकिस्तान की दांत काटी” मित्रता हैं, मैंने श्रीमाली जी को जोधपुर टेलीफोन किया। मेंने कहा – हम तो एक तरफ पाकिस्तान एक तरफ चीन से घिरे हुए बैठे हैं और अमेरिका का शिकंजा हम पर बराबर कसता जा रहा है।
टेलीफोन पर ही श्रीमाली ने जवाब दिया – विश्व में आने वाले दिनों में चीन हमारा सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र साबित होगा बराबरी का सहयोगी और एक नया शक्ति संतुलन बनने जा रहा है, भारत-चीन और एक अन्य देश से मिलकर। सुनकर अटपटा लगा। जिस चीन ने हमारी धरती हड़प ली, जिस चीन ने हमारे आत्म सम्मान को चोट पहुंचायी, वह चीन हमारा सर्वाधिक श्रेष्ठ मित्र बन जाएगा। सुनकर विश्वास नहीं हुआ, परन्तु मुझे श्रीमाली जी की ज्योतिष पर अगाध आस्था है। पिछले तीस वर्ष इसके साक्षी हैं और में निश्चित हूं कि वास्तव में आने वाले दिनों में यह भविष्यवाणी भी सत्य सिद्ध होगी ।
श्रीमाली जी वास्तव में ही इस शताब्दी में अद्वितीय भविष्यवक्ता, मंत्र मर्मज्ञ एवं सिद्ध पुरुष हैं, यह हमारा सौभाग्य है कि हम उस युग में सांस ले रहे हैं जिस युग में नारायणदत्त श्रीमाली जैसा व्यक्तित्व विद्यमान है, मेरा उन्हें शत् शत् नमन। सद्गुरूदेव कहते हैं कि जिस प्रकार वातावरण में हम रहते हैं, जिस भूमि पर हम निवास करते हैं, तथा जो भूमि व्यक्ति की कार्यस्थली होती है ये सारी बातें मनुष्य की चिंतन कार्यक्षमता आदि क्रियाओं से वह अधिक प्रभावित रहती है। जीवन में जिस किसी भी इष्ट को, देवी देवता को अथवा हृदय भाव में विराजमान इष्ट रूपी गुरू का निरन्तर स्मरण करते हैं उन्हीं से जीवन में क्रियाएं बनती हैं और उसी के फल स्वरूप सद्गुरूदेव ने कहा कि किसी न किसी जीवन में कभी न कभी तुमसे जरूर वायदा किया होगा कि मैं तुम्हें अमृततत्व का पान कराऊंगा…. और इसी वायदे को निभाने के लिए मैं इस धरती पर आया हूं… और आवाज दे रहा हूं तुम्हें अपने पास बुलाने के लिए कि जिससे मेरे द्वारा किया गया वायदा पूरा हो सके …
तुम मेरे शिष्य हो या मेरे आत्मीय हो या मेरे से परिचित हो या पत्रिका के पाठक हो, किसी न किसी रूप में यदि तुम्हारा और मेरा संबंध बना हुआ है, तो इसकी जड़े जरूर पिछले किसी जीवन से जुड़ी रही होंगी। यह संभव ही नहीं है कि तुम मुझसे इसी जीवन से जुड़े होगे। यह संभव ही नहीं है कि तुम मुझसे इसी जीवन में जुड़े, कई-कई जन्मों से तुम मेरे साथ जुड़े हुए हो, हो सकता है कि तीन जन्म पहले, पांच जन्म पहले, आठ जन्म पहले या दस जन्म पहले। मैंने तुम्हारे साथ यह वायदा किया होगा कि मैं तुम्हें इन भौतिक बाधाओं से परे हटाकर उस पूर्णता तक पहुंचा दूंगा जिसे ब्रह्म” कहा गया है, जिसे पूर्णता कहा गया है, जिसे (पूर्णमदः पूर्णमिदं! कहा गया है, और इससे बाद हर जीवन में तुम मुझसे कहीं न कहीं मिले शिष्य के रूप में, पाठक के रूप में, परिचित के रूप में और किसी भी अन्य रूप में | हर बार मैंने तुम्हें समझाया है, पूर्णता तक पहुंचाने का प्रयत्न किया है। हर बार तुम ने मेरा हाथ छोड़ दिया है, हर बार तुम भटक गये, हर बार भौतिकता के दल-दल में फंस गये। हर बार पत्नी, पुत्र और परिवारजनों के वाक जाल में उलझ कर अपनी साधना को अधूरा छोड़ दिया और फिर तुम्हें जन्म लेना पड़ा, फिर तुम्हें मल-मूत्र में पड़ना पड़ा फिर तुम उसमें से बाहर निकले, फिर तुम अपने जीवन को बड़ा करते हुए उन्हीं समस्याओं में घिर गये, और जो जीवन का सही आनन्द, जीवन का जो सही प्रेम, स्नेह, ऊंचाई है, प्राप्त नहीं कर पाये।
इसका कारण है हर बार तुम्हारा इस प्रकार की भौतिक समस्याओं से उलझा हुआ रहना, पर इससे तुम्हें मिला क्या ? इस जीवन में ही तुम देख लो कि तुम्हें क्या मिल गया है ? थोड़े से कागजी नोट, थोड़े से परिवार के बंधन और इसके साथ ही साथ मिला तुम्हें तनाव, परेशानियां, बाधाएं, अड़चने, कठिनाइयां, असंतोष, जीवन की अपूर्णता । क्या यह सब कुछ सही है ? क्याए जीवन इतना घटिया, मामूली सा है कि इन छोटी चीजों के बदले जीवन को बरबाद कर दिया जाए ? तुम इस प्रकार से इन तुच्छ कागजी नोटों के बदले अपने जीवन को बरबाद ही कर रहे हो, सही अर्थों में कहना चाहूं तो तुम्हारा जीवन खरे सोने के सिक्कें की तरह है और तुम इसे रांगे के भाव, लोहे के भाव बेच रहे हो, बरबाद कर रहे हो। ऐसा कब तक चलेगा ? ऐसा तुम्हारे जीवन का अधूरापन कब समाप्त होगा ? कब तक तुम मन में पीड़ा और दर्द लिए घूमते रहोगे ? कब तक तुम्हारे मन में छटपटाहट बनी रहेगी, कब तक तुम्हारे जीवन में असंतोष उभरता रहेगा ? कोन सा ऐसा क्षण आएगा जब तुम्हें समझ आएगी, कोन सा ऐसा क्षण आयेगा जब तुम अहसास कर सकोगे कि मुझे जीवन में पूर्णता प्राप्त कर लेनी है।
यह पूर्णता गुरु ही दे सकते हैं – तुम्हारा यह अधूरापन, तुम्हारी यह कमी, तुम्हारी यह न्यूनता, संसार का कोई वैज्ञानिक, कोई साइंस, कोई टेकूनोलॉजी दूर नहीं कर सकती। तुम्हारे मन का जो अंधियारा है वह बाहर से दूर हो ही नहीं सकता | कोई ऐसी मशीन बनी ही नहीं जो तुम्हारे असंतोष को दूर कर सके। तुम जिस पैसे पर गर्व कर रहे हो, वे तो चांदी के चंद ठीकरें है, टुकड़े हैं । उन चांदी के टुकड़ों से तुम मन का संतोष प्राप्त नहीं कर सकते। उन कागजी नोटों पर मन का आनन्द मोल नहीं ले सकते, प्रसन्नता नहीं प्राप्त कर सकते, जीवन की उमंग नहीं खरीद सकते, जीवन का वास्तविक सुख इन रुपयों के बदले प्राप्त नहीं हो सकता। जीवन की श्रेष्ठता केवल पैसों से प्राप्त नहीं हो सकती। यह तुम्हारे मन का आनन्द, यह तुम्हारे मन का संतोष, यह मन की पूर्णता न तुम्हारे पैसे दे सकते हैं, न तुम्हारी पत्नी दे सकती है, न तुम्हारा पुत्र दे सकता है और न तुम्हारा समाज दे सकता है।
इस समाज में, जिसको तुमने पत्नी कहा है, पति कहा है, चाचा, काका, ताऊ जो कुछ कहा है, उन्होंने तुम्हें केवल बंधन दिया हैं । बांध दिया है, छोटे से कटघरे में, एक छोटे से मकान में, एक पत्नी के साथ, दो-चार बच्चों के साथ, पांच हजार रूपयों के साथ । वे बंधन दे सकते है, मुक्ति नहीं दे सकते, वे तुम्हें परेशानियां दे सकते है, उलझने दे सकते है, जीवन का आनन्द नहीं दे सकते है। वे तुम्हें गृहस्थ की कठिनाइयां दे सकते हैं, तुम्हें आकाश में उड़ने की क्षमता नहीं दे सकते। आकाश में उड़ने का आनन्द हंस ही प्राप्त कर सकता है। वह तो मानसरोवर झील में डुबकी लगाने का आनन्द क्या होता है, और यह आनन्द गुरु के अलावा और कोई दे ही नहीं सकता, न देवता, न मनुष्य, न मित्र, न परिवार, न पत्नी, न पति, न पुत्र, न बन्धु, न बान्धव । जब तक ज्ञान प्राप्त नहीं होगा तब तक तुम्हारे जीवन में पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती और जब तक पूर्णता प्राप्त नहीं होती तब तक तुम्हारा यह जीवन बार-बार घिसा-पिटा चलता रहेगा। एक ऐसा जीवन जो घिसे हुए रिकार्ड की तरह है जो बार-बार एक ही बात पर घिसटती रहती है। आखिर तुम कब सावधान होगे ? कब चेतन्य होगे ? कब एहसास करोगे कि हमें यह सब बन्धन तोड़ कर जीवन की उमंगता को प्राप्त करना है, जीवन का ऐश्वर्य प्राप्त करना है। इन रुपयों-पैसों, घर-मकान और चांदी के चंद टुकड़ों के बदले उस खरे सोने को लेना है, उस हीरे को प्राप्त करना है जो जीवन में पूर्ण आनन्द दे सकता है, जीवन में पूर्ण चेतन्यता दे सकता है, जीवन की पूर्णता दे सकता है। मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से इस एक योनि में ही खड़ा कर सकता हूं –
हमारे शास्त्रों में कहा है कि चौरासी लाख योनियां होती हैं। व्यक्ति हर योनियों में भटकता हुआ इस मनुष्य जीवन को प्राप्त करता है। अब तुमने मनुष्य जीवन प्राप्त किया है वह तुम्हारे साठ साल का, सतर साल का जीवन है। वैसे भी तुमने तीस-पैतीस साल समाप्त कर दिए हैं, कुल बीस-पच्चीस साल बचे है इस मानव जीवन के, और यह जीवन भी समाप्त हो गया, तो पुनः चौरासी लाख योनियां भटकने के बाद ही यह मानव जीवन प्राप्त हो सकेगा, कब प्राप्त हो सकेगा कुछ कहा नहीं जा सकता । यदि ऐसा जीवन प्राप्त हो भी गया और सही सदगुरु प्राप्त नहीं हुए तो भी वह जीवन व्यर्थ चला जायेगा, उस जीवन का कोई अर्थ, कोई मकसद नहीं रह पायेगा। अब जबकि तुम्हारे हाथ में यह जीवन है तो इस जीवन का मूल्यांकन करना तुम्हारा फर्ज है। इस जीवन में तुम्हें सब कुछ कर देना है, इसी जीवन में पूर्णता प्राप्त कर लेनी है, जिससे कि भविष्य में बार-बार जन्म नहीं लेना पड़े, बार-बार उस मल-मूत्र में नही रहना पड़े, बार-बार उस भौतिकता में बंधकर जीवन को एक कटपघरे में कैदी की तरह व्यतीत नहीं करना पड़े। मैं तुम्हें इन चौरासी लाख योनियों के आवागमन से मुक्ति दिलाकर इसी जीवन में मुक्त कर देना चाहता हूं, इसीलिए तो मैं आया हूं ।
बिना त्याग के जीवन में पूर्णता आ ही नहीं सकती : यह भी अच्छी तरह से समझ लें कि जब तक तुम किसी चीज को अपनी छाती से चिपकाए रखोगे, उससे आसक्ति रखोगे तब तक जीवन में पूर्णता आ ही नहीं सकती | पूर्णता तभी आ सकती है जब आप विलुप्त हो जाए, सबसे परे हट जाएं, किसी के प्रति तुम्हें आसक्ति नहीं रहे न पति के प्रति, न पत्नी के प्रति, न धन के प्रति, न खाने पीने के प्रति, न समाज के प्रति। इन सबसे हट कर जब तुम खड़े हो सकोगे तब तुम सही अर्थों में शिष्प बन सकोगे, साधक बन सकोगे, पूर्णता तक पहुंचने का रास्ता प्राप्त कर सकोगे। आकाश में उड़ने के लिए पंख फैलाने की क्षमता मिल सकेगी, मानसरोवर में डुबकी लगाने की क्रिया आ सकेगी। इसके लिए बहुत जरूरी है – त्याग” क्योंपकि तुम्हें पूर्णता तक पहुंचाने वाला केवल एक ही व्यक्तित्व है जिसको हमने “गुरु! कहा है, जिसको (पूर्णममदः” कहा है, जिसको “ गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुदेवो महेश्वर:’ कहा गया है। उस तक पहुंचने की क्रिया ही तुम्हारी पूर्णता है उन्हें प्राप्त करने की क्रिया ही तुम्हारी श्रेष्ठता है। उनके होंठो पर तुम्हारा नाम आ जाना ही अपने आप में महानता है क्योंकि उनके सामने तो सैकड़ो, हजारों, लाखों व्यक्ति है और शिष्य हैं और सबके नाम याद रखना संभव नहीं है।
जब तक उनके होंठो पर तुम्हारा नाम नहीं होगा, उनके हृदय में जब तक तुम बस नही जाओगे तब तक उनके और तुम्हारे बीच में संबंध बनाने के लिए जरूरी है कि तुम बिल्कुल अपने गुरु के साथ एकाकार हो जाओ, मिल जाओ, एक हो जाओ, तुम्हारा और गुरु का अस्तित्व अलग रहे ही नहीं ।
त्याग : गुरु तक पहुंचने का पहला कदम और यह तभी संभव है जब तुम त्याग कर सको “बुद्ध” की तरह जिसने अपने गुरु के सामने जाकर अपने गले का हार, अपने आभूषण, अपने राजसी वस्त्र चरणों में समर्पित कर दिये और कहा – “अब मैं मुक्त हूं कोई राजसी चीज मेरे पास नहीं है। में केवल आप के दिए वस्त्र धारण करना चाहता हूं। में इसी जीवन में आपके चरणों में पूर्णता प्राप्त कर लेना चाहता हूं ।
तुम्हें मुक्त होना है बुद्ध की तरह, एक राजा का पुत्र होने के बाद भी अपने पूरे ऐश्वर्य के साथ गुरु – चरणों में समर्पित हो गया, सौंप दिया – नहीं चाहिए ये चांदी के टुकड़े, नहीं चाहिए यह वैभव, नहीं चाहिए यह ऐश्वर्य, नहीं चाहिए यह सम्पन्नता। मुझे केवल आप की श्रेष्ठता और दिव्यता चाहिए। मुझे चाहिए कि मैं आप के हृदय में स्थापित हो सकूं। में आप के हृदय में स्थान बना सकं। मैं आप के आंखों के रास्ते आप के हृदय में पहुंच सकूं। मैं आप के होठों पर अपना नाम अंकित कर सकूं और यह त्याग ही इस बात का एहसास होगा, इस त्याग से गुरु इस बात को अनुभव कर सकेंगे कि तुममें लगन है, चेतना है। गुरु को तुम्हारा धन, वैभव, ऐश्वर्य चाहिए नहीं, मगर वह तुम्हारा त्याग देखना चाहता है कि तुम सिफ होटों से ही “गुरु” शब्द का उच्चारण कर रहे हो या तुम्हारे हृदय में भाव है, एक चिन्तन है, एक विचार है कि अपने आप को पूर्णता के साथ समर्पित करने की क्षमता है। यह क्षमता तुम्हारे त्याग से अनुभव हो सकेगी। यह तुम्हारे चिन्तन से स्पष्ट हो सकेगी। यह तुम्हें तब प्राप्त हो सकेगी, जब तुम अपना सब कुछ समर्पित कर दोगे, सब कुछ सौंप दोगे। जो कुछ रांगा है, लौहा है, तांबा है यह सब कुछ सौंप कर ही उस पूर्णता को प्राप्त कर सकोगे जिसे हीरा” कहा गया है। जिसको अपने आप में “बहुविभूषित” कहा गया है, जिसको (पूर्णमदः” कहा गया है। इस प्रकार से ही जीवन में पूर्णता प्राप्त कर सकोगे और वह गुरु तो यह अहसास कर लेता है कि वह वास्तव में समर्पित है, वास्तव में ही इसमें त्याग – वृति है। वास्तव में इसने त्याग को विसर्जित कर दिया है। न इसे पद का मोह है, यह ऑफिसर है न इस बात का गरूर है, न इसे धन का घमण्ड है, न व्यापार का और न परिवार का घमण्ड रहा है। सब कुछ गुरु चरणों में सौंप दिया है, विमुक्त भाव से बिना लाग लपेट के। तब गुरु अपने हाथ को तुम्हारे सिर पर रख देगा। तब गुरु इस बात को अनुभव कर सकेगा कि अब तुम में एक पूर्ण त्याग की भावना है और यह सब कुछ सौंप देना ही पूर्णता है। यह सब कुछ विसर्जित कर देना ही श्रेष्ठता है।
अपना जो कुछ है वह सब कुछ उनके चरणों में समर्पित कर देना पहला कदम है उस पर जो पूर्णता की ओर जाता है, अमरत्व की ओर जाता है, जो रास्ता श्रेष्ठा की ओर जाता है, जो गुरु से एकाकार होने का रास्ता है। आज तक जितने भी उच्च कोटि के योगी सन्यासी बने, चाहे वह शंकराचार्य हो, चाहे गोरखनाथ हो, चाहे सूर, मीरा, तुलसी, कबीर हो, चाहे विश्वामित्र, वशिष्ठ, कणाद, अबत्रि, पुलस्त्य हो, चाहे महावीर हो सभी अपने वैभव के साथ धन और ऐवर्श्य के साथ गुरु-चरणों में समर्पित हुए हैं अहसास कराने के लिए मुझे अब त्याग ही करना है, अब मुझे अपने पास कुछ रखना ही नहीं है। ये चांदी के टुकड़े आप रखिये मुझे तो आप वह दीजिए जो वास्तव में हीरे हैं, बहुमूल्य जीवन है, जो अपने आपमें श्रेष्ठता है । यही स्थिति गुरु को अहसास दिला सकती है कि वास्तव में लगन है इसके मन में धोखा नहीं है, धूर्तता नहीं है, चालाकी नहीं है, मक्कारी नही है। सही अर्थों में समर्पण है, सही अर्थों में भव्यता के साथ अपने को समर्पित कर देने की क्रिया है और ऐसा होगा तब गुरु अपने सीने से लगा लेगा। अहसास कर लेगा कि यह व्यक्ति वास्तव में हीरक खण्ड है इसके मन में कोई लाग-लपेट नहीं है न पत्नी के प्रति, न पुत्रों के प्रति। ठोकर मार कर खड़ा हो गया है, उस जगह जाने के लिए जहां जाने के लिए योगी – यति भी तरसते हैं, उस जगह जाने के लिए जहां अमृत का झरना निरन्तर प्रवाहित रहता है, उस जगह जाने के लिए जिसको सिद्धाश्रम कहा गया हे, उस जगह जहां मृत्यु होती ही नहीं अमरत्व प्राप्त हो जाता है।
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