





हमारी संस्कृति में जीव के निर्माण की अपेक्षा जीवन में निर्माण पर अधिक ध्यान दिया गया है और यह स्पष्ट रूप से माना है कि जीवन का अंत क्षय हो सकता है लेकिन मनुष्य जो निर्माण युक्त जीवन जीता है वह उसका आत्मिक जीवन होता है, उस जीवन का आत्मा से सम्बन्ध होता है। इसीलिये आत्मा को अविनाशी कहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयन्ति मारूतः।।
अर्थात आत्मा ही वह अविनाशी तत्व है, जिसे न तो संसार का कोई अस्त्र समाप्त कर सकता है, न ही कोई अग्नि उसे जला सकती है, न ही कोई जल या वायु उसे नष्ट कर सकती है। ‘अर्थात अक्षय रहने वाली केवल आत्मा ही है।’
हमारा शरीर भी लाखों लाखों कोशिकाओं से बना होता है और उसमें निरन्तर क्षय भी होता रहता है, लेकिन साथ ही साथ नया निर्माण भी होता रहता है और वातावरण में व्याप्त आक्सीजन को ग्रहण कर, रक्त का शुद्धिकरण कर, कॉर्बन डाई आक्साइड बाहर निकाल कर यह कार्य निरन्तर चलता रहता है, इस क्रिया में सबसे अधिक योगदान फेफड़ों का रहता है, जो निरन्तर क्रियाशील रहते हैं।
और जब इनके ऊपर ही प्रभाव पड़ जाता है तो जो रोग उत्पन्न होता है, उसे ‘क्षय रोग’ अर्थात टी.बी. कहा जाता है। क्षय अर्थात निरन्तर टूटने की क्रिया और जब यह क्रिया प्रारम्भ हो जाती है, तो जीवन अक्षय नहीं रह पाता।
क्या हिमालय अक्षय है? उसमें भी तो निरन्तर बर्फ पिघलती रहती है और सहस्त्र नदियां बनती हैं लेकिन उसके उपरान्त भी हिमालय उतना ही विशाल, उत्तंग और सिर उठाए खड़ा है, उसमें कोई कमी नहीं आती क्योंकि प्रकृति पूरी प्रक्रिया के साथ नये हिम बिन्दुओं का निर्माण करती ही रहती है।
जीवन में क्षय हो सकता है, लेकिन क्या ऐसी स्थिति आ सकती है, कि जितना क्षया हो, उससे अधिक पुनः निर्माण हो जाये और जीवन निरन्तर उच्चता की ओर गतिशील रहे, वही अक्षय स्थिति कहलाती है। क्रिया हो तो क्षय की मात्रा से अधिक निर्माण की मात्रा होगी, इसीलिये श्रेष्ठ पुरूषों का जीवन उत्तरोत्तर प्रगति करता रहता है, वे अपने जीवन में उच्चतम शिखर पर पहुंचते हैं और फिर उनका जीवन अनुकरणीय बन जाता है, दूसरों के लिये प्रेरणास्पद बन जाता है।
अक्षय तृतीया ऐसा ही महान दिवस है, जिसे सिद्ध मुहूर्त कहा गया है और सबसे बड़ी बात यह है कि पूरे भारत वर्ष में अक्षय तृतीया के दिन जितने विवाह होते हैं, उतने किसी अन्य दिवस पर नहीं। जितने मकान निर्माण के कार्य होते हैं, वे भी किसी अन्य दिन प्रारम्भ नहीं होते। क्योंकि इस दिवस के सम्बन्ध में हजारों वर्ष से मान्यता है कि इस दिन किया गया प्रत्येक कार्य शुभ ही होता है।
इस दिन के लिये कोई ग्रह संयोग देखने के लिये आवश्यकता ही नहीं होती। चाहे कोई भी ग्रह किसी भी राशि में स्थित हो, अक्षय तृतीया का मुहूर्त सिद्ध उच्च मुहूर्त है।
सद्गुरूदेव जी ने भी अपनी एक महत्वपूर्ण प्रवचन में कहा था कि होली, दीवाली, शिवरात्रि, नवरात्रि के समान ही सिद्धत्तम दिवस अक्षय तृतीया है। इस दिन मांत्रोक्त साधनायें सम्पन्न करें चाहे तांत्रोक्त, साधनाओं में पूर्णता प्राप्त होती ही है। जीवन का क्षय रूक कर जीवन का सुख सौभाग्य, कीर्ति, यश, आनन्द अक्षय बन जाता है।
इस शुभ मुहूर्त को पूर्णतः अक्षयमय बनाने हेतु मोती शंख पर प्रयोग की जाने वाली लक्ष्मी प्राप्ति प्रयोग दी जा रही है।
यह शंख लक्ष्मी प्राप्ति, आर्थिक उन्नति, व्यापार वृद्धि आदि में भी विशेष रूप से सहायक है, कर्जा उतारने में तो यह प्रयोग अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं प्रभाव युक्त है।
जो व्यक्ति इस प्रकार का प्रयोग चाहता है, या अपने जीवन में पूर्ण आर्थिक उन्नति एवं व्यापार वृद्धि चाहता है, उसे यह प्रयोग अवश्य करना चाहिये।
संकल्प
ऊँ अस्य श्री महालक्ष्मी मंत्रस्य विश्वामित्र ऋषिः गायत्री छन्दः महालक्ष्मी देवता, श्रीं बीजं, हीं शक्तिः दारिद्रय दहनाय निमित्तं धन्य धान्यादि समृद्धिं प्राप्तये जपे विनियोगः।
प्रार्थना
उद्यन्मार्तण्ड कान्ति विगलित कावेरी कृष्ण वस्त्रावृतांग्डीं।
दण्डं लिगं कराब्जैर्वरमथ भुवनं सन्दध्तीं त्रिनेत्राम।
नाना रत्नैविंभातीं स्मित मुख कमलां सेवितां देव सर्वै माया राज्ञीं नमो भूत स-रवि-कल-तनुमाश्रये ईश्वरीं त्वाम्।
अक्षय तृतीया के दिवस को प्रातः स्नान कर, शुद्ध वस्त्र धारण कर, अपने सामने इस शंख को रख दें, और उस पर केसर से स्वास्तिक चिन्ह बना दें, इसके बाद निम्न मंत्र का जप करें, मंत्र जप में कमल गट्टा माला का ही प्रयोग किया जाना चाहिये।
यह मंत्र पढ़ने के साथ-साथ साधक इसके मुंह में चावल का एक दाना डालता रहे, इस बात का ध्यान रखें कि चावल टूटा हुआ न हो, इस प्रकार नित्य एक माला फेरे, यह प्रयोग भी 30 दिन का है, जो अपने आप में अचूक और प्रभाव युक्त है।
पहले दिन की माला समाप्त होने के बाद उसमें चावल हटा दें, और दूसरे दिन भी उसी प्रकार मंत्र जप करते हूये उसमें एक मंत्र के साथ एक-एक चावल का दाना डालते रहें।
तीस दिन की माला समाप्त होने के बाद चावल के दानों के सहित इस शंख को सफेद कपड़े में बांध कर अपने घर में पूजा स्थान में रख दें, या कारखाने में, फैक्ट्री या व्यापारिक स्थल पर स्थापित कर दें, यह जब तक रहेगा, तब तक उसके जीवन में आर्थिक अभाव नहीं होगा, तथा निरन्तर आर्थिक व्यापारिक उन्नति होती रहेगी, यह भी स्पष्ट है, कि ऐसा प्रयोग करने पर शीघ्र ही व्यक्ति कर्जे से मुक्ति पा लेता है, और सभी दृष्टियों से उन्नति करता रहता है।
दीपावली के दिन भी इस शंख का पूजन किया जा सकता है और जिस प्रकार लक्ष्मी की पूजा होती है, उसी प्रकार इसका पूजन किया जाना चाहिये।
वस्तुतः यह शंख अत्यधिक महत्वपूर्ण, दुर्लभ एवं प्रभावयुक्त है, तथा ऐसे बिरले ही सौभाग्यशाली होंगे जिनके घर में इस प्रकार का दुर्लभ महत्वपूर्ण शंख पाया जाता होगा, पर इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि इस प्रकार का शंख तभी सफलता देने वाला हो सकता है, जब वह प्राण संजीवनी क्रिया से सिक्त, मंत्र सिद्ध एवं प्राण प्रतिष्ठा युक्त हो।
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