





ऐसा नहीं है कि कलियुग में ही लक्ष्मी का महत्व बढ़ गया है, लक्ष्मी की प्रधानता तो युगों-युगों से रही है। महाभारत में महर्षि व्यास जी ने लिखा है ‘पुरूषा धनं वधः’ अर्थात् लक्ष्मी का अभाव तो मनुष्य के लिये मृत्यु का चिन्ह है। लक्ष्मी के अभाव का तात्पर्य दरिद्रता है और शास्त्र कहते हैं, ‘‘सर्व कष्टा दरिद्रता’’ अर्थात् दरिद्रता सब कष्टों को देने वाली है, जो दरिद्र है, उसके पास कष्ट एक के बाद एक आते ही रहते हैं।
‘भर्तृहरि संहिता’ में नीति वाक्य लिखा है, कि जिसके पास लक्ष्मी है, वही पंडित है, गुणवान है, विद्वान है, रूपवान है, आदर्श है, जिसके पास लक्ष्मी है उसके पास सम्मान है, प्रतिष्ठा है।
देवी वरलक्ष्मी के विषय में वर्णन-
वरलक्ष्मी व्रत, श्रावण शुक्ल पक्ष के अन्तिम शुक्रवार को मनाया जाता है। वरलक्ष्मी सिद्धि दिवस धन एवं समृद्धि की देवी की आराधना करने हेतु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मुहूर्त में से एक है। भगवान विष्णु की पत्नी वरलक्ष्मी, देवी महालक्ष्मी के रूपों में से एक हैं। देवी वरलक्ष्मी का प्रादुर्भाव क्षीर सागर से हुआ था। देवी वरलक्ष्मी का रंग रूप का वर्णन दूधिया सागर के समान किया गया है तथा वे उसी रंग के वस्त्र धारण करती हैं।
मान्यताओं के अनुसार, देवी का वरलक्ष्मी रूप वरदान प्रदान करता है तथा अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। इसीलिये देवी के इस रूप को वर+लक्ष्मी के रूप में जाना जाता है, अर्थात देवी लक्ष्मी जो वर प्रदान करती हैं।
देवी वरलक्ष्मी की आराधना केवल स्त्रियों के लिये ही नहीं, अपितु पुरुषों के लिये भी सुझायी जाती है। वरलक्ष्मी की आराधना सन्तान, जीवनसाथी, विलासिता आदि सभी प्रकार के सांसारिक सुखों की कामनापूर्ति हेतु किया जाता है।
विवाहित स्त्रियों द्वारा पति एवं परिवार के अन्य सदस्यों की कुशलता के लिये वरलक्ष्मी पूजा की जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवी वर-लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने से अष्टलक्ष्मी पूजन के समान फल प्राप्त होता है। धन (श्री), पृथ्वी (भू), विद्या (सरस्वती), प्रेम (प्रीति), प्रसिद्धि (कीर्ति), शान्ति (शान्ति), आनन्द (तुष्टि) तथा शक्ति (पुष्टि) की आठ देवियों को अष्टलक्ष्मी के रूप में जाना जाता है। वरलक्ष्मी व्रतम् देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने एवं उनका आशीर्वाद ग्रहण करने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त दिवसों में से एक है।
वरलक्ष्मी पर्व अष्ट लक्ष्मी सिद्धि हेतु विशिष्ट मुहुर्त है, इस मुहुर्त का पूर्णतः लाभ प्राप्त करने हेतु सद्गुरू द्वारा मंत्र सिद्धि प्राण प्रतिष्ठित चौबीसा यन्त्र धारण करें, जिससे वरलक्ष्मी के वरदान स्वरूप आश्चर्यजनक लक्ष्मी प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
‘‘यन्त्र पहिर चौबीस। धन, सुख, भोग अनीसा।।’’ अर्थात जो अपनी उंगली में चौबीसा यंत्र की मुद्रिका धारण कर लेता है, वह आश्चर्यजनक रूप से लक्ष्मी प्राप्त करने लगता है, जिस प्रकार का भी भोग वह अपने जीवन में चाहता है, वह भोग, सुख, ऐश्वर्य उसे अनायास ही प्राप्त होने लगता है।
इस मुद्रिका की विशेषता है कि इसके धारण करने से आर्थिक दृष्टि से निरन्तर उन्नति होती रहती है, चारों तरफ का वातावरण कुछ ऐसा बन जाता है कि उसके आर्थिक स्त्रोत चारों तरफ से खुल जाते हैं। अच्छे व्यक्तियों से परिचय और सम्पर्क बनता है, और उनके माध्यम से ही जीवन में भोग एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होने लगती है।
गुरू गोरखनाथ के अनुसार चौबीसा और बीसा यंत्र का एक सा ही प्रभाव है, और दोनों ही कलयुग में तो अपने आप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, इसे बायें हाथ की मध्यमा उंगली में धारण किया जाना चाहिये।
इस मुद्रिका का प्रभाव कई साधकों ने किया है, यदि कहीं पर रूपया फंसा हो या निकल न रहा हो, तो इसके धारण करने से कार्य सम्पन्न होने लगता है, इस मुद्रिका की यह विशेषता है, कि यदि व्यक्ति पर कर्जा हो तो यह शीघ्र ही ऋण मिटा देता है, व्यापार नहीं चल रहा हो, तो इसके धारण करने से व्यापार बढ़ने लगता है, नया व्यापार शुरू होने लगता है, रूके हुये व्यापार में तेजी आने लगती है, व्यापार में बिक्री बढ़ जाती है, और एक प्रकार से देखा जाय, तो घर में धन की वर्षा सी होने लगती है। वास्तव में ही यह मुद्रिका कलियुग में कल्पवृक्ष के समान फलदायक है।
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