





यदि हम ज्येष्ठ की भीषण गर्मी में एक दिन सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन सूर्योदय तक बिना पानी के उपवास करें तो बिना बताये ही हमें जल की आवश्यकता, अपरिहार्यता, विशेषता पता लग जायेगी- जीवन बिना भोजन, वस्त्र के कई दिन संभाला जा सकता है, परंतु जल और वायु के बगैर नहीं। शायद उन दूरदर्शी महापुरुषों को काल के साथ ही शुद्ध पेयजल के भीषण अभाव और त्रासदी का भी अनुमान होगा ही- इसीलिए केवल प्रवचनों, वक्तव्यों से जल की महत्ता बताने के बजाये उन्होंने उसे व्रत श्रेष्ठ एकादशी जैसे सर्वकालिक सर्वजन हिताय व्रतोपवास से जोड़ दिया।
निर्जला एकादशी का पौराणिक महत्व और आख्यान भी कम रोचक नहीं है। जब वेदव्यास जी ने पाण्डवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया , तब युधिष्ठिर बोले – हे जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, कृपया उसका वर्णन कीजिए । भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा व्यास जी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्व ज्ञान को जानने वाले और वेद- वेदांगों के पारंगत विद्वान् हैं ।
तब वेदव्यास जी कहने लगे- कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी में अन्न ग्रहण करना वर्जित है । द्वादशी को स्नान करके पवित्र होकर पुष्पों (फूलों) से भगवान् केशव (नारायण) की पूजा करें । इसके पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराएं अन्त में स्वयं भोजन करें । यह सुनकर भीमसेन बोले- परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिए । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी अन्न न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही आग्रह करता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जाएगी अतः मैं व्रत नहीं कर पाउँगा ।
भीमसेन की यह बात सुनकर व्यास जी ने कहा- यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना ।
भीमसेन बोले महा बुद्धिमान पितामह ! मैं आपके समक्ष (सामने) सच कहता हूँ । मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ । मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है। इसलिए हे महामुनि ! मैं सम्पूर्ण वर्ष भर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा ।
पितामह ने भीम की समस्या का निदान करते और उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- नहीं कुंतीनंदन, धर्म की यही तो विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता, सबके योग्य साधन व्रत-नियमों की बड़ी सहज और लचीली व्यवस्था भी उपलब्ध करवाता है।
व्यास जी ने कहा- भीम ! ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका यत्नपूर्वक निर्जल (जल के बिना ) व्रत करो । परन्तु मुख शुद्धि या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर अन्य किसी प्रकार का जल मुख में न डालें, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। इसके बाद द्वादशी को प्रात: काल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक भोजन और जल का दान करें। इस प्रकार सभी कार्य सम्पादित करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करें। वर्ष भर में जितनी एकादशीयां होती हैं, उन सभी का फल इस “निर्जला एकादशी” का उपवास करने से मनुष्य प्राप्त कर लेता है। निःसंदेह तुम इस लोक में सुख, यश और प्राप्तव्य प्राप्त कर मोक्ष लाभ प्राप्त करोगे।
शंख,चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तब वह समस्त पापों से छूट जाता है ।
हे कुन्तीनन्दन ! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो – इस दिन जल में शयन करने वाले भगवान् विष्णु का पूजन करें तथा ब्राह्मण को दक्षिणा प्रदान करें एवं विभिन्न प्रकार के मिष्ठान और फल ब्राह्मणों को दान करें ।
क्योंकि ब्राह्मण को यथासामर्थ्य के अनुसार दान करने से श्रीहरि साधक को मोक्ष प्रदान करते हैं । इस प्रकार वेदव्यास जी द्वारा कहा गया “निर्जला एकादशी व्रत” भीमसेन ने प्रारम्भ किया ।
इतने आश्वासन पर तो वृकोदर भीमसेन भी इस एकादशी का विधिवत व्रत करने को सहमत हो गये। इसलिए वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को लोक में पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन जो स्वयं निर्जल रहकर ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को शुद्ध पानी से भरा घड़ा इस मंत्र के साथ दान करता है।
देवदेव ऋषीकेश संसारार्णवतारक
उद्कुम्भ प्रदानेन नय मां परमां गतिम।
तो उसे इस दान-पुण्य का कई गुना फल प्राप्त होता है और पेयजल के संरक्षण, संवर्द्धन एवं सदुपयोग का संदेश भी।
साधक को चाहिये कि वह अपनी कमजोरियों को अपने गुरुजनों या परिवार के बड़ों से न छिपाये, उन पर विश्वास रखते हुए अपनी समस्या उन्हें बताए ताकि वे उसका कोई उचित उपाए बताएँ, तथा बताए गए उपाय पर श्रद्धा और विश्वासपूर्वक अमल करना चाहिये । अपने पितामह व्यास जी की कृपा से भीमसेन भी एक एकादशी का व्रत करके सभी एकादशीयों का फल प्राप्त करके स्वर्ग के भागी बने।
निर्जला एकादशी व्रत का माहात्म्य :
इस प्रकार निर्जला एकादशी के माहात्म्य का वर्णन हमें प्राप्त होता है । यह एकादशी सर्वविध कल्याण करने वाली तथा सभी मनोवांछित कार्यों में सिद्धि प्रदान करने वाली है ।
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