





व्यक्ति की मानसिकता में जो संदेह उसे घेरे रहते हैं और इन संदेह और अविश्वास के कारण वह अपनी आत्म स्थिति को अनुभव नहीं कर पाता। व्यस्त जीवन, कार्य भार एवं कर्त्तव्यों के बोझ से व्यक्ति का जीवन एक मजदूर सा हो जाता है और वह तनावों से, चिंताओं से ग्रस्त हो जाता है और कई बार तो वह मानसिक रोगी तक भी हो जाता है।
जीवन में पढ़ाई, लिखाई, नौकरी, विवाह इत्यादि जितने भी कर्म हैं वे सब फल के अधीन हैं। फल की आशा को त्याग कर कोई भी व्यक्ति कर्म नहीं करता है और यही उसकी समस्याओं का मूल कारण है। जो कर्म कर्तव्य भाव से किया जाता है, उसमें व्यक्ति उसके कर्म के फल से चिपकता नहीं है जबकि बिना कर्तव्य की सकाम क्रिया ऐसा कर्म बनती है जो उसे निरंतर बंधनों में लपेटती रहती है। जिस कर्म के फल में मनुष्य की बुद्धि लिप्त है और जो कर्म इच्छा से प्रेरित होकर किया जाता है वही कर्म फल, संस्कार तथा जन्म-मरण के कारण बनते हैं। लेकिन जो कर्म कामना रहित फल की आशा से मुक्त होकर किया जाता है तो उसे कर्मयोग कहते हैं। अर्थात् जो व्यक्ति कर्म फल पर आश्रित न रहकर कर्म करता है वही संन्यासी है, वही योगी है।
सद्गुरुदेव निखिल के संन्यास आश्रम प्रवेश दिवस कार्तिक पूर्णिमा की दिव्यतम चेतना में जीवन कर्मफल के इन्हीं सिद्धान्तों की चेतना को आत्मिक रूप से सभी समर्पित शिष्य आत्मसात कर सकेंगे। जो अपने आप में अत्यन्त दुर्लभ दीक्षा है। इस दीक्षा के माध्यम से साधक-शिष्य अपनी आत्म चेतना से सम्पर्क स्थापित कर जीवन के सभी मूल कर्तव्यों का निर्वाह पूर्ण कर्मयोग स्वरूप में करने में सफल होता है। जिससे उनके सांसारिक जीवन में सुख-शांति, प्रसन्नता, आनन्द का वातावरण निर्मित होता है और वे अपने सांसारिक जीवन को श्रेष्ठतम स्वरूप में व्यतीत करते हुए पूर्णता की प्राप्ति करने की ओर अग्रसर होते हैं।
संन्यास महोत्सव अपने-आप में साधनात्मक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व है और देखा जाये तो, पूरा भारतवर्ष इस कार्तिक मास में पूर्ण आध्यात्मिक वातावरण से ओत-प्रोत होता है। इस मास का संन्यास महोत्सव का प्रत्येक दिवस अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि ये व्यक्ति के पूर्ण जीवन चक्र का प्रतिनिधित्व करते है, इसलिए इन दिनों में किसी भी प्रकार का किया गया कार्य अपने-आप में आने वाले वर्ष में फलप्रद होता है।
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