





जो मैं तुम्हें ज्ञान, चेतना दे रहा हूं वह कोई पन्नों पर या पुस्तकों में संजो के रखने की चीज नहीं है। मैं तुम्हें वह चेतना दे रहा हूं जिससे तुम्हारे दिव्य चक्षु जागृत हो सकें तथा तुम उन समस्त शक्तियों को अनुभव कर सको जिनको हमने देवी-देवता कहा है।
और यह तभी संभव है जब तुम निरन्तर गुरू के सम्पर्क में रहों तभी वह चेतना का प्रवाह बराबर गतिशील रह सकता है और गुरू सम्पर्क में रहना एक बहुत महत्त्वपूर्ण क्रिया है क्योंकि जब एक सूखी खेजड़ी की लकड़ी भी एक चंदन के सम्पर्क में आ जाती है तो वह साधारण लकड़ी भी अपने आप सुगंधमय हो जाती है।
गुरू चेतना का पूंज है, एक चेतना का स्त्रोत है, एक चेतना का सागर है। जब आप उसे निरंतर सम्पर्क में रहते है तो धीरे-धीरे वही चेतना आप में भी व्याप्त होने लग जाती है। उससे जुड़कर आपका भी जीवन सुगंधित तरंगित और दिव्य हो जाता है।
गुरू से जुड़ने का अर्थ कोई गुरू को पकड़ना नहीं। जुड़ने का अर्थ है उसके हृदय से अपने हृदय के तारों को जोड़ देना, अपने आत्मा को लीन कर देना, अपने मस्तिष्क और विचारो को पूर्णतः उस पर केन्द्रित कर देना। ऐसा कर देना कि फिर आप में और गुरू में कोई दूरी ही न रहे, कोई भेद ही न रहे।
गुरू के प्राणों से जुड़ने की आवश्यकता है क्योंकि गुरू का शरीर नहीं उनके प्राण ही उस चेतना के स्त्रोत है। जब यह जुड़ाव होता है तो फिर स्वयं आंखों से प्रेमाश्रु छलक पड़ते है। फिर स्वयं गुरू का नाम स्मरण करने लगते है, फिर स्वयं हृदय की धड़कन में गुरू का नाम उच्चारण होता प्रतीत होता है।
यह प्रक्रिया इतनी कठिन नहीं है और यो कहे तो इतनी सरल भी नहीं है। इसमें बस आवश्यकता है कि व्यक्ति अपने अहं को पूर्ण रूप से मिटा दें। केवल कहने भर मात्र से अहं नहीं मिटता। अहं मिटता है जब व्यक्ति स्वीकार कर लेता है कि जो कुछ उसके जीवन में घटित हो रहा है वह गुरू की इच्छा से हो रहा है।
ऐसी स्थिति आने पर व्यक्ति स्वयं को गुरू से अलग नहीं अनुभव करता। प्रतिक्षण वह गुरू चरणों में लीन रहता हुआ, भौतिक जीवन को भी जीता हुआ, आध्यात्मिकता से उच्चतम लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है।
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