





मानव जीवन का अर्थ, अपने भौतिक आध्यात्मिक जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति है, केवल कर्म करना, मेहनत करना, शरीर को थकाना, वह तो केवल मजदूरी है जो आपको शरीर से, मन से थका देगी, परन्तु केवल मेहनत करने से क्या आपको सफलता, पूर्णता, तृप्ति प्राप्त होगी? मेहनत तो एक मजदूर भी करता है पर क्या उसे पेट भर खाना भी मिलता है या उस मेहनत के बाद मन में संतोष के भाव आते है? केवल तप-कार्य मेहनत से आप अपना प्रारब्ध अपने भाग्य नहीं बदल सकते हो।
तो पुरूषार्थ वो कर्म, वो मेहनत है जो आपको भौतिक व आध्यात्मिक सफलता प्रदान करें, आपके मन को थकाये या निराश न करे अपितु जगाये व नई ऊर्जा प्रदान करें। पुरूषार्थ तो वो कर्म है जो आपके प्रयत्नों को सही दिशा दें, आपके मन-मस्तिष्क को शक्ति-ऊर्जा प्रदान करें, आपके हर एक श्रम को आपके शरीर- मन को साधने में सहायक हो।
मेहनत तो कोई भी कर सकता है लेकिन पुरूषार्थ केवल वही कर सकता है जिसके मन में वह अग्निपूंज हो व संकल्प शक्ति हो अपने भाग्य को बदलने की अपने वर्तमान को बदलने की, काम सिर्फ शरीर से नहीं अपितु बुद्धि से करना है, तभी आप बुद्धिजीवी कहलाओगे।
जीवन तो ऐसे ही चलता रहेगा, जो कार्य आज किया था वो कल भी करोगे बस एक सामान्य जीवन लेकर आये थे, और परिस्थितियों के तले एक सामान्य ही मरोगे। और अगर सामान्य नहीं मरना अपनी परिस्थिति के अधीन नहीं रहना तो अपने पुरूषार्थ को, अपने अन्दर की उस अग्नि को, चेतना को जागृत करो। अपने उद्देश्य को, लक्ष्य को एक दिशाहीन नहीं अपितु एक नियोजित पथ बनाये। कोई काल्पनिक या कपोल कल्पित लक्ष्य नहीं अपितु ऐसा लक्ष्य जिसे आप सोच सके जिससे आप नित्य कार्य कर सके तभी आप अपने उस इच्छित कर्म के फल की प्राप्ति कर पाओगे उस कर्म से, उस पुरूषार्थ से ही आपका प्रारब्ध बदलेगा, आपका कल बदलेगा।
इस संसार में कोई भी सफल व्यक्ति या संसाधन केवल भाग्य या आशीर्वाद के तले सफल हुआ, वे सफल तभी हुआ जब उस कार्य लक्ष्य में कर्म व आत्म शक्ति व दिव्य चेतना का समावेश हुआ।
आपमें वो क्षमता है, पौरूष है जो उस कार्य को, उस लक्ष्य को पूर्ण करने में आपके सहायक होंगे क्योंकि आपके साथ आपके गुरू है, आपके प्राणेश्वर है जिन्होंने आपको एक साधक के रूप में एक शिष्य के रूप में जन्म दिया।
अपने पुरूषार्थ को याने अपने सभी प्रकार के अवरोधों को चाहे वे मानसिक हो या भौतिक उनके संहार के लिये उन शत्रुओं के अन्त के लिये आप 05-06-07 दिसम्बर को श्री जगन्नाथ हरि केशव योग-भोग चक्रधारी साधना महोत्सव, जगन्नाथ पुरी (Orissa) में भाग लेकर आप भी चेतना से परिपूर्ण हो।
आपका अपना
विनीत श्रीमाली
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