





विवाह करके और गृहस्थ धर्म का निर्वाह करते हुए व्यक्ति अत्यन्त उच्च विचारों एवं भावों से युक्त रहता है, यदि सूक्ष्मता से देखा जाये, तो शास्त्रों में जितने भी देवता हैं वे सभी युग्म रूप में है- अर्थात् यदि शिव है तो पार्वती भी है, विष्णु है तो लक्ष्मी भी है, ब्रह्मा है तो सरस्वती भी हैं, राम है तो सीता भी है, नारायण है तो भगवती भी है। वैवाहिक जीवन की सफलता से ही आत्मिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास सम्भव होता है। क्योंकि तब वे एक दूसरे के बाधक न होकर, एक दूसरे के सहायक या सहयोगी होते हैं।
सृष्टि को गतिशील रखने के लिए विवाह अत्यन्त आवश्यक है। यदि विवाह ही न हो, तो विष्णु जगत के पालन कर्ता रह नहीं सकते, क्योंकि यदि मनुष्य ही नहीं होगा, तो वे पालन करेंगे भी तो किसका? ‘प्रयाजै गृहमेधिनाम्’ के अनुसार विवाह का उद्देश्य भोग विलास नहीं वरन् वंश रक्षा हेतु संतानोत्पत्ति है।
वेदों में कभी भी विवाह को नकारात्मक या त्यात्य नहीं बताया है, अपितु इसे तो एक कर्त्तव्य के रूप में बताया गया है। किसी भी मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण होते हैं-
इनमें से सर्वप्रथम देव ऋण से यज्ञ, पूजन, साधना, आरती, नैवेद्य आदि द्वारा मुक्त हुआ जाता है। दूसरे ऋण अर्थात् गुरू ऋण के प्रतिफल में शिष्य को गुरू सेवा करनी चाहिये। तीसरा ऋण होता है पितृ ऋण अर्थात् हमारे माता-पिता ने हमें एक शरीर दिया, जिसका अवलम्बन लेकर हमारी आरती इस जगत में आ सकी। इस ऋण को हम अपने ही जैसी किसी आत्मा को शरीर देकर ही चुका सकते हैं, इसलिये बिना संतान हुए इस तीसरे ऋण से मुक्ति सम्भव नहीं है। तीनों प्रकार के ऋणों से मुक्ति के पश्चात् की मोक्षादि या जिसे सिद्धाश्रम प्राप्ति कहते हैं। उसकी कल्पना की जा सकती है।
विवाह के द्वारा व्यक्ति की मानसिकता में व्यापकता भी आती है। मूलत: व्यक्ति स्वार्थी प्राणी होता है। अपने शरीर, अपनी ही प्रगति आदि की उसे लालसा होती है। उसका अपने प्रति यह प्रेम, यह मोह, विवाह के उपरान्त मात्र अपने ऊपर न होकर क्रमश पत्नी, फिर पुत्र, पुत्री, सगे सम्बन्धी, परिवार, कुटुम्ब आदि में विभक्त हो जाता है। इससे उसके व्यक्तित्व में व्यापकता एवं उदात्तता आती है। आत्म केन्द्रितता से ऊपर उठकर व्यक्ति उसी दिशा में और चले तो व्यक्ति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के पुनीत आदर्श का व्यावहारिक रूप धारण कर लेता है। विश्व प्रेम ममत्व की अन्तिम श्रेणी है और इस पर पहुंच कर मनुष्य- ‘यो मम् पश्यति सर्वत्र सर्वंच मयि पश्यति’ के उच्च शिखर पर पहुंच जाता है। इसलिए स्वार्थ परक प्रेम को विस्तृत कर उसका मुक्ति में पर्यवसना ही विवाह का एक मुख्य उद्देश्य है।
त्याग, क्षमा, धैर्य, सन्तोष- ये सभी मनुष्य जीवन के अलंकार हैं। इन्हीं गुणों का संग्रह तथा अभ्यास भी विवाह का एक उद्देश्य है। गृहस्थ में रहते हुए दम्पति को एक दूसरे के हित के लिए स्वार्थ त्याग, अनुचित व्यवहार में भी क्षमा, अत्यन्त कष्ट में भी धैर्य आदि गुणों का प्रयोग करना अनिवार्य हो जाता है। यही गुण विकसित होकर मनुष्य को सामाजिक क्षेत्र में विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करते हैं।
गृहस्थ जीवन का आदर्श स्वरूप भगवान सदाशिव और माता पार्वती ही हैं। सामान्य स्वरूप में युवक सुन्दर, उच्च सुज्ञान, सुलक्ष्णा, सुसंस्कार से युक्त पत्नी के लिये भगवान शिव का पूजन और अभिषेक करते हैं साथ ही युवतियां संस्कारित, सुन्दर, कामदेव बलिष्ठ वर प्राप्ति के लिये माता गौरी की आराधना करती हैं। शिव परिवार की अभ्यर्थना से गृहस्थ जीवन की कामनायें पूर्ण होती ही है। विघ्नहर्ता गणपति प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में पूजनीय है, कार्तिकेय की वन्दना सर्व विजयश्री हेतु सम्पन्न की जाती है और पत्नी के रूप में सौभाग्य प्रदान करने वाली देवी पार्वती है।
अपने गृहस्थ जीवन को शिव-गौरी परिवार आदर्श रूप में स्थापित कर आनन्द, हर्ष, प्रेम, करूणा के कई वर्ष व्यतीत कर चुके पूज्य सद्गुरूदेव व वन्दनीय माताजी हम सभी शिष्यों के लिये प्रेरणा स्वरूप हैं, शिष्य सदैव अपने गुरू के आदर्शों पर चलकर उनके ही स्वरूप की चेतना को आत्मसात करने की क्रिया करता है। अपने गुरू की भांति सुन्दर श्रेष्ठ संस्कारों से अपने वैवाहिक जीवन को शिव परिवारमय चेतनाओं से आबद्ध करने हेतु 07 जुलाई को कैलाश सिद्धाश्रम दिल्ली में सम्पन्न होगा। इस पर्व की दिव्यता को आत्मसात कर शिव-गौरी परिवार स्वरूप सद्गुरूदेव व वन्दनीय माता जी के सानिध्य में शिव-गौरी गृहस्थ सुख वृद्धि दीक्षा ग्रहण करेंगे तो जीवन में अखण्ड सुहाग सौभाग्य, संतान सुख, सुयोग्य वर-वधु प्राप्ति, ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और पूर्णता की प्राप्ति हो सकेगी। जिससे पारिवारिक जीवन सुदृढ़ और सफल होगा।
आप सपरिवार आत्मीय भाव से आमंत्रित हैं। आशीर्वाद प्राप्त कर आनन्द तत्व की प्राप्ति कर सकें।
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