






जीवन में भौतिक रूप से उतार-चढ़ाव आते ही हैं उथल-पुथल होती ही है लड़ाई-झगड़े होते ही हैं लाभ-हानि होती ही है. अमीरी-गरीबी होती है, परन्तु मनुष्य वही है जो हर स्थिति में सम रहे प्रसन्न रह सके आनन्दित रह सके और इसके लिये आवश्यक है कि वह मनश्चेतना के स्तर पर काफी ऊपर उठा हुआ व्यक्ति हो तभी वह जीवन का आनन्द प्राप्त कर सकता है, अन्यथा सकल सम्पदा होते हुये भी सब व्यर्थ है। मन को पूर्ण चैतन्यता, दृढ़ता और अड़िगता प्रदान करने की ही यह दीक्षा है।
शक्ति के संबंध में हजारों व्याख्याएं की जा सकती है लेकिन सबके मूल में यह बात सिद्ध होती है कि जीवन को सही रूप से संचारित करने के लिये शक्ति तत्व का होना आवश्यक है। भौतिक जीवन में शक्ति तत्व के जागरण से सांसारिक सुख प्राप्त होते हैं, निरन्तर प्रगति होती है, कार्य सरलता से सिद्ध होते हैं, वहीं आध्यात्मिक जीवन में कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया शक्ति तत्व से ही संभव हो पाती है। शक्ति के बिना कोई सिद्धि नहीं है और इस शक्ति और सिद्धि द्वारा भाग्य तत्व प्रबल होता है, कर्म तत्व पूर्ण फल देता है, क्योंकि शक्ति और सिद्धि एक महान् प्रक्रिया है आत्म साक्षात्मकार की, अपने बल, अपनी बुद्धि को पहिचान कर जीवन-दिशा को निर्धारित करने की।
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मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम का जन्मोत्सव राम नवमी पर्व सम्पूर्ण हिन्दू समाज के लिये गर्व का विषय है। भगवान श्रीराम का जीवन करूणा, दया और बिना किसी भेद-भाव प्राणी मात्र के महत्त्व और कल्याण का मार्ग है। उनका प्रकटोत्सव दिवस राम नवमी धर्म और कर्त्तव्य का निर्धारण दिवस कहलाता है। शिलारूपी अहिल्या को अपने चरणकमल की धूल से अभिशाप मुक्त किया। उन्होंने शबरी के जूठे बेर खाने में जहां संकोच नहीं किया वही निषाद को गले लगाकर दलित उद्धार का संदेश दिया।
उस युग में राम को वशिष्ठ, विश्वामित्र, जनक, परशुराम, सीता और वाल्मिकी ने जाना कि राम परब्रह्म है। जन्म के समय स्वयं राम ने अपना चतुर्भज स्वरूप कौशल्या को दिखा दिया। ऐसी ही जीवन में चतुर्वग रूप में पूर्णता प्राप्ति हेतु इस चैत्रीय नवरात्रि में विशेष रूप से रामनवमी पर्व पर मर्यादा पुरूषोत्तम सिद्धि साधना दीक्षा आत्मसात् करने से पुरूषोत्तममय बनने की स्थितियां निर्मित होती है।
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