





मन के उत्थान के लिये ही आपको आध्यात्म, उपदेश व मंत्र जप करना होगा। ईश्वर की भक्ति व गलत कार्य, पाप कम करने का भय ही आपके मन को नियन्त्रण में लाता है, जिस प्रकार हमे माता-पिता, अध्यापक व गुरू की डांट-मार या किसी ऋषि मुनी के श्राप का भय गलत करने से रोकता है।
मन का स्वभाव तो गिरना है अगर आपको उसका उत्थान करना है, उसे ऊपर ले जाना है तो सकाम भाव से भक्ति व मंत्र जाप करना होगा। जीवन में कुछ अच्छा हुआ तो भी मन में शंका होगी, अरे कही नजर तो नही लग जायेगी, अरे उसे चुरा तो नहीं ले जायेगा, इसका क्या समाधान है।
-:भक्ति :-
महादेव की भक्ति करो तो वीरता-शौर्य, त्याग से भर जाओगे।
विष्णु जी की भक्ति करो तो प्रेम-वात्सलय से परिपूर्ण हो जाओगे।
ब्रह्मा जी की भक्ति करो तो ज्ञान से, ओज से पूर्णता प्राप्त करोगे।
परन्तु किस मंत्र से करोगे, किस साधना का, किस यंत्र का प्रयोग करोगे इसका ज्ञान तो गुरू ही दे सकते है। क्योंकि गुरू ईश्वर द्वारा रचित वो ज्ञान-चेतना सागर है जो आपके मन को चंचल होने से, अज्ञानता से दूर ले जाये। मन तो उथल पुथल होता रहता है, पर गुरू ज्ञान ही आपको उस उलझन से बाहर निकालता है, ज्ञान का तो कोई अन्त नहीं, आप कितना भी पढ़ ले, अध्ययन कर ले, कितनी बार पुनः जन्म ले लो, ज्ञान को तो पूर्ण रूप से प्राप्त ही नहीं कर सकते, आपको तो केवल अपने जीवन के ज्ञान को जानना है, अपने उद्देश्य को प्राप्त करने का ज्ञान प्राप्त करना है, स्वयं को जानने का ज्ञान प्राप्त करना है और यह केवल गुरू ही संभव करवा सकते है क्योंकि गुरू की चेतना में वह शक्ति है जो आपके मन को नियंत्रण कर सकती है।
उस चेतना को आत्मसात करने व अपने मन को सकाम भाव में रखने के लिये आप 19-20-21 अप्रैल को भगवती महामाया विष्णु नारायण सहस्त्र लक्ष्मी साधना महोत्सव, दुर्ग (भिलाई) छ.ग. में अवश्य सम्मिलित हो।
आपका अपना
विनीत श्रीमाली
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