





पिछले दो वर्षों के पत्रिका अंक में श्री विष्णु के कुल 24 अवतरों का वर्णन मैने किया कि कैसे भगवान नारायण ने पृथ्वी पर समय-समय पर अवतरित होकर आसुरी शक्तियों का, अधर्म, अशांति का समूल संहार कर धर्म की रक्षा की व पृथ्वी पर पुन: शांति व संतुलन को स्थापित कर धरा पर रहने वाले मनुष्यों, जीव-जंतुओं, प्रकृति को संरक्षित किया।
हिन्दू वर्ष के प्रत्येक माह में भगवान विष्णु ने किसी-न-किसी रूप में अवतरित होकर अपने भक्तों की प्राण रक्षा की है तभी श्री विष्णु के प्रत्येक अवतार की जयंती पूरे भारतवर्ष में धूम-धाम से मनाई जाती है। जैसे वराह जयंती, मत्स्य जयंती, राम नवमी, हनुमान जयंती, गुरू पूर्णिमा/व्यास पूर्णिमा, परशुराम जयंती, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आदि। यदि इन विशेष अवसरों पर शुद्ध हृदय भाव के साथ इन अवतारों का चिन्तन-स्मरण कर साधना की जाये, गुरूजी प्रदत्त दीक्षा ली जाये, विशेष अवसर से संबंधित चैतन्य कवच धारण किया जाये तो साधक जीवन के जो भी कष्ट, चिन्ता, बाधा है उससे मुक्ति प्राप्त कर श्री नारायण की भक्ति से भाव विभोर होकर उनकी चेतना शक्ति से परिपूर्ण होकर जीवन चक्र के प्रत्येक पायदान पर निर्भय होकर शत् प्रतिशत् सफलता प्राप्त करेगा यह निश्चित है।
नृसिंह अवतार साधना दीक्षा – भक्तों के प्राणरक्षक और असुरों की दुर्गति कर नाश करने वाले श्री नृसिंह भगवान जिन्हें श्री विष्णु के क्रुद्ध एवं आक्रामक रूप में शत्रुओं का नाश करने वाले के रूप में जाना जाता है। यदि साधक श्री नृसिंह की साधना संपन्न करते है एवं दीक्षा प्राप्त करते है तो भगवान नृसिंह की कृपा से इन्हीं के समान निर्भीक, शक्तिशाली स्वरूप युक्त होकर जीवन की दुःख, पीड़ा, कष्ट, शत्रु-बाधा आदि आसुरी स्थितियों से स्वयं को उबार लेने में पूर्ण सक्षम बन पराक्रम, बल युक्त बन जाते हैं। वैशाख मास की शुक्ल चतुर्दशी श्री नृसिंह जयंती पर साधक प्रभु की साधना सम्पन्न कर प्रभाव युक्त शक्ति से ओतप्रोत आत्मविश्वास से परिपूर्ण होते है।
साधना- पापहरण विपत्तिनाशक साधना सामग्री न्यौछावर 580/-
दीक्षा- श्री हरि विपत्तिनाशक पापहरण दीक्षा न्यौछावर 1800/-
पापहरण विपत्तिनाशक नृसिंह साधना
साधना सामग्री- नृसिंह यंत्र, नृसिंह गुटिका व नृसिंह रक्ताभ माला।
वैशाख मास की शुक्ल चतुर्दशी को या किसी भी बुधवार को प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर पीला आसन बिछाकर अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर किसी ताम्र पात्र में ‘‘नृसिंह यंत्र’’ व ‘‘नृसिंह गुटिका’ को स्थापित कर पूजा स्थान में बैठ जाएं। सर्वप्रथम संक्षिप्त गणेश/गुरू पूजन संपन्न कर गुरू मंत्र की 04 माला जप करें।
तत्पश्चात् यंत्र व गुटिका का पूजन कुंकुम, पुष्प, अक्षत, दीपक व नैवेद्य आदि से करें। फिर ‘‘नृसिंह रक्ताभ माला’’ से निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप नित्य 11 दिनों तक संपन्न करें:-
नित्य मंत्र जप पश्चात् गुरू पूजन कर गुरू आरती संपन्न करें। साधना समाप्ति उपरांत गुटिका को लाल धागे में पिरो कर गले में धारण कर लें और यंत्र व माला को किसी पवित्र जलाशय में विसर्जित कर दें। साधना काल में शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करें व भूमि शयन करें।
श्री कृष्ण अवतार साधना दीक्षा – कहते हैं कि श्री कृष्ण के भक्त कभी दुःखी नहीं रहते, सदा अपनी मस्ती में मगन रहते हैं और इसी तरह से जीवन की बाधाओं से पार भी हो जाते है। श्री कृष्ण के जीवन का प्रत्येक क्षण उत्सव समान उल्लासपूर्ण है। ठीक उसी भांति श्रावण मास में श्री कृष्ण की साधना संपन्न कर श्री माधव सर्व बाधा हरण दीक्षा प्राप्त करने से साधक संताप, उदासीनता, अवसाद, निराशा युक्त जीवन से मुक्त हो जीवन में नई उमंग से युक्त बन जाता है। उसे प्रत्येक दिन त्यौहार समान प्रतीत होने लगता है, निराशा उसे छू भी नहीं पाती और साधक श्री कृष्ण की ही भांति उत्साह युक्त हो जीवन पथ की प्रत्येक बाधा से एक-एक कर मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
साधना – कृष्णमय जीवन प्रेम उमंग प्राप्ति साधना सामग्री न्यौछावर 560/-
दीक्षा- श्री माधव सर्व बाधा हरण दीक्षा न्यौछावर 1800/-
श्रीकृष्णमय जीवन प्रेम उमंग प्राप्ति साधना
साधना सामग्री – कृष्ण चैतन्य यंत्र, कृष्णत्व गुटिका व योगेश्वर माला।
भाद्रपद मास की कृष्ण अष्टमी को या किसी भी अष्टमी की रात्रि 10:00 बजे पश्चात् स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर अपने पूजा स्थान में बैठ जायें, सर्वप्रथम संक्षिप्त गणेश/गुरू पूजन सम्पन्न कर गुरू मंत्र की चार माला जाप करें।
इसके पश्चात् ‘‘कृष्ण चैतन्य यंत्र’’ व ‘‘कृष्णत्व गुटिका’’ को स्नान करा कर शुद्ध वस्त्र से पोछकर अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर किसी पात्र में पुष्प बिछाकर स्थापित करें। यंत्र व गुटिका का पूजन कुंकुम, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप व नैवेद्य आदि से करें। इसके पश्चात् निम्न मंत्र की ‘‘योगेश्वर माला’’ से 11 माला मंत्र जप नित्य 11 दिनों तक सम्पन्न करें।
साधना समाप्ति पश्चात् गुटिका को पीले धागे में पिरो कर गले में धारण कर लें और यंत्र व माला को किसी नदी या पवित्र जलाशय में विसर्जित कर दें। साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करें, शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करें व भूमि शयन करें।
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