





बाएं तट पर बसे लोगों से पूछा। उन्होंने कहा, चुनाव का सवाल ही नहीं है। बसना हो, यहीं बसना है। स्वागत है आपका। क्योंकि इस हिस्से को स्वर्ग कहते हैं। और उस तरफ, नदी का जो दूसरा किनारा है, वह नरक है। वहां भूल कर मत जाना। वहां दुःख पाओगे, सड़ोगे। वहां बड़े दुष्ट प्रकृति के लोग हैं।
सम्राट को किनारा तो स्वर्ग जैसा लगा, लेकिन स्वर्ग में रहने वाले लोगों के मन में दूसरे किनारे बसे लोगों के प्रति दुर्भावना होगी, यह बात न जंची।
वह दूसरे किनारे भी गया। दूसरा किनारा भी अति सुंदर था। एक से दूसरा किनारा ज्यादा सुंदर था। उसने लोगों से पूछा कि मैं बसने का सोचता हूँ, किस किनारे को चुनूं?
उन्होंने कहा, चुनाव का कोई सवाल ही नहीं। बसना हो तो यहीं बसो। इस तरफ देवता बसते हैं, उस तरफ दानव। भूल कर भी उस तरफ मत जाना, अन्यथा सदा पछताओगे। फंस गए तो निकलना भी मुश्किल हो जायेगा। महाक्रूर प्रकृति के लोग हैं। उन दुष्टों से तो परमात्मा बचाये। उनकी तो छाया भी पड़ जाती है तो आदमी भटक जाता है। उस किनारे तो भूल कर भी उतरना भी मत, नाव भी मत लगाना।
सम्राट बड़ी दुविधा में पड़ गया। दोनों किनारे सुंदर थे, लेकिन दोनों तरफ रहने वाले लोग असुंदर थे। दोनों तरफ स्वर्ग था, लेकिन रहने वाले लोग वंचित हो गए थें। क्योंकि जब तक दूसरे की बुराई दिखाई पड़ती रहे, तब तक अपने भीतर छिपी भलाई को भोगने का अवसर नहीं आता। और जब तक दूसरे के कांटे गिनने की आदत बनी रहे, तब तक अपने भीतर खिले फूल की सुगंध नहीं मिलती। कांटों को गिनने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे फूल की गंध लेने की कला ही भूल जाता है। नरक पर जिसकी आंखें लगी हो, उसकी आंखों की क्षमता ही खो जाती है स्वर्ग को देखने की। खुरदरे पत्थरों के साथ ही जो दिन-रात अपने हाथों को लगाये रहा हो, वह फिर हीरों को नहीं पहचान पाता। हीरें भी पत्थरों जैसे ही लगते हैं।
इससे उलटी बात भी सच है कि जिसने अपने भीतर खिला हुआ फूल देखा हो, उसे सब तरफ फूल दिखाई पड़ने शुरू हो जाते हैं। क्योंकि व्यक्ति अंततः अपने को ही सब तरफ झलकता हुआ पाता है। सारा अस्तित्व दर्पण है। उसमें हम विभिन्न रूपों में अपने ही चेहरे देखते हैं। उस किनारे जो दिखाई पड़ता है वह अपना ही चेहरा है। दुश्मन में जो दिखाई पड़ता है वह अपना ही चेहरा है। नरक में जलती हुई जो लपटें दिखाई पड़ती हैं वह अपना ही चेहरा है।
सम्राट ने कहा, इन्हीं उपद्रवों से तो बच कर भागना चाहा है साम्राज्य से। वह इस शांत पहाड़ की झील में बसे लोगों में, इस घाटी में बसे हुए लोगों में भी वही का द्वंद्व है।
तो नाव को बढ़ाता आगे चला गया। उसने कहा, अब तो वहीं रूकूंगा जहां आदमी न हो। क्योंकि जहां तक आदमी है वहां तक मन रहेगा। और जहां तक मन है वहां तक संसार से बाहर जाने का कोई उपाय नहीं। मन ही तो संसार है। जहां तक मन हैं वहां तक द्वैत रहेगा, विरोध रहेगा, पक्षपात रहेगा, अपना-पराया रहेगा, मैं- तू रहेगा। नदी दिखाई न पड़ेगी, किनारे महत्त्वपूर्ण रहेंगे-अपना किनारा, पराया किनारा। वह दूर का किनारा, दुश्मन का किनारा। वह बढ़ता गया। ऐसा समय आया, कोई लोग न मिले, बस्ती समाप्त हो गई। अब वह बस सकता था। लेकिन उसने कहा, अब भी मैं बसूंगा तो किसी एक किनारे पर बसूंगा। मैं भी आदमी हूं। अभी छूट नहीं गया हूं, छूटने की कोशिश कर रहा हूँ। बंधन तोड़ रहा हूँ, थोड़े ढ़ीले हुये हैं, लेकिन जंजीरे खुल नहीं गई हैं। अगर एक किनारे पर बसूंगा, कौन जाने दूसरा किनारा मुझे भी बुरा दिखाई पड़ने लगे!
मनुष्य की स्वाभाविक दुर्बलतायें हैं। तुम जहां हो, उसे महिमावान सिद्ध करने के लिये अनिवार्यरूपेण तुम्हें, जहां नहीं हो, वहां की निंदा करनी पड़ती है। तुम जो हो, उस अहंकार की तृप्ति के लिये दूसरों का खंडन करना होता है।
अहंकार को एक ही रास्ता पता है अपने को बड़ा करने का, वह है दूसरों को छोटा करना। आत्मा का रास्ता अहंकार को पता नहीं है। आत्मा का रास्ता है अपने को बड़ा करना। और मजा यह है कि जब कोई अपनी आत्मा को बड़ा करता है, तो दूसरे भी उसके साथ बड़े होते चले जाते हैं।
और जब अहंकार अपने को बड़ा करना चाहता है तो उसे एक ही गणित मालूम है, दूसरे को छोटा करना। और दूसरी बात भी समझ लेने जैसी है, जितने दूसरे छोटे होते हैं, उतने ही छोटे तुम भी होते चले जाते हो। क्योंकि छोटें के साथ बड़े होने का उपाय नहीं हैं। छोटे के साथ जीना हो तो तुम्हें भी छोटा होना पड़ेगा। बुरे आदमी के साथ जीना हो तो तुम्हें भी बुरा होना पड़ेगा। और अगर तुमने सब में बुराई ही देखी है तो तुम भले कैसे रह सकोगे? रहना तो बुरे लोगों के साथ होगा, जिनमें तुमने बुराई देखी है। तुम भी बुरे हो जाओगे।
शायद गहरे में तुम बुरे होने के लिये सुविधा चाहते हो इसीलिये दूसरे में बुराई देखते हो। तुम दूसरे को छोटा बताते हो ताकि तुम्हें अपना छोटापन अखरे न। तुम दूसरे को छोटा करते हो ताकि कम से कम छोटों में तो बड़े दिखाई पड़ सकों। जितने दूसरे छोटे हो जायंगे उतना तुम्हें ऐसा लगता है, मैं थोड़ा बड़ा हूँ।
लेकिन जिसने दूसरों को छोटा किया वह खुद भी छोटा हो गया। तुम छोटे करने की चेष्टा कर ही नहीं सकते बिना छोटे हुए। क्योंकि तुम्हारा प्रत्येक कृत्य तुम्हें निर्मित करता है। तुम्हारे प्रत्येक कृत्य की छाप तुम पर पड़ जाती है। तुम जो करते हो, करते-करते वही तुम हो जाते हो।
सम्राट ने सोचा, रूक जाऊं इस किनारे। दोनों किनारे सुंदर हैं। किसी भी जहां छूट जाये वहीं रूकूंगा। वह नाव बढ़ाता चला गया। वह मूल उदगम पर पहुँच गया नदी के। वहां नदी ही समाप्त हो गई थी, किनारे भी समाप्त हो गए थे। जिस पर्वत से नदी निकलती थी, वह पर्वत न इस किनारे था, न उस किनारे था, बीच में खड़ा था। बीच में भी नदी के तल पर न था, नदी से बहुत ऊपर खड़ा था। उसने उस पर्वत के ही ऊपर अपना भवन बनाया। वह वहीं रहा। उसने अपने भवन का नाम रखाः नेति-नेति। उपनिषद का प्राचीन वचन हैः न यह, न वह! न यह किनारा, न वह किनारा।
जब उसके मित्र प्रियजन आते उससे मिलने, उसके दर्शन करने, तो वे सभी पूछते कि इस भवन का नाम नेति-नेति। उपनिषद का प्राचीन वचन हैः न यह, न वह। न यह किनारा, न वह किनारा।
जब उसके मित्र प्रियजन आते उससे मिलने, उसके दर्शन करने, तो वे सभी पूछते कि इस भवन का नाम नेति-नेति किस कारण? तो वह यह सारी कहानी कहता जो मैंने तुमसे कहीं।
जहां तक मनुष्य है, वहां तक तुम मन से बाहर न हो सकोगे। मन के फैलाव का नाम ही तो मनुष्य है। हमारा शब्द ‘मनुष्य’ बड़ा बहुमूल्य है। वह मन से ही बना है। मन के फैलाव का नाम ही तो मनुष्य है। हमारा शब्द ‘मनुष्य’ बड़ा बहुमूल्य है। वह मन से ही बना है। अंग्रेजी का ‘‘मैन’’ भी ‘मन’ का ही रूपांतर है। वह भी मनुष्य का ही आधा हिस्सा है। मन का अर्थ हैः चुनाव। मन का अर्थ हैः इस किनारे, उस किनारे, इस पक्ष में, उस पक्ष में। हिंदू, मुसलमान, जैन, ईसाई, ब्राह्मण, शूद्र, भारतीय, चीनी- मन हमेशा तोड़ता है दो में। एक को पकड़ता है, एक से लड़ता है। मन बिना शत्रुता के नहीं जीता। इसलिये मन कभी शांत नहीं हो सकता।
मुझसे, आते हैं लोग, पूछते हैं कि मन कैसे शांत हो जाये?
मैं उनसे कहता हूँ, मन कभी शांत न होगा। मन के पार जाना होगा, तभी शांति है। मन शांत होता ही नहीं। जब मन नहीं होता तभी शांति होती है। मन के अभाव का नाम शांति है। मन के भाव का नाम अशांति है। मन यानि अशांति, इसलिये मन के शांत होने की बात ही मत सोचना। वह भूल हो जायेगी। वह तो तुमने बीमारी को ही स्वास्थ्य समझ लिया। अब तुम बीमारी को ही निखारने में लग जाओगे। हां, मन निखर सकता है, बड़ा सूक्ष्म हो सकता है, बड़ा चमत्कार उससे पैदा हो सकता है, लेकिन शांत नहीं होगा। कितना ही बलशाली हो सकता है, लेकिन शांत नहीं होगा।
बड़े प्रसिद्ध व्यक्ति की कथा है कि वह अपने गुरू के आश्रम में था और वर्षो से चेष्टा कर रहा था मन को शांत करने की। मन बलशाली हो गया। दूर के दृश्य दिखाई पड़ने लगे। दूसरों के विचार पढ़ने में आने लगे। छू देता, बीमारियां हट जातीं। चमत्कार घटने लगे। छाया पड़ जाती उसकी, कुम्हलाए फूल फिर से खिल जाते, सूखता हुआ वृक्ष फिर हरा हो जाता। दूर-दिगंत तक उसकी खबर पहुँचने लगी। और वह अभी भी श्रम में। मन उसका रोज-रोज शुद्ध होने लगा। रोज-रोज मन में नई शक्तियों के आविर्भाव होने लगे।
एक दिन उसका गुरू उसके द्वार पर आकर बैठ गया। वह ध्यान कर रहा था। वह अपने मन को मांज रहा था। उसके सामने ही बैठ कर गुरू ने एक ईंट को घिसना शुरू कर दिया पत्थर पर।
वह व्यक्ति तो बैठा हुआ अपने को ध्यान में ही खींचता रहा। थोड़ी देर में उसे हैरानी भी हुई कि यह गुरू को क्या हुआ, क्या पागलपन हुआ है? इस तरह उपद्रव करना, ध्यान करते शिष्य को बाधा देनी, यह कोई गुरू का ढंग है! गुरू तो बचाने को है कि विघ्न उपस्थित करने को है? पर फिर भी उसने सोचा कि शायद मेरी परीक्षा लेते हो कि मैं अभी परेशान होता हूँ या नहीं होता। तो वह डटा रहा। सांझ हो गई। और गुरू भी डटा रहा, वह घिसता ही रहा। सिर भी पक गया उस व्यक्ति का। आखिर उसने चिल्ला कर कहा कि बंद भी करो! क्या कर रहे हो? ईंट को घिसने से क्या होगा?
गुरू ने कहा कि ईंट को घिस-घिस कर सोचता हूं कि दर्पण बना लेंगे।
वह व्यक्ति हंसने लगा। उसने कहा, पागल हुये हो बुढ़ापे में? सठिया गये? कहीं ईंट को घिसने से दर्पण बना है!
गुरू हंसने लगा। उसने कहा, तो तेरा अभी होश खोया नहीं। ईंट घिसने से दर्पण नहीं बनता, मन घिसने से कभी आत्मा बनती है? तू भी ईंट घिस रहा है। हां, ईंट घिसने से साफ-सुथरी हो जायेगी, चिकनी हो जायेगी, सूक्ष्म हो जायेगी, सुंदर हो जायेगी, रूप-रंग दे सकते हो घिस -घिस कर लेकिन दर्पण तो न बनेगा।
मन को घिस-घिस कर कई रूप आ जायेंगे, कई भीतर के इंद्रधनुष प्रकट हो जायेंगे, लेकिन वह तो न मिलेगा जो सभी रूपों के पार है। मन के घिसने से शांति न मिलेगी।
और ध्यान की दो विधिया हैं संसार में। एक, जो मन को घिसने में ही भरोसा करते हैं। उन्हें सिद्धियां उपलब्ध होती हैं, चमत्कार होते हैं। लेकिन आत्मा नहीं मिलती। वे भीतर की संपदा में भटक गये। वे भीतर के बाजार में भटक गये। बाहर के बाजार से बचे तो भीतर के बाजार में उलझ गये। बच न पाये, बाजार से उठ न पाये ऊपर।
दूसरी ध्यान की विधियां हैं, जो मन को घिसने की नहीं, मन के त्यागने की हैं। मन का त्याग ही ध्यान है। मन की साधना नहीं, मन का अभ्यास नहीं, मन का विसर्जन ध्यान है। और जहां मन जाता है वहां पक्ष चले जाते हैं। जब तक मन है तब तक पक्ष रहेगा। तुम कितना ही सोचो कि निष्पक्ष हो जाऊ, तुम निष्पक्षता के पक्षपाती हो जाओगे, इससे ज्यादा और कुछ भी न होगा। अब तुम निष्पक्षता को ही अपनी अकड़ और पकड़ बना लोगे कि मैं तटस्थ हूं, अब तुम निष्पक्षता के लिये लड़ने लगोगे। लेकिन लड़ाई जारी रहेगी, लड़ाई का अंत न होगा। क्योंकि तुम मूल बात चूक ही गये।
मैंने सुना है, एक गांव के रास्ते पर दो आदमी लड़ रहे थे। बड़ी गाली-गलौच बक रहे थे, मार-पीट पर उतारू थे, ईंट-पत्थर लिये खड़े थे। मुहल्ले के एक बुद्धिमान आदमी ने कहा कि भाई, बात क्या है? यह झगड़ा क्या है? पूरे गांव को क्यों इकट्ठा किया हुआ है? अगर कोई झगड़े को ही बात है, तो पंच नियुक्त कर लो, निपटारा हो जाये। लड़ते क्यों हो?
बात समझ में आ गई। लोगों ने औरों ने भी कहा कि ठीक है, तीन-तीन पंच नियुक्त कर लो।
सांझ वह आदमी जब वापस बाजार से अपने काम करके लौटा तो वहां और भी बड़ा झगड़ा मचा हुआ था। सुबह दो आदमी लड़ रहे थे, अब वहां आठ आदमी लड़ रहे थे। उसने कहा, मामला क्या है? यह तो बात और बिगड़ गई!
पता चला कि वे जो पंच नियुक्त किये है, अब वे भी लड़ रहे हैं। वे दो तो लड़ ही रहे है, वे जो तीन-तीन पंच नियुक्त किये थे दोनों की तरफ से, अब वे भी लड़ रहे हैं।
अगर मूल न बदले और बोध न हो, तो तुम जो भी करोगे वह वही होगा नये रूप में। उसमें फर्क नहीं पड़ने वाला, जब तक मूल दृष्टि न साफ हो जाये। पत्ते काटने से कुछ हल न होगा, जब तक जड़ पर ही हाथ न पहुँच जाये।
उस सम्राट ने ठीक किया कि वह किनारों पर न रूका। क्योंकि पक्ष पर रूक जाता तो मन पर ही रूक जाता। नेति-नेति का भवन है मन के पार। वह अद्वैत है। वहां यह किनारा भी नहीं है, वह किनारा भी नहीं है।
तुम्हारा जीवन की सारी दुविधा क्या है? कि तुमने कभी भी अद्वैत का कोई क्षण भर का भी अनुभव नहीं पाया। यह शब्द तुमने सुना है- ब्रह्म, अद्वैत, एक, पर तुमने जो भी अनुभव पाये है जीवन में, वे सब द्वैत के हैं। तुम्हारे श्रेष्ठतम अनुभव भी द्वैत के ही हैं।
तुम किसी के प्रेम में पड़े हो। किसी स्त्री, किसी पुरूष, किसी मित्र, किसी बच्चे को, किसी को तुमने प्रेम किया है। बड़ा गहरा अनुभव है, लेकिन वह भी द्वैत का है, वह भी दो के बीच है। अभी वह भी मन के पार नहीं है। तुमने कभी संगीत सुना है। और कभी संगीत के साथ बह गये हो, बड़ी दूर की यात्रा की है। लेकिन वह भी द्वैत का ही अनुभव है। संगीत भी है और तुम भी हो। ऐसा नहीं हुआ कि संगीत ही रह गया हो और तुम न रहे हो। जब भी तुम खोजोगे, अपने को पाओगे, उस गहरे से गहरे संगीत में भी द्वैत ही है।
तो तुम कितने ही उदगम के करीब पहुँच गये होओ, लेकिन बिलकुल उदगम के पार नहीं जा पाये हो। किनारे बने ही रहे है। नदी छोटी होती गई होगी। जैसे-जैसे स्त्रोत पास आता है, नदी छोटी होती है, छोटा सा झरना रह गया। लेकिन छोटे झरने के भी दो किनारे होते हैं। अगर गौर से देखो तो एक बूंद के भी दो किनारे होते है। बूंद कितनी ही छोटी हो, उसके भी दो पहलू होते हैं।
तो तुमने जीवन में कभी-कभी झलक भी पाई है, गहरी झलक भी पाई है, तो भी द्वैत के पार नहीं गई है। अद्वैत तो खाली शब्द है, उसका कोई अनुभव नहीं है। और उसे तुम शास्त्रों से न समझ सकोगे। उसका तो स्वाद चाहिये।
एक संत था। वह एक दिन अपने शिष्यों को समझा रहा है। जब वह आया था बोलने, तो अपने हाथ में एक टोकरी लेकर आया था। शिष्य थोड़े चौंके भी, लेकिन टोकरी को उसने ढांक रखा था। उत्सुकता भी जगी। कभी वह ऐसा कुछ लेकर न आया था और आज यह टोकरी लेकर क्यों चला आया?
जैसे मैं कल टोकरी लेकर चला आऊं, तो तुम मुसीबत में पड़ जाओ- कि यह टोकरी किसलिये लाई गई है?
सब सजक, सध कर बैठ गये कि कुछ मामला होने को है। और उसने बोलना शुरू किया और वह समझाने लगा नासपतियों के संबंध में और उसने कहा कि ऐसी-ऐसी नासपातियां दुनिया में है। उनके अलग-अलग ढंग से वर्णन किये। अलग-अलग ढंग की नासपातियां हैं, उनके स्वाद, उनके रंग, उनके आकार, उनकी ताजगी। और फिर उसने कहा कि एक वैज्ञानिक ने सारे संसार की नासपातियों को इकट्ठा करके एक नई तरह की नासपाती पैदा की है। ऐसा फल तुमने देखा भी नहीं हैं। उसका उसने बड़ा गहरा वर्णन किया। लोगों के मुंह में पानी आ गया। और तब लोगों को थोड़ा शक भी होने लगा कि टोकरी में क्या है? लेकिन वह बातचीत ही करता रहा। और लंबी उसने चर्चा की और लोगों को बिलकुल भाव से भर दिया उस नासपाती के लिये। तैयार ही थे कि वहां से छूटें कि बाजार जायें। जब सारी बात हो गई तब उसने कहा कि मैं तुमसे पूछता हूं, मैंने इतनी चर्चा की, तुम्हें स्वाद मिला?
उन्होंने कहा, स्वाद तो नहीं मिला, लेकिन स्वाद की आकांक्षा जगी।
तब उसने अपनी टोकरी का कपड़ा उघाड़ दिया और उसने नासपातियां बांटी। और उसने कहा, अब तुम स्वाद भी ले लो। और तब मुझे कहो कि जो मैंने कहा था क्या उससे तुम्हें इसकी जरा सी भी झलक मिली थी?
तब उन्होंने नासपातियां चखीं। उन्होंने कहा, हम तो सोचते थे कि आपके शब्द बड़े अनूठे हैं। आप कुछ भी प्रकट कर सकते हैं। लेकिन अब हमें पता चला कि नासपाती का स्वाद भी आप न कह सके। यह तो बात ही और है। जो आपने कहा था, उससे इसका क्या लेना-देना? वह तो ऐसे था जैसे रूखी-सूखी रेगिस्तान की चर्चा हो। और यह तो हरित उद्यान है। इसका उससे कोई लेना-देना नहीं है। वह तो जैसे मरी हुई लाश हो और यह जीवित नाचती हुई प्रतिमा है। जैसे वह कोई बासा, जन्मों-जन्मों का सूख गया फूल हो और यह अभी-अभी खिला हुआ गुलाब है।
और उन्होंने कहा, लेकिन हम भी कुछ नहीं कह सकते हैं। एक युवक उठा और उसने कहा कि आप भी एक नासपाती चखें। क्योंकि हम भी कहें जो हमारे भीतर हुआ है, नासपाती से जो स्वाद हमें मिला है।
संत ने उनसे कहा, परमात्मा के संबंध में मैंने तुमसे जो कहा है, वह सब ऐसा ही है। और मेरी मजबूरी है कि मैं परमात्मा को टोकरी में भर कर नहीं ला सकता, नासपातियों की तरह तुम्हें नहीं दे सकता। आकांक्षा तुम्हें देता हूं। लेकिन ध्यान रखना, मेरी आकांक्षा को जो मैंने तुम्हारे भीतर जगाई, जो अभीप्सा पैदा की, वह बस ऐसी ही है जैसे नासपातियों के संबंध में की गई मधुर चर्चा कितनी ही काव्यात्मक हो, कितने ही गीत से भरी हो, लेकिन स्वाद का तो मुकाबला नहीं कर सकती। तो तुम मेरे शब्दों से राजी मत हो जाना, तुम परमात्मा का स्वाद लेने निकलना। जब तक स्वाद न मिल जाये तब तक रूकना मत, तब तक यात्रा पूरी नहीं हुई। बहुत कमजोर शब्दों पर ही रूक जाते हैं। बहुत थोड़े लोग हैं जो अनुभव की यात्रा पर जाते हैं।
अद्वैत अनुभव है, स्वाद है। कोई दूसरा तुम्हें दे नहीं सकता। दूसरे से तुम्हें थोड़ी सी प्यास मिल जाये, बस काफी है। परमात्मा नहीं मिलता किसी से।
इन वचनों में उन्होंने सब भर दिया है जो वे भर सकते थे। लेकिन इन वचनों को समझ कर मत रूक जाना। यह मत समझ लेना कि समझ लिये वचन, अब और क्या बाकी बचा! शास्त्र जब पूरा समझ लिया जाता है तभी असली यात्रा शुरू होती है। शास्त्र को पूरा समझ लेने के बाद यह मत समझना कि अब क्या बाकी बचा? समझ तो लिया पूरा! जब तुमने पूरा समझ लिया, अभी पूरा बाकी है। अभी बात ही शुरू नहीं हुई है। क्योंकि स्वाद तो अभी आया नहीं। अभी तो तुम सिर्फ नींद से जगाये गये हो। अभी तुम उठे नहीं, अभी तुम्हारे पैर बढ़े नहीं, अभी आया नहीं। अभी तो तुम सिर्फ नींद से जगाये गये हो। अभी तुम उठे नहीं, अभी तुम्हारे पैर बढ़े नहीं, अभी उस मंदिर की तरफ तुम चले नहीं। अभी तो दूर मंदिर की गूंजती हुई घंटियां तुम्हारे कानों में पड़ी हैं। अभी मंदिर बहुत दूर है। कितनी ही मधुर हो घंटियों की आवाज, उसी को सुनते मत बैठ जाना।
संतों की आवाज मंदिर में गूंजती घंटियों की आवाज है। वे स्वर मंदिर से आते हैं। लेकिन वे स्वर मंदिर नहीं है। बहुत उनको पकड़ कर बैठ जाते है। तब बड़ी भ्रांति हो जाती है। तब जीवन एक डबरा बन जाता है और जीवन में गति नहीं रह जाती।
तुम जीवन को डबरा मत बनाना। संतों के वचन समझो, उनसे पुलक लो और यात्रा पर निकल जाओ। उनसे गति लो थोड़ी सी, थोड़ा सा धक्का लो। ऐसे ही जैसे हम कार के इंजन को स्टार्ट करते हैं, तो बैटरी का थोड़ा सा धक्का। फिर बैटरी के ही सहारे कोई इंजन नहीं चलता है, थोड़ा सा धक्का-और इंजन शुरू हो गया। बैटरी नहीं होती तो हम किसी से धक्का लगवा लेते हैं। उससे भी काम चल जाता है। कोई नहीं होता धक्का लगाने वाला तो थोड़ा गाड़ी को उतार पर खड़ा करके चला लेते हैं। उससे भी काम चल जाता है।
बस वह पहली पुलक और गति! संत-वचन उससे ज्यादा कुछ भी नहीं कर सकते। लेकिन वह भी बहुत बड़ा है। वह भी हो जाये तो भी सौभाग्य है।
अगर परमात्मा तुम्हें न मिलता हो तो आश्चर्य नहीं है। परमात्मा के मिलने की शर्त ही तुम पूरी न कर पाये। वह शर्त हैः परमात्मा तुम्हारी सभी आकांक्षाओं का संयुक्त रूप हो जाये। तुम सभी आकांक्षाओं में उसी को खोजो। सभी आकांक्षाएं उसी की तरफ दौड़ने लगें। तुम्हारा रोआं-रोआं, श्वास-श्वास उसी की तरफ गतिमान होने लगे। तुम उठो तो उसके लिये, बैठो तो उसके लिये, सोओ तो उसके लिये, भोजन करो तो उसके लिये।
अगर तुम परमात्मा को पाने में भी अपने बल पर भरोसा करते हो, तुम न पा सकोगे। क्योंकि तुम्हारा भरोसा परमात्मा पर अभी भी नहीं है। भरोसा तुम्हारा अपने पर है। यही अपने पर भरोसा तो संसार में था। अपने ही भरोसे पर सोचते थे सफलता पा लेंगे संसार में। अपने ही भरोसे पर सोचते थे धन कमा लेंगे संसार में। अपने ही भरोसे पर सोचते थे यह कर लेंगे, वह कर लेंगे। यही भरोसा तुम फिर यहां भी ले आये, मंदिर में भी। अब तुम कहते हो, अपने ही भरोसे पर पा लेंगे भगवान को भी।
अहंकार कैसे उसे पा सकेगा? यह अपने पर भरोसा तो अहंकार है। तुम ही तो बाधा हो। तुम्हारे बल तुम उसे न पा सकोगे। तुम निर्बल होकर ही उसे पा सकोगे। यह गणित बड़ा उलटा है- निर्बल के बल राम। यहां बली हार जाते हैं, निर्बल जीत जाते हैं।
अगर जीतना है तो जीतने की आकांक्षा छोड़ दो। हारने को तैयार हो जाओ, फिर तुम्हें कोई हरा न सकेगा। निर्बल के बल राम- सारा गणित एक है।
तो सांसारिक मनुष्य वह है जो अपने बल जीता है। चाहे वह धर्म कर रहा हो, तो भी सांसारिक है, तत्पश्चर्या कर रहा हो, तो भी सांसारिक है, उपवास कर रहा हो, व्रत कर रहा हो, तो भी सांसारिक है- अपने बल। समर्पित नहीं है, संघर्ष कर रहा है, लड़ रहा है।
बहुत करके देख लिया अपने बल, कुछ भी न हुआ। अपने बल सिर्फ मिटे, अपने बल सिर्फ भटके, अपने बल अंधकार पैदा हुआ, अपने बल अज्ञान बढ़ा, अपने बल नरक और महानरक निर्मित हुये। अपने बल कोई सुख न मिला, कोई शांति न मिली। क्योंकि वह अपना आपा ही सब दुःख का जड़ है। वह अहंकार ही सारे नरकों का बीज है।
परमात्मा को पाने का अर्थ कुछ पाना नहीं है, वरन कुछ छोड़ना है। वह सपना छोड़ना है। परमात्मा को पाने का अर्थ कुछ जोड़ना नहीं है, कुछ जुड़ गया है परमात्मा के साथ, उतना काट देना है। थोड़ी सी नींद है। कुछ पाप नहीं हो गया है। कुछ भूल नहीं हो गई। कुछ भूल हो नहीं सकती। क्योंकि अगर वहीं सबके भीतर है तो भूल कैसे हो सकती है? विश्राम हो गया होगा, भूल नहीं हुई है। थोड़ा ज्यादा सो गये है। थोड़ी समय से ज्यादा नींद ले ली है। थोड़े सपनों में बहुत दूर निकल गये हैं।
व्यक्ति भटकता है कर्मो के कारण। वह जो-जो करता है, सोचता है मैंने किये है। मैंने किये- और अहंकार निर्मित हुआ। और फिर अहंकार भटकाता चला जाता है।
और भ्रांति यह है कि कर्मों को चलाने वाला परमात्मा है, तुम नहीं। जिस दिन यह तुम्हें समझ में आ गया कि कर्मो को चलाने वाला वह है, मैं नहीं, कर्ता मैं नहीं हूँ, कर्ता वह है, उसी दिन तुम बाहर हो गये नींद के। नींद की कुल कला इतनी है कि तुम सोचते हो, कर्ता मैं हूँ।
अगर तुम यह याद रख सको, अगर यह स्मरण तुम्हारे जीवन में बैठ जाये, एक दीये की तरह जलने लगे भीतर कि जब भी भ्रांति तुम्हें पकड़ने लगे कर्ता की, तत्क्षण छोड़ दो। हंस कर आकाश की तरफ देख लेना और कहनाः फिर! फिर वही! मेरे सिर दिया! तू ही संभाल।
थोड़े दिन में दीया ठीक से जलने लगेगा। फिर यह कहने की सोचने की भी जरूरत न रह जायेगी। जो कुछ भी होगा, तुम जानोगे, वही कर रहा है, अच्छा हो, बुरा हो। फिर तुम जब बीच में न रहे तो क्या अच्छा और क्या बुरा! जब सभी उसका है तो अच्छा ही होगा। फिर दोनों नदी के किनारे स्वर्ग हैं। फिर दूसरा किनारा नरक नहीं है।
मैं तुमसे कहता हूं, स्वर्ग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। नरक आदमी की ईजाद है। स्वर्ग अस्तित्व है। नरक आदमी का ख्याल है। क्योंकि तुम्हें नरक तो बनाना ही पड़ेगा, दुश्मनों को कहां डालोगे? शत्रुओं को कहां डालोगे? कोई जगह तो चाहिये। और इस नरक के साथ तुमने जिस स्वर्ग की कल्पना की है, वह भी झूठ है। क्योंकि वह असली स्वर्ग नहीं हो सकता। असली स्वर्ग में तो नरक है ही नहीं। बुरा तो है ही नहीं। यही तो धार्मिक व्यक्ति की परम क्रांति की दशा है, जहां उसे बुरा दिखाई ही नहीं पड़ता। भला ही है, क्योंकि सभी पर उसी एक का हस्ताक्षर है। सभी स्वर उसके है, तो बुरा हो कैसे सकता है?
अगर तुम्हें बुरा भी दिखाई पड़ता हो तो समझना कि अपनी आंख की ही कोई भूल होगी, अपनी दृष्टि की कोई भूल होगी, अपनी व्याख्या की कोई भूल होगी। लेकिन बुरा हो नहीं सकता।
जिस दिन तुमने वह भवन खोज लिया जिसका नाम नेति-नेति है- न यह, न वह। द्वंद्व गया। अद्वैत का स्वाद आना शुरू हुआ। और वही एक स्वाद पा लेने जैसा है। ओर सब स्वाद तुम पाते रहो, वे कोई भी स्वाद तुम्हें तृप्त न कर सकेंगे। परितृति उन स्वादों में नहीं है। उस एक स्वाद को पाकर ही सारी भूख मिट जाती है, सारी स्वाद की आकांक्षा मिट जाती है। उस गहन परितोष की उपलब्धि होती है, जिसका कोई अंत नहीं है।
परम पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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