





किन्तु जन्म लेने की, तो प्रत्येक घटना एक दुःसाध्य प्रक्रिया कही गयी है, किस प्रकार सम्भव हो यह? इसी का विवेचन कर रहा है यह आलेख…….
चलना है दूर क्यों सोवें रहे!
विश्व में कदाचित हिन्दू धर्म ही एक ऐसा धर्म है, जो व्यक्ति को विश्लेषण करने की पूरी-पूरी छूट देता है। यह विश्लेषण वह न केवल जीवन की विभिन्न मान्यताओं, परम्पराओं एवं संस्कारों के प्रति कर सकता है वरन् इससे भी आगे बढ़ कर वह धर्म की मूलभूत स्थितियों का विश्लेषण करने के लिये भी उतना ही स्वतंत्र होता है।
हिन्दू धर्म में विश्लेषण की प्रक्रिया बौद्धिकता का मात्र एक अस्त्र ही नहीं वरन् सम्पूर्ण जीवन शैली ही है और सनातन धर्म में जिस प्रकार से कर्मकांडों का एक सुनिश्चित स्थान है, उसी प्रकार से विश्लेषण का, साधना के मार्ग में स्थान रहा है।
यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा, कि साधना का तात्पर्य केवल वही स्थिति नहीं होती, जब एक साधक किन्हीं विशेष पद्धतियों को सम्पूर्ण करता है वरन् साधना तो वह स्थिति होती है, जब साधक अपनी समस्त चेतना व सामर्थ्य को एकत्र कर अपने ही जीवन को पूर्णता देने की ओर अग्रसर हो जाता है।
और जितना वह साधना के आसन पर बैठ लक्ष्य के चिंतन में तल्लीन होता है, प्रयासरत होता है, उतना ही अधिक वह ऐसा आसन से उठने के बाद भी करता है।
विश्लेषण सम्पूर्णता की प्राप्ति में अग्रसर कराने वाला एक सम्पूर्ण साधना ही है तथा जब साधक इसका आश्रय पूर्णरूपेण ग्रहण कर लेता है, तभी वह शनैः-शनैः आत्मविश्लेषण की स्थिति में पहुँचने की क्रिया सम्पन्न करने लग जाता है।
विश्लेषण का प्रारम्भ यदि तय से मान लिया जाये, तो उसकी समाप्ति भी श्रद्धा में होनी अवश्यम्भावी मान लेनी चाहिये और ऐसा हो जाना ही गुरूत्त्व का प्रारम्भ होता है।
गुरूत्त्व अर्थात् गहनता, शालीनता, शिष्टता, परिपूर्णता या इसी श्रेणी के अन्यान्य गुण। यहां गुरूत्व से तात्पर्य गुरू बन जाने से नहीं है!
वस्तुत गुरूत्व व विश्लेषण करने की क्रिया दोनों समानार्थक स्थितियां होती है। यहां यह बात समझना इस कारणवश आवश्यक और अनिवार्य है कि जो व्यक्ति वास्तव में साधना जगत में प्रवेश करने का इच्छुक है उसे प्रचलित मान्यताओं से कुछ तो विद्रोह करना ही पड़ेगा।
प्रचलित मान्यता में गुरू का स्थान यदि व्यक्ति विशेष है, तो साधना की दृष्टि में उसी व्यक्ति विशेष का अन्तः पक्ष!
प्रचलित मान्यता में यदि गुरू के प्रति श्रद्धानवत होने की परम्परा है, तो साधना के मार्ग में उसी व्यक्तित्व की प्रवृति और चेष्टाओं को ग्रहण करने, उन्हें आत्मसात् करने का उपक्रम ही मुख्य होता है।
लक्ष्य तो एक भक्त व साधक का एक ही होता है, किन्तु दोनों के देखने की शैली में पर्याप्त भेद हो जाता है।
गुरूत्व को समझने की चेष्टा एक प्रकार से दीपक जलाने की ही तो क्रिया है।
हिन्दू धर्म की जहां अनेक विशेषताएं और उपलब्धियां हैं वहीं उसमें दोष भी है और इन दोषों में से एक जो प्रमुख दोष रहा है वह है रूढ़ि का! अर्थात् यह केवल हिन्दू धर्म का ही गुण या अवगुण है, कि वह बड़ी शीघ्रता से किसी भी विचार या लक्ष्य को एक मूर्तिवत स्वरूप प्रदान कर देता है।
-और ऐसा करने से कालांतर में श्रद्धा (तथाकथित) और अनुकरण की बाते तो प्रधान हो जाती है, किन्तु विश्लेषण की प्रक्रिया लुप्त अथवा मंद हो जाती है। मूर्ति पूजा के पीछे ऐसी ही बात रही है और यह बात क्या किसी प्रवृति की ओर संकेत नहीं करती?
यह प्रवृत्ति आज भी समाप्त नहीं हुई है और एक प्रकार से कहा जाये, तो कभी समाप्त होगी भी नहीं, क्योंकि बहुतायत तो उन लोगों का रहा है और रहेगा, जो अल्प श्रम में ही सुविधाभोगी बनना चाहते हैं।
मूर्ति पूजा के पीछे, जो चिंतन कार्य करता है, वह वस्तुतः यही अल्प श्रम में सुविधाभोग प्राप्त कर लेने का ही होता है। अपनी स्वार्थपरता एवं एक परम्परा के रूप में यह नितांत अस्वस्थ दृष्टिकोण है।
भारत के अनेक धर्म, अनेक प्राचीन शैलियां केवल इसी अवगुण के कारण आज या तो लुप्त हो गयी है या इसी स्थिति में पहुँच गयी है, जहाँ उन्हें केवल विकृति की संज्ञा दी जा सकती है।
विश्लेषण या ज्ञान की प्रक्रिया, यदि स्पष्ट शब्दों में कहा जाये, तो भयावाह होती है, क्योंकि जिस दिन से व्यक्ति में, भले ही वह चाहे या न चाहे, इसका प्रवेश हो जाता है, उस दिन से उसके समक्ष जीवन की अनेक मान्यतायें, अनेक सौन्दर्य, अनेक सम्बन्ध छिन्न-भिन्न होने लग जाते हैं।
ज्ञान तो हिमशिखर से उतरी उस गंगा के प्रवाह के समान होता है, जो यद्यपि निर्मल और शीतल तो होता है, किन्तु जिसने अपना मार्ग बनाने के लिये हठी से हठी पर्वत का सीना भी फाड़ कर रख दिया होता है।
जिस प्रकार गंगा जहां एक ओर पर्वत को काटती है, अपने साथ मिट्टी को भी बहा कर ले जाती है तो वहीं उसे सुदूर तक ले जाकर उसे उपजाऊ मैदान में भी बदल देती है, ठीक उसी प्रकार गुरू भी अपनी करूणा, चेतना और प्रवाह से अपने शिष्य के अहं को बहा ले जाये।
साथ ही वे यह भी जानते है, कि ऐसे विगलित अहं को कहां छोड़ जाये, कि वह नवांकूरों को विकसित होने का एक हेतु सा बन जाये।
विध्वंस और निर्माण – ये दोनों क्रियायें एक साथ सम्पन्न करना केवल ‘गुरू’ ही जानते है। ऐसे विषय केवल गुरू की क्षमता से ही सम्पादित हो सकते है और साधक गुरू को जितना उसके अघातों के माध्यम से आत्मसात् करता जाता है उतना ही अधिक उसमें लीन होता जाता है।
किन्तु जैसा कि प्रारम्भ में ही कहा, कि यह सामान्य क्रिया नहीं होती है, यह अत्यन्त पीड़ादायक क्रिया होती है, क्योंकि जो शिष्य, गुरू की इस क्रिया में संलग्न हुआ नहीं या जिसे गुरूदेव ने इस क्रिया में संलग्न कर लिया नहीं, उसके ऊपर गुरू प्रारम्भ के दिन से ही कोई आवरण नहीं चढ़ा रहने देते। ऐसे शिष्य या साधक के जीवन का अपना कुछ रह ही नहीं जाता है।
भक्ति तो बहुत दूर की बात उसे आत्मनिवेदन तक करने का अधिकार नहीं रह जाता है। इसके उपरान्त भी होती है यह क्रिया अत्यन्त मधुर ही! शायद कुछ बिरले ही होते है जिनके भाग्य में ऐसी पंक्तियां अंकित होती होगी। शिष्य का नूतन जन्म इसी रूप में सम्भव हो सकता है और प्रत्येक जन्म को पीड़ा के चक्र से होकर तो गुजरना पड़ता ही है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,