





भगवान धन्वन्तरी आयुर्वेद के जन्मदाता हैं, इन्हें समस्त स्वर्गलोक का चिकित्सक भी माना जाता है। इनका स्वरूप भगवान विष्णु की ही भांति चार भुजा वाले देव के रूप में है। जिनमें से दो भुजाओं में शंख और कलश है। तीसरे हाथ में आयुर्वेद संहिता और चौथे हाथ में औषधि लिये हैं।
समुद्र मंथन में सहायता करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने के लिये भगवान विष्णु धन्वंतरी के रूप में प्रकट हुये। इस प्रकार समुद्र मंथन के समय ही भगवान विष्णु ने तीन अवतार लिये, जिसके पश्चात् देवताओं को अमृतपान का अवसर मिल पाया और वे पुनः अपनी शक्ति व बल को प्राप्त कर दैत्यों को परास्त कर पाये। ये तीन अवतार क्रमशः कच्छप अवतार है, जिसमें समुद्र मंथन को सुगम बनाने के लिये श्री विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर मंदराचल पर्वत को अपने पीठ पर उठाया। उसके पश्चात् समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत के बंटवारे के लिये श्री विष्णु ने मोहिनी रूप में अवतार लिया। इसी बीच में भगवान विष्णु ने एक और अवतार लेकर देवताओं की सहायता की वह है भगवान धन्वन्तरी अवतार। जिसमें समुद्र मंथन में सहायता करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने के लिये भगवान विष्णु धन्वन्तरी के रूप में प्रकट हुये। भगवान धन्वन्तरी ही अपने हाथों में अमृत कलश लेकर समुद्र से बाहर आये थे। इस अवतार को समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में से एक का स्थान दिया गया है। इस रूप में श्री विष्णु ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को अवतार लिया था। इसीलिये इस दिन को धनतेरस के रूप में पूजा जाता है।
भगवान धन्वन्तरि के अवतरण को आयुर्वेद के आरंभ से जोड़ा जाता है। इन्होंने समस्त वनस्पत्तियों पर अध्ययन कर इनके अच्छे-बुरे प्रभाव व गुणों को प्रकट किया। भगवान धन्वन्तरि द्वारा रचित धन्वन्तरि संहिता आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है।
गरूड़ पुराण के अनुसार एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास गये और अनेक व्याधियों से ग्रस्त प्राणियों के निरोगी होने का उपाय पूछा। तब श्री विष्णु ने कहा- ‘‘मैं इन्द्रदेव से आयुर्वेद को प्राप्त कर धन्वन्तरि अवतार में सभी लोकों को स्वस्थ बना दूंगा। मैं कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी वीरवार हस्त नक्षत्र के दिन बनारस (काशी) में धन्वन्तरी के रूप में अवतार लेकर आयुर्वेद का उद्धार करूंगा।’’
एक समय ऐसा आया जब द्वापर युग में पृथ्वीवासी कई प्रकार के गंभीर रोगों से ग्रसित हो गये। तब देवराज इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान धन्वन्तरी ने काशीराज धन्व के घर पर जन्म लिया। इसका उल्लेख ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण में भी है। यह समुद्र मंथन से उत्पन्न धन्वन्तरी का दूसरा जन्म था। और राजा धन्व काशी नगरी के संस्थापक काश के पुत्र थे।
आयुर्वेद के विख्यात आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वन्तरी जी से शिक्षा प्राप्त की थी और धन्वन्तरी संहिता का ज्ञान प्राप्त किया, बाद में चरक मुनि ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। महर्षि चरक ने भगवान धन्वन्तरी के मन्तव्य की व्याख्या करते हुये लिखा है-
अर्थात् न मैं राज्य चाहता हूं, न स्वर्ग और न मोक्ष। मैं तो दुःख से संतप्त समस्त जीवों के दुख का नाश चाहता हूं। इस प्रकार धन्वन्तरी प्राणीमात्र को दु:खों से मुक्त करने को दूसरी बार पृथ्वी पर अवतरित हुये थे। आगे चलकर इन्हीं के वंशज दिवोदास ने शल्य चिकित्सा का पहला विद्यालय स्थापित किया।
भगवान धन्वन्तरी ने चिकित्सा पर अपनी शिक्षा व ज्ञान कई ऋषियों को भी दिया। आयुर्वेद को इन्होंने अष्टांग में विभाजित किया। इन्होंने आयुर्वेद पर कई ग्रंथों की रचना की, जिनमें से वर्तमान में केवल धन्वन्तरी संहिता ही शेष रह गई है, इसमें आयुर्वेद का इतना सारा ज्ञान व्याप्त है जिस कारण वह आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है। सुश्रुत संहिता में भी भगवान धन्वन्तरी के आयुर्वेदिक ज्ञान की कई बातों का विस्तृत बखान मिलता है। इसमें शल्य चिकित्सा तकनीक, औषधीय पौधे, विषहरण विधियां और उपचार भी शामिल है। आयुर्वेद चिकित्सा समग्र दृष्टिकोण का उपयोग करके शरीर के भीतर संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती है। यहां संतुलन शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्थितियों का होता है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति की यह विशेषता है कि यह शारीरिक रोग के समय उत्पन्न मानसिक कलेशों, मन के विकारों को भी रोग के साथ ही दूर करके व्यक्ति को पूर्णतया स्वस्थ बनाती है। भगवान धन्वन्तरी जो आयुर्वेद चिकित्सा के जन्मदाता है, इनके पूजन से न केवल स्वास्थ्य लाभ मिलता है, बल्कि कई रोगों से सम्पूर्ण छुटकारा भी मिलता है। साथ-ही-साथ सुख समृद्धि व सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
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